बुधवार, 25 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०९ ॥ -----


अंधाधुँध दुहाई के धरा होत कृष काय । 
होवणहार सँभारियो बिसरत आपण ताए ॥ ३०९१ ॥ 
भावार्थ : -- बिना सोचे विचारे इस पृथ्वी के संचित सम्पदा का दोहन किया जा रहा है जिससे वह कृशकाय होती जा रही है ।  उसकी रक्त वाहिकाएं रूपी नदियां मलीन हो गईं हैं बाँध रूपी अवरोध हो गए हैं पर्वत रूपी अस्थियां  भंग हो गई वन रूपी केश गिरते ही जा रहें हैं समुद्र रूपी ह्रदय में नित्य आघात हो रहें हैं तापमान  में तीव्रता से वृद्धि हो रही है.....

महि संचित धन संपदा, निसदिन होत  नसान । 
भोग भोग अति भोग सों एक दिन होंहि बिहान ॥ ३०९२ ॥ 
भावार्थ : -- पृथ्वी की संचित धन सम्पदा निरंतर नष्ट हो रही है । भोग वादिता व् दुरव्यसन पूर्णित  जीवन चर्या से एक दिन यह समाप्त ही हो जाएगी ॥

 अब अपने सुख की उपेक्षा कर हम होने वाली संततियों के लिए भविष्य की चिंता करें ॥

सम्पद सब सँजोई के  धरति रहे  धनवान । 
धनी धरा सों होत  है धनी सकल संतान ॥३०९३॥ 

भावार्थ : -   द्रव्यवान पृथ्वी से ही संतति धनी होती हैं |  धन सम्पदा संचित रहेगी तो  पृथ्वी भी द्रव्यवान होगी ।। 

अर्थ  धरम बर्धन करे धर्म अर्थ बरधाए । 
कामना करत बरतिया पूरत दुहु बिनसाए ॥ ३०९४ ॥ 

भावार्थ : -- अर्थ से धर्म की व् धर्म से अर्थ की वृद्धि होती है । काम जनित भोग और विलासिता पूर्ण व्यवहार से दोनों ही नष्ट होते हैं ॥

एक बाप नै धाम शाला बनवाई लल्लो ने उसका सोपिंग कम् पलेक्स बना दिया । धर्म तो आया गया हो गया साला रह गया.....

जग के  सुख भोगत फिरा अमर आपुनो जान । 
संसार एक सरिता तू बहता सरिल समान ॥ ३०९५॥ 
भावार्थ : --मनुष्य  जग के सुखभोग में मृत्यु को विस्मृत  कर  स्वयं को अमर समझने लगता है । जिस प्रकार नीर नित नया व्  नदी वही पुरानी रहती है उसी प्रकार संसार रूपी सरिता नित्य  व्  सरिल के समान प्रत्येक मनुष्य का जीवन अनित्य है क्षणस्थायी है बह के तो उसे भी जाना होगा ॥

आजु मरता  कोए गया काल गया था कोए । 
इस जीवंतक जगत में मरन धर्मि सब होए ॥ ३०९६ ॥ 
भावार्थ : -- कल कोई मरा था आज कोई,  इस जीव जगत में सभी मरण-धर्मी हैं यह स्मरण रहे ॥ 


कूट कपट संग दरसिहि चहुँपुर पापहि पाप । 
बाताबरन भए अस जस गयऊ गरल ब्याप ॥ ३०९७ ॥ 
भावार्थ : - छल कपट दुराचार भ्रष्टाचार जैसे कदाचरण से चारों ओर  पाप ही पाप दृष्टिगत हो रहा है धर्म  का तो जैसे विलोपन ही हो गया । विद्यमान परिस्थितियों में वातावरण ऐसा प्रतीत होता ही जैसे इसमें कोई विष घोल रहा हो॥

पाप ब्यापित जगत में पून के होत  बिलोप । 
रोग सोक दुःख सों बढ़े, आतंक कर प्रकोप ॥३०९८॥ 
भावार्थ : -- पाप व्यापित इस जगत में जब धर्म को विलोप हो रहा हो  तब रोग शोक व् दुःखादि संग आतंक का प्रकोप बढ़ने लगता है ॥

