बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०४-३०५॥ -----


जीव जीव सब एक अहैं एकए मरन की पीर । 
जनमत जो को जी धरे, जग में वाका सीर ॥३०४१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य हो क़ि जीव जंतु हों सभी प्राणी एक हैं मारने पर सभी को पीड़ा होती है । इस धरती पर जिसने भी जन्म लिया है जीवन के सह उसपर उन सभी का अधिकारहै । मनुष्य को चाहिए कि वह अन्य जीव-धारियों को भी अपने प्राणों के तुल्य मान दे ॥  

निरीह व्  मूक की निर्मम हत्या कहाँ तक न्याय संगत है.....? 

जोइ धर्म कर राखिया धर्महु राखत तेहिं । 
जोइ अहिंसक होइया हिंसा हते न केहिं ॥३०४२ ॥ 
भावार्थ : -- जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है । निरीह की हत्या क्या धर्म है ?हिंसा हिंसक को ही लक्ष्य करती है, अहिंसक को हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती ॥ हत्यारे को समाप्त करने से हत्याएं समाप्त नहीं होंगी अत: हत्या के कारणों को समाप्त करना अधिक श्रेयष्कर है ॥ 

क्या धर्म-निरपेक्ष का अर्थ अधर्म के सापेक्ष है.....? 

सुबरन घड़े सुनालिया लोहा घड़े लुहारि । 
बुद्धि रन तस जयन घड़े परि बल ऊपर भारि ॥३०४३॥ 
भावार्थ : -- जिस प्रकार स्वर्ण को सुनार घडता है लोहा को लुहार उसी प्रकार बुद्धि सदैव बल पर भारी पड़ती है और विजय को घडती है ॥  

तामस रस रसियाए के बुद्धि गहे नहि कोइ । 
रावन सुबरन दीप बसा बिजय राम कर होइ ॥३०४४॥ 
भावार्थ : -- आती कहाँ से है ये बुद्धि..... ? एक महाआआआ त्मा कह गए हैं की भूखे पेट बुद्धि नहीं आती 
सत्य तो यह है कि तामस प्रवृत्ति से बुद्धि नहीं आती देना कहाँ की बुद्धिमानी है । रावण तो भूखा नहीं था वह तो स्वर्णमयी द्वीप में बसा था भूखे तो श्री राम थे जो वन वन फिर रहे थे तथापि बल व् बुद्धि की निर्बल पर विजय हुई । सात्विकता से बल व् बुद्धि दोनों प्राप्त होते हैं ॥ गरवा भईंसा खाने से नरभक्षण करने से न बल प्राप्त होता है न बुद्धि ॥ तामस रसी को रसों की अनुभूति नहीं होती उसकी रसना स्वाद हीन हो जाती है ॥ 

हनुमत भूखे उदर भए पवन जवन अवरोहि । 
सुबरन लंका जारि के लाए सिआ कर टोहि ॥३०४५॥ 
भावार्थ : -- ज्ञान व् गुणके  सागर हनुमंत क्षुधित रूप में हवा के घोड़े पर अवरोहित हुवे स्वर्ण की लंका जलाई व् माता सीता को खोज निकाला । 

भूख नल अरु नील कर सागर सेतु बँधाए । 
करिअ सागर पार प्रभो लंका गत फल खाए ॥३०४६ ॥ 
भावार्थ : -- क्षुधित नल व् नील के हाथों सागर पर परिकलन रहित रामसेतु बंधा । उस सेतु से अपार सागर को पार कर श्री राम को  लंका पहुंचाया फिर सात्विक भोजन ग्रहण किया ॥ 


जिसने रामायण का अध्ययन नहीं किया , सात्विकता के महात्मय से अनभिज्ञ होकर वही क्षुधा को बुद्धि का नाशक कहता है.....

तन के परिशोधन संग, अंतर मन की सुद्धि । 
सोधित कर धन धारिये आवै छम छम बुद्धि ॥३०४७ ॥ 
भावार्थ :--शुद्धि से बुद्धि आती है.....

तन कैसे शुद्ध होता है ? : -- 

प्रात क्रिया के  संगत किए जब प्रतिदिन अस्नान । 
तदनन्तर करि आचमन निर्मल होत मलान ॥३०४८॥ 
भावार्थ : -- प्रात क्रिया के संग प्रतिदिन स्नान करें । तदनन्तर आचमन  कर स्वच्छ परिधान धारण करें हो गया तन शुद्ध ॥ 

भगवान ने मनुष्य को बनाने के पश्चात कहा : -- दो बार नहाना एक बार खाना उसने उल्टा सुना..... 

