धर्माचरन परायनी करे जगत के राख ।
अधरम ऐसो भूखिया लेइ सकल जग भाख ॥ २९७१ ॥
भावार्थ : -- धर्माचरणी इस सृष्टि के रक्षक हैं । अधर्म ऐसा छिद्र है जो सृष्टि को ग्रसने में समर्थ है ॥
धर्म कहाँ लिए जाइया जहां मिले भगवान ।
दीठी पीठी पाइया अपना पथ पहचान ॥ २९७२॥
भावार्थ : - धर्म कहाँ ले जाता है ईश्वर के पास । यदि ईश्वर सम्मुख न होकर विमुख हों तो अपने पथ को पहचानें और ईश्वरोन्मुख होकर चलें .....
सच्चरिताधार कर जब कुलीन भए सब लोग ।
ऊंची करनी कार के मेटो जी का रोग ॥ २९७३॥
भावार्थ : -- जन्म से कोई कुलीन नहीं होता शील व् सदाचरण-वृत्ति का निर्माण कर ही सब कुलीन हुवे हैं सत्कर्म करने से ही जी के रोग मिटते हैं । दया करो ऐसा वैसा मत करो, कृपा करो ऐसा वैसा मत खाओ, ऐसा वैसा मत पीओ ॥ क्योंकि विष है तो विषधर है.....
मानस जनमन पाए के मत कर तू अभिमान ।
पसु पखेरू जीव जंतु अपने जी सो जान ॥ २९७४ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन प्राप्त कर अहंकार न करें । पशु को पखेरुओं को जीवों को जंतुओं को अपने जैसा समझे उनको भी उतना ही कष्ट होता है जितना की मनुष्य को होता है ॥
धरम करम पुकार रहा चल गोसाईं पास ।
अकरम कासे कंठ कू अधरम की कर फाँस ॥२९७५॥
भावार्थ : -- धर्म और कर्म पुकारते रहे चलो ईश्वर के पास चलो । अधर्म की फांसी से कुकर्म कंठ को कसे रहे कैसे जाते ॥
अपनी अपनी देहरी अपनी अपनी आगि ।
अपने अपने में रहे भस्म भूत कर जागि ॥२९ ७६ ॥
भावार्थ : -- अपने अपने घर हैं आग सबके घरों में लगी है किसी की दिखती है किसी की नहीं दिखती । जब स्वजन ही स्वार्थ के परायण होते हैं तब यह अगन दावाग्न में परिवर्तित होकर सब कुछ भस्म कर देती है ॥
मान मरयादा कर सों जँह रह सील सनेह ।
बड़े बिरध के छाँय गह कहबत सोई गेह ॥ २९७७ ॥
भावार्थ : -- मान और मर्यादा के संग जहाँ सदाचार व् स्नेह होता है, जहाँ माया नहीं होती बड़ों की छाया होती है घर वही कहलाता है ॥
माया की छाया करे दिखे न अपने पाप ।
आन घराँ कूँ देखिया धर्म सील बन आप ॥२९७८॥
भवार्थ : -- आतंक सो लड़णो है, तेरे कुचरित्तर के रोगों ने जो आतंक मचा रखा है उस तईं कुन लडोगो । डागदर बना पराए घरां में घूसतो फिरो है, पहले अपने देश के पाप देख फिर दूसरों के पापों को देख ।
रोग मारो, जीणा रोगी णू एक न एक दिन मरणा ही है । स्त्री-पुरुष को संग ही शोभा देता है ।।
पाप = व्यभिचार
धरम करम बिहीन रहे भगवन पथ ना पाए ।
जैसी करनी कारिआ तैसी खनि में जाए ॥ २९७९॥
भावार्थ : - धर्म व् सतकर्म से विहीन मनुष्य को ईश्वर का मार्ग प्राप्त नहीं होता । जीव जंतुओं की चौरासी लाख योनि है जो चार खण्डों में विभाजित हैं स्वेदज, अण्डज,पिण्डज, उद्भिज । फिर वह जैसे अधर्म करता है जैसे कुकर्म करता है उसे वैसा खंड प्राप्त होता है ॥
पिण्डज बच्चे देने वाले जीव : --जैसे मनुष्य, गौ आदि
अंडे देने वाले : - सरीसृप, पक्षिवर्ग आदि
स्वेद से उत्पन्न होने वाले जीव जैसे -खटमल मच्छर आदि
उद्भिज : - धरती फोड़कर बाहर निकलने वाले जीव जैसे : --पेड़ पौधे विभिन्न वनस्पति
काया कोमल कमनीय अंतरतम पाषान ।
ताते निहठुर होइगा वो तेरा भगवान ॥२९८० -क ॥
भावार्थ : --रे कोमल कमनीय काया वाले अधम मनुष्य जो तूने अंतरतम पाषाण किया तो वो तेरा ईश्वर तुझसे भी अधिक निष्ठुर होगा ॥
दया कर पर दया करे, दानी को दए दान ।
साँचे सों साँचा रहे, तप सों तपोनिधान ॥२९८०- ख ॥
भावार्थ : -- उन खण्डों में अधोगत होकर तुमने पूर्व में दया की तो दया प्राप्त होगी दान किया तो दान प्राप्त होगा त्याग किया तो त्याग में कुछ प्राप्त होगा वह सत्य है तू असत्य, सत्य सत्य के साथ ही रहता है वह तेरे साथ नहीं होगा ।। यही जीवन का मर्म है ॥
अधरम ऐसो भूखिया लेइ सकल जग भाख ॥ २९७१ ॥
भावार्थ : -- धर्माचरणी इस सृष्टि के रक्षक हैं । अधर्म ऐसा छिद्र है जो सृष्टि को ग्रसने में समर्थ है ॥
धर्म कहाँ लिए जाइया जहां मिले भगवान ।
दीठी पीठी पाइया अपना पथ पहचान ॥ २९७२॥
भावार्थ : - धर्म कहाँ ले जाता है ईश्वर के पास । यदि ईश्वर सम्मुख न होकर विमुख हों तो अपने पथ को पहचानें और ईश्वरोन्मुख होकर चलें .....
