सोमवार, 7 सितंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम २९० ॥ -----

गयउ बरसकर बरस बिनु बीते पावस काल । 
देस माहि अकाल परे सेन करे हटताल ॥ २९०१ ॥ 

भावार्थ : -- बादल बिन बरसे ही चले गए पावस काल व्यतीत हो चला ,  देश में अकाल पड़ गया तब  सेना हड़ताल कर रही थी ॥ कैसी सेना है ये.....? 

एक संग एकहि कलहने गने सैन कर कोष । 

सीवाँ पार करि करि घर भीतर बसे पड़ोस ॥२९०२ ॥ 
भावार्थ : -- हस्त सिद्धि को गिनकर कर ये सेना आपस में ही लड़ती रही । वहां पड़ोसी निरंतर सीमा पार करते कश्मीर में बसते भारत के  वाशिंदे हो गए । अब वे हमारे अधिकार को अपना किए हैं । 

कितने सुरक्षित है हम.....? 

 पराए केरे आपने रहे नहीं किछु भेद । 
देस धरम बिनसाए के करे मूर परिछेद ॥ २९०३ ॥ 
भावार्थ : -- अपने पराए में कुछ भेद न कर भारत एक अराष्ट्रवादी देश बनता जा रहा है ।यह अभेद नीति देश के आचार -विचार को ही नष्ट कर अब भारत व् भारत वंशियों की जड़ों को काटने पर तूली है ॥ 

दरस रहे परदेसिआ  बसे बसति सब कूल । 
कहाँ भारत कहँ भारती कहँ भारत के मूल ॥ २९०४॥  
भावार्थ : -- देश के सीमांत प्रदेशों में जहाँ तक देखो  परदेश के लोग ही बसे दिखाई देते हैं । भारत की सीमाएं कहाँ हैं भारतीय कहाँ है भारत का वह मूल निवासी कहाँ निवासरत है ॥ कश्मीर तो मुसलमानों का ही हो गया है सत्ता धारी भारतीयों को केवल शब्दों से बहला रहे हैं की ये तुम्हारा है ॥ 

ऐसो सासक सिर धरे देस धर्म गए भूल । 
लगे उपार्जन आपनी पोस पराई मूल ॥ २९०५ ॥ 
भावार्थ : -- भारतीय ऐसे शासकों को सिरौधार करते आ रहे हैं जो देश का परिवेश छिन्न -भिन्न कर उसकी जड़ों को उखाड़ रहें  हैं और अन्यान्य की जड़ें यहाँ सुदृढ़ कर रहे हैं  ।

परदेसज  समुदाय के  जहँ निर्बाध प्रबेस । 
एक दिन अवसी होइहीं खंड खंड सो देस ॥२९०६ ॥ 
भावार्थ : -- सावधान !!!यह भारत का अनुभव कहता है कि जिस देश में परदेसी समुदाय का निर्बाध प्रवेश हो रहा है । एक समय वह निश्चित ही खंड खंड होकर अवशेष मात्र रह जाएगा  ।। 

संविधान कहे ए देसज  धरम भरोसे नाए । 
जब कहे तब केत रहे अजहुँ केत गनि पाए ॥ २९०७॥ 
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है विश्व की कुल जनसँख्या में वे लगभग १५ % हैं । भारत के संविधान में जब यह कहा  गया कि यहाँ के निवासी धर्म के भरोसे नहीं हैं, उन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है । यह धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है  जब यह कहा गया तब ऐसे अधर्मी कितने थे अब कितने हैं ? 

 दया सोहि हरिदै भरे करे धरम का दान । 
साँच मन तन आँच धरे ते जन धर्मी जान ॥ २९०८ ॥ 
भावार्थ : -- दया भरे ह्रदय के साथ जो अपने पुण्यों का दान करता हो जो सत्य का आचरण करता हो  जिसका विग्रह त्याग रूपी अगन से तपायमान हो वह मनुष्य धर्मी है  ॥ ये धरनिरपेक्ष कौन है कैसे हैं ? 

खादक खादन छांड के अखादन जोइ खात । 
सोइ अधमतस समुदाय  सोइ अधमतस जात ॥२९०९-क॥ 
भावार्थ : -- खाने योग्य खाद्यान को त्याग कर जो अखाद्य को खाए ऐसे समुदाय ऐसे समाज  निम्न पद को प्राप्त होते हैं ॥ 
करतब काज न कार के  करें अकरतब काज । 
पैहैं पाँवर पतित पद गह सो धर्म समाज ॥२९०९-ख ॥ 
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य न कर न करने योग्य कार्य करे ऐसे समुदाय ऐसे समाज पतित होकर निम्न पद को प्राप्त होते हैं ॥ 

कागा मोती चुगी कै खाए चाहे न खाए । 
हंस बांस को चाहिये घुन के कन बिसराए ॥ २९१०॥ 
भावार्थ : -- कौंवा मांस छोड़े न छोड़े कौवा मोती चुग कर खाए न खाए हंस के वंशजों को तो घुन के कणों का त्याग कर देना चाहिए ॥ 

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