गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१६ ॥ -----

रे मानस  तू मती कर बढ़ा बढ़ी की होड़ । 
दुनिया अगुसर होइहीं ताकू पीछे छोड़ ॥३१६१ ॥ 
भावार्थ :- हे मनुष्य तू बढ़ा - बढी की प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहित मत कर । ऐसे प्रोत्साहन से ये दुनिया  तुझे  पीछे छोड़ कर स्वयं आगे बढ़ जाएगी ॥ 

दुइ बात जग होइ रही कै दिन अरु कै  रात । 
को जगा को सोए रहा को गत को आयात ॥ ३१६२ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में दो बातें सदेव होती रही या तो दिन या रात  । कोई जगता रहा कोई सोता रहा कोई आता कोई जाता रहा ॥  

देखत देखत दिन गया निसि भी देखत जाए । 
जीउति काल दुराए के मरनी नियरे लाए ॥३१ ६३ ॥ 
भावार्थ : -- देखते देखते दिन व्यतीत हो गया रात भी व्यतीत हो जाएगी । ये रिक्त होते दिन-रात जीवन से दूर होकर मृत्यु को लक्षित हो रहे हैं ॥ 

जो तासों पिछुवाइया, करे संग दे हाथ । 
बढ़ते को पूकारिये चलो हमारे साथ ॥ ३१६४ ॥ 
भावार्थ : - जो तुमसे पीछे हो गए हों हाथ बढ़ा कर उन्हें अपने संग करो । जो तुमसे आगे निकल गए उन्हें हाँक लगा कर साथ चलने को कहो ॥ 

जब लग जीता जागता तब लग सब दए कान । 
आगिन केरि कौन सुने  छोड़ चले समसान ॥३१६५ ॥ 
भावार्थ : - जब तक जीवन है तुम्हारी कथा तब तक ही सुनी जाएगी ॥ मरणी पाछे  सब श्मसान में छोड़कर भाग जाते हैं आगे की फिर कोई नहीं सुनता है ॥ 

प्राण रहे न देह रहे रहे नहीं मुख बानि । 
मिर्तक पूनर जनम की का सो कहे कहानि ॥३१६६ ॥ 
भावार्थ : -- प्राण नहीं रहते तब काया भी नहीं रहती और मुख में वाणी भी विलोपित हो जाती है । फिर मृतक पुनर्जन्म की कथा कहे भी तो कैसे कहे किससे कहे ॥ 

जोडू मल जी चल बसा, स्वजन लगाए काड़ि । 
चलती बिरियाँ जोड़ गए घोड़ा गया न गाड़ि ॥३१ ६७ ॥ 
भावार्थ : -- जोडू मल जी मर गया मरते ही लोगों ने काड़ी ( माचिस ) लगा दी ॥ चलते समय न जोडू का जोड़ गया न घोड़े गए न गाड्डी गई ॥ 

चलता पथ जब उठि के गया कुकरमी दास । 
बाँस उठाए पडा मिला परनाले के पास ॥ ३१६८॥ 
भावार्थ : -- चलता चलता कुकर्मी दास भी उठ गया । कित्ते नहीं गया खोजा तो बांस मारता परनाले के पास पड़ा मिला ॥ 

आकासबानी हुई कि गए महात्मा चंद । 
नाचघर के संग संग मदिरालय हुए बंद ॥३१६९ ॥ 
भावार्थ : -- आकाशवाणी हुई ! क्यूँ हुई ? महात्मा चंद चल बसे इसलिए हुई । थे तब सब चालू थे जाते ही बंद हो गए ॥ 

जाकी नीयत रिति रहे भरे रहे जब पेट । 
बिलखत ऊपर चालिया धरम कर्म सब मेट ॥३१७०॥ 
भावार्थ : -- जिसकी जीवनचर्या असाधारण होती हैं और विचार दूषित होते हैं वह धर्म -कर्म का मटियामेट किए ऊपर देख कर चलता  है उसे पहले अपनी जाति अपना समाज दूसरे अपना  देश समझ में नहीं आता , फिर एक समय ऐसा आता है जब उसे यह दुनिया ही समझ में नहीं आती ॥ 


शनिवार, 26 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१५॥ -----

पंथ कतहूँ न जाइया पंथी आवहि जाहिं । 
बालपन आयत दरसिहि बिरधा गत दरसाहि ॥३१५१॥ 
भावार्थ : -- गतिशीलता पंथी में होती है पंथ में नहीं । गतायात पंथी का स्वभाव है पथ का नहीं । बाल्यावस्था में पंथी आता व् वृद्धावस्था में जाता दिखाई देता है ॥