मन कैसे शुद्ध  होता है : -- 

ऊँच नीच को विचारत,  जो मन धरे ध्यान । 
ऐसोइ अभ्यास संग  अमलिन होत मलान ॥ ३०४९ ॥ 
भावार्थ : -- शास्त्रों में कहा  गया है कि उचित-अनुचित ( यह करना, यह कहना, यह खाना उचित है कि नहीं ) का विचार कर ध्यानाभ्यास करता हुवा मनोमस्तिष्क दोषरहित होता जाता है ॥


धन कैसे शुद्ध होता है : -- 


धन के स्वामी एकही नारायन भगवान । 
उदर पूरत कर लीजो अधिक न अपना मान ॥३० ५० ॥ 
भावार्थ : -- संसार में धन के स्वामी एक ही हैं वो हैं नारायण भगवान । ऐसा उत्तम विचार करते हुवे  अधिक धन को पराया जानकर केवल निर्वाह योग्य ही धन ग्रहण करें ॥ 

संपत केतक धारिये जेतक में निर्बाह । 
अधिक पराई जान के अपनी मानिए नाह ॥३०५१ ॥ 
भावार्थ : -  सम्पती कितनी ग्रहण करनी चाहिए जितने में निर्वाह हो । अधिक पर अन्य  का अधिकार जानकर उसे पराई मानना चाहिए ॥ 

राजू : -- हाँ ! और  न जीते जी अपनी क्रिया भी कर लेनी चाहिए बाद में  कोई करे न करे, और न दो ढाई हवेली इधर-उधर पडी हों तो एक आध सलटा देनी चाहिए.....

सन्मारग कर अरजनहु, मैल मलिनई होत । 
भाव पूरित लोभ रहित दानहि धन को धोत ॥३०५२॥
भावार्थ : -- उचित मार्ग से अर्जित किए धन सम्पति में भी मलिनता होती है । भाव पूर्णित कामना रहित दान धन-सम्पत्ति को शुद्ध करता है ॥

चारि दिवस का जीउना माँग माँग मत जोड़ । 
जनम जनम सुख चाहिता देइ देइ कर छोड़ ॥ ३०५३॥ 
भावार्थ : -- अल्प काल का जीवन है मांग मांग कर मत जोड़ो । अभी तो कितने ही जन्म होने हैं यदि प्रत्येक जनम में सुख चाहते हो तो दे दे कर छोड़ो ॥

धरम पूरित धनार्जन धर्मात्मन्हि पाए । 
पाप पूरित अर्जित धन  पापी के कर जाए ॥३०५४॥ 
भावार्थ : -- धर्मानुसार अर्जित धन-सम्पत्ति  का दान धर्मात्मा को प्राप्त होता है । पाप कर्म से व् अन्याय पूर्वक अर्जित धन के दान को पापीचारी प्राप्त करता है ॥

सागर सों जूँ बादरी मोती चुनि चुनि लाए । 
वाके चरंननुहार के जीवन धन उपजाए ॥३०५५॥ 
भावार्थ : -- सागर में मल और मोती दोनों होते हैं किन्तु जिस प्रकार बदरी केवल मोतियों को चुन लाती है ।मनुष्य को भी उसी प्रकार से जीविकोपार्जन करना चाहिए ॥

बादर ऊँचे पद लहे बरखत जल कर दान । 
सागर तिन संचाए के, गहे अधम अस्थान ॥३०५६॥ 
----- ॥ पुराणों से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- वर्षा से जल का दान करते हुवे बादल सदैव ऊँचे पद को प्राप्त होते हैं , जबकि उसी जल का संग्रह करने वाले सागरों का स्थान निम्न रहता है ॥

सागर जल संचाए के सकले मैल मलीन । 
बादर जल बरखाए के छनु छिनु होत कुलीन ॥३०५७॥  
भावार्थ : -- सागर जल का संचयन कर मलिनता का संकलन करता है । बादल उसी जल का दान कर निरंतर कुलीनता को प्राप्त होता है ॥

धर्म के मर्यादा बिनु करता अर्थ अनर्थ । 
पेट परायन आपना अर्थप होत ब्यर्थ ॥ ३०५८ ॥ 
भावार्थ : -- अर्थ में धर्म की मर्यादा न हो तो वह अनर्थ करता है ॥ जो अर्थपति अपने ही पेट के परायण हो उसका होना व्यर्थ होता है ॥ उससे किसी का हित नहीं होता ॥

जो अर्थ धर्मार्थ हुँत तासु जगत सुख पाए । 
अर्थार्थी को अर्पित होत सदा  दुखदाए ॥ ३० ५९॥ 
भावार्थ : -- जो अर्थ परोपकर के निमित्त हो वह समस्त विश्व के लिए सुखप्रद होता है । जो अर्थ, पिशाचों के निमित्त हो वह सदैव दुखप्रद होता है ॥ उससे किसी का कल्याण नहीं होता ॥

सम्पद सोई धारिये जामें जग सुख पाए । 
औरन को जीबित करे आपन जीवन दाए ॥३०६० ॥ 
भावार्थ : -- संपत्ति वही धारण करें जिससे किसी को कष्ट न हो जो जगत भर के लिए सुख प्रद हो । जो औारों के साथ स्वयं को भी जीवंत करे ॥










बुधवार, 14 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०३ ॥ -----


जात संग जातीयता जात संग अभिजात । 
जात धर्म बिसराए के होत जात सम्पात ॥ ३०३१ ॥ 
भावार्थ : -- राष्ट्रीयता जन्म जात होती है प्रवास से नहीं । अपने धर्म जाति कुल में स्थिर रहने से ही आनुवांशिकता प्राप्त होती है। जो जाति-धर्म  का तिरस्कार करता है वह शनै शनै अपने कुल अपने समाज अपने राष्ट्र से पृथक होता जाता है ॥ 

चूँकि विदेशों में आनुवंशिकता का अभाव पाया जाता है बहूँतों को वहां अपने मात-पिता का नाम भी पता नहीं होता  इस लिए आनुवांशिक अभियांत्रिकी में किंचित अनुसंधान हुवे अत: इस क्षेत्र में बहुंत संभावनाएं हैं और अनुसन्धान में निश्चित ही कुछ चौंकाने वाले परिणाम प्रात होंगे.....

