बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०३ ॥ -----


जात संग जातीयता जात संग अभिजात । 
जात धर्म बिसराए के होत जात सम्पात ॥ ३०३१ ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्रीयता जन्म जात होती है प्रवास से नहीं । अपने धर्म जाति कुल में स्थिर रहने से ही आनुवांशिकता प्राप्त होती है। जो जाति-धर्म  का तिरस्कार करता है वह शनै शनै अपने कुल अपने समाज अपने राष्ट्र से पृथक होता जाता है ॥ 

चूँकि विदेशों में आनुवंशिकता का अभाव पाया जाता है बहूँतों को वहां अपने मात-पिता का नाम भी पता नहीं होता  इस लिए आनुवांशिक अभियांत्रिकी में किंचित अनुसंधान हुवे अत: इस क्षेत्र में बहुंत संभावनाएं हैं और अनुसन्धान में निश्चित ही कुछ चौंकाने वाले परिणाम प्रात होंगे.....

देस धर्म को छोड़ के अपनी जात न तोड़ । 
यह निज गुन बिनसाए के आन अगुन करि जोड़ ॥३०३२ ॥ 
भावार्थ : --अपने देश अपने आचार- विचार अपने आहार-विहार का तिरस्कार   कर किसी को भी अपनी जाति-धर्म  का त्याग नहीं करना चाहिए ।  यह त्याग  गुण की उपेक्षा कर अवगुण को ग्रहण कर गुणहीन हो जाता है ॥  

लोहा लोहा ते मिले घन बन मारए चोट । 
जो कहूँ सुबरन मेलिआ होत खरा सों खोट ॥ ३०३३ ॥ 
भावार्थ : --  लोहा लोहा से मेल करे तो घन बन के ठन ठन करके स्वर्ण को भूषण का स्वरूप देता है  
स्वर्ण से मेल करे तो वही लोहा दुष्टता का प्रतीक होकर निकृष्ट हो जाता है ॥ 

इसलिए उत्तम धातु से मिश्रित होकर निम्न धातु उत्तम नहीं न हो जाती, अधम हो जाती है और उत्तम धातु निम्न हो जाती है ॥ 

हरिआ करिआ सों मिले रंग रहए नहि कोए । 
हरिआ ते हरिआ मिले हरिआ हरिआ होए ॥३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- हरा  काले वर्ण से मिले तो वह रंगहीन हो जाता है । वहीँ हरा यदि हरे से मिले तो वह हरा-भरा हो जाता है ॥ 

धर्म कर्म सँभारी के अपनी जाति सुधार । 
मानस कर उद्धरन  सों जगत केर उद्धार ॥३०३५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म-कर्म को सहेजते हुवे आहार-विहार व् आचार-विचार में परिवर्तन कर अपनी जाति  सुधारनी चाहिए । जाति  व् धर्म वह उपकरण हैं जो मनुष्य का उद्धार करते हैं, यह उद्धरण जगत के उद्धार का आधार है ॥ 

साँच रहे बिन साँच भए दाता भए बिन दान । 
दया बिनहि दयाकर भए, टप बिनु तपो निधान ॥३०३६- क॥ 
भावार्थ : -- सत्य का आचरण करे बिना जो सत्यवादी हैं, बिना दान के दातार हैं,   दया बिना ही दयाकर व् तप  बिना ही जो तपोनिधान हैं ॥ 

जाति धरम पतित ही जब समाज पति पद जोए । 
सुधरना उधरना कि तहँ  कहि बत बिरथा होए ॥ ३०३७ - ख ॥ 
भावार्थ : -- जहां ऐसे जाति-धर्म पतित समाज के पति पद को प्राप्त हो वहां सुधार- उद्धार का वार्तालाप व्यर्थं है ॥ 

कूल बँधाई नदी भली भली नदी में नाउ । 
पौर पौर सों मेलती पहुंचे पिउ के गाँव ॥३०३८ ॥ 
भावार्थ : -- तटों से बंधी हुई नदी भली होती है ऐसी भली नदी  नाव के लिए भी भली होती है । यह मर्यादित नदी व् नाव पौड़ी पौड़ी से मेल करती जिस प्रकार सीधे अपने प्रीतम के गाँव पहुंचती हैं । 

उसी प्रकार मर्यादित संप्रदाय संसार के लिए हितकर होते हैं यह अपने अनुयायियों को सौहार्द पूर्ण वातावरण में सीधे ईश्वर के पास पहुंचा देते हैं ॥ 

एक : --  सौहार्द पूर्ण वातवरण के लिए आवश्यक है कि धार्मिक संप्रदाय धर्म के आचरण ( सत्य दया तप दान ) का पालन करें , 
दो : -- अपने धर्म अपनी जाति-गत समाज में ही वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हों  । 

तीन :-- इंसान का पशुओं से भी  भाईचारा हो साईँ चारा न हो.....
 क्रमश:

आन बसे परबासिया भूर परे मर्याद । 
जोइ बिरावन बोलिया ताको संग विवाद ॥३०३९॥ 
भावार्थ : -- प्रवासी जब इस देश के निवासी होकर अपनी मर्यादा भूल गए । अब जो कोई उन्हें पराया कह देता वह विवादित हो जाता ॥

अजहुँ त मनोभाव संग  रसना भई अधीन । 
देसज अपने  देस में भयऊ बोल बिहीन ॥३०४० ॥ 
भावार्थ : -- देश स्वाधीन क्या हुवा कि अब तो विचार-अभिव्यक्ति के साथ जिह्वा भी सत्ताधारियों के अधीन हो गई । भारत वंशी अपने ही देश में देशांतरी को कुछ कहने से भी वंचित हो गए ॥























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