ऊंची पीठी पैठ पुनि लिखा भाग में खाट ।
कर चरन मुख सीउँ नयन लखे मरन की बाट ॥ २८९१ ॥
भावार्थ : -- भला मृत्यु की भी कोई प्रतीक्षा करता है, इतने ऊंचे पद को प्राप्त होकर भी जिसने अपने भाग्य में खटिया लिखी वह पापी अब कर चरण और मुख में पक्ष का आघात खाकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है ॥
राजा की बिरदाबली सेबक की कुसलाइ ।
ऐसी हेली जग हेतु, होत सदा सुखदाइ ॥ २८९२॥
भावार्थ : -- राजा की कीर्ति कथा और सेवक की कुशलता का सम्मिलन जगत हेतु सदा सुखदायक होता है ॥
राजा जब सेबा करे सबक राजे राज ।
ऐसी चलनि हो निकले सब कहुँ छाए ब्याज ॥ २८९३॥
भावार्थ : -- स्वामी तो सेवा करे और सेवक राज करे ऐसे चलन से जगत में छल कपट दुष्टता, धूर्तता व्याप्त हो जाती है ॥
गेही भए बिन गृहस्थी बिरागी बिनु बिराग ।
दाने बिन दातार भए त्यागी बिनु त्याग ॥ २८९४ ॥
भावार्थ : -- फिर तो बिना एक्टिंग के एक्टर जैसे बिना गृहस्थी के गृहस्थ, बिना वैराग्य करे वैरागी, बिना दान करे दातार और बिना त्याग करे त्यागी हो जाते हैं ॥ अर्थात योग्यता महत्वहीन हो जाती है.....
"आरक्षण चिकित्सक अवश्य बना देता है किन्तु चिकित्सा करना तो योग्यता ही सिखाती है....."
जिउ साधन सहजहि मिले जन जन होत निकाज ।
करिषि करषक हीन होत दसिन दसिन घटत अनाज ॥ २८९५॥
भावार्थ : -- जीव-साधन सहज सुलभ हों तो जन मानस अकर्मण्य हो जाता है । कृषि कृषक विहीन हो जाती है और अनाज का उत्पादन निरंतर घटता जाता है ॥ उसपर पड़ा अकाल दुकाल के सदृश्य होता है.....
दास भरोस बिश्राम तो दरिद काल का पाल ।
राम भरोसे काम किए रहँ सम्पद सब काल ॥ २८९६ ॥
भावार्थ : -- सेवक के भरोसे स्वामी का विश्राम विपन्न काल का पालक है । स्वामी विश्रामी हो तो सेवक को सूट में और उसे कच्छे में आते देर नहीं लगती । जो स्वामी ईश्वर पर भरोसा कर अपना कार्य स्वयं करें उसके सभी काल सम्पन्न होते हैं.....
साई ऐसो होइबे जैसो राजा राम ।
छाँड़ चले रस राजसी करे जगत के काम ॥ २८९७ ॥
भावार्थ : - स्वामी को राजा राम के जैसे होना चाहिए । जन्होंने राजपाट क त्याग कर सात्विक रूप में सत्कार्य करते हुवे जगत का कल्याण किया ॥
दासा ऐसो चाहिबे पहिरै एके लँगोट ।
उदकत नदपत डहकि गए जारि दियो परकोट ॥ २८९८ ॥
भावार्थ : -- दस को हनुमं लला के जैसे होना चाहिए जिन्होंने केवल एक ही लंगोट पहने उदकते हुवे समुद्र को लाँघ गए और लंका सहित रावण के परकोट का दहन कर दिया ।।
यहाँ तो एक हस्ताक्षर करने के लिए भी बैमान चाहिए.....
कितना राजस्व व्यय होता है इस शासन पर ? और कितना होना चाहिए..... ?
दासा ऐसो चाहिबे कारज में कुसलाए ।
अर्थ बिन सेतु बाँधि के, निज पत पार लगाए ॥ २८९९ ॥
भावार्थ : -- दास को ऐसा होना चाहिए जो अपना कार्य करने में कुशल हो योग्य हो । जो बिना धन के समुद्र में सेतु बांध दे और अपने स्वामी को दूसरे देश पहुंचा दे ।
यहाँ तो सीमा का उल्ल्ंघन करने वाले घुसपैठियों के लिए भी परमाणु गोले चाहिए, जो एक हुंकार से भाग जाएं । एक गृहस्थ को चौकीदारी में कितना धन व्यय करना चाहिए.....
राजू : -- अरहर की टट्टी और गुजराती ताला = छोटी वस्तु की रक्षा के लिए अधिक व्यय करना,
दासा ऐसो चाहिबे जाके मन संतोष ।
मुकता दए गोसाइँया, मु लेइ पेटे पोष ॥ २९०० ॥
भावार्थ : --दास के मन संतोष हो । स्वामी मुक्ता भी दे तो केवल मु ले और कुता पर आसक्त न होकर अल्पतर में अपना पालन पोषण करे ॥
तभी देश का वर्तमान समृद्ध व् भविष्य संपन्न होगा.....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें