धरम करे बिनु आपनी धरमी जहँ सब होए ।
बिनहि मोल मदिरा मिले बिके हाट तहँ तोए ॥३००१ ॥
भावार्थ : -- जहां धर्म करे बिना ही सभी धर्मात्मा बन जाते हैं वहां मदिरा बिना ही क्रय किए मिल जाती है जल का व्यापार होने लगता है ॥
पयस पियुष परिहार को, रकत पीब ललिहाए ।
सो जन जग मलिनाए के नित नव रोग जनाए ॥३००२॥
भावार्थ : -- जो अमृत का त्याग कर रक्त सेवन की ही लालसा करती हैं । ऐसी पिपासु प्रवृत्ति संसार में मलिनता बढाती है जिनसे नित नए रोगों का जन्म होता है ॥
रोगों के रोकथाम हेतु अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन करें.....
जग ने अल्पहि काल में जन्मे नव नव रोग ।
रोगी कतहुँ दरसाए त भय क्रांत सब लोग ॥३००३॥
भावार्थ : -- विश्व ने अल्प काल में ही नए नए रोगों को जन्म दे दिया जो एक चिंताजनक विषय है । रोग भी ऐसे रोगों से ग्रसित रोगी के दर्शन मात्र से ही लोग भयभीत हो जाते हैं ॥
सबहि कतहुँ मिले सो तो होत सधारन धर्म ।
सत्कारज किन बोलिये जो जगहित कर कर्म ॥३००४ ॥
भावार्थ : --सब कहीं मिलने वाले धर्म को साधारण धर्म कहते हैं जैसे सत्य, अहिंसा, दया, दान, त्याग आदि । जिन कार्यों में विश्व का कल्याण निहित हो उन्हें ही सत्कर्म कहते हैं । जीवों की रक्षा करना, जीवन- संरक्षण जल- संरक्षण वन्य-जीव संरक्षण पालतू पशु-संरक्षण करना,प्रदुषण न करना, पेड़-पौधे लगाना इत्यादि.....
उपासना से साधारण धर्म अथवा उत्तम भावों का वर्द्धन होता है उपासना- पद्धतियों की विभिन्नता संप्रदायों को भिन्न करती है.....
सधारन धर्म कोष अरु उत्तम देसाचार ।
ऊँच विचार संग करे ले परिवेस अकार ॥३००५॥
भावार्थ : -- साधारण धर्म का संग्रह और उत्तम आचार- व्यवहार( आहार-विहार ) , \उच्च विचारों के संगत एक उत्तम परिवेश का निर्माण करते हैं ॥
संस्कारगत होत पुनि एक संस्कृति सँजोए ।
जगत के सिरमौर होत भारत उदयित होए ॥३००६ ॥
भावार्थ : -- पाषाण युग की मनुष्य जाति की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर उसका परमार्जन व् सुधारकरण के पश्चात एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व-सिरमौर भारत-वर्ष का प्रादुर्भाव हुवा ।|
बिलगित चारन सों रहे बिलगित सबके काज ।
एकै धर्म समूह भीत, संगठित भए समाज ॥३०० ७ ॥
भावार्थ : -- भिन्न भिन्न आचार-व्यवहार व् भिन्न आहार-विहार के संग सभी के कार्य भी भिन्नता लिए हुवे थे । इस प्रकार कर्म के आधार पर एक धर्म समुदाय में समाज संगठित होते गए ॥ इन समाजों के सम्मिलन से एक राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥
लघु कुटीरु उद्यम संग पसु पालन कृषिकार ।
वैभव विभूति सहित सुख समृद्धि के आधार ॥३००८॥
भावार्थ : -- लघु और कुटीर उद्योग के संग पधुपालन और कृषकर्म विभूतिमान भारत की जगत्प्रसिद्ध सुख समृद्धि के आधार हुवे ॥
कृषिधन पसुधन संग रहँ सुख सम्पद सब काल
भंडार भरपूर रहँ परे नहीं अकाल ॥३००९॥
भावार्थ : -- इस प्रकार कृषिधन पशुधन का संग प्राप्त कर उसके सभी काल संपन्न होते गए । वह अकाल- ग्रस्त नहीं होता अन्न के भण्डार भर पूर होते ॥
देस परिबेस लाँघि जब आन बसे परबासि ।
देस चरन बिपरीत कर होत गयउ सम भासि ॥३०१० ॥
भावार्थ : -- देश की सीमाओं का अतिक्रमण व् उसके परिवेश का परिच्छेदन कर फिर उपनिवेशी यहाँ आ बसे । इनकी उपासना पद्धति भारत से पृथक थी इनके आचार- व्यवहार व् आहार-विहार भारतीय नियमों के प्रतिकूल होकर उनकी कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते ॥ इनकी भाषा भारतीयों से समवेत होती गई ॥
बिनहि मोल मदिरा मिले बिके हाट तहँ तोए ॥३००१ ॥
भावार्थ : -- जहां धर्म करे बिना ही सभी धर्मात्मा बन जाते हैं वहां मदिरा बिना ही क्रय किए मिल जाती है जल का व्यापार होने लगता है ॥
पयस पियुष परिहार को, रकत पीब ललिहाए ।
सो जन जग मलिनाए के नित नव रोग जनाए ॥३००२॥
भावार्थ : -- जो अमृत का त्याग कर रक्त सेवन की ही लालसा करती हैं । ऐसी पिपासु प्रवृत्ति संसार में मलिनता बढाती है जिनसे नित नए रोगों का जन्म होता है ॥
रोगों के रोकथाम हेतु अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन करें.....
