बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०४-३०५॥ -----


जीव जीव सब एक अहैं एकए मरन की पीर । 
जनमत जो को जी धरे, जग में वाका सीर ॥३०४१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य हो क़ि जीव जंतु हों सभी प्राणी एक हैं मारने पर सभी को पीड़ा होती है । इस धरती पर जिसने भी जन्म लिया है जीवन के सह उसपर उन सभी का अधिकारहै । मनुष्य को चाहिए कि वह अन्य जीव-धारियों को भी अपने प्राणों के तुल्य मान दे ॥  

निरीह व्  मूक की निर्मम हत्या कहाँ तक न्याय संगत है.....? 

जोइ धर्म कर राखिया धर्महु राखत तेहिं । 
जोइ अहिंसक होइया हिंसा हते न केहिं ॥३०४२ ॥ 
भावार्थ : -- जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है । निरीह की हत्या क्या धर्म है ?हिंसा हिंसक को ही लक्ष्य करती है, अहिंसक को हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती ॥ हत्यारे को समाप्त करने से हत्याएं समाप्त नहीं होंगी अत: हत्या के कारणों को समाप्त करना अधिक श्रेयष्कर है ॥ 

क्या धर्म-निरपेक्ष का अर्थ अधर्म के सापेक्ष है.....? 

सुबरन घड़े सुनालिया लोहा घड़े लुहारि । 
बुद्धि रन तस जयन घड़े परि बल ऊपर भारि ॥३०४३॥ 
भावार्थ : -- जिस प्रकार स्वर्ण को सुनार घडता है लोहा को लुहार उसी प्रकार बुद्धि सदैव बल पर भारी पड़ती है और विजय को घडती है ॥  

तामस रस रसियाए के बुद्धि गहे नहि कोइ । 
रावन सुबरन दीप बसा बिजय राम कर होइ ॥३०४४॥ 
भावार्थ : -- आती कहाँ से है ये बुद्धि..... ? एक महाआआआ त्मा कह गए हैं की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती 
सत्य तो यह है कि तामस प्रवृत्ति से बुद्धि नहीं आती देना कहाँ की बुद्धिमानी है । रावण तो भूखा नहीं था वह तो स्वर्णमयी द्वीप में बसा था भूखे तो श्री राम थे जो वन वन फिर रहे थे तथापि बल व् बुद्धि की निर्बल पर विजय हुई । सात्विकता से बल व् बुद्धि दोनों प्राप्त होते हैं ॥ गरवा भईंसा खाने से नरभक्षण करने से न बल प्राप्त होता है न बुद्धि ॥ तामस रसी को रसों की अनुभूति नहीं होती उसकी रसना स्वाद हीन हो जाती है ॥ 

हनुमत भूखे उदर भए पवन जवन अवरोहि । 
सुबरन लंका जारि के लाए सिआ कर टोहि ॥३०४५॥ 
भावार्थ : -- ज्ञान व् गुणके  सागर हनुमंत क्षुधित रूप में हवा के घोड़े पर अवरोहित हुवे स्वर्ण की लंका जलाई व् माता सीता को खोज निकाला । 

भूख नल अरु नील कर सागर सेतु बँधाए । 
करिअ सागर पार प्रभो लंका गत फल खाए ॥३०४६ ॥ 
भावार्थ : -- क्षुधित नल व् नील के हाथों सागर पर परिकलन रहित रामसेतु बंधा । उस सेतु से अपार सागर को पार कर श्री राम को  लंका पहुंचाया फिर सात्विक भोजन ग्रहण किया ॥ 


जिसने रामायण का अध्ययन नहीं किया , सात्विकता के महात्मय से अनभिज्ञ होकर वही क्षुधा को बुद्धि का नाशक कहता है.....

तन के परिशोधन संग, अंतर मन की सुद्धि । 
सोधित कर धन धारिये आवै छम छम बुद्धि ॥३०४७ ॥ 
भावार्थ :--शुद्धि से बुद्धि आती है.....

तन कैसे शुद्ध होता है ? : -- 

प्रात क्रिया के  संगत किए जब प्रतिदिन अस्नान । 
तदनन्तर करि आचमन निर्मल होत मलान ॥३०४८॥ 
भावार्थ : -- प्रात क्रिया के संग प्रतिदिन स्नान करें । तदनन्तर आचमन  कर स्वच्छ परिधान धारण करें हो गया तन शुद्ध ॥ 

भगवान ने मनुष्य को बनाने के पश्चात कहा : -- दो बार नहाना एक बार खाना उसने उल्टा सुना..... 

