धनवान तो बहुतेरे सुखी न दरसा कोए ।
जाके मन संतोष धन सुखी जगत में सोए ॥३०६१॥
भावार्थ : -- धनवान तो बहुंत हैं उनमें सुखी एक भी नहीं दिखाई देता । जिसके मन के कोष में संतोष रूपी धन है संसार में वही धनवान है और वही सुखी है ॥
कोउ धरम करि छाँड़ि दिए कोउ त करि करि पाप ।
दोउ पापी समुझत हैं धर्मी आपन आप ॥ ३०६२ ॥
भावार्थ : -- एक बोला : -- मैंणे तेरे जिसे धर्म कर कर के छोड़ दिए,
दूसरा बोला : -- मैणे तेरे जिसे पाप कर कर के छोड़ दिए..,
मैं ने बोला : -- दोनों अपने आप को धर्मी समझते हैं वस्तुत: हैं दोनों पापी.....
जीवन भर सकलत रहे गए सो खाली हाथ ।
मनि रतन गए भवन गए गया न तन भी साथ ॥ ३०६३॥
भावार्थ : -- जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन किया वह भी हाथ पसारे ही गए । न मणिरत्न गए न भव्य भवन ही गए उनकी देह भी साथ नहीं गई ।
जीवन भर सकलत करे रहे पसारे हाथ ।
सुकरम हो कि कुकरम हो चले मरे के साथ ॥३०६४ ॥
भावार्थ : -- जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन ही किया वह भी हाथ पसारे ही गए । मृत्यु -पश्चात और कुछ नहीं जाता केवल कर्म ही साथ जाते हैं ॥
मायावी काया संग निकसे जब जब प्रान ।
चारी काँधे पर गही भसम भई समसान ॥ ३०६५ ॥
भावार्थ : -- इस मायावी काया से जब जब जब प्राण निर्गत हुवे तब तब वह चार कंधों पर चढ़ के श्मशान में भस्म हो गई ॥ किसी की न्यारी काया हो तो बात दूसरी है पण हमने तो देख्यी नहीं ऐसी काया ॥
भल की कृपा बिहीनता खलजन केरी पीन ।
निर्बल को धनहीन कर करें दीन ते दीन ॥ ३०६६ ॥
भावार्थ : -- सज्जन की कृपा विहीनता व् दुर्जन की परिपुष्टता निर्बल को साधनहीन कर दरिद्रित करती है ॥
पाँवर पाँउ पसार के सोया नैनन मीच ।
लोग कहे ऊपर गया गया नीच ते नीच ॥ ३० ६७ ॥
भावार्थ : -- एक दुष्ट था एक दिन वह पाँव पसार के पलकें बंद कर सोया रहा । लोगों ने कहा उप्पर गया लोगों का इतना कहना ही था कि खाट तै नीचे आ गया । ले तू तो कह रिया था उप्पर गया ।
जीउ जुगावन आपना औरन पीर न दाए ।
जीते जी नीचे रहे मरता ऊपर जाए ॥ ३०६८ ॥
भावार्थ : -- अपने जीवन को संजोने में जो अन्य किसी प्राणी को कष्ट न दे उसके प्राण न हरे । जो जीवित रूप में विनम्र रहे वह वास्तविक मृत्यु को प्राप्त होता है ॥
दुष्टता ऊपर नहीं नीचे ले जाती है, इसलिए भूमि पर ही प्राण त्यागना चाहिए.....
जीते जी कहा नहि तू रहा धर्म ते चूक ।
बैठा अब किन रोइया निकस गई जब फूँक ॥ ३०६९ ॥
भावार्थ : -- जीते जी तो रोया नहीं रे मरनेवाले तू पाप जोड़ रहा है पुण्य नहीं जोड़ रहा । जब फूँक ही निकल गई फिर उसके लिए कैसा रोना ॥
अपना जिउ जमोअन में लगे रहे दिन रात ।
भोजन बासना और न दूजी बात ॥ ३०७० ॥
भावार्थ : -- जो जीवन की सहेज में ही लगा रहे भोजन वसन और वासन के अतिरिक्त और कुछ न संकलित करे प्राण निर्गत होने के पश्चात उसके लिए फिर क्या रोना ॥
मनु जीवन सुख सयनिका ये जग सपन समान ।
छन माहि भंगूरा जब तन से निकसे प्रान ॥ ३०७० ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन सुख शयनिका है यह संसार स्वप्न के सदृश्य है । शरीर से प्राण निर्गत होते ही यह छन में ही भंगुरता को प्राप्त हो जाता हे ॥
आत्मा देह क्यूँ धारण करती है : -- दुनिया देखने के लिए "देही बिन जग दरस न भाई "
जाके मन संतोष धन सुखी जगत में सोए ॥३०६१॥
भावार्थ : -- धनवान तो बहुंत हैं उनमें सुखी एक भी नहीं दिखाई देता । जिसके मन के कोष में संतोष रूपी धन है संसार में वही धनवान है और वही सुखी है ॥
कोउ धरम करि छाँड़ि दिए कोउ त करि करि पाप ।
दोउ पापी समुझत हैं धर्मी आपन आप ॥ ३०६२ ॥
भावार्थ : -- एक बोला : -- मैंणे तेरे जिसे धर्म कर कर के छोड़ दिए,
दूसरा बोला : -- मैणे तेरे जिसे पाप कर कर के छोड़ दिए..,
मैं ने बोला : -- दोनों अपने आप को धर्मी समझते हैं वस्तुत: हैं दोनों पापी.....
