मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१०- ३११ ॥ -----

अधरम कुकरम ऊँच भए नीच धरम सत काज । 
समाज हीन अगौइहैं पछोइ भया समाज ॥ ३१०१ ॥ 
भावार्थ : -- पाप व्यापित वातावरण में अधर्म व् कुकर्म ऊँचे और धरम व् सत्कर्म पददलित हो गया । अब समाज बिहीन जन आगे रहते हैं और समाज कहीं पीछे होता है ।

अब अधर्मी धर्म का व्  कुकर्मी सत्कर्म का उपदेश करते हैं समाज से बहिर्भूत समाज सुधारक कहलाते हैं ॥

नेम बधिता नेम धरे दोषी करे न्याय । 
रीति सब बिपरीत भई ऐसी बिधि बंधाए ॥ ३१०२ ॥ 
भावार्थ : - अधुनातन हम ऐसी विधि से बंधे है जिसमें नियम  का उल्लंघन  करने वाले ही नियम बना रहे  हैं अपराधी  न्याय करते हैं जो विपरीत है इस विधि में वो रीत है ॥

बहिरा बैठा कान दे गूंगा सुर समुझाए । 
कोयलिया करकस भई कौंवा रागिनि गाए  ॥ ३१०३ ॥ 

देसी भए परदेसिया  देस भया  परदेस । 
साजन कहाँ जा बिलिए, बोले होत क्लेस ॥ ३१०४॥ 
भावार्थ : -- पर्दे देख देख के शासन चलाया जा रहा है । परदेसी देसी हो गए हैं देसी बिदेसी हो गए हैं ॥ भारत की धर्मनरपेक्षता भारत वंशियों को मुसलमान व् ईसाई बना रही है..... 

अजहुँ त करम सोंह देस भयऊ अर्थ प्रधान । 
धन सम्पद हो चाहिये चाहे जेन बिधान ॥ ३१०५॥ 
भावार्थ : -- कर्म की प्रधानता विलुप्त हो चली है अब यह देश अर्थ प्रधान हो गया है । ऐसा वैसा कैसा भी हो लोगों के पास पैसा होना चाहिए ॥ 

निर्धन को दुत्कार  के धनी मान  सब दाहि । 
यह सम्पद कहँ ते आए, पूछे कोऊ नाहि ॥३१०६ ॥ 
भावार्थ : --  अर्थ  प्रधानता में निर्धन पददलित होता है और धनवान सम्मानित होता है ॥ धनवान प्रतिक्षण के नए नए वस्त्र,नए  नए वाहन,  नए नए भूषण, नए नए भाषण यह अपार धन सम्पती  कहाँ से लाता है किस पेड़ में उगाता है यह कोई नहीं पूछता ॥ 

सोइ नियंतन हीन हैं नेम नियंता जौन । 
बंधन बधिता आपहीं नेम बँधावै कौन ॥ ३१०७ ॥ 
भावार्थ : -- नियंत्रण कर्त्ता ही जब निरंकुश हों तो शासन व्यवस्था कैसे नियंत्रित होगी ।बाधक ही जब शासन प्रबंधक हो तो उसके बनाए नियमों का पालन कौन करेगा.....कोई नहीं करेगा ।  

सासन हर जब मेलिया पैसे में पै पांच । 
अँधेरी नगरी प्रगसिहीं नाना अर्थ पिसाच ॥३१०८ ॥ 
भावार्थ : - ऐसे शासन प्रबंधन में शासक ही पैसे में  पांच मिलने लगते हैं  नीति व् नियमों के अभाव रूपी अँधेरे में फिर भांति  भांति के अर्थ पिशाच प्रकट हो जाते हैं ॥  

सासन कस हो चाहिये सागर के समरूप । 
जोइ तापस चरन चरे  भरे ताल नद कूप ॥३१ ०९ ॥ 
भावार्थ : -- शासन कैसा होना चाहिए सागर के जैसा । जो टप का आचरण करत हुवे देश रूपी धरती के ताल नदी और कूप को अर्थ से भर दे जिससे वह लोकोपकारी कार्य में नियोजित हो ॥ 



प्रसासन घन हो चाहिये बरखे एक समरूप । 
खेत खेत को सींच के भरे ताल नद कूप ॥ ३११० ॥ 
भावार्थ : --  प्रशासन को ऐसा घन होना चाहिए । सागर के कार्यों में सहयोग करते जो एक रस वर्षा करे और खेत खेत को सींच कर धरती को हराभरा कर दे ॥ 

