शनिवार, 26 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९६॥ -----

बास बास कर कास जब बासे भोग बिलास । 
धर्म कर्म को नास तब अधरम करे निवास ॥२९६१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य को मोह पाश में कर्षित कर जब भोग-विलास सर्वत्र व्याप्त हो जाता है तब धर्मतस आचरण व् सतकर्मों का विनाश कर वहां अधर्म का निवास हो जाता है ॥ 
फलस्वरूप लोग  पाप कर्म में लिप्त होकर  दुःख आतंक रोग व् शोक को  प्राप्त होते हैं..... 

भय रुज सोक बियोग दुःख चहुँ पुर बैर बिरोध । 
कारन कारक जान के चलो करे परिशोध ॥२९६२ ॥ 
भावार्थ : --विद्यमान समय में  विश्व आतंक रोग शोक वियोगऔर दुःख  से व्याप्त है चारों और वर विरोध दर्शित हो रहही शसन व्यवस्था का अभाव ही इनके कारण व् कारकों को ज्ञात कर चलो इन्हें परिशोधित करें ॥ 

जहाँ रहे गनवादिता तहाँ रहे गुन गौन । 
सुचिता सच्चरिता सहित  रहे धर्म तहँ मौन ॥२९६३ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ सांख्यवाद प्रभावी होता है , वहां शुद्धता, सच्चरित्रता के संग गुणों  को प्राप्त करने के लिए आवश्यक धर्म मौन धारण कर लेता  है और गुण गौण हो जाते हैं । जहाँ गुणवाद प्रभावी होता है वहां  सांख्यिकी पर संकट आन पड़ता है अत: दोनों का ही सामंजस्य आवश्यक है विद्यमान समय में सांख्यवाद अत्यधिक प्रभावी है ॥ 

 निष्कर्ष : -- सांख्यवाद में व्युत्पन्न संतति गुणहीन होती है.....


दयावान हरिदे रहे मनस रहे उदार । 
ताप रत सत चरन चरत निज गुन सूत सुधार ॥ २९६४ ॥ 
भावार्थ : -- हृदय में दया रहे मस्तिष्क में उदार भाव रहे । मन त्याग हेतु तत्पर रहे आचरण में सत्य रहे यह धर्म है जिससे गुणों की प्राप्ति होती है ॥ 

एकनिष्ठ जैसे मैं एक ही स्त्री एक पुरुष संबंध व्रत, जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए यह एक उत्तम आचार है । ईसाई व् मुसलमान इतने क्यों हैं ? एक स्त्री अधिक से अधिक पंद्रह बच्चे जन्मेगी एक पुरुष का यदि एक ही स्त्री से संबंध हो तो वह भी पंद्रह बच्चे ही जन्मेगा  इसीलिए हिन्दू धर्म के अनुयायियों की संख्या अल्प है ॥

जिस मलिनता को पृथ्वी ग्रहण करने में असमर्थ होती है वह विष है में परिणित हो जाता है...... 

धरम दिसा दरसात ही कर्म दसा दरसाए । 
दुरजीवी जीउति रहे धर्म कर्म बिसराए ॥२९६५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है  कर्म उसकी दशा बताता है । धर्म कर्म को तिरष्कृत करने से जीवन निंदनीय व् अनौचित्य हो जाता है ॥ 

ये करो तभी ऐसे रहोगे वो करोगे तो वैसे हो जाओगे.....यही कर्म है कारक है । ऐसे करोगे तो रोगी हो जाएगे ये रोग हुवा ही क्यों ?ऐसा वैसा करने से.....ये कारण है..... 

जग में जब अग्यान के छाए रहे अँधियार । 
कारक पर विचार करें कारन करत निवार ॥२९६६ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में जब अज्ञान का अंधेर छाया हो तब कारकों पर विचार करते हुवे पहले कारण का निवारण करें । ऐसा वैसा नहीं करने से नए रोगी नहीं होंगे कुछ समय के पश्चात रोग समाप्त हो जाएगा । यदि ऐसा वैसा करते ही गए तो और नए नए रोग हो जाएंगे॥  

निष्कर्ष : -- रोगों के नियंत्रण के लिए गुण होना आवश्यक है.....

मैं पूछ तू कौन है तू ने कहा मलीन । 
तू बोला तू कौन है मैं ने कहा कुलीन ॥२९६७ ॥ 

सोइ निर्झर सो नदी परबत सागर सोए । 
मैं मेल मलिनाए रहा, तुम कुलीन कस होए ॥२९६८॥ 
भावार्थ : -- वही झरने हैं वही नदी है पर्वत सागर भी वही है फिर तुम कुलीन कैसे हो गए .....? 

दयावान हरिदे किया, मानस किया उदार । 
तापरत सत चरन चला  रह कुल कर आधार ॥ २९६९ ॥ 
भावार्थ : -- हृदय दया से  द्रवित किया  मनोमस्तिष्क उदार किया समुदाय, जाति, गोत्र व् कुल को धारण किये त्याग व् सत्य के पथ पर चला ॥
तुम्हारे पास माँ है ?  हाँ ! पिता है ? हाँ ! बहन भी है.....? हाँ है !.....ये बताओ ये साली कहाँ से आई ये तो किसी के पास नहीं है.....? .....ससुराल से कुलीनता से.....इसिलए रक्त सम्बन्ध नहीं होंने चाहिए, यदि होंगे तो उसमें माँ भी माँ नहीं रहेगी ॥ 

धर्माधर्म जान बिना,कृत्याकृत्य न देखि । 
बाकी जनिति अधिकाधिक भयौ धर्म निरपेखि ॥२९७० ॥ 
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है जो धर्म निरपेक्ष हैं उनमें  अधिकांश वह और उनकी संतति हैं जिन्होंने धर्म व् अधर्म के ज्ञान बिना किंकर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यम् को नहीं जाना॥ 

कहा किया  हम आए के  कहा करेंगे जाए । 
इत के भए ना ऊत के चाले मूल गवाएँ ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- कहाँ से आए थे कहाँ जाएंगे इधर के रहे न उधर के रहे चले धर्म अधर्म का ज्ञान बिना अपने  मूल को गवां चले ॥ 






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