जग ने अल्पहि काल में जन्मे नव नव रोग ।
रोगी कतहुँ दरसाए त भय क्रांत सब लोग ॥३००३॥
भावार्थ : -- विश्व ने अल्प काल में ही नए नए रोगों को जन्म दे दिया जो एक चिंताजनक विषय है । रोग भी ऐसे रोगों से ग्रसित रोगी के दर्शन मात्र से ही लोग भयभीत हो जाते हैं ॥
सबहि कतहुँ मिले सो तो होत सधारन धर्म ।
सत्कारज किन बोलिये जो जगहित कर कर्म ॥३००४ ॥
भावार्थ : --सब कहीं मिलने वाले धर्म को साधारण धर्म कहते हैं जैसे सत्य, अहिंसा, दया, दान, त्याग आदि । जिन कार्यों में विश्व का कल्याण निहित हो उन्हें ही सत्कर्म कहते हैं । जीवों की रक्षा करना, जीवन- संरक्षण जल- संरक्षण वन्य-जीव संरक्षण पालतू पशु-संरक्षण करना,प्रदुषण न करना, पेड़-पौधे लगाना इत्यादि.....
उपासना से साधारण धर्म अथवा उत्तम भावों का वर्द्धन होता है उपासना- पद्धतियों की विभिन्नता संप्रदायों को भिन्न करती है.....
सधारन धर्म कोष अरु उत्तम देसाचार ।
ऊँच विचार संग करे ले परिवेस अकार ॥३००५॥
भावार्थ : -- साधारण धर्म का संग्रह और उत्तम आचार- व्यवहार( आहार-विहार ) , \उच्च विचारों के संगत एक उत्तम परिवेश का निर्माण करते हैं ॥
संस्कारगत होत पुनि एक संस्कृति सँजोए ।
जगत के सिरमौर होत भारत उदयित होए ॥३००६ ॥
भावार्थ : -- पाषाण युग की मनुष्य जाति की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर उसका परमार्जन व् सुधारकरण के पश्चात एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व-सिरमौर भारत-वर्ष का प्रादुर्भाव हुवा ।|
बिलगित चारन सों रहे बिलगित सबके काज ।
एकै धर्म समूह भीत, संगठित भए समाज ॥३०० ७ ॥
भावार्थ : -- भिन्न भिन्न आचार-व्यवहार व् भिन्न आहार-विहार के संग सभी के कार्य भी भिन्नता लिए हुवे थे । इस प्रकार कर्म के आधार पर एक धर्म समुदाय में समाज संगठित होते गए ॥ इन समाजों के सम्मिलन से एक राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥
लघु कुटीरु उद्यम संग पसु पालन कृषिकार ।
वैभव विभूति सहित सुख समृद्धि के आधार ॥३००८॥
भावार्थ : -- लघु और कुटीर उद्योग के संग पधुपालन और कृषकर्म विभूतिमान भारत की जगत्प्रसिद्ध सुख समृद्धि के आधार हुवे ॥
कृषिधन पसुधन संग रहँ सुख सम्पद सब काल
भंडार भरपूर रहँ परे नहीं अकाल ॥३००९॥
भावार्थ : -- इस प्रकार कृषिधन पशुधन का संग प्राप्त कर उसके सभी काल संपन्न होते गए । वह अकाल- ग्रस्त नहीं होता अन्न के भण्डार भर पूर होते ॥
देस परिबेस लाँघि जब आन बसे परबासि ।
देस चरन बिपरीत कर होत गयउ सम भासि ॥३०१० ॥
भावार्थ : -- देश की सीमाओं का अतिक्रमण व् उसके परिवेश का परिच्छेदन कर फिर उपनिवेशी यहाँ आ बसे । इनकी उपासना पद्धति भारत से पृथक थी इनके आचार- व्यवहार व् आहार-विहार भारतीय नियमों के प्रतिकूल होकर उनकी कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते ॥ इनकी भाषा भारतीयों से समवेत होती गई ॥
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