देस धर्म को छोड़ के अपनी जात न तोड़ । 
यह निज गुन बिनसाए के आन अगुन करि जोड़ ॥३०३२ ॥ 
भावार्थ : --अपने देश अपने आचार- विचार अपने आहार-विहार का तिरस्कार   कर किसी को भी अपनी जाति-धर्म  का त्याग नहीं करना चाहिए ।  यह त्याग  गुण की उपेक्षा कर अवगुण को ग्रहण कर गुणहीन हो जाता है ॥  

लोहा लोहा ते मिले घन बन मारए चोट । 
जो कहूँ सुबरन मेलिआ होत खरा सों खोट ॥ ३०३३ ॥ 
भावार्थ : --  लोहा लोहा से मेल करे तो घन बन के ठन ठन करके स्वर्ण को भूषण का स्वरूप देता है  
स्वर्ण से मेल करे तो वही लोहा दुष्टता का प्रतीक होकर निकृष्ट हो जाता है ॥ 

इसलिए उत्तम धातु से मिश्रित होकर निम्न धातु उत्तम नहीं न हो जाती, अधम हो जाती है और उत्तम धातु निम्न हो जाती है ॥ 

हरिआ करिआ सों मिले रंग रहए नहि कोए । 
हरिआ ते हरिआ मिले हरिआ हरिआ होए ॥३०३४ ॥ 
भावार्थ : -- हरा  काले वर्ण से मिले तो वह रंगहीन हो जाता है । वहीँ हरा यदि हरे से मिले तो वह हरा-भरा हो जाता है ॥ 

धर्म कर्म सँभारी के अपनी जाति सुधार । 
मानस कर उद्धरन  सों जगत केर उद्धार ॥३०३५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म-कर्म को सहेजते हुवे आहार-विहार व् आचार-विचार में परिवर्तन कर अपनी जाति  सुधारनी चाहिए । जाति  व् धर्म वह उपकरण हैं जो मनुष्य का उद्धार करते हैं, यह उद्धरण जगत के उद्धार का आधार है ॥ 

साँच रहे बिन साँच भए दाता भए बिन दान । 
दया बिनहि दयाकर भए, टप बिनु तपो निधान ॥३०३६- क॥ 
भावार्थ : -- सत्य का आचरण करे बिना जो सत्यवादी हैं, बिना दान के दातार हैं,   दया बिना ही दयाकर व् तप  बिना ही जो तपोनिधान हैं ॥ 

जाति धरम पतित ही जब समाज पति पद जोए । 
सुधरना उधरना कि तहँ  कहि बत बिरथा होए ॥ ३०३७ - ख ॥ 
भावार्थ : -- जहां ऐसे जाति-धर्म पतित समाज के पति पद को प्राप्त हो वहां सुधार- उद्धार का वार्तालाप व्यर्थं है ॥ 

कूल बँधाई नदी भली भली नदी में नाउ । 
पौर पौर सों मेलती पहुंचे पिउ के गाँव ॥३०३८ ॥ 
भावार्थ : -- तटों से बंधी हुई नदी भली होती है ऐसी भली नदी  नाव के लिए भी भली होती है । यह मर्यादित नदी व् नाव पौड़ी पौड़ी से मेल करती जिस प्रकार सीधे अपने प्रीतम के गाँव पहुंचती हैं । 

उसी प्रकार मर्यादित संप्रदाय संसार के लिए हितकर होते हैं यह अपने अनुयायियों को सौहार्द पूर्ण वातावरण में सीधे ईश्वर के पास पहुंचा देते हैं ॥ 

एक : --  सौहार्द पूर्ण वातवरण के लिए आवश्यक है कि धार्मिक संप्रदाय धर्म के आचरण ( सत्य दया तप दान ) का पालन करें , 
दो : -- अपने धर्म अपनी जाति-गत समाज में ही वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हों  । 

तीन :-- इंसान का पशुओं से भी  भाईचारा हो साईँ चारा न हो.....
 क्रमश:

आन बसे परबासिया भूर परे मर्याद । 
जोइ बिरावन बोलिया ताको संग विवाद ॥३०३९॥ 
भावार्थ : -- प्रवासी जब इस देश के निवासी होकर अपनी मर्यादा भूल गए । अब जो कोई उन्हें पराया कह देता वह विवादित हो जाता ॥

अजहुँ त मनोभाव संग  रसना भई अधीन । 
देसज अपने  देस में भयऊ बोल बिहीन ॥३०४० ॥ 
भावार्थ : -- देश स्वाधीन क्या हुवा कि अब तो विचार-अभिव्यक्ति के साथ जिह्वा भी सत्ताधारियों के अधीन हो गई । भारत वंशी अपने ही देश में देशांतरी को कुछ कहने से भी वंचित हो गए ॥























मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७९ -----

" ऐ राजू ! ये पोतने वाले स्याही पोतने का क्या लेते हैं ? "

राजू : -- बीस प्रतिशत !