विषकारी  बाताबरन मांग रहा है हूति । 
त्याग पूरित भाव सों  दावें निज भव भूति ॥ ३०९९ ॥ 
भावार्थ : -- विषाक्त  वातावरण  फिर आहुति मांगता  हैं । आने वाली संततियों के लिए सांसारिक सुखों को त्याग कर हम अपनी भव भूतियों का उपभोग न कर उनसे धर्म करें जिससे यह वातावरण अमृत मय हो जाए ॥

करे अरथ का आँगना परमारथ की छाँह । 
सुखकर सरसिक सागरी  तासों  दूरे नाह ॥३१०० ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ का  आँगन परमार्थ की छाँव से युक्त ह तो फिर  सुख सरोजल से युक्त सरोवर उससे अधिक दूर नहीं होता ॥

सोमवार, 23 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०८ ॥ -----

पाहन की ठोकर सहे देइ नदी जल धार । अज्ञात । 
दीपक सतत बरत कहे दूर रहे अँधियार ॥ ३०८१॥ 
भावार्थ ; --  पत्थर की ठोकर सहके भी नदिया जल-धारा प्रदान कर संसार की तृष्णा शांत करती है । दीपक सतत प्रज्वलित होकर अंधकार से निवृत्ति की कामना करता है ॥ 

 तात्पर्य है प्रकृति का कण कण लोककल्याण के लिए समर्पित है मनुष्य भी जगकल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करे ॥ 

जोग जीवती पाए पुनि रहे कृपन कर हाथ । 
हितकारी करतब करें उदारता  के साथ ॥ ३०८२ ॥ 
भावार्थ : -- शीलवान जीविका प्राप्त कर वह ( मनुष्य ) कृपणता पूर्वक रहते हुवे उदाहृदय के साथ संसार के हितकारी कर्तव्य करे ॥ 

हितकर हेतु के मद जो करे जगत के काज । 
तासों श्रीधर होइया निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-क  ॥ 
अपने पेट परायना छाँड़े जग के काज । 
वासों श्रीहीन होइहि निसदिन देस समाज ॥ ३० ८३-ख ॥  
भावार्थ : -- जो कोई हितकर उदेश्यों के मद सांसारिक कर्त्तव्य करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज नित्य शोभा सौंदर्य व् समृद्धि को प्राप्त होता है ॥ इसके विपरीत जो अपने उदर के परायण सांसारिक कर्त्तव्यों का तिरस्कार करता है उसके द्वारा उसका देश-समाज श्रीहीन होकर विपन्नता को प्राप्त  होता है ॥ 

कोई धन को नष्ट करने में जो जितना आगे होता है उसके द्वारा उसका देस-समाज उतना पीछे व् नीचे होप्ता जाता है..... 

अर्थ केरी तीनी गति, दायन भोग नसान । 
दिए उत्तम भोग मध्यम नसै अधमतस जान ॥ ३०८४ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ के उपयोग से धन की तीन गति होती है : -- दान, भोग  और नाश 
                 सबसे उत्तम गति दान, मध्यम भोग व् अधम नाश है 

" भारतीय शास्त्रानुसार भोग व् दुरूपयोग से धन नष्ट होता है....." 

दान परायन कोइ है पेट परायन कोए । 
जगत अकारथ होइया अर्थ नसावै जोए ॥ ३०८५॥ 
भावार्थ : - कोई दान परायण है तो कोई उदर परायण । संसार में उसका जीवन हेतुरहित है जो धन को अनावश्यक कार्यों में नष्ट करता है ॥



अँधेरे में जूँ  दिया बिनु गाहे हाथ कछु नाए । 
तैसेउ सब होत जात दाने बिनु सुख नाए ॥ ३०८६ ॥  
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- अंधकार में जिसप्रकार दिया से रहित होकर कुछ  प्राप्त नहीं होता । उसी प्रकार भी संपन्न होकर भी यदि दान रूपी दिये  से रहित  हों तो उस सम्पन्नता का सुख प्राप्त नहीं होता ॥

भले को जो गहन करें बुरे को दे त्याज । 
निसदिन श्रीधर होइया वासों देस समाज ॥ ३०८६ ॥ 
भावार्थ : - जगत में व्याप्त दोषों को त्याग कर जो गुणों को ग्रहण करता है उसके द्वारा उसका  देश व् समाज निरंतर शोभान्वित  व् समृद्ध है.....