पाँच पलक का  पाउना सहसहि जोग सँजोए । 
धोबा का गदहा ज्यूँ चला भार कू ढोए ॥ ३१५२॥ 
भवार्थ : -  घड़ी भर का आगंतुक और अनेकानेक वस्तुएं । ऐसा यात्री धोबी के गधे जैसा होता है जो अन्य के उपयोग हेतु भार ढोता चलता है ॥

आगे आगे जाय था पीछे पड़ा बिकास । 
चली काल की चाकरी मिलिआ खड़ा  बिनास ॥ ३१ ५३ ॥ 
भावार्थ : -- एक जणा आगे आगे जाय था बिकास का भूत उसके पीच्छे पड़ गया  । समय ने फिर ऐसा खेल खेला थोड़ा और आग्गे जाने पर उसे विनाश खड़ा मिला वो खाट पे पड़ा मिला ॥

कबहुँ चलता पीठ पीछु दीठ घुमाई देख । 
दरसे ललाम लाल सो  पाप कहत करि रेख ॥ ३१५४॥ 
भावार्थ : -- जीवन की यात्रा तय करते कभी अपने अतीत पर भी दृष्टि पात कर लेना । यदि पथ कहीं अथवा सर्वत्र रक्त से रंजीत दिखे तो उसे अपने पाप को रेखांकित करता हुवा आलेख समझना ॥

  मन मानस सँकोच रहे हरिदै रहे उदार ।
पाप किए कर भार गहे धरम किए त हरुबार ॥ ३१५५ ॥
भावार्थ : -- संकोचित मनो-मस्तिष्क पाप को प्रेरित करता है उदार हृदय धर्म को । मनोनिग्रह व् उदारशीलता से अधिकाधिक धर्म होता है । पाप यात्री के भार को बढ़ा देता है धर्म उसके भार को हल्का करता है ॥

यह मन ही है जो संसार के दुखों का कारण है......

अपना चलन भुलाए के चला चलन को और । 
अंत काल पछताइया पहुँच पराई पौर ॥ ३१५६॥ 
भावार्थ : -- जो अपना चलन बिसरा कर पराए चलन में चलता है । अंतकाल में वह पराई ड्योढ़ी को प्राप्त होकर पश्चाताप ही करता है ॥ अंग्रेज अंगेरज्जी से ब्याह करता रहा मुसल्ले से हिन्दू को सिखाता तू हिंदी से ब्याह मत कर  । मुसल्ला अपनी ढक के रखता दूसरे की उघाड़ता फिरता.....

अपने चलन बिसुर चले , आन  कही अनुहार । 
पुर्बल जहँ ते चालिआ पहुंचे सोए द्वार ॥ ३१५७ ॥ 
भावार्थ : --  दूसरों की कही में आकर जो अपने धर्म का अपने चलन का तिरस्कार करता है । जहां से चला था वह वहीं पहुँच जाता है । जीवन की यात्रा तय करने हेतु उसे किसी न किसी धर्म की आवश्यकता होगी ही होगी ॥ 

धर्म संविधान के अनुसार नहीं चलता धर्म तत्संबंधित ग्रंथों के आधार पर चलता है.....

दस पांच लोगों की सुविधाओं के लिए बनाया गया पचास साठ साल पुराना भारत का संविधान तय करेगा की तुम हिन्दू हो कि मुस्लिम हो की ईसाई हो,  फिर धर्म ग्रन्थ क्या करेंगे..... 

फलाँराम कहाए चहे बोया बिआ बबूल । 
बिरवा तैसा होइया जैसा वाका मूल ॥ ३१ ५८ ॥ 
भावार्थ : - बबुल का बोया हुवा बिरवा अब फलाराम कहलाना चाहता है । पेड़ वैसा ही होगा जैसी उसकी जड़ें होंगी जड़ कैसी होंगी जैसा बीज होगा ॥ 

फूल बोए फूलहि फरे सूल बोए तो सूल । 
 साधो धरे न होइआ फलबर नाउ बबूल ॥ ३१५९ ॥ 
भावार्थ : -  मार्ग में फूल बोएंगे तो फूल ही प्राप्त होंगे सूल बोएगे तो सूल ही प्राप्त होंगे । बबूल  का नाम आम रखने से वह आम नहीं होता ।  कहने वाले कहते हैं फल सभी एक होते हैं, होते हैं क्या.....? 

