कंद मूल फल खाए के भए जो धरना धारि ।
सत्ता सूत हथियाए तो भए कस माँसाहारि ।२९११ ।
भावार्थ : -- पाठशाला में हमें पढ़ाया गया था कि फल-फूल खा खा के महात्मा लोग धरना धारी बने थे तब यह देश स्वतन्त्र हुवा था । सत्ता हाथ में आते ही वे ही क्रांतिकारी मांस आहार कर हिंसा वादी कैसे बन गए ?
एक अहिंसा एक अनसन बरे चरन जन दोइ ।
स्वाधीन होत ए देस हिंसक कैसे होइ ॥ २९१२॥
भावार्थ : -- भारत के जनमानस ने एक अहिंसा और एक अनशन इन दो आचरणों को वरन कर अहिंसक आंदोलन से देश को स्वत्रन्त्र किया था । स्वाधीन होते ही यह हिंसा वादी कैसे हो गया ॥
कोइ भारत मातु कह पयसि पयस करि ओक ।
ऐंचतान को रकत गहँ जोइ लगे थन जोँक ॥२९१३ ॥
भावार्थ : -- कोई भारत को माता माता कहकर ओंक कर उसका अमृत ही ग्रहण करता रहा । थन से चिपके जोंक के जैसे कोई उसे कष्ट दे देकर उसका रक्त पीता रहा कौन है ये ?
भजे नहि जो राम नाम पूजे नाही गंग ।
बरियाए जो दास करे तेहि लगावैं अंग ॥ २९१ ४ ॥
भावार्थ : -- यह देश राम का देश है, गंगा जी से जगत में प्रसिद्ध है जो इस देश में रहते हैं इस देश का खाते हैं राम नाम में उनकी श्राद्ध नहीं है गंगा जी का जो आदर नहीं करते । जिन्होंने बलपूर्वक इस देश को दास बनाया क्या वह अंगीकार करने योग्य हैं ?
परदेसी समुदाय जब रह रहँ अपने संग ।
बहुरि कवन कर होइया एही देस प्रलवंग ॥ २९१५॥
भावार्थ : -- जब अन्य देशों के धर्मगत समुदायों को साथ ही रहना था । फिर यह देश विभाजित क्यों हुवा ?
खाल खाए एहि देस के पूज पराई पौर ।
अजहुँ सोइ पापी भए सासन के सिरमौर ॥२९१६ ॥
भावार्थ : -- जिनके राज में भारतीयों की दशा अत्यंत दयनीय थी जो खाल तो इस देश की खाते हैं और परायों देश की पौड़ीयों को पूजते हैं वही पापी अब शासकों के सिरमौर हो गए ॥
जोइ भगता राम भजे ताते बैर बिरोध ।
अवध पूरी कह आपनी, अवराधन अवरोध ॥ २९१७ ॥
भावार्थ : -- जो कोई भक्त राम का नाम भजता है उसे ये दंगाबाज कहते हैं विप्लववादी कहते है । और अवधपुरी को अपना कहकर ये भारतियों की सेवा पूजा में विध्न करते हैं ॥ रामा- सेतु को ये आदम सेतु कहते हैं कश्मीर भी इनका है अवध भी इनका है फिर भारतीयों का क्या है.....?