मन कैसे शुद्ध  होता है : -- 

ऊँच नीच को विचारत,  जो मन धरे ध्यान । 
ऐसोइ अभ्यास संग  अमलिन होत मलान ॥ ३०४९ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्रों में कहा  गया है कि उचित-अनुचित ( यह करना, यह कहना, यह खाना उचित है कि नहीं ) का विचार कर ध्यानाभ्यास करता हुवा मनोमस्तिष्क दोषरहित होता जाता है ॥


धन कैसे शुद्ध होता है : -- 


धन के स्वामी एकही नारायन भगवान । 
उदर पूरत कर लीजो अधिक न अपना मान ॥३० ५० ॥ 
भावार्थ : -- संसार में धन के स्वामी एक ही हैं वो हैं नारायण भगवान । ऐसा उत्तम विचार करते हुवे  अधिक धन को पराया जानकर केवल निर्वाह योग्य ही धन ग्रहण करें ॥ 

संपत केतक धारिये जेतक में निर्बाह । 
अधिक पराई जान के अपनी मानिए नाह ॥३०५१ ॥ 
भावार्थ : -  सम्पती कितनी ग्रहण करनी चाहिए जितने में निर्वाह हो । अधिक पर अन्य  का अधिकार जानकर उसे पराई मानना चाहिए ॥ 

राजू : -- हाँ ! और  न जीते जी अपनी क्रिया भी कर लेनी चाहिए बाद में  कोई करे न करे, और न दो ढाई हवेली इधर-उधर पडी हों तो एक आध सलटा देनी चाहिए.....

सन्मारग कर अरजनहु, मैल मलिनई होत । 
भाव पूरित लोभ रहित दानहि धन को धोत ॥३०५२॥
भावार्थ : -- उचित मार्ग से अर्जित किए धन सम्पति में भी मलिनता होती है । भाव पूर्णित कामना रहित दान धन-सम्पत्ति को शुद्ध करता है ॥

चारि दिवस का जीउना माँग माँग मत जोड़ । 
जनम जनम सुख चाहिता देइ देइ कर छोड़ ॥ ३०५३॥ 
भावार्थ : -- अल्प काल का जीवन है मांग मांग कर मत जोड़ो । अभी तो कितने ही जन्म होने हैं यदि प्रत्येक जनम में सुख चाहते हो तो दे दे कर छोड़ो ॥

धरम पूरित धनार्जन धर्मात्मन्हि पाए । 
पाप पूरित अर्जित धन  पापी के कर जाए ॥३०५४॥ 
भावार्थ : -- धर्मानुसार अर्जित धन-सम्पत्ति  का दान धर्मात्मा को प्राप्त होता है । पाप कर्म से व् अन्याय पूर्वक अर्जित धन के दान को पापीचारी प्राप्त करता है ॥

सागर सों जूँ बादरी मोती चुनि चुनि लाए । 
वाके चरंननुहार के जीवन धन उपजाए ॥३०५५॥ 
भावार्थ : -- सागर में मल और मोती दोनों होते हैं किन्तु जिस प्रकार बदरी केवल मोतियों को चुन लाती है ।मनुष्य को भी उसी प्रकार से जीविकोपार्जन करना चाहिए ॥

बादर ऊँचे पद लहे बरखत जल कर दान । 
सागर तिन संचाए के, गहे अधम अस्थान ॥३०५६॥ 
----- ॥ पुराणों से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- वर्षा से जल का दान करते हुवे बादल सदैव ऊँचे पद को प्राप्त होते हैं , जबकि उसी जल का संग्रह करने वाले सागरों का स्थान निम्न रहता है ॥

सागर जल संचाए के सकले मैल मलीन । 
बादर जल बरखाए के छनु छिनु होत कुलीन ॥३०५७॥  
भावार्थ : -- सागर जल का संचयन कर मलिनता का संकलन करता है । बादल उसी जल का दान कर निरंतर कुलीनता को प्राप्त होता है ॥

धर्म के मर्यादा बिनु करता अर्थ अनर्थ । 
पेट परायन आपना अर्थप होत ब्यर्थ ॥ ३०५८ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ में धर्म की मर्यादा न हो तो वह अनर्थ करता है ॥ जो अर्थपति अपने ही पेट के परायण हो उसका होना व्यर्थ होता है ॥ उससे किसी का हित नहीं होता ॥

जो अर्थ धर्मार्थ हुँत तासु जगत सुख पाए । 
अर्थार्थी को अर्पित होत सदा  दुखदाए ॥ ३० ५९॥ 
भावार्थ : -- जो अर्थ परोपकर के निमित्त हो वह समस्त विश्व के लिए सुखप्रद होता है । जो अर्थ, पिशाचों के निमित्त हो वह सदैव दुखप्रद होता है ॥ उससे किसी का कल्याण नहीं होता ॥

सम्पद सोई धारिये जामें जग सुख पाए । 
औरन को जीबित करे आपन जीवन दाए ॥३०६० ॥ 
भावार्थ : -- संपत्ति वही धारण करें जिससे किसी को कष्ट न हो जो जगत भर के लिए सुख प्रद हो । जो औारों के साथ स्वयं को भी जीवंत करे ॥










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