मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०० ॥ -----

धरम करे बिनु आपनी धरमी जहँ सब होए  । 
बिनहि मोल मदिरा मिले बिके हाट तहँ तोए ॥३००१ ॥
भावार्थ : -- जहां  धर्म करे बिना ही सभी धर्मात्मा बन जाते हैं वहां मदिरा बिना ही क्रय किए मिल जाती है जल का व्यापार होने लगता है ॥

पयस पियुष परिहार को, रकत पीब ललिहाए ।
सो जन जग मलिनाए के नित नव रोग जनाए ॥३००२॥
भावार्थ : -- जो अमृत  का त्याग कर रक्त सेवन की ही लालसा करती हैं । ऐसी पिपासु प्रवृत्ति संसार में मलिनता बढाती है जिनसे नित नए रोगों का जन्म होता है ॥

 रोगों के रोकथाम हेतु अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन करें.....

जग ने  अल्पहि काल में जन्मे नव नव रोग । 
रोगी कतहुँ दरसाए त  भय क्रांत सब लोग ॥३००३॥ 
भावार्थ : -- विश्व ने अल्प काल में ही नए नए रोगों को जन्म दे दिया जो एक चिंताजनक विषय है । रोग भी ऐसे रोगों से ग्रसित रोगी के दर्शन मात्र से ही लोग भयभीत हो जाते हैं ॥

सबहि कतहुँ  मिले सो तो होत सधारन धर्म । 
सत्कारज किन बोलिये जो जगहित कर कर्म ॥३००४ ॥ 
भावार्थ : --सब कहीं मिलने वाले धर्म को साधारण धर्म कहते हैं जैसे सत्य, अहिंसा, दया, दान, त्याग आदि । जिन कार्यों में विश्व का कल्याण निहित हो उन्हें ही सत्कर्म कहते हैं । जीवों की रक्षा करना, जीवन- संरक्षण जल- संरक्षण वन्य-जीव संरक्षण पालतू पशु-संरक्षण करना,प्रदुषण न करना, पेड़-पौधे लगाना इत्यादि.....

 उपासना से साधारण धर्म अथवा उत्तम भावों  का वर्द्धन होता है उपासना- पद्धतियों की विभिन्नता संप्रदायों को भिन्न करती है.....

सधारन धर्म कोष अरु  उत्तम देसाचार । 
ऊँच विचार संग करे ले परिवेस अकार ॥३००५॥ 
भावार्थ : -- साधारण धर्म का संग्रह और उत्तम आचार- व्यवहार( आहार-विहार ) , \उच्च विचारों के संगत एक उत्तम परिवेश का निर्माण करते हैं ॥

संस्कारगत होत पुनि  एक संस्कृति सँजोए । 
जगत के  सिरमौर होत  भारत उदयित होए ॥३००६ ॥ 
भावार्थ : -- पाषाण युग की मनुष्य जाति की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर उसका परमार्जन व् सुधारकरण के पश्चात एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व-सिरमौर भारत-वर्ष  का प्रादुर्भाव हुवा ।|

बिलगित चारन सों रहे बिलगित सबके काज । 
एकै धर्म समूह भीत, संगठित भए समाज ॥३०० ७ ॥ 
भावार्थ : -- भिन्न भिन्न आचार-व्यवहार व् भिन्न आहार-विहार के संग सभी के कार्य भी भिन्नता लिए हुवे थे । इस प्रकार कर्म के आधार पर एक धर्म समुदाय में समाज संगठित होते गए ॥ इन समाजों  के सम्मिलन से एक राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥

लघु कुटीरु उद्यम संग पसु पालन कृषिकार । 
वैभव विभूति सहित सुख समृद्धि के आधार ॥३००८॥ 
भावार्थ : -- लघु और कुटीर उद्योग के संग पधुपालन और कृषकर्म विभूतिमान भारत की  जगत्प्रसिद्ध सुख समृद्धि के आधार हुवे ॥

कृषिधन पसुधन संग रहँ सुख सम्पद सब काल 
भंडार भरपूर रहँ  परे नहीं अकाल ॥३००९॥ 
भावार्थ : -- इस प्रकार कृषिधन पशुधन का संग प्राप्त कर उसके सभी काल संपन्न होते गए । वह  अकाल- ग्रस्त नहीं होता अन्न के भण्डार भर पूर होते ॥

देस परिबेस लाँघि जब आन बसे परबासि । 
देस चरन बिपरीत कर होत गयउ सम भासि ॥३०१० ॥ 
भावार्थ : -- देश की सीमाओं का अतिक्रमण व् उसके परिवेश का परिच्छेदन कर फिर उपनिवेशी यहाँ आ बसे । इनकी उपासना  पद्धति भारत से पृथक थी इनके आचार- व्यवहार व् आहार-विहार भारतीय नियमों के प्रतिकूल होकर उनकी कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते ॥ इनकी भाषा भारतीयों से समवेत होती गई ॥







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