बुरे से तात्पर्य  है : -- बुरे कर्म, बुरी वृत्ति, बुरे आचार-विचार , बुरा आहार -विहार, बुरी सम्पति,  बुरी संगत, आदि आदि.....

धर्म सत्कर्म संचिये धन सम्पद को नाहि । 
न तरु जहँ संग आइया मरन परन तहँ जाहि ॥ ३०८७॥ 
भावार्थ : -- धर्म व् सतकर्म का ही संचय करो धन सम्पदा का नहीं । अन्यथा जिस नरक कुण्ड से आए हो वहीं  पहुँच जाओगो ॥

यत्किंचित धन साधना यत्किञ्चितहि सँजोउ । 
अधिकाधिक का लोभना कोऊ लाभ न होउ ॥ ३०८८ ॥ 
भावार्थ : --  जीवन धन व् जीव साधन उतने ही हो जितने जीवन हेतु के लिए आवश्यक है ।अधिक हाथ पैर फैलाने से सकेलने के लिए चार  नहीं आठ चहिए होगें । अनावश्यक का लोभ किसी के काम नहीं आता न अपने न दूसरे के ॥

अधुनातन के काल में नव नव मति बिस्तार । 
जीर्ण का उद्धरन कर जीवन जोग सँभार ॥ ३०८९ ॥ 
भावार्थ : -- वर्तमानपरिदृश्य  में जिस प्रकार की परिस्थितियां हैं उसमें नव नव संरचनाएँ  नहीं होनी चाहिए  ।  पृथ्वी की संचित निधि द्रुत गति से समाप्त हो रही है अत : नवीन विस्तार न होकर जीर्णोद्धार होना चाहिए । जीवन को संचालित करने वाले घटकों को सहेजना चाहिए जिससे पृथ्वी में जीवन का प्रादुर्भाव रहे ।

 अन्यथा ऐसे वर्तमान का भविष्य दरिद्र होगा ।

सच्ची झूठी बानि किए खोज रहा है पाणि । 
लेना देना  किछु नहीं कहता मैं मह दाणि ॥३० ९० ।।  











मंगलवार, 17 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०७ ॥ -----,

मानस केरा जीउना घरि भर का घमसान । 
सोते को अभिसाप है जागे को वरदान ॥ ३०७१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य का जीवन क्षण मात्र का संघर्ष है । सुख भोग में आसक्ति से यह संघर्ष अभिशाप सिद्ध हो सकता है विरक्ति से वरदान ॥ 

खेलनहारा खेलिया जनम मरन के खेल । 
कच्ची सरसूँ पेलि के खली भई ना तेल ॥ ३०७२ ॥ संत कबीर दास ॥ 
भावार्थ : -- खेलन हारा जनम-मरण के खेल खेलता रहता है । अपरिपक्व देह पापपुण्य से रहित होती है मृत्यु को प्राप्त होने पर वह लेखांकित नहीं होते ॥

यदि निच्चे नहीं जाना है उप्पर ही जाणा है तो सत्यवत रहो, प्राणीमात्र पर दया करो , त्याग से परिपूर्ण तन मन धन का सत्पात्र को दान करो.....

दान मन बसन तपस तन, साँच बसन को भेस । 
दया हृदय करी बासना जीवन गह  गणवेश ॥ ३०७३॥ 
भावार्थ : -- तन मन वचन अंत:करण के क्रमश:  तप दान सत्य व् दया रूपी वस्त्र जीवन के गणवेश हैं ॥ गणवेश अनुशासन के प्रेरक होते हैं ॥ 

धरम ऊँच ले जाइया पातक नीच गिराए । 
दोउ एकसम रूप रहे मानस जीवन पाए ॥ ३० ७४ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्र कहते हैं कि धर्म से जीव का उत्थान व् पाप से पतन होता है अर्थात धर्म की अधिकता मनुष्य को ऊपर ले जाती है और पाप की अधिकता उसे नीचे गिराती है । पाप-पुण्य समान होने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है जैसे : -- जीव ने जीवन पर्यन्त कुल सौ कर्म किए जिसमें पचास शुभ व् पचास अशुभ किए तब उसे मानव की योनि प्राप्त होगी ॥ 

कोई सब को खाता रहे  उसे कोई न खाए ऐसा कहीं होता है ? : - ऐसा कहीं नहीं होता 
इसलिए सब कुछ नहीं खाना चाहिए.....