जन जन नदि नद होइयो बहियों धीरहि धीर । 
खेत खेत को सींच के मिल्यो सागर तीर ॥ ३१११ ॥ 
भावार्थ : -- जन जन को ऐसे नदि नद होना चाहिए जो व्यर्थ के नियम निबंधनों में बंधे बिना  धीरे धीरे बहे । खेत खेत को सिंचित कर जो सागर से जा मिले ॥ जहां नदी नद हों वहां ताल  तलैया निरुपयोगी होते हैं जहां नदी नद नहीं होते वहां ताल तलैया उपयोगी सिद्ध होते हैं ॥ छोटे छोटे बांध अच्छे होते हैं  लघुता में ही प्रभुता  बसती है ॥ 

कालि कमाई कुकर्मी ले गए देस बहार । 
वाका दुःख जा रोइया सासन असुअन ढार ॥ ३११२ ॥ 
भावार्थ : -- कुकर्मी कुकर्म की कमाई देस के बाहर ले जाते हैं । भारत-शासन ढाई ढाई मन आँसू  ढलका के उनके दुखड़ों को जा रोता है ॥ इसको और कोई रोने को नहीं मिलता, ये शासन है कि दुस्साशन है ॥ 

अन्न पचे काया  रचे पयसन प्रान सँजोए । 
जलमन्न सुभाषितम् तीनि रतन भू जोए ॥३११३ ॥ 
भावार्थ : - अन्न काया की रचना व् जल प्राण प्रतिष्ठित करता है । अत:पृथ्वी  में तीन ही वास्तविक रत्न ही जल अन्न और सुभाषित वचन । शासन को  इनके दुखड़े रोने चाहिए ॥ 

अर्थ के दोइ सुक्ल गति कै  त्याग कै दान । 
जो गत दुर्गत होइया  सो तो दुःख की खान ॥ ३११४ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ की दो ही गति कल्याणकारी होती है या तो उसका त्याग करो अथवा उससे धर्म करो ॥ अन्य गति में अर्थ की दुर्गति ही होती है ऐसी दुर्गति दुखों का भंडार होकर संसार में  रोग सोक व् आतंक का कारण बनती है ॥ 

धर्म नियंतन  हेतु है अर्थ लोकोपकार । 
काम हेतु भव भोग के मुकुत रहे संसार ॥ ३११५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म मनुष्य को अनुशासित कर उसे मर्यादित करने के लिए है । अर्थ संसार का भला करने के लिए है । काम सुख भोग के लिए है  ये तीनों संसार से मुक्ति के लिए है संसार में कोई जीव दुःख भोगने नहीं आता प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण वह  दुःख भोगता है  यह परिस्थितियां कर्मानुगत होती हैं ॥ 

धर्म से बड़ो अर्थ जहँ त्याग सोही भोग । 
बयस्कर निर्वासित तहँ आन बसे बहु रोग ॥३११६॥ 
भावार्थ : -- जहाँ  अर्थ धर्म से प्रधान होता है त्याग से भोग प्रधान होता है । स्वास्थ को निर्वासित कर वहां बहुंत से रोग आ बसते हैं ॥  वहां मनुष्य की आयु क्षीण होती जाती है आगे आगे यह देह पचास पचपन का ही एवरेज देगी ॥ 

जीव साधन बहुतक किए   जीवन किए बहु थोड़ । 
छोड़ छोड़ को जोड़िया जोड़ जोड़ को छोड़ ॥ ३११७ ॥ 
भावार्थ : - मनुष्य ने जीवन के साधन तो बहुंत संजो लिए जीवन थोड़े से भी थोड़ा कर दिया । जीवन को साधने के बहुंत विकल्प है किन्तु जीवन अल्प है वह त्याग करते हुवे संग्रह करे व् संग्रह करते हुवे त्याग करें ॥ 

हेरे मिलता  में सुना धन पति एक ते एक । 
हेरा कतहुँ न मेलिआ दासा मिले अनेक ॥३११८ ॥ 
भावार्थ : - सुना है कि इस दुनिया में एक से बढ़कर एक  धनपति हैं । ढूंडने निकले तो धन के दास अनेकानेक  मिले किन्तु पति कोई नहीं मिला  ॥ 

धन को दासा कारि के  रहें आप धन कंत । 
सोइ कहावन जोग है जगत माहि धनवंत ॥३११९ ॥ 
भावार्थ : -- जो धन को दास नियुक्त कर स्वयं उसका स्वामी रहे, वस्तुत: वही धनी कहलाने के योग्य है ॥  

धन सन पियजन बिहुनाए बिहुने हुए जब प्रान । 
भूरि चिता चढ़ाई के बिहनिहि देह बिहान ॥ ३१२० ॥ 
भावार्थ : -- जब प्राण  छूटेंगे तब धन भी छूटेगा और प्रियजन भी छूट जाएंगे । अंतकाल में जब चिता पर चढ़ाए जाओगे तब यह देह भी यही छूट जाएगी इसलिए पहले ही छोड़ते चलो अन्यथा अंत में तो सब कूछ  यहीं छूटना है ॥ 















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