रविवार, 20 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९३॥ -----

कदाचार एहि  देश में भयउ छूत  के रोग । 
जब महमारी रूप लिए रोगी भए सब लोग ॥२९३१ ॥ 
भावार्थ  : -- अब व्यभिचार भ्रष्टाचार जैसे कदाचरण ने इस देश में संक्रामक रोग का रूप ले लिया । जब  महामारी मची तब सभी वसति वासी इस रोग से ग्रस्त हो गए ॥ 

धौल गिरि सम देस जब होत  भूत बसबास । 
आनइ बसती सुख बसे  सम्पद आन निबास ॥२९३२ ॥ 
भावार्थ : --  हिमालय पर्वत जैसा कुलीन देश जब मलिन बस्ती में परणित  हो जाता है तब उसका सुख किसी अन्य  बसती में जा बसता है  व् सम्पद  अन्यत्र  निवासित हो जाती है ॥  

हिंसारत अकरम सील, जो को बिषय बिलासि । 
अस मलीमस मानस जन  बन चहँ तहँ के बासि  ॥ २९३३ ॥ 
भावार्थ : - जो हिंसा में आनद मनाते हैं जो आलस्य से भरपूर हैं जो "  पीओ-खाओ और आनंद करो"  के सिद्धांत में जिसकी रूचि होती, ऐसा पापी जनमानस  उस मलिन भवन में निवास हेतु उत्सुक रहता  ॥

काया काली काग सी, कूकर का सा सोर । 
एक देस जहाँ देखिया साहुकार से चोर ॥ २९३४ ॥ 
भावार्थ : -- काया तो काले कौंवे सी है भूंकनी बोली है  । ये  देश ऐसा बन गया कि  जहाँ चोर भी साहूकार जैसे दिखाई देते ॥
उत्तर : -- टी बी 

पप्पा सो परिचै नहीं, दद्दा रहिगा दूर । 
लल्ला लौ  लागी रहे, नन्ना सदा हजूर ।। 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- उस भवन में एक पापी ऐसा था जिसका पापा का परिचय नहीं, काहे  की दद्दा दूर रह गया न । फिर ? फिर क्या नाना नाना कहते लल्ला काले कुकरम में लगा रहता  इस प्रकार उसका जीवन असफल होता गया  ।। ईब  बता कौन  ?

एक शोक सूचना : --

नेम निर्बंध नहि रहे निर्मम भए निर्बाध । 
अपने घर की जोग रह, मुकुत फिरै अपराध ।। २९३५॥ 
भावार्थ : --  नियम व् निर्बन्धन नहीं रहे छोटे  छोटे अपाहिज बच्चों को अनाथ करने वाले निर्मम  निर्दयी आतताई निरंकुश हो गए हैं, अपराध मुक्त विचरण कर रहा है अत: जन-साधारण अपने घर की सुरक्षा स्वयं करे, सुचना समाप्त हुई धन्यवाद !  ॥ 

 अंधेरी नगरी भई चौपट देस द्वार । 
जो चहे सो आन बसे कोइ नहीं रखबार ॥२९३६॥  
भावार्थ : -- जब  नगरों में नियम व् नीति का अभाव होता है तब देश का द्वार रक्षकों से विहीन होकर चौपट हो जाता है फिर अपना आधार ढूंढते हुवे पराए देश के लोग ऐसे चौपट देश में आ बसते हैं  ।। 

अंधेरी सब नगर किए  जोको चौपट देस । 
होत तहँ  प्रतिबेसिहु  के नित निर्बाध प्रबेस ॥२९३७॥  
भावार्थ : -- नियम व् नीतियों का अभाव किए जो कोई देश चौपट हो जाता है, प्रतिवेशियों का भी वहां नित्य निर्बाध प्रवेश होता रहता है ॥ 

भयकारी निर्भय  होत प्रबिषि तहाँ अगाध । 
तेहि  माझ सौभाग बस गहे कोउ एक आध ॥२९३८॥ 
भावार्थ : -- सीमाओं के निरंतर अतिक्रमण से वहां भयकारियों अत्यधिक संख्या में  निर्भीक होकर प्रवेश करते हैं सौभाग्य से  उनमें  कोई एक आध ही धरा जाता है ॥ 

आतताई गहि गयो लोग बजावै थाल । 
सासन घारै पालना पले पलक जूँ लाल ॥ २९३९ ॥  
भावार्थ : -- धरा गया भई धरा गया आतंकवादी धरा गया लोग थाली बजाते हैं मानो आतंकवादी धरा न गया हो जनम लिया हो  । सत्ताधारियों के  सोने के  पालने में वह ऐसे पलता है.....जैसे पलकों में किसी का लाल पलता हो ॥ जितना धन उसके पलने में व्यय होता है उतने में तो एक गांव पल जाता है ॥  

एक कहा मैं दासा हूँ  दूज कहा मैं नीच । 
दोउ सभा जब मेल किए  रहँ  तहँ कीचहि कीच ॥ २९४०॥ 
भावार्थ : -- एक ने कहा मैं दास हूँ दूसरे ने कहा मैं नीच हूँ । ये दोनों किसी सभा में मिल जावे वहां कीचड़ होना ही है जहाँ कीचड़ होगा वहां मच्छर होंगे ॥ 










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