 सूल पीर दे पेलिआ फूल चरन सहलाए । 
फलाराम जहँ मेलिआ सबके छुधा मिटाए ॥३१६० ॥ 
भावार्थ : - कंटक मार्ग  को बाधित कर पीड़ा ही देता है । पुष्प उस पीड़ा को हरण कर चरण को सुख प्रदान करता  है । जहाँ कहीं कोई फलवाला मिल जाए तो वह सबकी क्षुधा हरण करता चलता है ॥ इसलिए फलफूल वाले बनो सूल वाले मत बनो । दयालू बनो सत्यवादी बनो दानी बनो त्यागी बनो मर्यादित रहो..... 
   

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १८० -----

" राजू !!! सत्ता से अधिक मंत्री का प्रिय होना कोई नया फैसन है क्या..... ? " 

राजू : - न न मास्टर जी ! ऎसे ऐसे फेसन पंजे ने घणैइ किए हैं..... 


शनिवार, 19 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१४॥ -----

धर्म चरन अनुहारिहि सो तो राजसि पंथ । 
अगति को जहाँ गति मिले सो दिग्दर्सक ग्रंथ ॥ ३१४१ ॥ 
भावार्थ : -- धर्मा-चरण अर्थात जो सत्य दया तप दान का आधारित हो वह पथ जगतपति ईश्वर तक जाने के लिए  राज-पथ है । इन चरणों से विहीन पथ गड्डे वाले होते हैं जो दुर्घटना को निमंत्रित करते रहते हैं ॥ जिस धर्म- ग्रन्थ में निराश्रित को ईश्वर स्वयं बहिर्गत होकर आश्रय देते हैं वह पथप्रदर्शक होते है । जो निराश्रित को भी ईश्वर का आश्रय दे वही ग्रन्थ दिग्दर्शक है ॥

निराश्रित जैसे : -- केवट,शबरी और संत कबीर आदि.....

अभिमानि मन भगवन सों चले मिलन बरियाए । 
भाव भगति के साधनहि तासों मेल कराए ॥ ३१४२ ॥ 

भावार्थ : -- लोभी और अभिमानी मानस को ईश्वर नहीं मिला करते बलपूर्वक तो कदापि नहीं मिलते । धर्म के पंथ में भाव और भक्ति  के साधन से ही ईश्वर प्राप्त होते हैं ॥ 

कामी क्रोधी लालची जाति बरन कुल खोए । 
भकति करै को सूरवाँ इनते भक्ति न होए ॥ 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----


यह जग जो को आइया, लगे जीउ धन जोड़ । 
कोउ पाप करि छोड़ गए कोउ धर्म करि छोड़ ॥३१४३ ॥ 

भावार्थ : -- इस संसार में जो भी आया अपनी ही पेट पूजा में लगा रहा ।  कोई पाप छोड़ गया कोई धर्म छोड़ गया ॥ 

धर्म संग  को धर्म करि पाप संग  को पाप । 
धरम जग सुख दाइया पाप देइ परिताप ॥३१४४॥ 

भावार्थ : -- धर्म से प्रेरित होकर कोई धर्म तो पाप से कोई पाप करता गया । धर्म ने इस संसार को सुखमय कर दिया और पाप ने इसमें दुःख ही दुःख भर दिया ॥ 

मरत परत पुनि मेलिआ जाने कौन सरीर । 
जग सुख भर जिए जाइये हरते बाक़ी पीर ॥ ३१४५॥ 
भावार्थ : -- मृत्यु के पश्चात फिर न जाने कौन सी देह मिले । अत: संसार में दुःख हरते व् सुख भरते हुवे जीवन की यात्रा करें॥  

निज मर्यादा भूर जो भूरे पथ मर्याद । 
चारि पांव को होइ के सो तो चले पयाद ॥३१ ४६ ॥ 
भावार्थ : -- यात्री के साथ साथ धर्मगत पथ की भी एक मर्यादा होती है जो इसका उल्लंघन करते हैं वे चार पाँव के होकर पाँव-पाँव ही चलते हैं । चार दिन चले अढ़ाई कोस अर्थात यह संसार उनसे पार नहीं होता ॥ 

बासन को हरि बास है  बाचन को हरि नाम । 
चारन हरि के चरन हैं कारन हरि के काम ॥३१४६ ॥ 
भावार्थ : - बसने को यहाँ ईश्वर का निवास वाचन  के लिए ईश्वर का नाम ही उत्तम है । चलन के लिए ईश्वर का आचरण व् करने के लिए ईश्वर के काम अर्थात हितकारी कार्य ही उत्तम हैं ॥

