मंगलवार, 29 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९७ ॥ -----

धर्माचरन परायनी करे जगत के राख । 
अधरम ऐसो भूखिया लेइ सकल जग भाख ॥ २९७१ ॥  
भावार्थ : -- धर्माचरणी  इस सृष्टि के रक्षक हैं । अधर्म ऐसा छिद्र है जो सृष्टि को ग्रसने में समर्थ है ॥

धर्म कहाँ लिए जाइया जहां मिले भगवान । 
दीठी पीठी पाइया अपना पथ पहचान ॥ २९७२॥ 
भावार्थ : - धर्म कहाँ ले जाता है ईश्वर  के पास । यदि ईश्वर सम्मुख न होकर विमुख हों  तो अपने पथ को पहचानें और  ईश्वरोन्मुख होकर चलें .....

सच्चरिताधार कर जब कुलीन भए सब लोग । 
ऊंची करनी कार  के मेटो जी का रोग ॥ २९७३॥ 
भावार्थ : -- जन्म से कोई कुलीन नहीं होता शील व् सदाचरण-वृत्ति का निर्माण कर ही सब कुलीन हुवे हैं सत्कर्म करने से ही जी के रोग मिटते हैं ।  दया करो ऐसा वैसा मत करो,  कृपा करो ऐसा वैसा मत खाओ, ऐसा वैसा मत पीओ ॥ क्योंकि विष है तो विषधर है.....

मानस जनमन पाए  के मत कर तू अभिमान । 
पसु पखेरू जीव जंतु अपने जी सो जान ॥ २९७४ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जीवन प्राप्त कर अहंकार न करें  । पशु को पखेरुओं को जीवों को जंतुओं को अपने जैसा समझे उनको भी उतना ही कष्ट होता है जितना की मनुष्य  को होता है ॥

धरम करम पुकार रहा चल गोसाईं पास । 
अकरम कासे कंठ कू अधरम की कर फाँस ॥२९७५॥ 
भावार्थ : -- धर्म और कर्म पुकारते रहे चलो ईश्वर के पास चलो । अधर्म की फांसी से कुकर्म कंठ को कसे रहे कैसे जाते ॥

अपनी अपनी देहरी अपनी अपनी आगि । 
अपने अपने में रहे भस्म भूत कर जागि ॥२९ ७६ ॥ 
भावार्थ : -- अपने अपने घर हैं आग सबके घरों में लगी है  किसी की दिखती है  किसी की नहीं दिखती । जब स्वजन ही स्वार्थ के परायण होते हैं तब यह अगन दावाग्न में परिवर्तित होकर सब कुछ भस्म कर देती है ॥

मान  मरयादा कर सों जँह रह सील सनेह ।
बड़े बिरध के छाँय गह  कहबत सोई गेह ॥ २९७७ ॥ 
भावार्थ : -- मान और मर्यादा के संग जहाँ सदाचार व् स्नेह होता है, जहाँ माया नहीं होती बड़ों की छाया होती है घर वही कहलाता है ॥

माया की छाया करे दिखे न अपने पाप । 
आन  घराँ कूँ देखिया धर्म सील बन आप ॥२९७८॥ 
भवार्थ : -- आतंक सो लड़णो है,  तेरे कुचरित्तर के रोगों ने जो आतंक मचा रखा है उस तईं कुन लडोगो । डागदर बना पराए घरां में घूसतो फिरो है,  पहले अपने देश के पाप देख  फिर दूसरों के पापों को देख ।
 रोग मारो,  जीणा रोगी णू एक न एक दिन मरणा ही है । स्त्री-पुरुष को  संग ही शोभा देता है ।।

पाप = व्यभिचार

धरम करम बिहीन रहे भगवन पथ ना पाए । 
जैसी करनी कारिआ तैसी खनि में जाए ॥ २९७९॥ 

भावार्थ : - धर्म व् सतकर्म से विहीन मनुष्य को ईश्वर का मार्ग प्राप्त नहीं होता । जीव जंतुओं की चौरासी लाख योनि है जो चार खण्डों में विभाजित  हैं स्वेदज, अण्डज,पिण्डज, उद्भिज ।  फिर वह जैसे अधर्म करता है जैसे  कुकर्म करता  है उसे वैसा खंड प्राप्त होता है ॥  

पिण्डज बच्चे देने वाले जीव : --जैसे मनुष्य, गौ आदि  
अंडे देने वाले : - सरीसृप, पक्षिवर्ग आदि 
स्वेद से उत्पन्न होने वाले जीव जैसे -खटमल मच्छर आदि 
उद्भिज : - धरती फोड़कर बाहर निकलने वाले जीव जैसे : --पेड़ पौधे विभिन्न वनस्पति 

