पाहन की ठोकर सहे देइ नदी जल धार । अज्ञात ।
दीपक सतत बरत कहे दूर रहे अँधियार ॥ ३०८१॥
भावार्थ ; -- पत्थर की ठोकर सहके भी नदिया जल-धारा प्रदान कर संसार की तृष्णा शांत करती है । दीपक सतत प्रज्वलित होकर अंधकार से निवृत्ति की कामना करता है ॥
तात्पर्य है प्रकृति का कण कण लोककल्याण के लिए समर्पित है मनुष्य भी जगकल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करे ॥
जोग जीवती पाए पुनि रहे कृपन कर हाथ ।
हितकारी करतब करें उदारता के साथ ॥ ३०८२ ॥
भावार्थ : -- शीलवान जीविका प्राप्त कर वह ( मनुष्य ) कृपणता पूर्वक रहते हुवे उदाहृदय के साथ संसार के हितकारी कर्तव्य करे ॥
हितकर हेतु के मद जो करे जगत के काज ।
तासों श्रीधर होइया निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-क ॥
अपने पेट परायना छाँड़े जग के काज ।
वासों श्रीहीन होइहि निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-ख ॥
भावार्थ : -- जो कोई हितकर उदेश्यों के मद सांसारिक कर्त्तव्य करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज नित्य शोभा सौंदर्य व् समृद्धि को प्राप्त होता है ॥ इसके विपरीत जो अपने उदर के परायण सांसारिक कर्त्तव्यों का तिरस्कार करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज श्रीहीन होकर विपन्नता को प्राप्त होता है ॥
कोई धन को नष्ट करने में जो जितना आगे होता है उसके द्वारा उसका देस-समाज उतना पीछे व् नीचे होप्ता जाता है.....
अर्थ केरी तीनी गति, दायन भोग नसान ।
दिए उत्तम भोग मध्यम नसै अधमतस जान ॥ ३०८४ ॥
भावार्थ : -- अर्थ के उपयोग से धन की तीन गति होती है : -- दान, भोग और नाश
सबसे उत्तम गति दान, मध्यम भोग व् अधम नाश है
" भारतीय शास्त्रानुसार भोग व् दुरूपयोग से धन नष्ट होता है....."
दान परायन कोइ है पेट परायन कोए ।
जगत अकारथ होइया अर्थ नसावै जोए ॥ ३०८५॥
भावार्थ : - कोई दान परायण है तो कोई उदर परायण । संसार में उसका जीवन हेतुरहित है जो धन को अनावश्यक कार्यों में नष्ट करता है ॥
अँधेरे में जूँ दिया बिनु गाहे हाथ कछु नाए ।
तैसेउ सब होत जात दाने बिनु सुख नाए ॥ ३०८६ ॥
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- अंधकार में जिसप्रकार दिया से रहित होकर कुछ प्राप्त नहीं होता । उसी प्रकार भी संपन्न होकर भी यदि दान रूपी दिये से रहित हों तो उस सम्पन्नता का सुख प्राप्त नहीं होता ॥
भले को जो गहन करें बुरे को दे त्याज ।
निसदिन श्रीधर होइया वासों देस समाज ॥ ३०८६ ॥
भावार्थ : - जगत में व्याप्त दोषों को त्याग कर जो गुणों को ग्रहण करता है उसके द्वारा उसका देश व् समाज निरंतर शोभान्वित व् समृद्ध है.....
बुरे से तात्पर्य है : -- बुरे कर्म, बुरी वृत्ति, बुरे आचार-विचार , बुरा आहार -विहार, बुरी सम्पति, बुरी संगत, आदि आदि.....
धर्म सत्कर्म संचिये धन सम्पद को नाहि ।
न तरु जहँ संग आइया मरन परन तहँ जाहि ॥ ३०८७॥
भावार्थ : -- धर्म व् सतकर्म का ही संचय करो धन सम्पदा का नहीं । अन्यथा जिस नरक कुण्ड से आए हो वहीं पहुँच जाओगो ॥
यत्किंचित धन साधना यत्किञ्चितहि सँजोउ ।
अधिकाधिक का लोभना कोऊ लाभ न होउ ॥ ३०८८ ॥
भावार्थ : -- जीवन धन व् जीव साधन उतने ही हो जितने जीवन हेतु के लिए आवश्यक है ।अधिक हाथ पैर फैलाने से सकेलने के लिए चार नहीं आठ चहिए होगें । अनावश्यक का लोभ किसी के काम नहीं आता न अपने न दूसरे के ॥
अधुनातन के काल में नव नव मति बिस्तार ।
जीर्ण का उद्धरन कर जीवन जोग सँभार ॥ ३०८९ ॥
भावार्थ : -- वर्तमानपरिदृश्य में जिस प्रकार की परिस्थितियां हैं उसमें नव नव संरचनाएँ नहीं होनी चाहिए । पृथ्वी की संचित निधि द्रुत गति से समाप्त हो रही है अत : नवीन विस्तार न होकर जीर्णोद्धार होना चाहिए । जीवन को संचालित करने वाले घटकों को सहेजना चाहिए जिससे पृथ्वी में जीवन का प्रादुर्भाव रहे ।
अन्यथा ऐसे वर्तमान का भविष्य दरिद्र होगा ।
सच्ची झूठी बानि किए खोज रहा है पाणि ।
लेना देना किछु नहीं कहता मैं मह दाणि ॥३० ९० ।।