सासन हर बिलास चहे आधीन नव अभिलास ।
गोसाईं पद खोए के होत परायो दास ॥ २९१८ ॥
भावार्थ : -- जब शासक भोग विलास में मग्न रहता है और शासनाधीन जन मानस नित नव अभिलाषा करता है । तब स्वामी पद गँवा कर वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दास हो जाते हैं ॥
सासन हर विलास चहे अधीन रहे उदास ।
गोसाईं पद खोए के होत परायो दास ॥ २९१९ ॥
भावार्थ : -- जब शासक भोग विलास में मग्न रहता है और शासनाधीन जन मानस उदासीन रहता हो । तब स्वामी पद गँवा कर वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दास हो जाते हैं ॥
गोसाईं पद खोइ के होए परायो दास ।
सुख तब आन बसति बसे सम्पद आन निवास ॥ २९२० - क॥
भावार्थ : -- स्वामी पद की हानि कर जन मानस जब दास हो जाता है । तब सुख अन्यान्य वसति का वासी हो जाता है, सम्पदा अन्यान्य वास में निवासित हो जाती है ॥
दासा होवै साइयाँ गोसाईं कर दास ।
सुख तब आन बसति बसे सम्पद आन निवास ॥ २९२०-ख ॥
भावार्थ : - जब दास स्वामी और स्वामी दास बन जाते हैं तब सुख अन्यान्य वसति का वासी हो जाता हैं , सम्पदा अन्यान्य वास में निवासित हो जाती हैं ॥
जीव हनए हिंसा करै मार मुँही मुह खाए । ( संत कबीर दास )
धरम सभा सो अधर्मी बैठे करे न्याय ॥२९ २० ॥
भावार्थ : -- फिर तो जो जीवों की हत्या करते हैं जिन्हें हिंसा करने में आनंद मनाने वाले धर्माधिकरणक धार्मिक कृत्यों का निरिक्षण कर धर्म-अधर्म का निर्णय करते ॥
समरथ को सब सहारथ सहजिअ होत सहाइ ।
जो जग कातर दीनतर, तिनकी कहाँ सुनाइ ॥ २९२१ ॥
भावार्थ : -- समर्थ की सभी सहायता करते हुवे उसके स्वभावगत मित्र हो जाते हैं । संसार में जो कातर होता है जो दीन की सुनवाई कहीं नहीं होती ॥
दूषन सन जन जन त्रसै दंड भयो उपहास ।
बासी पुर भीतर बसै कार न कारावास ॥२९२२॥
भावार्थ : -- दूषण से सभी त्रस्त रहते हैं दंड उपहास बन कर रह जाता है वासी घरों में वस्तियों में नगरों में वासित मिलते हैं कारावास व्यर्थ हो जाते ॥
बांधनिहारा भाँवरे सारे बंधन तोड़ ।
सर ऊपर आरा सहे दीन रहै हथ जोड़ ॥ २९ २३ ॥
भावार्थ : -- नियम नियोगी ही नियम तोड़ते फिरते । दरिद्र अपने सिर पर आरे के दंश सहन करते कर जोड़े खड़े रहते और शासन व्यवस्था व्यर्थ हो जाती.....
भयऊ कठिन कराल
स्वामी बनने के लिए क्या करना चाहिए : --
समस्याए इस देस की हुई असमाधेय ।
अपने मत का मान कर कूद कूद मत देय ॥ २९२४ ॥
भावार्थ : -- ( समझाने वाले ने समझाया )शासकों के पास देश की समाधेय समस्याओं का कोई समाधान नहीं है । हे जन मानस ! अपने मत का सम्मान कर इसे जिस किसी को भी मत दे । इस चुनाव प्रणाली में कोई भी ऐरा गैरा शासक बन जा रहा है ॥
जान मोल मत आपना दाता देय न देय ।
सासन हर के लेख मैं लिखे लेय ही लेय ॥२९२५ ॥
भावार्थ : -- अपने मत का मूल्य जानकर दाता मत देता न देता । किन्तु सत्ताधारियों के लेखों में लिया लिया और लिया ही लिखा जाता ॥
समस्याए इस देस की हुई असमाधेइ ।
भाग धेय धन आपना जेहि केहि कर देइ ॥ २९२५॥
