शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम २९८॥ -----


कोई मारे पाहना कोई मारे बान । 
दनुज देही तबहि मरे जब मारे भगवान ॥२९८१॥ 
भावार्थ : -- कोई पत्थर मारता  है कोई तीर से मारता  है  कोई कोई तो दम्बूक से मारता है  । भीतर के राक्षस तभी मरते हैं जब उन्हें भगवान मारते हैं ॥ 

मरि गया भई मरि गया मरा नहीं पर कोए । 
को कर बिनु को चरन बिनु  पुनि पुनि जनमन होए ॥ २९८२ ॥ 
भावार्थ : -- मर गया मर गया लोग कहते हैं पर मरता कोई नहीं अपने कुकर्मों के कारण मनुष्य  बिना हाथ-पैर के बारम्बार जन्म लेता है ॥ 

तू जाना मैं मरि गया  मरना सरल न होए । 
बहोरि जनम न होइया, मरा जगत में सोए ॥२९८३ ॥ 
भावार्थ : -- तू ने समझा मैं मर गया किन्तु मरना इतना सरल नहीं होता । जीव बारम्बार काल का ग्रास बनता है । जिसका पुनर्जन्म न हो वही मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ मृत्यु की वेदना अत्यंत दुखदाई होती है ॥ 

माया ही भगवान जहँ सब किछु केर बिधान । 

जैसी निर्बल बीतिया तैसी अपनी जान ।२९ ८४ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ पैसा ही भगवान हो और सब कुछ करने की छूट हो । वहां  निर्बल कातर निर्दोषों  के साथ जैसा व्यवहार हुवा है वैसा व्यवहार सब के साथ होगा ॥ 

कृत्याकृत्य सहित जहाँ पथ्यापथ्य न देख । 
अनरथ पति के अर्थ में सोई धर्म निरपेख ॥२९८५ ॥ 
भावार्थ : --  कृत्याकृत्य सहित जो पथ्यापथ्य  का विचार न करे  कुछ अनर्थ पतियों के लिए धर्म निरपेक्ष का यही अर्थ है ॥ 

कर्तव्याकर्तव्य =  (जहां सब कुछ करने छूट हो )
पथ्यापथ्य = कुछ भी खा लो विष भी खा लो, नर भी खा लो नारी भी खा लो  )

उचितनुचित बिहुरात जहँ नेमे नेम न्याय । 
दुर्धर्ष चरम पर होत  पाप परम पद पाए ॥२९८६ ॥ 
भवार्थ : -- उचितअनुचित का विचार किए जहाँ पर नियम व् न्याय निबंधित होते हैं वहां हिंसा अपने चरम पर होती है और पाप परम पद को प्राप्त होता है ॥ 

नेम नीति निरपेख जहँ नेमे नेम न्याय । 
धर्म नीचहि नीच रहे पाप परम पद पाए ॥२९ ८७ ॥ 
भावार्थ : -- लोक-व्यवहार के निर्वहन हेतु नियत किये गए आचार-विचारों की उपेक्षा करने वाले ही जब लोगों से नियमों की अपेक्षा करते हुवे नीति निर्धारित करते हैं तब धरम कहीं नीचे दब जाता  है और पाप परम पद को प्राप्त होता है ॥ 

अहिंसा परम धरम है हिंस सरिस न पाप । 
ये तो सुख की सम्पदा, यह भय रुज संताप ॥२९ ८८ ॥ 
भावार्थ : -- अहिंसा परम धर्म है  हिंसा जैसा कोई पाप नहीं है । अहिंसा सुखकर सम्पदा है हिंसा आतंक व्याधि वियोग आदि दुखों की दाता है ॥ 

हिंसा : -- प्राणी मात्र के प्रति की गई कष्टकर क्रिया 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...