रविवार, 11 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०२ ॥ -----

अंत्यज को का बोलिए रहँ सो अंतेबास । 
कृत्याकृत्य न जानिआ पहुंचे नहीं प्रकास ॥३०२१ ॥ 
भावार्थ : -- अन्त्यज वर्ग को क्या कहें वह तो सबसे अंतिम वास में वासित था उसे कृत्याकृत्य सहित पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं था क्योंकि तत्काल वहां तक सभ्यता की पहुँच नहीं थी ॥

चतुर्थ वर्ग चतुर्थ वर्ग क्यों था - इसी लिए था.…। इसलिए थोड़े की उसके पास पैसा नहीं था या पद नहीं था

रयन  में जो दिनकर धर करि घन घोर घमंड । 
कृत्यकृत्य न बूझिया ऐसो को दिग्दंड ॥३०२२ ।।  
भावार्थ : -- प्रथम पंक्ति के वह लोग जो श्रेष्ठतम भवनों में रहते हैं अभिमान पूर्वक जो  स्वयं को विकसित कहते हैं सभ्य कहतें हैं लब्ध प्रतिष्ठित कहतेंहैं सुशिक्षित कहते हैं यदि उन्हें कृत्याकृत्य व् पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं है तो ऐसों नराधमों को धिक्कार है ॥ 

तपोन्मुखी होइया जब यह मानस जात । 
तासों देस समाज के दिन दिन होत  निपात ॥ ३०२३ ॥ 
भावार्थ : --  मानव जाति जब पतोन्मुख होती है तब उसके साथ उसका समाज व् उसका देश भी निरंतर अधोगति को प्राप्त होता है ॥ यह अधोगति पृथ्वी सहित सृष्टि को भी संकटापन्न करती है ॥ 

प्रथम बसेरी जोइ  है अंत बसेरी सोए । 
अनगढ़ दोनउ मेलिया गढ़ना सरल न होए ॥ ३०२४ ॥ 
भावार्थ : -- जिस राष्ट में कभी जो अन्तेवासी था वर्तमान में वह राष्ट्र का प्रथम नागरिक है दोनों ही परिस्थिति में यदि वह अशिष्ट व् असंस्कृत हों तो इसका अर्थ यह है कि उसे शिष्ट व् सुसंस्कृत करना अतिशय कठिन है ॥ 

कोउ त अंते बासिया  बसा सुपासा कोउ । 
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु मिलिआ अनगढ़ दोउ ॥३०२५॥ 
भावार्थ : -- अंतेवासी अंतिम निवास में बसा था विकासी  प्रथमतस निवास में बसा है ।  कृत्याकृत्य के विवेक से रहित दोनों ही असभ्य व् असंस्कारी पाए गए.....निष्कर्ष : -अर्थ या अनर्थ से मनुष्य का उद्धार नहीं होता.....
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नीत्ति न्याय परत रहे रहे धरम के राज । 
रोग सोक ब्यापत नहीं  रहे  न कतहुँ ब्याज ॥३०२६ ॥ 
भावार्थ : - जब धर्म का शासन  होता है तब नीतिया न्यायपरक होती हैं और न्याय नीतिपरक होता है । भयोत्पादक तत्व व्याप्त नहीं होते अपराध नियंत्रित रहते हैं ॥ 

अधुनातन हिंसापरत हैं अधरम के राज  । 
चहुँ पु रोग सोक सहित ब्याप रहे ब्याज ॥३० २७ ॥ 
भावार्थ : -- अधुनातन न केवल भारत अपितु विश्वभर में हिंसा परत अधर्मी शक्तियों का ही शासन है । भयोत्पादक तत्वों का फैलाव व् अनियंत्रित अपराध इसका प्रमाण हैं । 

अहिंसा को आचरण में उतारने से हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती  । 

हिंसा रक्षक की विवशता है..... 

कनक कोट मनि कृत भवन गह  जस लंका होइ । 
ऐसो बिकसित अजहुँ लग जग मैं भया न कोइ ॥३०२८ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्णमयी  दुर्ग के भीतर मणिमय भवन , गाड़ी घोड़े रथ समूह,पुष्पक-विमान, सुन्दर सुन्दर पथ बलवती सेना,  वन, उपवन, वाटिका, स्वच्छ जल आपूर्ति, सुसभ्य नगर निवासी धारण किए जैसी विकसित लंका थी,  ऐसा अब तक कोई विकसित नहीं हुवा ॥ 

खाते क्या थे वे ? गांय-भैंस मनुष्य गदहे बकरे खाते थे.....

कलुष कलिमस राजस रस तामस करे सुभाय । 
अपने मद उन्मत रहे भूरे नीति न्याय ॥३०२९ ॥ 
भावार्थ : -- पाप कार्र्यों से विश्राम पूर्वक प्राप्त  राज सत्ता  का स्वभाव तामसी होता है । यह नीति व् न्याय विरद्ध होकर अपने ही मद में उन्मत रहती है ॥ 

 ऊंची पीठी पैठ के भूरे राम प्रताप । 
चरत आपा पंथ करत आप आप के जाप ॥३०३० ॥ 
भावार्थ : - ऊंची पीठ पर आसीत होकर तो यह  ईश्वर की संप्रभुता को ही अस्वीकार कर देती है। यह अधिनायक वाद अर्थात अनियंत्रित शासन प्रणाली को अंगीकार करते हुवे अभिमान के वशीभूत हो जाती है ॥ 

नीचे उतरते ही इसे सारे देवते स्मरण हो आते हैं..... 

 पुण्य कर्मों से व् श्रम पूर्वक प्राप्य प्रगति स्थायी होती है.....  

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