मानस देहाकार में चौपट करे द्वार ।
भवबन्धन बिमोचन कर भगवन कहे सिधार ॥३१४७ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य की देह गढ़कर ईश्वर ने संसार के द्वार खोल दिए । और जीवों से कहा सांसारिक बंधनों को विमोचित करो जाओ मरो ( संसार पार करो )  ॥

चैन बिसारे दिवस में नींद बिसारे रैन । 
देखे जग का चाँदना सोइ पसारे नैन ॥३१४८।। 
भावार्थ : --   जिसने परमार्थ हेतु दिवस में सुखभोग व् रयन में निद्रा को तिरोहित किया यह अंधकार मय संसार उसी के सम्मुख प्रकाशित हुवा ॥

जबलग हस्त चरन चरे हरें जगत की पीर । 
पंथि तब का कीजो जब सेवा मँगिहि सरीर ॥३१४९॥ 
भावार्थ : -- जब तक हाथ पैर चलते रहें सेवाभिरत होकर इस दुखिया संसार की पीड़ा हरण करते रहे । हे धर्म गत पंथ के पंथी जब यह शरीर ही सेवा माँगने लगे तब क्या करोगे यदि तुम किसी का दुःख हरोगे तो तुम्हरा दुःख भी कोई हरेगा ॥

पहली अवस्था में वह कार्य करें कि वृद्धा अवस्था सुखपूर्वक व्यतीत हो,जीवन पर्यन्त वह कार्य करें जिससे मरने के पश्चात भी सुख से रह सकें.....
----- ॥ विदुर ॥ -----

सब  जग जिन्हनि जानिआ  परिचित सब गन मान । 
अस परचन का कीजिये, परचित नहि भगवान  ॥ ३१५० ॥ 
भावार्थ : -- जिसे संसार भर के लोग जानते हों सभी गणमान्य से परिचय हो । यदि उसका ईश्वर  से ही परिचय नहीं है तो फिर ऐसे परिचय से क्या लाभ ?   कारण कि अंतत: जाना उसी के पास है अत: अन्य किसी से चाहे न हो किन्तु ईश्वर से परिचय अवश्य होना चाहिए ॥








रविवार, 13 दिसंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३१३॥ -----

सागर में की माछरी काटे उदर समाए  । 
जो को मोती होइया सो सब कंठ गहाए ॥ ३१३१ ॥ 
भावार्थ : -- अपने कुकृत्यों से जो इस भवसागर की मछली बने वे कटकर उदर में समाहित हो गए । सत्कृत्यों से जो मुक्ता हुवे वे सब के कंठ लगे ॥ 

बालक हो गर्भस्थ हो बिरधा हो कि जुवान । 
यह कराल काल सबन्हि कवलिनि एकै समान ॥३१३२ ॥ 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बालक हो चाहे गर्भस्थ हो वृद्ध हो चाहे कोई युवा ही क्यों न हो । यह विकराल मृत्यु सबको एक समान उठाती है । तेरी उठौनी दुनिया से भिन्न  न होगी इसलिए भिन्न भिन्न मत कर किसी और को काट ॥ 

जग सोंहि न जाने केत गयऊ भुगतत रोग । 
तापर भयकर भोग सों डरपत नाही लोग ॥३१३३ ॥ 
॥ भावार्थ : -- रोगों के भुक्त भोगी होकर संसार से न जाने कितने ही मरते चले जाते हैं हम प्रतिदिवस टी वी में पड़ते हैं समाचार पत्रों में देखते हैं कि मत्यु भी कितनी वीभत्स होने लगी है तथापि लोग भोगवादी प्रवृत्ति से भयभीत नहीं होते ॥ 

जीवन है एक झूलना जन्म मरन दो कूल  । 
मरन कूल बिसराए के लोग रहे हैं झूल  ॥ ३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन एक झूला है और जनम -मरण  इसके दो छोर हैं । भोगवादी युग में  लोग जीवन के आनंद में इस भांति निमग्न हैं कि उन्होंने मरण छोर को ही बिसरा दिया ॥ 