"थोड़ा अधिक हो गया"

राजू : -- अब आप से अधिक थोड़े न  लेंगे मास्टर जी, ये  कमाई बढ़ाने वाली स्याही है, कोई ऐसी वैसी नहीं, बीस तो यूं आ जाएंगे यूं..... 

रविवार, 11 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०२ ॥ -----

अंत्यज को का बोलिए रहँ सो अंतेबास । 
कृत्याकृत्य न जानिआ पहुंचे नहीं प्रकास ॥३०२१ ॥ 
भावार्थ : -- अन्त्यज वर्ग को क्या कहें वह तो सबसे अंतिम वास में वासित था उसे कृत्याकृत्य सहित पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं था क्योंकि तत्काल वहां तक सभ्यता की पहुँच नहीं थी ॥

चतुर्थ वर्ग चतुर्थ वर्ग क्यों था - इसी लिए था.…। इसलिए थोड़े की उसके पास पैसा नहीं था या पद नहीं था

रयन  में जो दिनकर धर करि घन घोर घमंड । 
कृत्यकृत्य न बूझिया ऐसो को दिग्दंड ॥३०२२ ।।  
भावार्थ : -- प्रथम पंक्ति के वह लोग जो श्रेष्ठतम भवनों में रहते हैं अभिमान पूर्वक जो  स्वयं को विकसित कहते हैं सभ्य कहतें हैं लब्ध प्रतिष्ठित कहतेंहैं सुशिक्षित कहते हैं यदि उन्हें कृत्याकृत्य व् पथ्यापथ्य का ज्ञान नहीं है तो ऐसों नराधमों को धिक्कार है ॥ 

तपोन्मुखी होइया जब यह मानस जात । 
तासों देस समाज के दिन दिन होत  निपात ॥ ३०२३ ॥ 
भावार्थ : --  मानव जाति जब पतोन्मुख होती है तब उसके साथ उसका समाज व् उसका देश भी निरंतर अधोगति को प्राप्त होता है ॥ यह अधोगति पृथ्वी सहित सृष्टि को भी संकटापन्न करती है ॥ 

प्रथम बसेरी जोइ  है अंत बसेरी सोए । 
अनगढ़ दोनउ मेलिया गढ़ना सरल न होए ॥ ३०२४ ॥ 
भावार्थ : -- जिस राष्ट में कभी जो अन्तेवासी था वर्तमान में वह राष्ट्र का प्रथम नागरिक है दोनों ही परिस्थिति में यदि वह अशिष्ट व् असंस्कृत हों तो इसका अर्थ यह है कि उसे शिष्ट व् सुसंस्कृत करना अतिशय कठिन है ॥ 

कोउ त अंते बासिया  बसा सुपासा कोउ । 
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु मिलिआ अनगढ़ दोउ ॥३०२५॥ 
भावार्थ : -- अंतेवासी अंतिम निवास में बसा था विकासी  प्रथमतस निवास में बसा है ।  कृत्याकृत्य के विवेक से रहित दोनों ही असभ्य व् असंस्कारी पाए गए.....निष्कर्ष : -अर्थ या अनर्थ से मनुष्य का उद्धार नहीं होता.....
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नीत्ति न्याय परत रहे रहे धरम के राज । 
रोग सोक ब्यापत नहीं  रहे  न कतहुँ ब्याज ॥३०२६ ॥ 
भावार्थ : - जब धर्म का शासन  होता है तब नीतिया न्यायपरक होती हैं और न्याय नीतिपरक होता है । भयोत्पादक तत्व व्याप्त नहीं होते अपराध नियंत्रित रहते हैं ॥ 

अधुनातन हिंसापरत हैं अधरम के राज  । 
चहुँ पु रोग सोक सहित ब्याप रहे ब्याज ॥३० २७ ॥ 
भावार्थ : -- अधुनातन न केवल भारत अपितु विश्वभर में हिंसा परत अधर्मी शक्तियों का ही शासन है । भयोत्पादक तत्वों का फैलाव व् अनियंत्रित अपराध इसका प्रमाण हैं । 

अहिंसा को आचरण में उतारने से हिंसा कभी लक्ष्य नहीं करती  । 

हिंसा रक्षक की विवशता है..... 

कनक कोट मनि कृत भवन गह  जस लंका होइ । 
ऐसो बिकसित अजहुँ लग जग मैं भया न कोइ ॥३०२८ ॥ 
भावार्थ : -- स्वर्णमयी  दुर्ग के भीतर मणिमय भवन , गाड़ी घोड़े रथ समूह,पुष्पक-विमान, सुन्दर सुन्दर पथ बलवती सेना,  वन, उपवन, वाटिका, स्वच्छ जल आपूर्ति, सुसभ्य नगर निवासी धारण किए जैसी विकसित लंका थी,  ऐसा अब तक कोई विकसित नहीं हुवा ॥ 

खाते क्या थे वे ? गांय-भैंस मनुष्य गदहे बकरे खाते थे.....