सच्चरिताधार कर जब कुलीन भए सब लोग ।
ऊंची करनी कार के मेटो जी का रोग ॥ २९७३॥
भावार्थ : -- जन्म से कोई कुलीन नहीं होता शील व् सदाचरण-वृत्ति का निर्माण कर ही सब कुलीन हुवे हैं सत्कर्म करने से ही जी के रोग मिटते हैं । दया करो ऐसा वैसा मत करो, कृपा करो ऐसा वैसा मत खाओ, ऐसा वैसा मत पीओ ॥ क्योंकि विष है तो विषधर है.....
मानस जनमन पाए के मत कर तू अभिमान ।
पसु पखेरू जीव जंतु अपने जी सो जान ॥ २९७४ ॥
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन प्राप्त कर अहंकार न करें । पशु को पखेरुओं को जीवों को जंतुओं को अपने जैसा समझे उनको भी उतना ही कष्ट होता है जितना की मनुष्य को होता है ॥
धरम करम पुकार रहा चल गोसाईं पास ।
अकरम कासे कंठ कू अधरम की कर फाँस ॥२९७५॥
भावार्थ : -- धर्म और कर्म पुकारते रहे चलो ईश्वर के पास चलो । अधर्म की फांसी से कुकर्म कंठ को कसे रहे कैसे जाते ॥
अपनी अपनी देहरी अपनी अपनी आगि ।
अपने अपने में रहे भस्म भूत कर जागि ॥२९ ७६ ॥
भावार्थ : -- अपने अपने घर हैं आग सबके घरों में लगी है किसी की दिखती है किसी की नहीं दिखती । जब स्वजन ही स्वार्थ के परायण होते हैं तब यह अगन दावाग्न में परिवर्तित होकर सब कुछ भस्म कर देती है ॥
मान मरयादा कर सों जँह रह सील सनेह ।
बड़े बिरध के छाँय गह कहबत सोई गेह ॥ २९७७ ॥
भावार्थ : -- मान और मर्यादा के संग जहाँ सदाचार व् स्नेह होता है, जहाँ माया नहीं होती बड़ों की छाया होती है घर वही कहलाता है ॥
माया की छाया करे दिखे न अपने पाप ।
आन घराँ कूँ देखिया धर्म सील बन आप ॥२९७८॥
भवार्थ : -- आतंक सो लड़णो है, तेरे कुचरित्तर के रोगों ने जो आतंक मचा रखा है उस तईं कुन लडोगो । डागदर बना पराए घरां में घूसतो फिरो है, पहले अपने देश के पाप देख फिर दूसरों के पापों को देख ।
रोग मारो, जीणा रोगी णू एक न एक दिन मरणा ही है । स्त्री-पुरुष को संग ही शोभा देता है ।।
पाप = व्यभिचार
धरम करम बिहीन रहे भगवन पथ ना पाए ।
जैसी करनी कारिआ तैसी खनि में जाए ॥ २९७९॥
भावार्थ : - धर्म व् सतकर्म से विहीन मनुष्य को ईश्वर का मार्ग प्राप्त नहीं होता । जीव जंतुओं की चौरासी लाख योनि है जो चार खण्डों में विभाजित हैं स्वेदज, अण्डज,पिण्डज, उद्भिज । फिर वह जैसे अधर्म करता है जैसे कुकर्म करता है उसे वैसा खंड प्राप्त होता है ॥
पिण्डज बच्चे देने वाले जीव : --जैसे मनुष्य, गौ आदि
अंडे देने वाले : - सरीसृप, पक्षिवर्ग आदि
स्वेद से उत्पन्न होने वाले जीव जैसे -खटमल मच्छर आदि
उद्भिज : - धरती फोड़कर बाहर निकलने वाले जीव जैसे : --पेड़ पौधे विभिन्न वनस्पति
काया कोमल कमनीय अंतरतम पाषान ।
ताते निहठुर होइगा वो तेरा भगवान ॥२९८० -क ॥
भावार्थ : --रे कोमल कमनीय काया वाले अधम मनुष्य जो तूने अंतरतम पाषाण किया तो वो तेरा ईश्वर तुझसे भी अधिक निष्ठुर होगा ॥
दया कर पर दया करे, दानी को दए दान ।
साँचे सों साँचा रहे, तप सों तपोनिधान ॥२९८०- ख ॥
भावार्थ : -- उन खण्डों में अधोगत होकर तुमने पूर्व में दया की तो दया प्राप्त होगी दान किया तो दान प्राप्त होगा त्याग किया तो त्याग में कुछ प्राप्त होगा वह सत्य है तू असत्य, सत्य सत्य के साथ ही रहता है वह तेरे साथ नहीं होगा ।। यही जीवन का मर्म है ॥