काया कोमल कमनीय  अंतरतम पाषान । 
ताते निहठुर होइगा  वो तेरा भगवान ॥२९८० -क ॥ 

भावार्थ : --रे कोमल कमनीय काया वाले अधम मनुष्य जो तूने अंतरतम पाषाण किया तो वो तेरा ईश्वर तुझसे भी अधिक निष्ठुर होगा ॥ 

दया कर पर दया करे, दानी को दए दान । 
साँचे सों  साँचा रहे, तप सों  तपोनिधान ॥२९८०- ख ॥ 

भावार्थ : -- उन खण्डों में अधोगत होकर तुमने पूर्व में दया की तो दया  प्राप्त होगी दान किया तो दान प्राप्त होगा त्याग किया तो त्याग में कुछ प्राप्त होगा वह सत्य है तू असत्य, सत्य सत्य के साथ ही रहता है वह तेरे साथ नहीं होगा ।। यही जीवन का मर्म है ॥ 




शनिवार, 26 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९६॥ -----

बास बास कर कास जब बासे भोग बिलास । 
धर्म कर्म को नास तब अधरम करे निवास ॥२९६१ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य को मोह पाश में कर्षित कर जब भोग-विलास सर्वत्र व्याप्त हो जाता है तब धर्मतस आचरण व् सतकर्मों का विनाश कर वहां अधर्म का निवास हो जाता है ॥ 
फलस्वरूप लोग  पाप कर्म में लिप्त होकर  दुःख आतंक रोग व् शोक को  प्राप्त होते हैं..... 

भय रुज सोक बियोग दुःख चहुँ पुर बैर बिरोध । 
कारन कारक जान के चलो करे परिशोध ॥२९६२ ॥ 
भावार्थ : --विद्यमान समय में  विश्व आतंक रोग शोक वियोगऔर दुःख  से व्याप्त है चारों और वर विरोध दर्शित हो रहही शसन व्यवस्था का अभाव ही इनके कारण व् कारकों को ज्ञात कर चलो इन्हें परिशोधित करें ॥ 

जहाँ रहे गनवादिता तहाँ रहे गुन गौन । 
सुचिता सच्चरिता सहित  रहे धर्म तहँ मौन ॥२९६३ ॥ 
भावार्थ : -- जहाँ सांख्यवाद प्रभावी होता है , वहां शुद्धता, सच्चरित्रता के संग गुणों  को प्राप्त करने के लिए आवश्यक धर्म मौन धारण कर लेता  है और गुण गौण हो जाते हैं । जहाँ गुणवाद प्रभावी होता है वहां  सांख्यिकी पर संकट आन पड़ता है अत: दोनों का ही सामंजस्य आवश्यक है विद्यमान समय में सांख्यवाद अत्यधिक प्रभावी है ॥ 

 निष्कर्ष : -- सांख्यवाद में व्युत्पन्न संतति गुणहीन होती है.....


दयावान हरिदे रहे मनस रहे उदार । 
ताप रत सत चरन चरत निज गुन सूत सुधार ॥ २९६४ ॥ 
भावार्थ : -- हृदय में दया रहे मस्तिष्क में उदार भाव रहे । मन त्याग हेतु तत्पर रहे आचरण में सत्य रहे यह धर्म है जिससे गुणों की प्राप्ति होती है ॥ 

एकनिष्ठ जैसे मैं एक ही स्त्री एक पुरुष संबंध व्रत, जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए यह एक उत्तम आचार है । ईसाई व् मुसलमान इतने क्यों हैं ? एक स्त्री अधिक से अधिक पंद्रह बच्चे जन्मेगी एक पुरुष का यदि एक ही स्त्री से संबंध हो तो वह भी पंद्रह बच्चे ही जन्मेगा  इसीलिए हिन्दू धर्म के अनुयायियों की संख्या अल्प है ॥

जिस मलिनता को पृथ्वी ग्रहण करने में असमर्थ होती है वह विष है में परिणित हो जाता है...... 

धरम दिसा दरसात ही कर्म दसा दरसाए । 
दुरजीवी जीउति रहे धर्म कर्म बिसराए ॥२९६५ ॥ 
भावार्थ : -- धर्म मनुष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है  कर्म उसकी दशा बताता है । धर्म कर्म को तिरष्कृत करने से जीवन निंदनीय व् अनौचित्य हो जाता है ॥ 

ये करो तभी ऐसे रहोगे वो करोगे तो वैसे हो जाओगे.....यही कर्म है कारक है । ऐसे करोगे तो रोगी हो जाएगे ये रोग हुवा ही क्यों ?ऐसा वैसा करने से.....ये कारण है..... 

