जगमें काल अँधेरिया छाए रहे घन घोर ।
दिसा दिसा दानव दिसे चोर चोर चहुँ ओर ॥२९९१ ॥
भावार्थ : -- संसार में जब न्ययोचित नियमों का नियमोचित न्याय व् सच्चरिता का अभाव होता है तब दिशा दिशा में दानव पथ पथ में चोर दिखाई देते हैं चारों ओर में रोग व्याप्त होते हैं ॥ और एक भय का वातावरण बन रहता है
जंगल केरे राज ते बुरा राकसी राज ।
फारत काचा खाइगा कारत कपट ब्याज ॥२९९२ ॥
भावार्थ : -- जंगल राज तो बुरा है ही उससे बुरा राक्षसी राज है राक्षसी राज छल कपट करता है इसके मुंह में राम पार्श्व देश में छुरी होती है खाते दोनों कच्चा ही हैं अब बताओ आहार बनना है ?
जागा है तो जगा रह सोया है तो जाग ।
जब लग भोर पौर लगे लगे चोर को लाग ॥ २९९३॥
भावार्थ : -- हे जन मानस यदि तुम जागृत हो तो जागृत ही रहो यदि सुषुप्त हो तो जागृत रहो । जब तक ज्ञान रूपी भोर का प्रादुर्भाव न हो जाए तब तक चोर और दानवों के पीछे लगे रहो ॥
जग में बरते सार सों चहुँ दिसि होत उजार ।
सार रहे न किछु रहे छाए रहे अँधियार ॥२९९४ ॥
भावार्थ : -- सार के तेजस् से ही यह संसार प्रकाशमय है । कोई भी शब्द हो कर्म हो धर्म हो वह सार गर्भित हो सार न होने से संसार में अँधकार व्याप्त रहता है ।।
एक बसना के बासना दूज रसना के रास ।
बहुरि छली की छावनी करे जगज्जन दास ॥२९९५ ॥
भावार्थ : -- एक तो वास वस्त्रो की वासना दूसरी जिह्वा की विलासिता उसपर कपट-छाया ने संसार को भोगों का दास बना दिया ॥
रगत माँस सब भखि गयो भली न कीन्हि कान । ( संत कबीर दास )
लोग गरब करि कहे अह हमरे देस बिधान ॥ २९९६ ॥
भावार्थ : -- " अहिंसा वादी स्वाधीनता का हिंसा वादी संविधान " जो देश इस धरती का दूध पीकर बड़ा हुवा इस संविधान न उसका रक्त छोड़ा न मांस छोड़ा । देश वासियों को इसने नरभक्षी बना दिया, कारण कि इसके अनुबंध स्वार्थ परता पर आधारित थे लोग गर्व करते हैं हमारा संविधान, हमारा लोकतंत्र ॥
क्या हिंसा वादिता भी कभी गर्व के योग्य हुई है ?
भारत जैसे देश में हिंसा कभी स्वीकार्य नहीं होगी, यह केवल आत्मरक्षा का अस्त्र है.....
सिंहासन पर पीठ दिए भाखे माँस मद दोए ।
सनै सनै नर भाख के सो तो दानव होए ॥२९९७ ॥
भावार्थ : -- मांसाहारी की जब उत्तरोत्तर उन्नति होती है तब वह मनुष्यों का भी भक्षण करने लगता है । अत: जो सिंहासन पर बैठे हैं वो खाते मांस हैं और पीते मदिरा हैं शनै शनै नर भक्षी होकर वह भी दानव बन गए
उनका राज दानव-राज हो गया ॥
यह भारत यह भूमि यह हिन्दू के अस्थान ।
धर्मपरायन लोग यहाँ सम्मुख हैं भगवान ॥ २९९८ ॥
भावार्थ : -- यह भारत यह भारत की भूमि हिन्दुओं का ही स्थान है कतिपय सत्ताधारी व् उनके समर्थक इसे तालीबान गालीबान नालीबान जैस न जाने कौन सा स्तान और बान बनाने पर तूले हैं । यहाँ ईश्वरोन्मुख धर्म
परायण लोग रहते हैं, उदरपरायण नहीं ॥ यह एक धार्मिक राष्ट्र था है और रहेगा ॥
धर्म धुर कहँ आपन पो करें पाप की बात ।
धाँधल धूर्त चरित कृत भए कस भारत जात ॥२९९९ ॥
भावार्थ : -- जो स्वयं को धर्म निष्ठ कहतें हैं और पाप की बात करते हैं । फिर वे दुष्ट चांडाल बेईमान भारतीय कैसे हुवे ?
दुर्नय ने दुर्नीत ने सिरोधरे धुरधर्ष ।
तहाँ जीवन जीवति हुँत जीव करे संघर्ष ॥३००० ॥
भावार्थ : -- नीति विरुद्ध नियमों व् मतार्थी दुरात्माओं ने हिंसा को सिरोधार्य करने के कारण जीव जीवति के लिए व् यह विश्वम्भरा जीवन के लिए संघर्ष कर रही है ॥ हरे भरे स्थल मरुस्थल में परिवर्तित होते जा रहे हैं ॥
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