शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०६॥ -----,

धनवान तो बहुतेरे सुखी न दरसा कोए । 
जाके  मन संतोष धन सुखी जगत में सोए ॥३०६१॥
भावार्थ : -- धनवान तो बहुंत हैं उनमें सुखी एक भी नहीं दिखाई देता ।  जिसके मन के कोष में संतोष रूपी धन है संसार में वही धनवान है और वही सुखी है ॥

कोउ धरम करि छाँड़ि दिए कोउ त करि करि पाप । 
दोउ पापी समुझत हैं धर्मी आपन आप ॥ ३०६२ ॥ 
भावार्थ : -- एक बोला : -- मैंणे तेरे जिसे धर्म कर कर के छोड़ दिए,
                दूसरा बोला : -- मैणे तेरे जिसे पाप कर कर के छोड़ दिए..,

मैं ने बोला : -- दोनों अपने आप को धर्मी समझते हैं वस्तुत: हैं दोनों पापी.....

जीवन भर सकलत रहे गए सो खाली हाथ । 
मनि रतन गए भवन गए गया न तन भी साथ ॥ ३०६३॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन किया वह भी हाथ पसारे ही गए  ।  न  मणिरत्न गए न भव्य भवन ही गए उनकी देह भी साथ नहीं गई ।

जीवन भर सकलत करे रहे पसारे हाथ । 
 सुकरम हो कि कुकरम हो चले मरे के साथ ॥३०६४ ॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन ही किया वह भी हाथ पसारे ही गए ।   मृत्यु -पश्चात और कुछ नहीं जाता केवल कर्म ही साथ जाते हैं ॥

मायावी  काया संग निकसे जब जब प्रान । 
चारी काँधे पर गही भसम भई समसान ॥ ३०६५ ॥  
भावार्थ : --  इस मायावी काया से जब जब जब प्राण निर्गत हुवे तब तब  वह चार कंधों पर चढ़ के  श्मशान में भस्म हो गई ॥ किसी की न्यारी काया हो तो बात दूसरी है पण हमने तो देख्यी नहीं ऐसी काया ॥

भल की कृपा बिहीनता खलजन केरी पीन । 
निर्बल को धनहीन कर करें दीन ते दीन ॥ ३०६६ ॥ 
भावार्थ : --  सज्जन की कृपा विहीनता व् दुर्जन की परिपुष्टता निर्बल को साधनहीन कर दरिद्रित करती है ॥

पाँवर पाँउ पसार के सोया नैनन मीच । 
लोग कहे ऊपर गया गया नीच ते नीच ॥ ३० ६७ ॥ 
भावार्थ : -- एक दुष्ट था एक दिन वह पाँव पसार के पलकें बंद कर सोया रहा । लोगों ने कहा उप्पर गया लोगों का इतना कहना ही था कि खाट तै नीचे आ गया । ले तू तो कह रिया था उप्पर गया ।

जीउ जुगावन आपना औरन पीर न दाए । 
जीते जी नीचे रहे मरता  ऊपर जाए ॥ ३०६८ ॥ 
भावार्थ : -- अपने जीवन को संजोने में जो अन्य किसी प्राणी को कष्ट न दे उसके प्राण न हरे । जो जीवित रूप में विनम्र रहे वह वास्तविक मृत्यु को प्राप्त होता है ॥

 दुष्टता  ऊपर नहीं नीचे ले जाती है, इसलिए भूमि पर ही प्राण त्यागना चाहिए.....

जीते जी कहा नहि तू रहा धर्म ते चूक । 
बैठा अब किन रोइया निकस गई जब फूँक ॥ ३०६९ ॥ 
भावार्थ : -- जीते जी तो रोया नहीं रे मरनेवाले तू पाप जोड़ रहा है पुण्य नहीं जोड़ रहा । जब फूँक ही निकल गई फिर  उसके लिए कैसा रोना ॥ 

अपना जिउ जमोअन में लगे रहे  दिन रात । 
भोजन बासना और न दूजी बात ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- जो जीवन की सहेज में ही लगा रहे  भोजन वसन और वासन  के अतिरिक्त और कुछ न संकलित करे प्राण निर्गत होने के पश्चात उसके लिए फिर क्या रोना ॥ 

मनु जीवन सुख सयनिका ये जग सपन समान । 
छन माहि भंगूरा  जब तन से निकसे प्रान ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन सुख शयनिका  है यह संसार स्वप्न के सदृश्य है । शरीर से प्राण निर्गत होते ही यह छन में ही भंगुरता को प्राप्त हो जाता हे ॥ 

 आत्मा देह क्यूँ धारण  करती है : -- दुनिया देखने के लिए  "देही बिन जग दरस न भाई "   


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