भावार्थ : -- इस देश की समाधेय समस्याएँ सत्ताधारियों से असमाधेय हो चली थी दाता अपना देय कर जिस किसी को भी दे देते ॥
भागधान निधेयक पद गह जब लोग पराए ।
दानवान को चाहिए वाके कर नहि दाए ॥ २९२६ ॥
भावार्थ : -- ( समझाने वाले पुनश्च समझाते ) जब भाग धान निधेयक का पद कोई अभारतीय ग्रहण कर ले तब दाता को चाहिए कि वह अपना देय कर उसे न देवे, इस देश को दास बनाने वालों को तो कदापि नहीं देना चाहिए ॥
सासन के प्रबंध भवन धरे धंध आधार ।
समास के दरार पड़े चौपट करे द्वार ॥२९२७ ॥
भावार्थ : -- भारत की शासन व्यवस्था का भवन ठगविद्या पर आधारित कर भवन के द्वार को चौपट कर दिया गया वहां कोई भी प्रवेश कर सकता था ऐसे भवन में समस्याओं की दरारे तो पड़नी ही थी ॥
कूट कपट कर कील पर, छल छाया की छाँत ।
धूत कृत के भीत करे, निस दिन होत निपात ॥ २९२६ ॥
भावार्थ : -- मिथ्या वादिता के स्तम्भ और असद आचरण की भीतिका पर छल कपट की छत गोले के रूप में जब तब जन मानस के सिर पर गिरती ॥
काल कवलित होत जान केतक लोग सिधाए ।
घात खाए केत न केत गने त गन नहि पाए ॥ २९२७ ॥
भावार्थ : -- गिरती हुई छत रूपी आतंकी गोलों से काल का ग्रास बनकर कितने ही लोग चल बसे । कितने धायल हुवे चूँकि यह अनगिनत थे अत: इनकी गणना ही नहीं हुई ॥
हम जाने थे खाएँगे जीम जीम बहु माल ।
ज्यों का त्यों ही रही गया पकड़ि लिए गया काल ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भोग बिलासा में भया अधमी घर संसार ।
मरा मिला जहँ मानसा, खाने को तैयार ॥ २९२८ ॥
भावार्थ : -- उस शासन प्रबंधन रूपी भवन का परिवार भोग विलास में तामसी प्रवृति का हो गया अब उसे मनुष्य भी कहीं मरा मिलता तो वह उसे भी खाने को तैयार रहता ॥
जीव हिंसा करि भए जब अधमी सब संसार ।
धरम संग को छाँड़ के करिये धर्म प्रसार ॥२९२९ ॥
भावार्थ : -- जीवों की हिंसा कर संसार में जब अधर्मी ही अधर्मी हो जाए तब पाखण्ड के प्रचार का त्यागकर धर्म का प्रसार करना चाहिए । कैसे ? ऐसे प्राणी मात्र पर दया करें ये धर्म है सदा सत्य बोलें ये धर्म है त्याग करें ये धर्म है त्याग करें किसका ? सुख का । दान करें किसका ? पुण्य का पाप के दान से पाप बढ़ता है ।
भ्रष्टचरण के संग मैं बाढ़े अति आचार ।
शासन के प्रबंध भवन भयऊ भूतागार ॥२९३०- क ॥
भावार्थ : -- चूँकि इस भवन की नीव ही पाखंडवाद ( बगुला वाद )पर आधारित थी अत: सुख को भोगने के लिए धन की आवश्यकता होती जो पाखंड वाद में भ्रष्ट रीति से सरलता पूर्वक प्राप्त हो जाता । परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार के संग अत्याचार बढ़ने लगा ऐसी बढ़ोतरी ने शासन के इस प्रबंध भवन को मलिन भवन व् देश को मलिन बस्ती में परिणित कर दिया ।
मलिन भवन की मैलाइ केहि बिधि कहि न जाइ ।
अति अचारी रूप में माखी मसक जनाए ॥।२९३०-ख ॥
भावार्थ : -- इस मलिन भवन की मलिनता वर्णनातीत है । अब इसमें अत्याचारी का रूप लिए मख्खी मच्छर उपजने लगे ॥
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