मानव धरम त्याज नित धन का करे ध्यान । 
जेहिं मन भीमन तहाँ कहँ ते आए ग्यान ॥ ३१३५ ॥  
भावार्थ : -- मानवोचित  कर्म व धर्म के अन्यथा धन के ध्यान में लगा हुवा मानव  मानवता के अभिमान में रहे तो उसे ज्ञान (  कृत्याकृत्य का बोध )  नहीं होगा, यदि ज्ञान नहीं होगा तो समस्या का समाधान  भी नहीं होगा ॥ 
बिबेक हीन सुलभ हुवे दुर्लभ हंस बिबेक । 
बाकी चाल चलत मिले काग बक एक ते एक ॥ ३१३६॥ 
भावार्थ : -- विवेक हीनता जब सुलभ हो जाती है  तब हंस विवेक दुर्लभ हो जाता है । अब तो हंस की चाल चलते  कौवें और बकुले एक से एक मिलने लगे हैं हंस नहीं मिलते ॥ हंस यदि दुर्लभ हो जाएंगे तो ज्ञान कूण देगा ॥ 

हमारे देश में तो कौंवे भूंकते हैं अर्थात हमारे देश में तो कौंवे भी कौंवे नहीं रहे आधे तितर आधे बटेर हो गए हैं..... 

यह दुनिया ईसाई और मुसलमानों से ही भरी पड़ी है ।इसलिए भीड़ न बनें भारत वंशी रहें भारतीय रहें और धार्मिक बनें.....

जनम मरण के पंथ में धाम धाम बिसराम । 
 जो पंथी पूरन परे पहुंचे मुक्ति धाम ॥३१३७ ॥ 
भावार्थ : -- जन्म- मरण के पंथ में ईश्वर के धाम (धर्मगत तीर्थ )  विश्राम गृह हैं ।  पंथी यात्रा को पूर्ण कर इसके अंतिम छोर अर्थात मुक्ति धाम तक पहुंचते है ॥

जनम मरन के पंथ में जगती पंथी रूप ।
दिग्दर्सक सद्ग्रन्थ हैं, भगवन सार सरूप ॥३१३८॥ 
भावार्थ : -- जीवन-मरण के पंथ में मनुष्य जाति यात्री है पशु-पक्षी उसके साथी-संगी हैं ॥ धर्मगत वे सद्ग्रन्थ उ पथ प्रदर्शक हैं जिसके सार में ईश्वर का स्वरूप है ॥ 

यात्री  कौन है मुक्ति धाम में प्रवेश का पात्र कौन है  : -- मनुष्य जाति यात्री है धर्मगत सम्प्रदाय मुक्ति धाम में प्रवेश के पात्र होते है ॥ क्योंकि यह धाम उन्हीं के बनाए हुवे हैं ॥

 जगति भई अगतिकागति, जगत अगम गम्भीर । 
अजहुँ पग पग देत चली रोगारत भय पीर ॥ ३१३९ ॥
भावार्थ : -- यह जगत दुर्गम है दुर्बोध है रहस्यमयी है । इससे पार जाने के लिए पन्थो की रचना की गई और ईश्वर का आश्रय निर्मित किए गए  । किन्तु वर्तमान की मनुष्य जाति दुर्दशा-ग्रस्त होकर निराश्रित हो गई निराश्रिता के कारण कुपंथचरणी होकर यह संसार को आतंक रोग पीड़ा प्रदान करते चल रही है ॥

जगती जो पथ  मेलिया सबके एकै सरीर । 
बोले तूने सुख दिया मौनी को दुःख पीर ॥ ३१४० ॥ 
भावार्थ : -  हे मानव ! जीवन-मरण के पंथ में  जो भी मिलता है वे सभी देहधारी हैं  काटो तो सभी को पीड़ा होती है तथापि तूने वाग्मित्व  को सुख दिया और मौनत्व पर अत्याचार कर उसे  दुःख व् पीड़ा दी ॥ क्यों ?  :--  क्योंकि तुम मनुष्य हो ? मनुष्य तुम्ही क्यों हो ?  और कोई क्यों नहीं ?  कभी चिंतन तो कर ॥

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१२ ॥ -----

जीवन मरनी पाख दुइ घरि भर का घमसान । 
मरनी संगत हारि के पहुँचिहि सब समसान ॥ ३१२१ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन और मृत्य दो पक्ष हैं दोनों में अल्पकाल का ही संग्राम होता है । इस संग्राम में मृत्यु के हाथों जीवन का पराजित होना निश्चित है सभी को श्मशान पहुंचना है ॥

जिअना तो सब जानिआ मरन न जाने कोइ । 
जो को मरनी जानिआ जिअना जानिहि सोइ ॥३१२२॥ 
भावार्थ : -- जीना तो सभी जानते हैं मरना कोई नहीं जानता । जिसे मरण ज्ञात हो गया  वस्तुत: जीवन उसी को ही ज्ञान हुवा खाना पीना और आनंद में रहना यह जीवन नहीं है ॥

