सहस बरस शासत करे अतिसय भोग बिलास ।
काल बरन मैं लेखि यह पाहन कर इतिहास ॥ ३०११ ॥
भावार्थ : -- सहस्त्र वर्ष से भी अधिक समय तक ये प्रवासी भारत के शास्ता रहे, काले अक्षरों में लिखा गया यह लाल- पत्थरों का काला इतिहास इनकी अतिसय भोग विलासिता का साक्ष्य है ॥
सुरभि गंधित बारी में फुरे फूर चौरंग ।
आन फिरंगी संग रहे परे रंग में भंग ॥ ३०१२ ॥
भावार्थ : -- इस सुरभित वाटिका में चौरंगी पुष्प खिला करते हैं । फिर यहाँ अंग्रेज आए और रंग में भंग पड़ गया जब भारतीय इनका विरोध करने लगे तब अंग्रेजों के सिखाने पर ये प्रवासी पुराण को पढ़े बिना ही पुराण- पंथी कह कह कर देश को बिगाड़ने में लग गए ॥
देख फिरंगी सब चरे बड़ अनुहारी होए ।
चरन चले कहँ जात हैं देखे नाहीं कोए ॥३०१३॥
भावार्थ : -- फिर तो पश्चिमी सभ्यता का ऐसा अनुकरण होने लगा कि पश्चिम वाले भी चकित रह गए ॥ जो चरण कभी शमशान में जाते थे वह अब कब्रिस्तान में जाने लगे ॥
" शमशान जाने वाले को श्मशान जाना चाहिए कब्रिस्तान जाने वाले को कब्रिस्तान जाना चाहिए । जब मंदिर जाने वाला मंदिर जाएगा यह तभी होगा....."
धर्म कर्म बिनसाए के बैठे भवन बिलास ।
माँसा गवासा होइए बाका नाउ बिकास ॥३०१४॥
भावार्थ : -- धर्म-कर्म को नष्ट करके विलास भवन में बैठकर वासना जनित क्रीड़ाएं करो । मदिरा पान करो, मांस खाओ और गांय-भैंस का भक्षण कर चंडाल बन जाओ, ऐसी जीवन-चर्या विकास कहलाने लगी ॥
मानस हेतु सार सरूप यह गीता का ज्ञान ।
करम संग ही पतन है करम संग उत्थान ॥३०१५ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन हेतु श्रीमद्भगवद्गीता में इस सारभूत ज्ञान का व्याख्यान किया गया कि कर्मों से ही मनुष्य का पतन है और कर्मों से ही उसका उत्थान है, अर्थ से नहीं अनर्थ से तो कदापि नहीं ॥
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
दया दान त्याग सहित जहँ को साँचा वाद ।
बिगड़े बासि प्रबासि के ताको संग बिबाद ॥३०१६॥
भावार्थ : -- दया दान त्याग व् सत्य के वाद सहित जहां धर्म- वाद होता । इन विपरीत कर प्रवासी और देशवासियों का उसके संग विवाद होता ॥
गाँव गाँव गौधन रहँ घर घर में गोपाल ।
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु अजहुँ भयउ चंडाल ॥ ३०१७ ॥
भावार्थ : -- जहाँ कभी गाँव गाँव में गौधन था और घर घर में ग्वाले होते थे । कृत्याकृत्य के विवेक से राहित्य अब वहां चंडाल बसने लगे ॥
चांडाल : -- अत्यंज वर्ग की कसाई गौभक्षी जाति सहस्त्रों वर्ष पूर्व जिसका उद्धार हो गया था.....
जीव जितना छोटा होता है उसकी आयु भी उतनी छोटी होती है, जो जितना अधिक जीव-हत्या करता है वह उतना छोटा जीव शरीर प्राप्त करता है जितनी बार जीव मारता है उतनी बार मरता है.....