जग में जब अग्यान के छाए रहे अँधियार । 
कारक पर विचार करें कारन करत निवार ॥२९६६ ॥ 
भावार्थ : -- संसार में जब अज्ञान का अंधेर छाया हो तब कारकों पर विचार करते हुवे पहले कारण का निवारण करें । ऐसा वैसा नहीं करने से नए रोगी नहीं होंगे कुछ समय के पश्चात रोग समाप्त हो जाएगा । यदि ऐसा वैसा करते ही गए तो और नए नए रोग हो जाएंगे॥  

निष्कर्ष : -- रोगों के नियंत्रण के लिए गुण होना आवश्यक है.....

मैं पूछ तू कौन है तू ने कहा मलीन । 
तू बोला तू कौन है मैं ने कहा कुलीन ॥२९६७ ॥ 

सोइ निर्झर सो नदी परबत सागर सोए । 
मैं मेल मलिनाए रहा, तुम कुलीन कस होए ॥२९६८॥ 
भावार्थ : -- वही झरने हैं वही नदी है पर्वत सागर भी वही है फिर तुम कुलीन कैसे हो गए .....? 

दयावान हरिदे किया, मानस किया उदार । 
तापरत सत चरन चला  रह कुल कर आधार ॥ २९६९ ॥ 
भावार्थ : -- हृदय दया से  द्रवित किया  मनोमस्तिष्क उदार किया समुदाय, जाति, गोत्र व् कुल को धारण किये त्याग व् सत्य के पथ पर चला ॥
तुम्हारे पास माँ है ?  हाँ ! पिता है ? हाँ ! बहन भी है.....? हाँ है !.....ये बताओ ये साली कहाँ से आई ये तो किसी के पास नहीं है.....? .....ससुराल से कुलीनता से.....इसिलए रक्त सम्बन्ध नहीं होंने चाहिए, यदि होंगे तो उसमें माँ भी माँ नहीं रहेगी ॥ 

धर्माधर्म जान बिना,कृत्याकृत्य न देखि । 
बाकी जनिति अधिकाधिक भयौ धर्म निरपेखि ॥२९७० ॥ 
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है जो धर्म निरपेक्ष हैं उनमें  अधिकांश वह और उनकी संतति हैं जिन्होंने धर्म व् अधर्म के ज्ञान बिना किंकर्त्तव्यम् अकर्त्तव्यम् को नहीं जाना॥ 

कहा किया  हम आए के  कहा करेंगे जाए । 
इत के भए ना ऊत के चाले मूल गवाएँ ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- कहाँ से आए थे कहाँ जाएंगे इधर के रहे न उधर के रहे चले धर्म अधर्म का ज्ञान बिना अपने  मूल को गवां चले ॥ 






शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९५॥ -----


घर भीतर गौ साल रह खेत खेत सस साल। 
सुचिता सच्चरिता रहत रह सम्पन सब काल ॥ २९५१ ॥ 

भावार्थ : --   पूर्व कालीन भारत से यह प्रेरणा मिलती है कि यदि घर में गौधन रहे,  खेतों में उपज लहलहाती रहे, घर शुचिता, उत्तम आचार विचार, सदाचरण व्  सद्गुणों से युक्त रहे तो वर्तमान ही नहीं अपितु सभी काल सम्पन होते हैं ॥

अर्थाधारित प्रबनधन  धनमन के हुँत होए । 
काल करम को पालिबे और न पाले कोए ॥ २९५२ ॥ 
भावार्थ : --  भारत का अर्थगत शासन प्रबंधन पूंजीपतियों के लिए ही आरक्षित  है ।यह आरक्षण केवल कलुषता का पालन पोषण कर रहा है अन्य किसी का नहीं ॥


बलवंत को एकै बार  निर्बल बारहि बार ।
छुधा अगन कर समन किए सोइ होत दातार ॥२९५३॥
भवार्थ : -- ऋग्वेद के दशम मंडल के ग्यारहवें सूक्त से यह तथ्य प्राप्त होता है कि सृष्टि को संचालित करने वाली शक्तियों ने प्राणियों को  क्षुधा देकर लगभग उनका वध ही कर दिया । जो अन्न देकर इस ज्वाला को शांत करे वही वास्तविक दातार है यह दान बलवान को एक बार व्  निर्बल को बारम्बार देना चाहिए ॥

सूरबीर सत में  मिले बिदुर सहसई माहि । 
लाखन में बकता मिले, दाता मिलिअब नाहि ॥ २९५४॥ 

----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- शूरवीर सौ में एक, विद्वान सहस्त्र में एक, भीड़ को नियंत्रित करने वाला वक्ता भी एक लाख में एक सही पर मिल ही जाता है, सत्दाता दुर्लभ है वह करोड़ों में एक आध ही मिलते हैं अत: सतदाता बनना चाहिए ॥ 

दरिद रहे पीर न सहै, सो तो मले मलीन । 
पीर सहता धीर रहए सोई होत कुलीन ॥ २९५५॥ 
भावार्थ : -- जो दरिद्र होकर भी कष्ट न सहन कर सके वह मलिनता धारण करता है । जो कष्ट सहता हुवा स्थिरचित्त रहकर दरिद्रहीनता की प्रतीक्षा करे वह कुलीनता को प्राप्त होता है ॥ 