जीव अपने कर्म भुगतते हैं तुम कारण मत बनो 
जिसे मरना है जैसे मरना है वह वैसे मरेगा, तुम मत मारो.....  

धरम करम के भेस जहँ  जन जन के गनवेष ।
सबहि देस माहि सबते  उत्तम सोई देस ॥३०७५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म कर्म रूपी वेश जहाँ जन जन का गणवेश हो देशों में वह सबसे उत्तम देश है ॥ 

धर्म कर्म परिहार के हो जो पाप अधीन । 
दिनोदिन दीन होत सो होअसि अर्थ बिहीन ॥३०७६ ॥ 
भावार्थ : -- जो देश धर्म कर्म से विहीन होकर पाप के अधीन होता है वह दिन प्रतिदिन दरिद्रता को प्राप्त होकर अर्थ विहीन हो जाता है । 

धर्म व् सत्कर्म की समृद्ध से देश समृद्ध होता है 
देश की समृद्धि से देश वासी समृद्ध होता है देश वासी की समृद्धि से देश समृद्ध नहीं होता..... 


सोई मत अनुहारिये जग हुँत होत हिताए । 
कारज सोई कारिये जो सब हुँत सुख दाए ॥ ३०७७ ॥ 

भावार्थ : -- उन्हीं धार्मिक पद्धतियों में निष्ठ होना चाहिए जिसमें समस्त जगत का कल्याण निहित हो । कर्म वही करने चाहिए जो सभी के लिए सुख प्रद हो । बुराई का प्रचार-प्रसार न करे, किसी को कष्ट न दे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में किसी के प्राण न हरे ॥

मानव जग सेवा हेतु समरथ सबहि बिधान । 
अपने पेट परायणा सो तो जंतु समान ॥ ३०७८ ॥ 

भावार्थ : - मनुष्य संसार की सेवाकर्म हेतु सभी प्रकार से ( तन मन धन से वाणी से बुद्धि से भीतर से बाहर से ऊपर से नीचे से ) समर्थ है इसका प्रादुर्भाव ही इस हेतु हुवा है कि वह संसार की सेवा कर उसका उद्धरण करे । समर्थ होने के पश्चात भी जो मनुष्य अपने उदर के परायण हो वह फिर जंतु के समान ही होगा ॥

प्रान  प्रदाय पवन बहे  बहे गंध दुर्गन्ध । अज्ञात । 
कंटक गहे सुमन कहे बिखरी रहे सुगंध ॥ ३०७९ ॥ 
भावार्थ : --  गंध दुरगंध का भार वहति पवन प्राण प्रदान करती चलती है । कटंकों का कष्ट सहते पुष्प कहते हैं उसमें सुगंध व्यापित रहे ॥ 

तपन के तपचरन संग  अलोकित सब संसार । 
सागर जर जर घन संग जीवन दे आधार ॥ ३०८० ॥ 
भावार्थ : -- सूर्यदेव की तपस्या से यह संसार आलोकित है । सागर जल जल कर घन रूप होकर जीव जीवित करता है॥ 






शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम ३०६॥ -----,

धनवान तो बहुतेरे सुखी न दरसा कोए । 
जाके  मन संतोष धन सुखी जगत में सोए ॥३०६१॥
भावार्थ : -- धनवान तो बहुंत हैं उनमें सुखी एक भी नहीं दिखाई देता ।  जिसके मन के कोष में संतोष रूपी धन है संसार में वही धनवान है और वही सुखी है ॥

कोउ धरम करि छाँड़ि दिए कोउ त करि करि पाप । 
दोउ पापी समुझत हैं धर्मी आपन आप ॥ ३०६२ ॥ 
भावार्थ : -- एक बोला : -- मैंणे तेरे जिसे धर्म कर कर के छोड़ दिए,
                दूसरा बोला : -- मैणे तेरे जिसे पाप कर कर के छोड़ दिए..,

मैं ने बोला : -- दोनों अपने आप को धर्मी समझते हैं वस्तुत: हैं दोनों पापी.....

