शनिवार, 19 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१४॥ -----

धर्म चरन अनुहारिहि सो तो राजसि पंथ । 
अगति को जहाँ गति मिले सो दिग्दर्सक ग्रंथ ॥ ३१४१ ॥ 
भावार्थ : -- धर्मा-चरण अर्थात जो सत्य दया तप दान का आधारित हो वह पथ जगतपति ईश्वर तक जाने के लिए  राज-पथ है । इन चरणों से विहीन पथ गड्डे वाले होते हैं जो दुर्घटना को निमंत्रित करते रहते हैं ॥ जिस धर्म- ग्रन्थ में निराश्रित को ईश्वर स्वयं बहिर्गत होकर आश्रय देते हैं वह पथप्रदर्शक होते है । जो निराश्रित को भी ईश्वर का आश्रय दे वही ग्रन्थ दिग्दर्शक है ॥

निराश्रित जैसे : -- केवट,शबरी और संत कबीर आदि.....

अभिमानि मन भगवन सों चले मिलन बरियाए । 
भाव भगति के साधनहि तासों मेल कराए ॥ ३१४२ ॥ 

भावार्थ : -- लोभी और अभिमानी मानस को ईश्वर नहीं मिला करते बलपूर्वक तो कदापि नहीं मिलते । धर्म के पंथ में भाव और भक्ति  के साधन से ही ईश्वर प्राप्त होते हैं ॥ 

कामी क्रोधी लालची जाति बरन कुल खोए । 
भकति करै को सूरवाँ इनते भक्ति न होए ॥ 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----


यह जग जो को आइया, लगे जीउ धन जोड़ । 
कोउ पाप करि छोड़ गए कोउ धर्म करि छोड़ ॥३१४३ ॥ 

भावार्थ : -- इस संसार में जो भी आया अपनी ही पेट पूजा में लगा रहा ।  कोई पाप छोड़ गया कोई धर्म छोड़ गया ॥ 

धर्म संग  को धर्म करि पाप संग  को पाप । 
धरम जग सुख दाइया पाप देइ परिताप ॥३१४४॥ 

भावार्थ : -- धर्म से प्रेरित होकर कोई धर्म तो पाप से कोई पाप करता गया । धर्म ने इस संसार को सुखमय कर दिया और पाप ने इसमें दुःख ही दुःख भर दिया ॥ 

मरत परत पुनि मेलिआ जाने कौन सरीर । 
जग सुख भर जिए जाइये हरते बाक़ी पीर ॥ ३१४५॥ 
भावार्थ : -- मृत्यु के पश्चात फिर न जाने कौन सी देह मिले । अत: संसार में दुःख हरते व् सुख भरते हुवे जीवन की यात्रा करें॥  

निज मर्यादा भूर जो भूरे पथ मर्याद । 
चारि पांव को होइ के सो तो चले पयाद ॥३१ ४६ ॥ 
भावार्थ : -- यात्री के साथ साथ धर्मगत पथ की भी एक मर्यादा होती है जो इसका उल्लंघन करते हैं वे चार पाँव के होकर पाँव-पाँव ही चलते हैं । चार दिन चले अढ़ाई कोस अर्थात यह संसार उनसे पार नहीं होता ॥ 

बासन को हरि बास है  बाचन को हरि नाम । 
चारन हरि के चरन हैं कारन हरि के काम ॥३१४६ ॥ 
भावार्थ : - बसने को यहाँ ईश्वर का निवास वाचन  के लिए ईश्वर का नाम ही उत्तम है । चलन के लिए ईश्वर का आचरण व् करने के लिए ईश्वर के काम अर्थात हितकारी कार्य ही उत्तम हैं ॥

मानस देहाकार में चौपट करे द्वार ।
भवबन्धन बिमोचन कर भगवन कहे सिधार ॥३१४७ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य की देह गढ़कर ईश्वर ने संसार के द्वार खोल दिए । और जीवों से कहा सांसारिक बंधनों को विमोचित करो जाओ मरो ( संसार पार करो )  ॥

चैन बिसारे दिवस में नींद बिसारे रैन । 
देखे जग का चाँदना सोइ पसारे नैन ॥३१४८।। 
भावार्थ : --   जिसने परमार्थ हेतु दिवस में सुखभोग व् रयन में निद्रा को तिरोहित किया यह अंधकार मय संसार उसी के सम्मुख प्रकाशित हुवा ॥

जबलग हस्त चरन चरे हरें जगत की पीर । 
पंथि तब का कीजो जब सेवा मँगिहि सरीर ॥३१४९॥ 
भावार्थ : -- जब तक हाथ पैर चलते रहें सेवाभिरत होकर इस दुखिया संसार की पीड़ा हरण करते रहे । हे धर्म गत पंथ के पंथी जब यह शरीर ही सेवा माँगने लगे तब क्या करोगे यदि तुम किसी का दुःख हरोगे तो तुम्हरा दुःख भी कोई हरेगा ॥

पहली अवस्था में वह कार्य करें कि वृद्धा अवस्था सुखपूर्वक व्यतीत हो,जीवन पर्यन्त वह कार्य करें जिससे मरने के पश्चात भी सुख से रह सकें.....
----- ॥ विदुर ॥ -----

सब  जग जिन्हनि जानिआ  परिचित सब गन मान । 
अस परचन का कीजिये, परचित नहि भगवान  ॥ ३१५० ॥ 
भावार्थ : -- जिसे संसार भर के लोग जानते हों सभी गणमान्य से परिचय हो । यदि उसका ईश्वर  से ही परिचय नहीं है तो फिर ऐसे परिचय से क्या लाभ ?   कारण कि अंतत: जाना उसी के पास है अत: अन्य किसी से चाहे न हो किन्तु ईश्वर से परिचय अवश्य होना चाहिए ॥








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