निर्दोष जीवों की हत्या का पाप बहुंत भारी होता है
यह भव भूत प्रभूत कर तामेँ काल अनंत ।
मानस तेरा जीउना दोइ घरी के रंत ॥ ३०१८ ॥
भावार्थ : -- एक तो भौतिक संसार की अपरिमित प्रभुता फिर उसमें अंतहीन समय । अपरिमित संसार में मानव कण मात्र भी नहीं है अनंत समय में उसका जीवन केवल दो घड़ी का है ॥
चार दिवस का जीवना जामें दोई रात ॥
भोजन बासा बास हुँत किए ऐतक उत्पात ॥३०१९ ॥
भावार्थ : -- चार दिवस का जीवन है उसमें दो रात का समय है जो शयन में व्यय होता है । भोजन वस्त्र आवास के लिए मनुष्य फिर इतने उत्पात करता है ॥ क्या मनुष्य केवल खाने पीने व् पहनने के लिए जन्म लेता है ? ॥
अधुनै मानस जात के दिन दिन होत निपात ।
होए पसुता तेहु परे, यह चिंतन की बात ॥ ३०२० ॥
भावार्थ : -- भोगवादिता के कारण ही वर्तमान समय में मानव जाति निरंतर पतन की ओर अग्रसर है । क्या उसका स्वभाव पशु से भी निम्न स्तर का हो गया है यह चिंतन का विषय है ॥
गौभक्षण अंत्यज वर्ग करता था गांय -भैंस सहित मानव का भक्षण दानव करते थे ॥
काल बरन मैं लेखि यह पाहन कर इतिहास ॥ ३०११ ॥
भावार्थ : -- सहस्त्र वर्ष से भी अधिक समय तक ये प्रवासी भारत के शास्ता रहे, काले अक्षरों में लिखा गया यह लाल- पत्थरों का काला इतिहास इनकी अतिसय भोग विलासिता का साक्ष्य है ॥
सुरभि गंधित बारी में फुरे फूर चौरंग ।
आन फिरंगी संग रहे परे रंग में भंग ॥ ३०१२ ॥
भावार्थ : -- इस सुरभित वाटिका में चौरंगी पुष्प खिला करते हैं । फिर यहाँ अंग्रेज आए और रंग में भंग पड़ गया जब भारतीय इनका विरोध करने लगे तब अंग्रेजों के सिखाने पर ये प्रवासी पुराण को पढ़े बिना ही पुराण- पंथी कह कह कर देश को बिगाड़ने में लग गए ॥
देख फिरंगी सब चरे बड़ अनुहारी होए ।
चरन चले कहँ जात हैं देखे नाहीं कोए ॥३०१३॥
भावार्थ : -- फिर तो पश्चिमी सभ्यता का ऐसा अनुकरण होने लगा कि पश्चिम वाले भी चकित रह गए ॥ जो चरण कभी शमशान में जाते थे वह अब कब्रिस्तान में जाने लगे ॥
" शमशान जाने वाले को श्मशान जाना चाहिए कब्रिस्तान जाने वाले को कब्रिस्तान जाना चाहिए । जब मंदिर जाने वाला मंदिर जाएगा यह तभी होगा....."
धर्म कर्म बिनसाए के बैठे भवन बिलास ।
माँसा गवासा होइए बाका नाउ बिकास ॥३०१४॥
भावार्थ : -- धर्म-कर्म को नष्ट करके विलास भवन में बैठकर वासना जनित क्रीड़ाएं करो । मदिरा पान करो, मांस खाओ और गांय-भैंस का भक्षण कर चंडाल बन जाओ, ऐसी जीवन-चर्या विकास कहलाने लगी ॥
मानस हेतु सार सरूप यह गीता का ज्ञान ।
करम संग ही पतन है करम संग उत्थान ॥३०१५ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन हेतु श्रीमद्भगवद्गीता में इस सारभूत ज्ञान का व्याख्यान किया गया कि कर्मों से ही मनुष्य का पतन है और कर्मों से ही उसका उत्थान है, अर्थ से नहीं अनर्थ से तो कदापि नहीं ॥
करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप ।
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥
दया दान त्याग सहित जहँ को साँचा वाद ।
बिगड़े बासि प्रबासि के ताको संग बिबाद ॥३०१६॥
भावार्थ : -- दया दान त्याग व् सत्य के वाद सहित जहां धर्म- वाद होता । इन विपरीत कर प्रवासी और देशवासियों का उसके संग विवाद होता ॥
गाँव गाँव गौधन रहँ घर घर में गोपाल ।
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु अजहुँ भयउ चंडाल ॥ ३०१७ ॥
भावार्थ : -- जहाँ कभी गाँव गाँव में गौधन था और घर घर में ग्वाले होते थे । कृत्याकृत्य के विवेक से राहित्य अब वहां चंडाल बसने लगे ॥
चांडाल : -- अत्यंज वर्ग की कसाई गौभक्षी जाति सहस्त्रों वर्ष पूर्व जिसका उद्धार हो गया था.....
जीव जितना छोटा होता है उसकी आयु भी उतनी छोटी होती है, जो जितना अधिक जीव-हत्या करता है वह उतना छोटा जीव शरीर प्राप्त करता है जितनी बार जीव मारता है उतनी बार मरता है.....
निर्दोष जीवों की हत्या का पाप बहुंत भारी होता है
यह भव भूत प्रभूत कर तामेँ काल अनंत ।
मानस तेरा जीउना दोइ घरी के रंत ॥ ३०१८ ॥
भावार्थ : -- एक तो भौतिक संसार की अपरिमित प्रभुता फिर उसमें अंतहीन समय । अपरिमित संसार में मानव कण मात्र भी नहीं है अनंत समय में उसका जीवन केवल दो घड़ी का है ॥
चार दिवस का जीवना जामें दोई रात ॥
भोजन बासा बास हुँत किए ऐतक उत्पात ॥३०१९ ॥
भावार्थ : -- चार दिवस का जीवन है उसमें दो रात का समय है जो शयन में व्यय होता है । भोजन वस्त्र आवास के लिए मनुष्य फिर इतने उत्पात करता है ॥ क्या मनुष्य केवल खाने पीने व् पहनने के लिए जन्म लेता है ? ॥
अधुनै मानस जात के दिन दिन होत निपात ।
होए पसुता तेहु परे, यह चिंतन की बात ॥ ३०२० ॥
भावार्थ : -- भोगवादिता के कारण ही वर्तमान समय में मानव जाति निरंतर पतन की ओर अग्रसर है । क्या उसका स्वभाव पशु से भी निम्न स्तर का हो गया है यह चिंतन का विषय है ॥
गौभक्षण अंत्यज वर्ग करता था गांय -भैंस सहित मानव का भक्षण दानव करते थे ॥
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