जीवन भर सकलत रहे गए सो खाली हाथ । 
मनि रतन गए भवन गए गया न तन भी साथ ॥ ३०६३॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन किया वह भी हाथ पसारे ही गए  ।  न  मणिरत्न गए न भव्य भवन ही गए उनकी देह भी साथ नहीं गई ।

जीवन भर सकलत करे रहे पसारे हाथ । 
 सुकरम हो कि कुकरम हो चले मरे के साथ ॥३०६४ ॥ 
भावार्थ : --    जिन्होंने जीवन पर्यंत धन संकलन ही किया वह भी हाथ पसारे ही गए ।   मृत्यु -पश्चात और कुछ नहीं जाता केवल कर्म ही साथ जाते हैं ॥

मायावी  काया संग निकसे जब जब प्रान । 
चारी काँधे पर गही भसम भई समसान ॥ ३०६५ ॥  
भावार्थ : --  इस मायावी काया से जब जब जब प्राण निर्गत हुवे तब तब  वह चार कंधों पर चढ़ के  श्मशान में भस्म हो गई ॥ किसी की न्यारी काया हो तो बात दूसरी है पण हमने तो देख्यी नहीं ऐसी काया ॥

भल की कृपा बिहीनता खलजन केरी पीन । 
निर्बल को धनहीन कर करें दीन ते दीन ॥ ३०६६ ॥ 
भावार्थ : --  सज्जन की कृपा विहीनता व् दुर्जन की परिपुष्टता निर्बल को साधनहीन कर दरिद्रित करती है ॥

पाँवर पाँउ पसार के सोया नैनन मीच । 
लोग कहे ऊपर गया गया नीच ते नीच ॥ ३० ६७ ॥ 
भावार्थ : -- एक दुष्ट था एक दिन वह पाँव पसार के पलकें बंद कर सोया रहा । लोगों ने कहा उप्पर गया लोगों का इतना कहना ही था कि खाट तै नीचे आ गया । ले तू तो कह रिया था उप्पर गया ।

जीउ जुगावन आपना औरन पीर न दाए । 
जीते जी नीचे रहे मरता  ऊपर जाए ॥ ३०६८ ॥ 
भावार्थ : -- अपने जीवन को संजोने में जो अन्य किसी प्राणी को कष्ट न दे उसके प्राण न हरे । जो जीवित रूप में विनम्र रहे वह वास्तविक मृत्यु को प्राप्त होता है ॥

 दुष्टता  ऊपर नहीं नीचे ले जाती है, इसलिए भूमि पर ही प्राण त्यागना चाहिए.....

जीते जी कहा नहि तू रहा धर्म ते चूक । 
बैठा अब किन रोइया निकस गई जब फूँक ॥ ३०६९ ॥ 
भावार्थ : -- जीते जी तो रोया नहीं रे मरनेवाले तू पाप जोड़ रहा है पुण्य नहीं जोड़ रहा । जब फूँक ही निकल गई फिर  उसके लिए कैसा रोना ॥ 

अपना जिउ जमोअन में लगे रहे  दिन रात । 
भोजन बासना और न दूजी बात ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- जो जीवन की सहेज में ही लगा रहे  भोजन वसन और वासन  के अतिरिक्त और कुछ न संकलित करे प्राण निर्गत होने के पश्चात उसके लिए फिर क्या रोना ॥ 

मनु जीवन सुख सयनिका ये जग सपन समान । 
छन माहि भंगूरा  जब तन से निकसे प्रान ॥ ३०७० ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन सुख शयनिका  है यह संसार स्वप्न के सदृश्य है । शरीर से प्राण निर्गत होते ही यह छन में ही भंगुरता को प्राप्त हो जाता हे ॥ 

 आत्मा देह क्यूँ धारण  करती है : -- दुनिया देखने के लिए  "देही बिन जग दरस न भाई "   


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...