कलुष कलिमस राजस रस तामस करे सुभाय । 
अपने मद उन्मत रहे भूरे नीति न्याय ॥३०२९ ॥ 
भावार्थ : -- पाप कार्र्यों से विश्राम पूर्वक प्राप्त  राज सत्ता  का स्वभाव तामसी होता है । यह नीति व् न्याय विरद्ध होकर अपने ही मद में उन्मत रहती है ॥ 

 ऊंची पीठी पैठ के भूरे राम प्रताप । 
चरत आपा पंथ करत आप आप के जाप ॥३०३० ॥ 
भावार्थ : - ऊंची पीठ पर आसीत होकर तो यह  ईश्वर की संप्रभुता को ही अस्वीकार कर देती है। यह अधिनायक वाद अर्थात अनियंत्रित शासन प्रणाली को अंगीकार करते हुवे अभिमान के वशीभूत हो जाती है ॥ 

नीचे उतरते ही इसे सारे देवते स्मरण हो आते हैं..... 

 पुण्य कर्मों से व् श्रम पूर्वक प्राप्य प्रगति स्थायी होती है.....  

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०१ ॥ -----

सहस बरस शासत करे अतिसय भोग बिलास । 
काल बरन मैं लेखि यह  पाहन कर इतिहास ॥ ३०११ ॥ 
भावार्थ : -- सहस्त्र वर्ष से भी अधिक समय तक ये प्रवासी भारत के शास्ता रहे,  काले अक्षरों में लिखा गया यह  लाल- पत्थरों का काला इतिहास इनकी अतिसय भोग विलासिता का साक्ष्य है ॥

सुरभि गंधित बारी  में फुरे फूर चौरंग । 
आन फिरंगी संग रहे परे रंग में भंग ॥ ३०१२ ॥ 
भावार्थ : -- इस सुरभित वाटिका में चौरंगी पुष्प खिला करते हैं । फिर यहाँ अंग्रेज आए और रंग में भंग पड़ गया जब भारतीय इनका विरोध करने लगे तब अंग्रेजों के सिखाने पर ये प्रवासी पुराण को पढ़े बिना ही पुराण- पंथी कह कह कर देश को बिगाड़ने में लग गए ॥

देख फिरंगी सब चरे बड़ अनुहारी होए । 
चरन चले कहँ जात हैं  देखे नाहीं कोए ॥३०१३॥ 
भावार्थ : -- फिर तो पश्चिमी सभ्यता का ऐसा अनुकरण होने लगा कि पश्चिम वाले भी चकित रह गए ॥ जो चरण कभी शमशान में जाते थे वह अब कब्रिस्तान में जाने लगे ॥ 

" शमशान जाने वाले को श्मशान जाना चाहिए कब्रिस्तान जाने वाले को कब्रिस्तान जाना चाहिए । जब मंदिर जाने वाला मंदिर जाएगा यह तभी होगा....." 

धर्म कर्म बिनसाए के बैठे भवन बिलास । 
माँसा गवासा होइए बाका नाउ बिकास ॥३०१४॥ 
भावार्थ : -- धर्म-कर्म  को नष्ट करके  विलास भवन में बैठकर वासना जनित क्रीड़ाएं करो । मदिरा पान करो,  मांस खाओ और गांय-भैंस का भक्षण कर चंडाल बन जाओ, ऐसी जीवन-चर्या विकास कहलाने लगी ॥

मानस हेतु सार सरूप यह गीता का ज्ञान । 
करम संग ही पतन है करम संग उत्थान ॥३०१५ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन हेतु श्रीमद्भगवद्गीता में  इस सारभूत ज्ञान का व्याख्यान किया गया कि  कर्मों से ही मनुष्य का पतन है और कर्मों से ही उसका उत्थान है, अर्थ से नहीं अनर्थ से तो कदापि नहीं ॥ 

करें न पतन आपन हुँत, करें आप उद्धाप । 
मानस आपन मित आप, अरु रिपु आपहि आप । ६३७। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ६ /५॥ -----  

भावार्थ : -- मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करें, पतन न करें । क्योंकि वह ( मनुष्य) आप ही अपना मित्र है, और आप ही अपना शत्रु है ॥ 

दया दान त्याग सहित जहँ  को साँचा वाद । 
बिगड़े बासि प्रबासि के ताको संग बिबाद ॥३०१६॥ 
भावार्थ : -- दया दान त्याग व् सत्य के वाद सहित जहां धर्म- वाद होता । इन विपरीत कर प्रवासी और देशवासियों का उसके संग विवाद होता ॥ 

गाँव गाँव गौधन रहँ घर घर में गोपाल । 
कृत्याकृत्य बिबेक बिनु अजहुँ भयउ चंडाल ॥ ३०१७ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ कभी गाँव गाँव में गौधन था और घर घर में ग्वाले होते थे । कृत्याकृत्य के विवेक से राहित्य अब वहां चंडाल बसने लगे ॥ 

चांडाल : -- अत्यंज वर्ग की  कसाई गौभक्षी जाति सहस्त्रों वर्ष पूर्व जिसका उद्धार हो गया था.....


जीव जितना छोटा होता है उसकी आयु भी उतनी छोटी होती है, जो जितना अधिक जीव-हत्या करता है वह उतना छोटा जीव शरीर प्राप्त करता  है जितनी बार जीव मारता है उतनी बार मरता है.....