जीवन भर सकलत रहे गए सो खाली हाथ ।
मनि रतन गए भवन गए गया न तन भी साथ ॥ ३०६३॥
भावार्थ : -- जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन किया वह भी हाथ पसारे ही गए । न मणिरत्न गए न भव्य भवन ही गए उनकी देह भी साथ नहीं गई ।
जीवन भर सकलत करे रहे पसारे हाथ ।
सुकरम हो कि कुकरम हो चले मरे के साथ ॥३०६४ ॥
भावार्थ : -- जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन ही किया वह भी हाथ पसारे ही गए । मृत्यु -पश्चात और कुछ नहीं जाता केवल कर्म ही साथ जाते हैं ॥
मायावी काया संग निकसे जब जब प्रान ।
चारी काँधे पर गही भसम भई समसान ॥ ३०६५ ॥
भावार्थ : -- इस मायावी काया से जब जब जब प्राण निर्गत हुवे तब तब वह चार कंधों पर चढ़ के श्मशान में भस्म हो गई ॥ किसी की न्यारी काया हो तो बात दूसरी है पण हमने तो देख्यी नहीं ऐसी काया ॥
भल की कृपा बिहीनता खलजन केरी पीन ।
निर्बल को धनहीन कर करें दीन ते दीन ॥ ३०६६ ॥
भावार्थ : -- सज्जन की कृपा विहीनता व् दुर्जन की परिपुष्टता निर्बल को साधनहीन कर दरिद्रित करती है ॥
पाँवर पाँउ पसार के सोया नैनन मीच ।
लोग कहे ऊपर गया गया नीच ते नीच ॥ ३० ६७ ॥
भावार्थ : -- एक दुष्ट था एक दिन वह पाँव पसार के पलकें बंद कर सोया रहा । लोगों ने कहा उप्पर गया लोगों का इतना कहना ही था कि खाट तै नीचे आ गया । ले तू तो कह रिया था उप्पर गया ।
जीउ जुगावन आपना औरन पीर न दाए ।
जीते जी नीचे रहे मरता ऊपर जाए ॥ ३०६८ ॥
भावार्थ : -- अपने जीवन को संजोने में जो अन्य किसी प्राणी को कष्ट न दे उसके प्राण न हरे । जो जीवित रूप में विनम्र रहे वह वास्तविक मृत्यु को प्राप्त होता है ॥
दुष्टता ऊपर नहीं नीचे ले जाती है, इसलिए भूमि पर ही प्राण त्यागना चाहिए.....
जीते जी कहा नहि तू रहा धर्म ते चूक ।
बैठा अब किन रोइया निकस गई जब फूँक ॥ ३०६९ ॥
भावार्थ : -- जीते जी तो रोया नहीं रे मरनेवाले तू पाप जोड़ रहा है पुण्य नहीं जोड़ रहा । जब फूँक ही निकल गई फिर उसके लिए कैसा रोना ॥
अपना जिउ जमोअन में लगे रहे दिन रात ।
भोजन बासना और न दूजी बात ॥ ३०७० ॥
भावार्थ : -- जो जीवन की सहेज में ही लगा रहे भोजन वसन और वासन के अतिरिक्त और कुछ न संकलित करे प्राण निर्गत होने के पश्चात उसके लिए फिर क्या रोना ॥
मनु जीवन सुख सयनिका ये जग सपन समान ।
छन माहि भंगूरा जब तन से निकसे प्रान ॥ ३०७० ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन सुख शयनिका है यह संसार स्वप्न के सदृश्य है । शरीर से प्राण निर्गत होते ही यह छन में ही भंगुरता को प्राप्त हो जाता हे ॥
आत्मा देह क्यूँ धारण करती है : -- दुनिया देखने के लिए "देही बिन जग दरस न भाई "
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