घर भीतर गौ साल रह खेत खेत सस साल।
सुचिता सच्चरिता रहत रह सम्पन सब काल ॥ २९५१ ॥
भावार्थ : -- पूर्व कालीन भारत से यह प्रेरणा मिलती है कि यदि घर में गौधन रहे, खेतों में उपज लहलहाती रहे, घर शुचिता, उत्तम आचार विचार, सदाचरण व् सद्गुणों से युक्त रहे तो वर्तमान ही नहीं अपितु सभी काल सम्पन होते हैं ॥
अर्थाधारित प्रबनधन धनमन के हुँत होए ।
काल करम को पालिबे और न पाले कोए ॥ २९५२ ॥
भावार्थ : -- भारत का अर्थगत शासन प्रबंधन पूंजीपतियों के लिए ही आरक्षित है ।यह आरक्षण केवल कलुषता का पालन पोषण कर रहा है अन्य किसी का नहीं ॥
बलवंत को एकै बार निर्बल बारहि बार ।
छुधा अगन कर समन किए सोइ होत दातार ॥२९५३॥
भवार्थ : -- ऋग्वेद के दशम मंडल के ग्यारहवें सूक्त से यह तथ्य प्राप्त होता है कि सृष्टि को संचालित करने वाली शक्तियों ने प्राणियों को क्षुधा देकर लगभग उनका वध ही कर दिया । जो अन्न देकर इस ज्वाला को शांत करे वही वास्तविक दातार है यह दान बलवान को एक बार व् निर्बल को बारम्बार देना चाहिए ॥
सूरबीर सत में मिले बिदुर सहसई माहि ।
लाखन में बकता मिले, दाता मिलिअब नाहि ॥ २९५४॥
----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- शूरवीर सौ में एक, विद्वान सहस्त्र में एक, भीड़ को नियंत्रित करने वाला वक्ता भी एक लाख में एक सही पर मिल ही जाता है, सत्दाता दुर्लभ है वह करोड़ों में एक आध ही मिलते हैं अत: सतदाता बनना चाहिए ॥
दरिद रहे पीर न सहै, सो तो मले मलीन ।
पीर सहता धीर रहए सोई होत कुलीन ॥ २९५५॥
भावार्थ : -- जो दरिद्र होकर भी कष्ट न सहन कर सके वह मलिनता धारण करता है । जो कष्ट सहता हुवा स्थिरचित्त रहकर दरिद्रहीनता की प्रतीक्षा करे वह कुलीनता को प्राप्त होता है ॥
अधमी अधरमात्मना नीच हो कि नर भूप ।
माँगत भड़ भड़ बोलिया चोरि करे तो चूप ॥ २९५६ ॥
भावार्थ : -- जनसामान्य हों धनवंत हों कि कोई शासक क्यों न हों धूर्त चरित्र, दुष्ट, निकृष्ट, अधर्मी मनुष्यों का यह स्वभाव होता है कि जब मांगना हो तो भड़ भड़ बोलते हैं चोरी करते पकड़े जाए तो चुप्पी साध लेते हैं ॥
अधमी अधरमात्मना नीच हो कि नर भूप ।
धनिमन के सिर बरसिया दारिद सिर कर धूप ॥ २९५६ ॥
भावार्थ : -- जनसामान्य हों धनवंत हों कि कोई शासक क्यों न हों धूर्त चरित्र, दुष्ट, निकृष्ट, अधर्मी मनुष्यों का यह स्वभाव होता है कि वह नीचे रहे तो धनवानों को भलाबुरा कहते है और ऊँचा होते ही उन्ही पर कृपा बरसाते है उन्हें यह दिखाई नहीं देता कि उनके नीचे भी एक दुनिया है ॥
दीन हीन को चाहिये तामस रस परिहाए ।
सातिक रस गहाई के राजस जोग लगाए ॥ २९५७ ॥
अर्थ : -- दीन हीन को चाहिए कि वह तामस वृत्ति का त्याग करते हुवे सात्विकता को वरण कर राजस रस की प्रतीक्षा करे ॥
भाव : -- नीचे को चाहिए कि वह ऊँचे व् धनवंत के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर कहे : -- मेरी पहुँच अन्न तक नहीं है तथापि निर्मिष हूँ तुम्हारी सभी रसों तक पहुँच है तुमने मांस खाया, भांति भांति के कुकर्म करते हुवे नीचता की तो नीच कौन है.....?
सामरथी को चाहिये राजस रस परिहाए ।
सातिक रस अपनाए के तामस गुन दूराए ॥ २९५८॥
अर्थ : -- धन, पदादि में समर्थ जन को अपना जीवन सरल व् सात्विक करते हुवे असमर्थ के अज्ञान, आलस्य का निवारण कर उसे तामस वृत्ति से मुक्त करने का प्रयास करे ॥
समरथ हो असमर्थ हो असहाए कर सहाए ।
अनुकरनी पद गहन कर करता पद परिहाए ॥२९५९ ॥
भावार्थ : - समर्थ हो चाहे असमर्थ हो वह अपने नीचे के असहायों की सहायता करते हुवे देश व् समाज में अनुकर्त्ता न बनकर अनुकरणीय बने ॥
धन्वन हो कि दीन हीनहो चाहे जन पाल ।
सील सुचित सुचालि रहे रह सम्पद सब काल ॥२९६० ॥
भावार्थ : - धनी हो कि दीन हीन हो चाहे कोई शासक ही क्यों न हो यदि वह शील वृद्ध सन्मार्गी सत्चरित्र कुलीन रहे तो सभी काल सम्पन होते हैं ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें