मंगलवार, 17 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०७ ॥ -----,

मानस केरा जीउना घरि भर का घमसान । 
सोते को अभिसाप है जागे को वरदान ॥ ३०७१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन क्षण मात्र का संघर्ष है । सुख भोग में आसक्ति से यह संघर्ष अभिशाप सिद्ध हो सकता है विरक्ति से वरदान ॥ 

खेलनहारा खेलिया जनम मरन के खेल । 
कच्ची सरसूँ पेलि के खली भई ना तेल ॥ ३०७२ ॥ संत कबीर दास ॥ 
भावार्थ : -- खेलन हारा जनम-मरण के खेल खेलता रहता है । अपरिपक्व देह पापपुण्य से रहित होती है मृत्यु को प्राप्त होने पर वह लेखांकित नहीं होते ॥

यदि निच्चे नहीं जाना है उप्पर ही जाणा है तो सत्यवत रहो, प्राणीमात्र पर दया करो , त्याग से परिपूर्ण तन मन धन का सत्पात्र को दान करो.....

दान मन बसन तपस तन, साँच बसन को भेस । 
दया हृदय करी बासना जीवन गह  गणवेश ॥ ३०७३॥ 
भावार्थ : -- तन मन वचन अंत:करण के क्रमश:  तप दान सत्य व् दया रूपी वस्त्र जीवन के गणवेश हैं ॥ गणवेश अनुशासन के प्रेरक होते हैं ॥ 

धरम ऊँच ले जाइया पातक नीच गिराए । 
दोउ एकसम रूप रहे मानस जीवन पाए ॥ ३० ७४ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्र कहते हैं कि धर्म से जीव का उत्थान व् पाप से पतन होता है अर्थात धर्म की अधिकता मनुष्य को ऊपर ले जाती है और पाप की अधिकता उसे नीचे गिराती है । पाप-पुण्य समान होने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है जैसे : -- जीव ने जीवन पर्यन्त कुल सौ कर्म किए जिसमें पचास शुभ व् पचास अशुभ किए तब उसे मानव की योनि प्राप्त होगी ॥ 

कोई सब को खाता रहे  उसे कोई न खाए ऐसा कहीं होता है ? : - ऐसा कहीं नहीं होता 
इसलिए सब कुछ नहीं खाना चाहिए.....

जीव अपने कर्म भुगतते हैं तुम कारण मत बनो 
जिसे मरना है जैसे मरना है वह वैसे मरेगा, तुम मत मारो.....  

धरम करम के भेस जहँ  जन जन के गनवेष ।
सबहि देस माहि सबते  उत्तम सोई देस ॥३०७५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म कर्म रूपी वेश जहाँ जन जन का गणवेश हो देशों में वह सबसे उत्तम देश है ॥ 

धर्म कर्म परिहार के हो जो पाप अधीन । 
दिनोदिन दीन होत सो होअसि अर्थ बिहीन ॥३०७६ ॥ 
भावार्थ : -- जो देश धर्म कर्म से विहीन होकर पाप के अधीन होता है वह दिन प्रतिदिन दरिद्रता को प्राप्त होकर अर्थ विहीन हो जाता है । 

धर्म व् सत्कर्म की समृद्ध से देश समृद्ध होता है 
देश की समृद्धि से देश वासी समृद्ध होता है देश वासी की समृद्धि से देश समृद्ध नहीं होता..... 


सोई मत अनुहारिये जग हुँत होत हिताए । 
कारज सोई कारिये जो सब हुँत सुख दाए ॥ ३०७७ ॥ 

भावार्थ : -- उन्हीं धार्मिक पद्धतियों में निष्ठ होना चाहिए जिसमें समस्त जगत का कल्याण निहित हो । कर्म वही करने चाहिए जो सभी के लिए सुख प्रद हो । बुराई का प्रचार-प्रसार न करे, किसी को कष्ट न दे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी के प्राण न हरे ॥

मानव जग सेवा हेतु समरथ सबहि बिधान । 
अपने पेट परायणा सो तो जंतु समान ॥ ३०७८ ॥ 

भावार्थ : - मनुष्य संसार की सेवाकर्म हेतु सभी प्रकार से ( तन मन धन से वाणी से बुद्धि से भीतर से बाहर से ऊपर से नीचे से ) समर्थ है इसका प्रादुर्भाव ही इस हेतु हुवा है कि वह संसार की सेवा कर उसका उद्धरण करे । समर्थ होने के पश्चात भी जो मनुष्य अपने उदर के परायण हो वह फिर जंतु के समान ही होगा ॥

प्रान  प्रदाय पवन बहे  बहे गंध दुर्गन्ध । अज्ञात । 
कंटक गहे सुमन कहे बिखरी रहे सुगंध ॥ ३०७९ ॥ 
भावार्थ : --  गंध दुरगंध का भार वहति पवन प्राण प्रदान करती चलती है । कटंकों का कष्ट सहते पुष्प कहते हैं उसमें सुगंध व्यापित रहे ॥ 

तपन के तपचरन संग  अलोकित सब संसार । 
सागर जर जर घन संग जीवन दे आधार ॥ ३०८० ॥ 
भावार्थ : -- सूर्यदेव की तपस्या से यह संसार आलोकित है । सागर जल जल कर घन रूप होकर जीव जीवित करता है॥ 






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