सागर तप कर घन दियो घन जल मुकुता दाए ।
धरनि मानिक रतन दियो हित करता कहलाए ॥ २९४१ ॥
भावार्थ : -- सागर तपस्या करते हुवे घन का दान किया घन जल स्वरूप मुक्ता का दान किया धरती ने मणिरत्नों का दान किया और हितकर्ता कहलाए ॥
सोई अर्थ निर्थक है जो धर्मार्थ नाए ।
स्वारथ परत हुँत रहए अरु किछु काम न आए ॥ २९४२॥
भावार्थ : -- वह अर्थ व्यर्थ है जो हित कार्यों में नियोजित न हो । जो केवल स्वार्थों की पूर्ति के लिए हो अन्य किसी के उपयोग में न आए ॥
माया भोग बिलासिता लक्ष्मी भूति ल्याए ।
यह मलीन करत बिहुरै यह कुलीन कर जाए ॥२९४३॥
भावार्थ : -- माया भोग विलासिता लाती है लक्ष्मी वैभव लाती है माया जब जाती है मलीन कर जाती है लक्ष्मी जब जाती है कुलीन कर जाती है ॥
संस्कार अरु संस्कृति लक्ष्मी के दो काज ।
बिकृति मति कुत्सित कृति कर माया करए ब्याज ॥ २९ ४४ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जाति को परमार्जित कर उसे सुसंस्कृत करना लक्ष्मी के ये दो प्रमुख कार्य हैं । माया बुद्धि को विकृत करती है वक्र-बुद्धि पाप कर्मों के द्वारा छल व् कपट कर धूर्ततापूर्ण व्यवहार करती है ॥
धर्मोचित करम करत सन मारग सों आए ।
लखमी नहीं माया है जब बिलास मैं जाए ॥ २९४५-क ॥
उपजित जीवनोपचयन बैभव के परिभास ।
संचित साधन सम्पदा भोगै भोग बिलास ॥ २९४५ -ख ॥
भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो त्याग हो दान हो ) ऐसे कर्म करते हुवे उत्तम मार्ग से प्राप्त अर्थ का भी जब भोग विलास में उपयोग हो तो वह माया है ॥
भावार्थ : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन ही वैभव व् संचित साधन सम्पदा का उपभोग भोग विलासित की परिभाषा है ॥
वैभव : -- सृष्टि को संचालित करने हेतु आवश्यक शक्ति सामर्थ्य
विलास : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन से प्राप्त सुख का अधिकाधिक उपभोग भी विलासिता है
धर्मोचित करम करत सन मारग सों आए ।
सो अर्थ सार गहै जो धर्म करम मैं जाए ॥२९४५ ॥
भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो त्याग हो दान हो ) ऐसे कर्म करते हुवे उत्तम मार्ग से प्राप्त अर्थ भी तभी सार्थक होता है जब वह पुण्य के अर्जन में नियोजित हो ॥
बसंत रितु आयो लखि डारि दियो द्रुम पात ।
ताते नव पल्लब भया दिया दूर नहि जात ॥
----- ॥ रास बिहारी ॥ -----
बसंत ऋतू को आता देख वृक्ष अपने पत्र त्याग देते हैं । इस क्रिया से उन्हें नव पल्लव प्राप्त होते हैं ।
" दिया कहीं नहीं जाता वह पुनश्च प्राप्त हो जाता है ॥ "
सुचित सुचालि सील बिरध सद गुण धरम अधीन ।
निसदिन दान धरम करए सोई होत कुलीन ॥२९४६ ॥
भावार्थ : -- शुचिता, उत्तम आचार विचार, सदाचरण व् सद्गुणों से युक्त कुल उत्तम नियमो के अधीन होकर नित्य प्रति दान कर पुण्य अर्जित करता है वह उत्तम कुल कहलाता है ॥
सच्चरिता सत्संकलपि कल दंपति के अंस ।
तासो जनित जनिमन कर होत रचित एक बंस ॥ २९४७ ॥
कुल कैसे बनता है : -- रक्त संबंधों से अन्यथा उत्तम आचार व् विचार से युक्त एक सूत्र में आबद्ध चरित्रवान दम्पति की संतति कुल का निर्माण करती हैं ।।
अकृत कृत अभच्छ भच्छत जो जिउ जिउती जोए ।
वाका जीवन जग माहि प्रसंसनीअ न होए ॥ २९४८ ॥
भावार्थ : -- अभक्ष्य का भक्षण कर निषिद्ध कार्य करते हुवे जीविका धारण करने वाले मनुष्य का जीवन संसार में प्रशंसनीय नहीं होता, ऐसे जीवन से वह क्षुद्र प्रकृति को प्राप्त होता है ॥
दान धरम के सँग होत अधम मनस के नास ।
जहाँ सुचिता बसी तहाँ लख्मी करे निवास ॥ २९४९॥
भावार्थ : -- वेदों में कहा गया है कि दान धर्म व् सत्कर्म से क्षुद्र मानसिकता का नाश होता है । जहाँ पवित्रता वास करती है लक्ष्मी का वहीँ निवास होता है ॥
" जब तक सिर पर माया नाचती है तब तक क्षुद्रता का आभास नहीं होता.....॥"
जीउ जीउ जी जीवते ऐसी जीवति जाकि ।
जीवनारथ सार गहत, सुफल जीवनी वाकि ॥ २९५० ॥
----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- जिसकी आजीविका पाषाणों में भी प्राण प्रतिष्ठित कर प्राणियों को जीवन शक्ति प्रदान करे उसका जीवन सार्थक होकर सफल हो जाता है ॥