देइ बिनु लगे रहे जब लेइ लेइ में लोग । 
पलछिन घाटत जाइहीं जीवन धन के जोग ॥३१२३॥ 
भावार्थ : -- जब लोग लेने में ही लगे रहेंगें देंगे कुछ नहीं अर्थात  जब जीव त्याग की अपेक्षा सुख भोग में कर्म की अपेक्षा अर्थ में अधिक प्रवृत्त रहेगा तब जीवन के आधारभूत संकलन घटते घटते समाप्त हो जाएंगे ॥

 परिश्रम कर बिनु सब किछु चाहीं ।

जग में जीवन जनमिया तिनका तिनका जोड़ । 
जेतक जिउती जोइया तेतक जइयो छोड़ ॥ ३१२४ ॥ 
कण कण के संयुग्मन से ही इस संसार में जीवन का प्रादुर्भाव हुवा । यह जीवंत रहे इस हेतु हम जितना इससे लें उतना ही इसे देकर जाएं ॥


छन भंगूरा जगत यह छन भंगूरी काए । 
जनम मरन के मध्य में जीवन है छल छाए ॥३१२५ ॥ 
भावार्थ : -- यह संसार ही जब छन भंगुर है धरती एक क्षण को भी   काया इसके सम्मुख कहाँ ठहरती है । जनम यदि सत्य है तो मरण उससे भी बड़ा सत्य है व्  मध्य में जीवन है जो असत्य है, असत्य सदैव पराजित होता है ॥

धरती अपने अक्ष  पर एक क्षण को भी ठहर गई तो समझो दुनिया गई.....ठहराऊँ ?

काल भया सो आजु था आजु भया पुनि  काल । 
काल काल फिर होइगा दसा काल का जाल ॥ ३१२६ ॥ 
भावार्थ : --  जो भूत है वह कभी वर्तमान था जो वर्तमान है लो वह भूत हो गया ।  वर्तमान को मृतकर भविष्य को भी भूत ही होना है ॥ अर्थात ये कल नहीं है ये तुम्हारा काल है ॥

मरन संजुग होए रहो जोगवना सब जोए ।
काल काल को जोगता काल करो मति कोए ॥३१२७ ॥
भावार्थ : - एक विशेष सूचना : -- यात्रीगण कृपया  सभी आवश्यक साजो -सामग्री संकलित कर  मरण-यात्रा को तैयार रहें । कल कल न करें, क्योंकि कल तो मृत्यु की प्रतीक्षा में है  कल में तो तुम्हारा अंत काल है ।।

अजहुँ त जीता जागता पलक जान का होए । 
होवनहारी काल सों निरभै रहे न कोए ॥३१२८॥ 
भावार्थ : -- अभी तो भला-चंगा है पलक में क्या होवेगा कौन जाने । इसलिए अपने कल से अपने काल से सदैव भयभीत रहें ॥ 


 मरा मरा कह रोइया मरा नहीं यहँ कोइ । 
मरता बहुर न जनमिआ, मरा जगत में सोइ ॥३१२९ ॥ 
भावार्थ : -- हाय मर गया कह कह के अपने परिजनों को सभी रोया करते हैं  किन्तु मरता कोई नहीं । मरे हुवे का पुनर्जन्म न हो तभी वास्तविक मरण है ।

जेतक खादन खाइये तेतक दे उपजाएँ । 
सोइ जगत का जोगना लिया देत जो जाए ॥ ३१३० ॥  
भावार्थ : -- जितना खाएं उतना उपजाएँ,  जितना पाएं उतना दाएं
जो जितना खाए उतना उपजाए संसार का संरक्षक  वह है जो लिया को देता जाए ॥





मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३१०- ३११ ॥ -----

अधरम कुकरम ऊँच भए नीच धरम सत काज । 
समाज हीन अगौइहैं पछोइ भया समाज ॥ ३१०१ ॥ 
भावार्थ : -- पाप व्यापित वातावरण में अधर्म व् कुकर्म ऊँचे और धरम व् सत्कर्म पददलित हो गया । अब समाज बिहीन जन आगे रहते हैं और समाज कहीं पीछे होता है ।

अब अधर्मी धर्म का व्  कुकर्मी सत्कर्म का उपदेश करते हैं समाज से बहिर्भूत समाज सुधारक कहलाते हैं ॥