निर्दोष जीवों की हत्या का पाप बहुंत भारी होता है

यह भव भूत प्रभूत कर तामेँ काल अनंत । 
मानस तेरा जीउना दोइ घरी के रंत ॥ ३०१८ ॥ 
भावार्थ : -- एक तो  भौतिक संसार की अपरिमित प्रभुता फिर उसमें अंतहीन समय । अपरिमित संसार में मानव कण मात्र भी नहीं है अनंत समय में उसका जीवन केवल दो घड़ी का है ॥

चार दिवस का जीवना जामें दोई रात ॥ 
भोजन बासा बास हुँत किए ऐतक उत्पात ॥३०१९ ॥ 
भावार्थ : -- चार दिवस का जीवन है उसमें दो रात का समय है जो शयन में व्यय होता है । भोजन वस्त्र आवास के लिए मनुष्य फिर इतने उत्पात करता है ॥ क्या मनुष्य केवल खाने पीने व् पहनने के लिए जन्म लेता है ? ॥

अधुनै मानस जात  के दिन दिन होत निपात । 
होए पसुता तेहु परे, यह चिंतन की बात ॥ ३०२० ॥ 
भावार्थ : -- भोगवादिता के कारण ही वर्तमान समय में मानव जाति निरंतर पतन की ओर अग्रसर है । क्या उसका स्वभाव पशु से भी निम्न स्तर का हो गया है यह चिंतन का विषय है ॥

गौभक्षण अंत्यज वर्ग करता था  गांय -भैंस सहित मानव का भक्षण दानव करते थे ॥












मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम ३०० ॥ -----

धरम करे बिनु आपनी धरमी जहँ सब होए  । 
बिनहि मोल मदिरा मिले बिके हाट तहँ तोए ॥३००१ ॥
भावार्थ : -- जहां  धर्म करे बिना ही सभी धर्मात्मा बन जाते हैं वहां मदिरा बिना ही क्रय किए मिल जाती है जल का व्यापार होने लगता है ॥

पयस पियुष परिहार को, रकत पीब ललिहाए ।
सो जन जग मलिनाए के नित नव रोग जनाए ॥३००२॥
भावार्थ : -- जो अमृत  का त्याग कर रक्त सेवन की ही लालसा करती हैं । ऐसी पिपासु प्रवृत्ति संसार में मलिनता बढाती है जिनसे नित नए रोगों का जन्म होता है ॥

 रोगों के रोकथाम हेतु अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन करें.....

जग ने  अल्पहि काल में जन्मे नव नव रोग । 
रोगी कतहुँ दरसाए त  भय क्रांत सब लोग ॥३००३॥ 
भावार्थ : -- विश्व ने अल्प काल में ही नए नए रोगों को जन्म दे दिया जो एक चिंताजनक विषय है । रोग भी ऐसे रोगों से ग्रसित रोगी के दर्शन मात्र से ही लोग भयभीत हो जाते हैं ॥

सबहि कतहुँ  मिले सो तो होत सधारन धर्म । 
सत्कारज किन बोलिये जो जगहित कर कर्म ॥३००४ ॥ 
भावार्थ : --सब कहीं मिलने वाले धर्म को साधारण धर्म कहते हैं जैसे सत्य, अहिंसा, दया, दान, त्याग आदि । जिन कार्यों में विश्व का कल्याण निहित हो उन्हें ही सत्कर्म कहते हैं । जीवों की रक्षा करना, जीवन- संरक्षण जल- संरक्षण वन्य-जीव संरक्षण पालतू पशु-संरक्षण करना,प्रदुषण न करना, पेड़-पौधे लगाना इत्यादि.....

 उपासना से साधारण धर्म अथवा उत्तम भावों  का वर्द्धन होता है उपासना- पद्धतियों की विभिन्नता संप्रदायों को भिन्न करती है.....

सधारन धर्म कोष अरु  उत्तम देसाचार । 
ऊँच विचार संग करे ले परिवेस अकार ॥३००५॥ 
भावार्थ : -- साधारण धर्म का संग्रह और उत्तम आचार- व्यवहार( आहार-विहार ) , \उच्च विचारों के संगत एक उत्तम परिवेश का निर्माण करते हैं ॥

संस्कारगत होत पुनि  एक संस्कृति सँजोए । 
जगत के  सिरमौर होत  भारत उदयित होए ॥३००६ ॥ 
भावार्थ : -- पाषाण युग की मनुष्य जाति की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर उसका परमार्जन व् सुधारकरण के पश्चात एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व-सिरमौर भारत-वर्ष  का प्रादुर्भाव हुवा ।|

बिलगित चारन सों रहे बिलगित सबके काज । 
एकै धर्म समूह भीत, संगठित भए समाज ॥३०० ७ ॥ 
भावार्थ : -- भिन्न भिन्न आचार-व्यवहार व् भिन्न आहार-विहार के संग सभी के कार्य भी भिन्नता लिए हुवे थे । इस प्रकार कर्म के आधार पर एक धर्म समुदाय में समाज संगठित होते गए ॥ इन समाजों  के सम्मिलन से एक राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥

लघु कुटीरु उद्यम संग पसु पालन कृषिकार । 
वैभव विभूति सहित सुख समृद्धि के आधार ॥३००८॥ 
भावार्थ : -- लघु और कुटीर उद्योग के संग पधुपालन और कृषकर्म विभूतिमान भारत की  जगत्प्रसिद्ध सुख समृद्धि के आधार हुवे ॥

कृषिधन पसुधन संग रहँ सुख सम्पद सब काल 
भंडार भरपूर रहँ  परे नहीं अकाल ॥३००९॥ 
भावार्थ : -- इस प्रकार कृषिधन पशुधन का संग प्राप्त कर उसके सभी काल संपन्न होते गए । वह  अकाल- ग्रस्त नहीं होता अन्न के भण्डार भर पूर होते ॥

देस परिबेस लाँघि जब आन बसे परबासि । 
देस चरन बिपरीत कर होत गयउ सम भासि ॥३०१० ॥ 
भावार्थ : -- देश की सीमाओं का अतिक्रमण व् उसके परिवेश का परिच्छेदन कर फिर उपनिवेशी यहाँ आ बसे । इनकी उपासना  पद्धति भारत से पृथक थी इनके आचार- व्यवहार व् आहार-विहार भारतीय नियमों के प्रतिकूल होकर उनकी कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते ॥ इनकी भाषा भारतीयों से समवेत होती गई ॥







सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७८ -----

राजू !! संत महात्माओ से यह ज्ञान  पूछना चाहिए की भारत का विभाजन किस लिए  हुवा था

राजू : -- लो इसका जवाब तो बहुंत आसान है मास्टर जी.....पाकिस्तानियों के लिए.....

" मगर पाकिस्तानी तो भारत में ही बसे हैं ?

राजू : -- ओह समझा तख्ते ताऊस मिलने की खुसी में सदके के कौंवे छोड़े गए होंगे..... दुनिया वालों ये लो पाकिस्तान, ये लो अफगानिस्तान, ये लो बांग्ला देश.....

" इसके माने तो ये हुवे वहां.....कोई और है.....

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९९ ॥ -----


जगमें काल अँधेरिया छाए रहे घन घोर । 
दिसा दिसा दानव दिसे चोर चोर चहुँ ओर ॥२९९१ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में जब न्ययोचित नियमों का  नियमोचित न्याय व् सच्चरिता का अभाव होता है तब दिशा दिशा में दानव  पथ पथ में चोर दिखाई देते हैं  चारों ओर में रोग व्याप्त  होते हैं ॥ और एक  भय का वातावरण बन रहता है 


जंगल केरे राज ते बुरा राकसी राज । 
फारत काचा खाइगा कारत कपट ब्याज ॥२९९२ ॥  
भावार्थ : -- जंगल राज तो बुरा है ही उससे बुरा  राक्षसी राज है  राक्षसी राज छल कपट करता है इसके मुंह में राम पार्श्व देश में छुरी होती है खाते दोनों कच्चा ही हैं अब बताओ आहार बनना है ? 

जागा है तो जगा रह सोया है तो जाग । 
जब लग भोर पौर लगे लगे चोर को लाग ॥ २९९३॥ 
भावार्थ : -- हे जन मानस यदि तुम जागृत हो तो जागृत ही रहो यदि सुषुप्त हो तो जागृत रहो । जब तक ज्ञान रूपी भोर का  प्रादुर्भाव  न हो जाए  तब तक चोर और दानवों के पीछे लगे रहो ॥ 

जग में बरते सार सों चहुँ दिसि होत उजार । 
सार रहे न किछु रहे छाए रहे अँधियार ॥२९९४ ॥ 
भावार्थ  : -- सार के तेजस् से ही यह संसार प्रकाशमय है । कोई भी शब्द हो कर्म हो धर्म हो वह सार गर्भित हो सार न होने से संसार में अँधकार व्याप्त रहता है ।। 

एक बसना के बासना दूज रसना के रास । 
बहुरि छली की छावनी करे जगज्जन दास ॥२९९५ ॥ 
भावार्थ : -- एक तो वास वस्त्रो की वासना दूसरी जिह्वा की विलासिता उसपर कपट-छाया ने संसार को भोगों का दास बना दिया ॥ 

रगत माँस सब भखि गयो भली न कीन्हि कान । ( संत कबीर दास )  
लोग गरब करि कहे अह हमरे देस बिधान  ॥ २९९६ ॥ 

भावार्थ  : -- " अहिंसा वादी स्वाधीनता का हिंसा वादी संविधान " जो देश इस धरती का दूध पीकर बड़ा हुवा इस संविधान न उसका रक्त छोड़ा न मांस छोड़ा । देश वासियों को इसने नरभक्षी बना दिया, कारण कि इसके अनुबंध  स्वार्थ परता पर आधारित थे लोग गर्व करते हैं हमारा संविधान, हमारा लोकतंत्र ॥ 

क्या हिंसा वादिता भी कभी गर्व के योग्य हुई है ? 
भारत जैसे देश में हिंसा कभी स्वीकार्य नहीं होगी, यह केवल आत्मरक्षा का अस्त्र है.....