धरनि मानिक रतन दियो हित करता कहलाए ॥ २९४१ ॥
भावार्थ : -- सागर तपस्या करते हुवे घन का दान किया घन जल स्वरूप मुक्ता का दान किया धरती ने मणिरत्नों का दान किया और हितकर्ता कहलाए ॥
सोई अर्थ निर्थक है जो धर्मार्थ नाए ।
स्वारथ परत हुँत रहए अरु किछु काम न आए ॥ २९४२॥
भावार्थ : -- वह अर्थ व्यर्थ है जो हित कार्यों में नियोजित न हो । जो केवल स्वार्थों की पूर्ति के लिए हो अन्य किसी के उपयोग में न आए ॥
माया भोग बिलासिता लक्ष्मी भूति ल्याए ।
यह मलीन करत बिहुरै यह कुलीन कर जाए ॥२९४३॥
भावार्थ : -- माया भोग विलासिता लाती है लक्ष्मी वैभव लाती है माया जब जाती है मलीन कर जाती है लक्ष्मी जब जाती है कुलीन कर जाती है ॥
संस्कार अरु संस्कृति लक्ष्मी के दो काज ।
बिकृति मति कुत्सित कृति कर माया करए ब्याज ॥ २९ ४४ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जाति को परमार्जित कर उसे सुसंस्कृत करना लक्ष्मी के ये दो प्रमुख कार्य हैं । माया बुद्धि को विकृत करती है वक्र-बुद्धि पाप कर्मों के द्वारा छल व् कपट कर धूर्ततापूर्ण व्यवहार करती है ॥
धर्मोचित करम करत सन मारग सों आए ।
लखमी नहीं माया है जब बिलास मैं जाए ॥ २९४५-क ॥
उपजित जीवनोपचयन बैभव के परिभास ।
संचित साधन सम्पदा भोगै भोग बिलास ॥ २९४५ -ख ॥
भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो त्याग हो दान हो ) ऐसे कर्म करते हुवे उत्तम मार्ग से प्राप्त अर्थ का भी जब भोग विलास में उपयोग हो तो वह माया है ॥
भावार्थ : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन ही वैभव व् संचित साधन सम्पदा का उपभोग भोग विलासित की परिभाषा है ॥
वैभव : -- सृष्टि को संचालित करने हेतु आवश्यक शक्ति सामर्थ्य
विलास : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन से प्राप्त सुख का अधिकाधिक उपभोग भी विलासिता है
धर्मोचित करम करत सन मारग सों आए ।
सो अर्थ सार गहै जो धर्म करम मैं जाए ॥२९४५ ॥
भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो त्याग हो दान हो ) ऐसे कर्म करते हुवे उत्तम मार्ग से प्राप्त अर्थ भी तभी सार्थक होता है जब वह पुण्य के अर्जन में नियोजित हो ॥
बसंत रितु आयो लखि डारि दियो द्रुम पात ।
ताते नव पल्लब भया दिया दूर नहि जात ॥
----- ॥ रास बिहारी ॥ -----
बसंत ऋतू को आता देख वृक्ष अपने पत्र त्याग देते हैं । इस क्रिया से उन्हें नव पल्लव प्राप्त होते हैं ।
" दिया कहीं नहीं जाता वह पुनश्च प्राप्त हो जाता है ॥ "
सुचित सुचालि सील बिरध सद गुण धरम अधीन ।
निसदिन दान धरम करए सोई होत कुलीन ॥२९४६ ॥
भावार्थ : -- शुचिता, उत्तम आचार विचार, सदाचरण व् सद्गुणों से युक्त कुल उत्तम नियमो के अधीन होकर नित्य प्रति दान कर पुण्य अर्जित करता है वह उत्तम कुल कहलाता है ॥
सच्चरिता सत्संकलपि कल दंपति के अंस ।
तासो जनित जनिमन कर होत रचित एक बंस ॥ २९४७ ॥
कुल कैसे बनता है : -- रक्त संबंधों से अन्यथा उत्तम आचार व् विचार से युक्त एक सूत्र में आबद्ध चरित्रवान दम्पति की संतति कुल का निर्माण करती हैं ।।
अकृत कृत अभच्छ भच्छत जो जिउ जिउती जोए ।
वाका जीवन जग माहि प्रसंसनीअ न होए ॥ २९४८ ॥
भावार्थ : -- अभक्ष्य का भक्षण कर निषिद्ध कार्य करते हुवे जीविका धारण करने वाले मनुष्य का जीवन संसार में प्रशंसनीय नहीं होता, ऐसे जीवन से वह क्षुद्र प्रकृति को प्राप्त होता है ॥
दान धरम के सँग होत अधम मनस के नास ।
जहाँ सुचिता बसी तहाँ लख्मी करे निवास ॥ २९४९॥
भावार्थ : -- वेदों में कहा गया है कि दान धर्म व् सत्कर्म से क्षुद्र मानसिकता का नाश होता है । जहाँ पवित्रता वास करती है लक्ष्मी का वहीँ निवास होता है ॥
" जब तक सिर पर माया नाचती है तब तक क्षुद्रता का आभास नहीं होता.....॥"
जीउ जीउ जी जीवते ऐसी जीवति जाकि ।
जीवनारथ सार गहत, सुफल जीवनी वाकि ॥ २९५० ॥
----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- जिसकी आजीविका पाषाणों में भी प्राण प्रतिष्ठित कर प्राणियों को जीवन शक्ति प्रदान करे उसका जीवन सार्थक होकर सफल हो जाता है ॥
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