दीपक सतत बरत कहे दूर रहे अँधियार ॥ ३०८१॥
भावार्थ ; -- पत्थर की ठोकर सहके भी नदिया जल-धारा प्रदान कर संसार की तृष्णा शांत करती है । दीपक सतत प्रज्वलित होकर अंधकार से निवृत्ति की कामना करता है ॥
तात्पर्य है प्रकृति का कण कण लोककल्याण के लिए समर्पित है मनुष्य भी जगकल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करे ॥
जोग जीवती पाए पुनि रहे कृपन कर हाथ ।
हितकारी करतब करें उदारता के साथ ॥ ३०८२ ॥
भावार्थ : -- शीलवान जीविका प्राप्त कर वह ( मनुष्य ) कृपणता पूर्वक रहते हुवे उदाहृदय के साथ संसार के हितकारी कर्तव्य करे ॥
हितकर हेतु के मद जो करे जगत के काज ।
तासों श्रीधर होइया निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-क ॥
अपने पेट परायना छाँड़े जग के काज ।
वासों श्रीहीन होइहि निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-ख ॥
भावार्थ : -- जो कोई हितकर उदेश्यों के मद सांसारिक कर्त्तव्य करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज नित्य शोभा सौंदर्य व् समृद्धि को प्राप्त होता है ॥ इसके विपरीत जो अपने उदर के परायण सांसारिक कर्त्तव्यों का तिरस्कार करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज श्रीहीन होकर विपन्नता को प्राप्त होता है ॥
कोई धन को नष्ट करने में जो जितना आगे होता है उसके द्वारा उसका देस-समाज उतना पीछे व् नीचे होप्ता जाता है.....
अर्थ केरी तीनी गति, दायन भोग नसान ।
दिए उत्तम भोग मध्यम नसै अधमतस जान ॥ ३०८४ ॥
भावार्थ : -- अर्थ के उपयोग से धन की तीन गति होती है : -- दान, भोग और नाश
सबसे उत्तम गति दान, मध्यम भोग व् अधम नाश है
" भारतीय शास्त्रानुसार भोग व् दुरूपयोग से धन नष्ट होता है....."
दान परायन कोइ है पेट परायन कोए ।
जगत अकारथ होइया अर्थ नसावै जोए ॥ ३०८५॥
भावार्थ : - कोई दान परायण है तो कोई उदर परायण । संसार में उसका जीवन हेतुरहित है जो धन को अनावश्यक कार्यों में नष्ट करता है ॥
अँधेरे में जूँ दिया बिनु गाहे हाथ कछु नाए ।
तैसेउ सब होत जात दाने बिनु सुख नाए ॥ ३०८६ ॥
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- अंधकार में जिसप्रकार दिया से रहित होकर कुछ प्राप्त नहीं होता । उसी प्रकार भी संपन्न होकर भी यदि दान रूपी दिये से रहित हों तो उस सम्पन्नता का सुख प्राप्त नहीं होता ॥
भले को जो गहन करें बुरे को दे त्याज ।
निसदिन श्रीधर होइया वासों देस समाज ॥ ३०८६ ॥
भावार्थ : - जगत में व्याप्त दोषों को त्याग कर जो गुणों को ग्रहण करता है उसके द्वारा उसका देश व् समाज निरंतर शोभान्वित व् समृद्ध है.....
बुरे से तात्पर्य है : -- बुरे कर्म, बुरी वृत्ति, बुरे आचार-विचार , बुरा आहार -विहार, बुरी सम्पति, बुरी संगत, आदि आदि.....
धर्म सत्कर्म संचिये धन सम्पद को नाहि ।
न तरु जहँ संग आइया मरन परन तहँ जाहि ॥ ३०८७॥
भावार्थ : -- धर्म व् सतकर्म का ही संचय करो धन सम्पदा का नहीं । अन्यथा जिस नरक कुण्ड से आए हो वहीं पहुँच जाओगो ॥
यत्किंचित धन साधना यत्किञ्चितहि सँजोउ ।
अधिकाधिक का लोभना कोऊ लाभ न होउ ॥ ३०८८ ॥
भावार्थ : -- जीवन धन व् जीव साधन उतने ही हो जितने जीवन हेतु के लिए आवश्यक है ।अधिक हाथ पैर फैलाने से सकेलने के लिए चार नहीं आठ चहिए होगें । अनावश्यक का लोभ किसी के काम नहीं आता न अपने न दूसरे के ॥
अधुनातन के काल में नव नव मति बिस्तार ।
जीर्ण का उद्धरन कर जीवन जोग सँभार ॥ ३०८९ ॥
भावार्थ : -- वर्तमानपरिदृश्य में जिस प्रकार की परिस्थितियां हैं उसमें नव नव संरचनाएँ नहीं होनी चाहिए । पृथ्वी की संचित निधि द्रुत गति से समाप्त हो रही है अत : नवीन विस्तार न होकर जीर्णोद्धार होना चाहिए । जीवन को संचालित करने वाले घटकों को सहेजना चाहिए जिससे पृथ्वी में जीवन का प्रादुर्भाव रहे ।
अन्यथा ऐसे वर्तमान का भविष्य दरिद्र होगा ।
सच्ची झूठी बानि किए खोज रहा है पाणि ।
लेना देना किछु नहीं कहता मैं मह दाणि ॥३० ९० ।।
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