नेम बधिता नेम धरे दोषी करे न्याय । 
रीति सब बिपरीत भई ऐसी बिधि बंधाए ॥ ३१०२ ॥ 
भावार्थ : - अधुनातन हम ऐसी विधि से बंधे है जिसमें नियम  का उल्लंघन  करने वाले ही नियम बना रहे  हैं अपराधी  न्याय करते हैं जो विपरीत है इस विधि में वो रीत है ॥

बहिरा बैठा कान दे गूंगा सुर समुझाए । 
कोयलिया करकस भई कौंवा रागिनि गाए  ॥ ३१०३ ॥ 

देसी भए परदेसिया  देस भया  परदेस । 
साजन कहाँ जा बिलिए, बोले होत क्लेस ॥ ३१०४॥ 
भावार्थ : -- पर्दे देख देख के शासन चलाया जा रहा है । परदेसी देसी हो गए हैं देसी बिदेसी हो गए हैं ॥ भारत की धर्मनरपेक्षता भारत वंशियों को मुसलमान व् ईसाई बना रही है..... 

अजहुँ त करम सोंह देस भयऊ अर्थ प्रधान । 
धन सम्पद हो चाहिये चाहे जेन बिधान ॥ ३१०५॥ 
भावार्थ : -- कर्म की प्रधानता विलुप्त हो चली है अब यह देश अर्थ प्रधान हो गया है । ऐसा वैसा कैसा भी हो लोगों के पास पैसा होना चाहिए ॥ 

निर्धन को दुत्कार  के धनी मान  सब दाहि । 
यह सम्पद कहँ ते आए, पूछे कोऊ नाहि ॥३१०६ ॥ 
भावार्थ : --  अर्थ  प्रधानता में निर्धन पददलित होता है और धनवान सम्मानित होता है ॥ धनवान प्रतिक्षण के नए नए वस्त्र,नए  नए वाहन,  नए नए भूषण, नए नए भाषण यह अपार धन सम्पती  कहाँ से लाता है किस पेड़ में उगाता है यह कोई नहीं पूछता ॥ 

सोइ नियंतन हीन हैं नेम नियंता जौन । 
बंधन बधिता आपहीं नेम बँधावै कौन ॥ ३१०७ ॥ 
भावार्थ : -- नियंत्रण कर्त्ता ही जब निरंकुश हों तो शासन व्यवस्था कैसे नियंत्रित होगी ।बाधक ही जब शासन प्रबंधक हो तो उसके बनाए नियमों का पालन कौन करेगा.....कोई नहीं करेगा ।  

सासन हर जब मेलिया पैसे में पै पांच । 
अँधेरी नगरी प्रगसिहीं नाना अर्थ पिसाच ॥३१०८ ॥ 
भावार्थ : - ऐसे शासन प्रबंधन में शासक ही पैसे में  पांच मिलने लगते हैं  नीति व् नियमों के अभाव रूपी अँधेरे में फिर भांति  भांति के अर्थ पिशाच प्रकट हो जाते हैं ॥  

सासन कस हो चाहिये सागर के समरूप । 
जोइ तापस चरन चरे  भरे ताल नद कूप ॥३१ ०९ ॥ 
भावार्थ : -- शासन कैसा होना चाहिए सागर के जैसा । जो टप का आचरण करत हुवे देश रूपी धरती के ताल नदी और कूप को अर्थ से भर दे जिससे वह लोकोपकारी कार्य में नियोजित हो ॥ 



प्रसासन घन हो चाहिये बरखे एक समरूप । 
खेत खेत को सींच के भरे ताल नद कूप ॥ ३११० ॥ 
भावार्थ : --  प्रशासन को ऐसा घन होना चाहिए । सागर के कार्यों में सहयोग करते जो एक रस वर्षा करे और खेत खेत को सींच कर धरती को हराभरा कर दे ॥ 

जन जन नदि नद होइयो बहियों धीरहि धीर । 
खेत खेत को सींच के मिल्यो सागर तीर ॥ ३१११ ॥ 
भावार्थ : -- जन जन को ऐसे नदि नद होना चाहिए जो व्यर्थ के नियम निबंधनों में बंधे बिना  धीरे धीरे बहे । खेत खेत को सिंचित कर जो सागर से जा मिले ॥ जहां नदी नद हों वहां ताल  तलैया निरुपयोगी होते हैं जहां नदी नद नहीं होते वहां ताल तलैया उपयोगी सिद्ध होते हैं ॥ छोटे छोटे बांध अच्छे होते हैं  लघुता में ही प्रभुता  बसती है ॥ 

