अंधाधुँध दुहाई के धरा होत कृष काय ।
होवणहार सँभारियो बिसरत आपण ताए ॥ ३०९१ ॥
भावार्थ : -- बिना सोचे विचारे इस पृथ्वी के संचित सम्पदा का दोहन किया जा रहा है जिससे वह कृशकाय होती जा रही है । उसकी रक्त वाहिकाएं रूपी नदियां मलीन हो गईं हैं बाँध रूपी अवरोध हो गए हैं पर्वत रूपी अस्थियां भंग हो गई वन रूपी केश गिरते ही जा रहें हैं समुद्र रूपी ह्रदय में नित्य आघात हो रहें हैं तापमान में तीव्रता से वृद्धि हो रही है.....
महि संचित धन संपदा, निसदिन होत नसान ।
भोग भोग अति भोग सों एक दिन होंहि बिहान ॥ ३०९२ ॥
भावार्थ : -- पृथ्वी की संचित धन सम्पदा निरंतर नष्ट हो रही है । भोग वादिता व् दुरव्यसन पूर्णित जीवन चर्या से एक दिन यह समाप्त ही हो जाएगी ॥
अब अपने सुख की उपेक्षा कर हम होने वाली संततियों के लिए भविष्य की चिंता करें ॥
सम्पद सब सँजोई के धरति रहे धनवान ।
धनी धरा सों होत है धनी सकल संतान ॥३०९३॥
भावार्थ : - द्रव्यवान पृथ्वी से ही संतति धनी होती हैं | धन सम्पदा संचित रहेगी तो पृथ्वी भी द्रव्यवान होगी ।।
अर्थ धरम बर्धन करे धर्म अर्थ बरधाए ।
कामना करत बरतिया पूरत दुहु बिनसाए ॥ ३०९४ ॥
भावार्थ : -- अर्थ से धर्म की व् धर्म से अर्थ की वृद्धि होती है । काम जनित भोग और विलासिता पूर्ण व्यवहार से दोनों ही नष्ट होते हैं ॥
एक बाप नै धाम शाला बनवाई लल्लो ने उसका सोपिंग कम् पलेक्स बना दिया । धर्म तो आया गया हो गया साला रह गया.....
जग के सुख भोगत फिरा अमर आपुनो जान ।
संसार एक सरिता तू बहता सरिल समान ॥ ३०९५॥
भावार्थ : --मनुष्य जग के सुखभोग में मृत्यु को विस्मृत कर स्वयं को अमर समझने लगता है । जिस प्रकार नीर नित नया व् नदी वही पुरानी रहती है उसी प्रकार संसार रूपी सरिता नित्य व् सरिल के समान प्रत्येक मनुष्य का जीवन अनित्य है क्षणस्थायी है बह के तो उसे भी जाना होगा ॥
आजु मरता कोए गया काल गया था कोए ।
इस जीवंतक जगत में मरन धर्मि सब होए ॥ ३०९६ ॥
भावार्थ : -- कल कोई मरा था आज कोई, इस जीव जगत में सभी मरण-धर्मी हैं यह स्मरण रहे ॥
कूट कपट संग दरसिहि चहुँपुर पापहि पाप ।
बाताबरन भए अस जस गयऊ गरल ब्याप ॥ ३०९७ ॥
भावार्थ : - छल कपट दुराचार भ्रष्टाचार जैसे कदाचरण से चारों ओर पाप ही पाप दृष्टिगत हो रहा है धर्म का तो जैसे विलोपन ही हो गया । विद्यमान परिस्थितियों में वातावरण ऐसा प्रतीत होता ही जैसे इसमें कोई विष घोल रहा हो॥
पाप ब्यापित जगत में पून के होत बिलोप ।
रोग सोक दुःख सों बढ़े, आतंक कर प्रकोप ॥३०९८॥
भावार्थ : -- पाप व्यापित इस जगत में जब धर्म को विलोप हो रहा हो तब रोग शोक व् दुःखादि संग आतंक का प्रकोप बढ़ने लगता है ॥
विषकारी बाताबरन मांग रहा है हूति ।
त्याग पूरित भाव सों दावें निज भव भूति ॥ ३०९९ ॥
भावार्थ : -- विषाक्त वातावरण फिर आहुति मांगता हैं । आने वाली संततियों के लिए सांसारिक सुखों को त्याग कर हम अपनी भव भूतियों का उपभोग न कर उनसे धर्म करें जिससे यह वातावरण अमृत मय हो जाए ॥
करे अरथ का आँगना परमारथ की छाँह ।
सुखकर सरसिक सागरी तासों दूरे नाह ॥३१०० ॥
भावार्थ : -- अर्थ का आँगन परमार्थ की छाँव से युक्त ह तो फिर सुख सरोजल से युक्त सरोवर उससे अधिक दूर नहीं होता ॥
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