रविवार, 13 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१३॥ -----

सागर में की माछरी काटे उदर समाए  । 
जो को मोती होइया सो सब कंठ गहाए ॥ ३१३१ ॥ 
भावार्थ : -- अपने कुकृत्यों से जो इस भवसागर की मछली बने वे कटकर उदर में समाहित हो गए । सत्कृत्यों से जो मुक्ता हुवे वे सब के कंठ लगे ॥ 

बालक हो गर्भस्थ हो बिरधा हो कि जुवान । 
यह कराल काल सबन्हि कवलिनि एकै समान ॥३१३२ ॥ 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बालक हो चाहे गर्भस्थ हो वृद्ध हो चाहे कोई युवा ही क्यों न हो । यह विकराल मृत्यु सबको एक समान उठाती है । तेरी उठौनी दुनिया से भिन्न  न होगी इसलिए भिन्न भिन्न मत कर किसी और को काट ॥ 

जग सोंहि न जाने केत गयऊ भुगतत रोग । 
तापर भयकर भोग सों डरपत नाही लोग ॥३१३३ ॥ 
॥ भावार्थ : -- रोगों के भुक्त भोगी होकर संसार से न जाने कितने ही मरते चले जाते हैं हम प्रतिदिवस टी वी में पड़ते हैं समाचार पत्रों में देखते हैं कि मत्यु भी कितनी वीभत्स होने लगी है तथापि लोग भोगवादी प्रवृत्ति से भयभीत नहीं होते ॥ 

जीवन है एक झूलना जन्म मरन दो कूल  । 
मरन कूल बिसराए के लोग रहे हैं झूल  ॥ ३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन एक झूला है और जनम -मरण  इसके दो छोर हैं । भोगवादी युग में  लोग जीवन के आनंद में इस भांति निमग्न हैं कि उन्होंने मरण छोर को ही बिसरा दिया ॥ 

मानव धरम त्याज नित धन का करे ध्यान । 
जेहिं मन भीमन तहाँ कहँ ते आए ग्यान ॥ ३१३५ ॥  
भावार्थ : -- मानवोचित  कर्म व धर्म के अन्यथा धन के ध्यान में लगा हुवा मानव  मानवता के अभिमान में रहे तो उसे ज्ञान (  कृत्याकृत्य का बोध )  नहीं होगा, यदि ज्ञान नहीं होगा तो समस्या का समाधान  भी नहीं होगा ॥ 
बिबेक हीन सुलभ हुवे दुर्लभ हंस बिबेक । 
बाकी चाल चलत मिले काग बक एक ते एक ॥ ३१३६॥ 
भावार्थ : -- विवेक हीनता जब सुलभ हो जाती है  तब हंस विवेक दुर्लभ हो जाता है । अब तो हंस की चाल चलते  कौवें और बकुले एक से एक मिलने लगे हैं हंस नहीं मिलते ॥ हंस यदि दुर्लभ हो जाएंगे तो ज्ञान कूण देगा ॥ 

हमारे देश में तो कौंवे भूंकते हैं अर्थात हमारे देश में तो कौंवे भी कौंवे नहीं रहे आधे तितर आधे बटेर हो गए हैं..... 

यह दुनिया ईसाई और मुसलमानों से ही भरी पड़ी है ।इसलिए भीड़ न बनें भारत वंशी रहें भारतीय रहें और धार्मिक बनें.....

जनम मरण के पंथ में धाम धाम बिसराम । 
 जो पंथी पूरन परे पहुंचे मुक्ति धाम ॥३१३७ ॥ 
भावार्थ : -- जन्म- मरण के पंथ में ईश्वर के धाम (धर्मगत तीर्थ )  विश्राम गृह हैं ।  पंथी यात्रा को पूर्ण कर इसके अंतिम छोर अर्थात मुक्ति धाम तक पहुंचते है ॥

जनम मरन के पंथ में जगती पंथी रूप ।
दिग्दर्सक सद्ग्रन्थ हैं, भगवन सार सरूप ॥३१३८॥ 
भावार्थ : -- जीवन-मरण के पंथ में मनुष्य जाति यात्री है पशु-पक्षी उसके साथी-संगी हैं ॥ धर्मगत वे सद्ग्रन्थ उ पथ प्रदर्शक हैं जिसके सार में ईश्वर का स्वरूप है ॥ 

यात्री  कौन है मुक्ति धाम में प्रवेश का पात्र कौन है  : -- मनुष्य जाति यात्री है धर्मगत सम्प्रदाय मुक्ति धाम में प्रवेश के पात्र होते है ॥ क्योंकि यह धाम उन्हीं के बनाए हुवे हैं ॥

 जगति भई अगतिकागति, जगत अगम गम्भीर । 
अजहुँ पग पग देत चली रोगारत भय पीर ॥ ३१३९ ॥
भावार्थ : -- यह जगत दुर्गम है दुर्बोध है रहस्यमयी है । इससे पार जाने के लिए पन्थो की रचना की गई और ईश्वर का आश्रय निर्मित किए गए  । किन्तु वर्तमान की मनुष्य जाति दुर्दशा-ग्रस्त होकर निराश्रित हो गई निराश्रिता के कारण कुपंथचरणी होकर यह संसार को आतंक रोग पीड़ा प्रदान करते चल रही है ॥

जगती जो पथ  मेलिया सबके एकै सरीर । 
बोले तूने सुख दिया मौनी को दुःख पीर ॥ ३१४० ॥ 
भावार्थ : -  हे मानव ! जीवन-मरण के पंथ में  जो भी मिलता है वे सभी देहधारी हैं  काटो तो सभी को पीड़ा होती है तथापि तूने वाग्मित्व  को सुख दिया और मौनत्व पर अत्याचार कर उसे  दुःख व् पीड़ा दी ॥ क्यों ?  :--  क्योंकि तुम मनुष्य हो ? मनुष्य तुम्ही क्यों हो ?  और कोई क्यों नहीं ?  कभी चिंतन तो कर ॥

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