कालि कमाई कुकर्मी ले गए देस बहार । 
वाका दुःख जा रोइया सासन असुअन ढार ॥ ३११२ ॥ 
भावार्थ : -- कुकर्मी कुकर्म की कमाई देस के बाहर ले जाते हैं । भारत-शासन ढाई ढाई मन आँसू  ढलका के उनके दुखड़ों को जा रोता है ॥ इसको और कोई रोने को नहीं मिलता, ये शासन है कि दुस्साशन है ॥ 

अन्न पचे काया  रचे पयसन प्रान सँजोए । 
जलमन्न सुभाषितम् तीनि रतन भू जोए ॥३११३ ॥ 
भावार्थ : - अन्न काया की रचना व् जल प्राण प्रतिष्ठित करता है । अत:पृथ्वी  में तीन ही वास्तविक रत्न ही जल अन्न और सुभाषित वचन । शासन को  इनके दुखड़े रोने चाहिए ॥ 

अर्थ के दोइ सुक्ल गति कै  त्याग कै दान । 
जो गत दुर्गत होइया  सो तो दुःख की खान ॥ ३११४ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ की दो ही गति कल्याणकारी होती है या तो उसका त्याग करो अथवा उससे धर्म करो ॥ अन्य गति में अर्थ की दुर्गति ही होती है ऐसी दुर्गति दुखों का भंडार होकर संसार में  रोग सोक व् आतंक का कारण बनती है ॥ 

धर्म नियंतन  हेतु है अर्थ लोकोपकार । 
काम हेतु भव भोग के मुकुत रहे संसार ॥ ३११५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म मनुष्य को अनुशासित कर उसे मर्यादित करने के लिए है । अर्थ संसार का भला करने के लिए है । काम सुख भोग के लिए है  ये तीनों संसार से मुक्ति के लिए है संसार में कोई जीव दुःख भोगने नहीं आता प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण वह  दुःख भोगता है  यह परिस्थितियां कर्मानुगत होती हैं ॥ 

धर्म से बड़ो अर्थ जहँ त्याग सोही भोग । 
बयस्कर निर्वासित तहँ आन बसे बहु रोग ॥३११६॥ 
भावार्थ : -- जहाँ  अर्थ धर्म से प्रधान होता है त्याग से भोग प्रधान होता है । स्वास्थ को निर्वासित कर वहां बहुंत से रोग आ बसते हैं ॥  वहां मनुष्य की आयु क्षीण होती जाती है आगे आगे यह देह पचास पचपन का ही एवरेज देगी ॥ 

जीव साधन बहुतक किए   जीवन किए बहु थोड़ । 
छोड़ छोड़ को जोड़िया जोड़ जोड़ को छोड़ ॥ ३११७ ॥ 
भावार्थ : - मनुष्य ने जीवन के साधन तो बहुंत संजो लिए जीवन थोड़े से भी थोड़ा कर दिया । जीवन को साधने के बहुंत विकल्प है किन्तु जीवन अल्प है वह त्याग करते हुवे संग्रह करे व् संग्रह करते हुवे त्याग करें ॥ 

हेरे मिलता  में सुना धन पति एक ते एक । 
हेरा कतहुँ न मेलिआ दासा मिले अनेक ॥३११८ ॥ 
भावार्थ : - सुना है कि इस दुनिया में एक से बढ़कर एक  धनपति हैं । ढूंडने निकले तो धन के दास अनेकानेक  मिले किन्तु पति कोई नहीं मिला  ॥ 

धन को दासा कारि के  रहें आप धन कंत । 
सोइ कहावन जोग है जगत माहि धनवंत ॥३११९ ॥ 
भावार्थ : -- जो धन को दास नियुक्त कर स्वयं उसका स्वामी रहे, वस्तुत: वही धनी कहलाने के योग्य है ॥  

धन सन पियजन बिहुनाए बिहुने हुए जब प्रान । 
भूरि चिता चढ़ाई के बिहनिहि देह बिहान ॥ ३१२० ॥ 
भावार्थ : -- जब प्राण  छूटेंगे तब धन भी छूटेगा और प्रियजन भी छूट जाएंगे । अंतकाल में जब चिता पर चढ़ाए जाओगे तब यह देह भी यही छूट जाएगी इसलिए पहले ही छोड़ते चलो अन्यथा अंत में तो सब कूछ  यहीं छूटना है ॥ 















----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...