सिंहासन पर पीठ दिए भाखे माँस मद दोए । 
सनै सनै  नर भाख के सो तो दानव होए ॥२९९७ ॥ 

भावार्थ : -- मांसाहारी की जब उत्तरोत्तर उन्नति होती है तब वह मनुष्यों का भी भक्षण करने लगता है । अत: जो सिंहासन पर बैठे हैं वो खाते मांस हैं और पीते मदिरा हैं शनै शनै नर भक्षी होकर वह भी दानव बन गए 
उनका राज दानव-राज हो गया ॥ 

यह भारत यह भूमि यह हिन्दू के अस्थान । 
धर्मपरायन लोग यहाँ  सम्मुख हैं भगवान ॥ २९९८ ॥ 
भावार्थ : --  यह भारत यह भारत की भूमि हिन्दुओं का ही स्थान है  कतिपय सत्ताधारी व् उनके समर्थक इसे तालीबान गालीबान नालीबान जैस न जाने कौन सा स्तान और बान बनाने पर तूले हैं । यहाँ  ईश्वरोन्मुख धर्म
परायण लोग रहते हैं, उदरपरायण नहीं ॥ यह एक धार्मिक राष्ट्र था है और रहेगा ॥ 

धर्म धुर कहँ आपन पो करें पाप की बात । 
धाँधल धूर्त चरित कृत भए कस  भारत जात ॥२९९९ ॥ 
भावार्थ : -- जो स्वयं को धर्म निष्ठ  कहतें हैं और पाप की बात करते हैं । फिर वे दुष्ट चांडाल बेईमान भारतीय कैसे हुवे ? 

दुर्नय ने दुर्नीत ने सिरोधरे धुरधर्ष । 
तहाँ जीवन जीवति हुँत जीव करे संघर्ष ॥३००० ॥ 
भावार्थ : -- नीति विरुद्ध नियमों व् मतार्थी दुरात्माओं ने हिंसा को सिरोधार्य करने के कारण जीव जीवति के लिए व् यह विश्वम्भरा जीवन के लिए संघर्ष कर रही है ॥ हरे भरे स्थल मरुस्थल में परिवर्तित होते जा रहे हैं ॥ 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम २९८॥ -----


कोई मारे पाहना कोई मारे बान । 
दनुज देही तबहि मरे जब मारे भगवान ॥२९८१॥ 
भावार्थ : -- कोई पत्थर मारता  है कोई तीर से मारता  है  कोई कोई तो दम्बूक से मारता है  । भीतर के राक्षस तभी मरते हैं जब उन्हें भगवान मारते हैं ॥ 

मरि गया भई मरि गया मरा नहीं पर कोए । 
को कर बिनु को चरन बिनु  पुनि पुनि जनमन होए ॥ २९८२ ॥ 
भावार्थ : -- मर गया मर गया लोग कहते हैं पर मरता कोई नहीं अपने कुकर्मों के कारण मनुष्य  बिना हाथ-पैर के बारम्बार जन्म लेता है ॥ 

तू जाना मैं मरि गया  मरना सरल न होए । 
बहोरि जनम न होइया, मरा जगत में सोए ॥२९८३ ॥ 
भावार्थ : -- तू ने समझा मैं मर गया किन्तु मरना इतना सरल नहीं होता । जीव बारम्बार काल का ग्रास बनता है । जिसका पुनर्जन्म न हो वही मृत्यु को प्राप्त होता है ॥ मृत्यु की वेदना अत्यंत दुखदाई होती है ॥ 

माया ही भगवान जहँ सब किछु केर बिधान । 

जैसी निर्बल बीतिया तैसी अपनी जान ।२९ ८४ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ पैसा ही भगवान हो और सब कुछ करने की छूट हो । वहां  निर्बल कातर निर्दोषों  के साथ जैसा व्यवहार हुवा है वैसा व्यवहार सब के साथ होगा ॥ 

कृत्याकृत्य सहित जहाँ पथ्यापथ्य न देख । 
अनरथ पति के अर्थ में सोई धर्म निरपेख ॥२९८५ ॥ 
भावार्थ : --  कृत्याकृत्य सहित जो पथ्यापथ्य  का विचार न करे  कुछ अनर्थ पतियों के लिए धर्म निरपेक्ष का यही अर्थ है ॥ 

कर्तव्याकर्तव्य =  (जहां सब कुछ करने छूट हो )
पथ्यापथ्य = कुछ भी खा लो विष भी खा लो, नर भी खा लो नारी भी खा लो  )

उचितनुचित बिहुरात जहँ नेमे नेम न्याय । 
दुर्धर्ष चरम पर होत  पाप परम पद पाए ॥२९८६ ॥ 
भवार्थ : -- उचितअनुचित का विचार किए जहाँ पर नियम व् न्याय निबंधित होते हैं वहां हिंसा अपने चरम पर होती है और पाप परम पद को प्राप्त होता है ॥ 

नेम नीति निरपेख जहँ नेमे नेम न्याय । 
धर्म नीचहि नीच रहे पाप परम पद पाए ॥२९ ८७ ॥ 
भावार्थ : -- लोक-व्यवहार के निर्वहन हेतु नियत किये गए आचार-विचारों की उपेक्षा करने वाले ही जब लोगों से नियमों की अपेक्षा करते हुवे नीति निर्धारित करते हैं तब धरम कहीं नीचे दब जाता  है और पाप परम पद को प्राप्त होता है ॥ 

अहिंसा परम धरम है हिंस सरिस न पाप । 
ये तो सुख की सम्पदा, यह भय रुज संताप ॥२९ ८८ ॥ 
भावार्थ : -- अहिंसा परम धर्म है  हिंसा जैसा कोई पाप नहीं है । अहिंसा सुखकर सम्पदा है हिंसा आतंक व्याधि वियोग आदि दुखों की दाता है ॥ 

हिंसा : -- प्राणी मात्र के प्रति की गई कष्टकर क्रिया 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...