अधमी अधरमात्मना नीच हो कि नर भूप । 
माँगत भड़ भड़ बोलिया चोरि करे तो चूप ॥ २९५६ ॥ 
भावार्थ : -- जनसामान्य हों धनवंत हों  कि कोई शासक क्यों न हों  धूर्त चरित्र,  दुष्ट, निकृष्ट, अधर्मी मनुष्यों  का यह स्वभाव होता है कि जब मांगना हो तो भड़ भड़ बोलते हैं चोरी करते पकड़े जाए तो चुप्पी साध लेते हैं ॥

अधमी अधरमात्मना नीच हो कि नर भूप । 
धनिमन के सिर बरसिया दारिद सिर कर धूप ॥ २९५६ ॥ 
भावार्थ : -- जनसामान्य हों धनवंत हों  कि कोई शासक क्यों न हों  धूर्त चरित्र,  दुष्ट, निकृष्ट,  अधर्मी मनुष्यों  का यह स्वभाव होता है कि वह नीचे रहे तो  धनवानों को भलाबुरा कहते  है और ऊँचा होते ही उन्ही पर कृपा बरसाते है उन्हें यह दिखाई नहीं देता कि उनके नीचे भी एक दुनिया है ॥

दीन हीन को चाहिये  तामस रस परिहाए । 
सातिक रस गहाई के  राजस जोग लगाए ॥ २९५७ ॥ 
अर्थ  : -- दीन  हीन को चाहिए कि वह तामस वृत्ति का त्याग करते हुवे सात्विकता को वरण कर राजस रस की प्रतीक्षा करे ॥

भाव : -- नीचे को चाहिए कि वह ऊँचे व् धनवंत के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर कहे : --  मेरी पहुँच अन्न तक नहीं है तथापि निर्मिष हूँ तुम्हारी सभी रसों तक पहुँच है तुमने मांस खाया, भांति भांति के कुकर्म करते हुवे नीचता की तो नीच कौन है.....? 

सामरथी को चाहिये राजस रस परिहाए ।
सातिक रस अपनाए के तामस गुन दूराए ॥ २९५८॥

अर्थ : --  धन, पदादि में  समर्थ जन को अपना जीवन सरल व् सात्विक करते हुवे  असमर्थ के  अज्ञान, आलस्य  का  निवारण कर उसे तामस वृत्ति से मुक्त करने का प्रयास करे ॥


भाव : -- ऊँचे को चाहिए की वह विचार ऊँचे रखे जीवन सरल करे नीचे के लिए उदाहरण प्रस्तुत कर कहे  देखो मैं इतना ऊँचा होकर भी उपवास करता हूँ छोटे घर में रहता हूँ  सत्कार्य कर अपनी जीविका प्राप्त करता हूँ तो तुम क्यों नहीं ऐसा करते.....

समरथ हो असमर्थ हो असहाए कर सहाए । 
अनुकरनी पद गहन कर करता पद परिहाए ॥२९५९ ॥ 
भावार्थ : - समर्थ हो चाहे असमर्थ हो वह अपने नीचे के असहायों  की सहायता करते हुवे देश व् समाज में अनुकर्त्ता न बनकर अनुकरणीय बने ॥

धन्वन हो कि दीन हीनहो चाहे जन पाल । 
सील सुचित सुचालि रहे रह सम्पद सब काल ॥२९६० ॥ 
भावार्थ : - धनी हो कि दीन हीन हो चाहे कोई शासक ही क्यों न हो यदि वह शील वृद्ध  सन्मार्गी सत्चरित्र  कुलीन रहे तो सभी काल सम्पन होते हैं ॥








सोमवार, 21 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९४॥ -----

सागर तप कर घन  दियो घन जल मुकुता  दाए ।
धरनि  मानिक रतन दियो  हित करता कहलाए ॥ २९४१ ॥ 
भावार्थ : -- सागर तपस्या करते हुवे घन का दान किया घन जल स्वरूप  मुक्ता  का दान किया  धरती ने मणिरत्नों का दान किया और हितकर्ता कहलाए ॥

सोई अर्थ निर्थक है जो धर्मार्थ नाए । 
स्वारथ परत हुँत रहए अरु किछु काम न आए ॥ २९४२॥  
भावार्थ : --  वह अर्थ व्यर्थ है जो हित कार्यों में नियोजित न हो । जो केवल स्वार्थों की पूर्ति के लिए हो अन्य किसी के उपयोग में न आए ॥

माया भोग बिलासिता लक्ष्मी भूति ल्याए । 
यह मलीन करत बिहुरै यह कुलीन कर जाए ॥२९४३॥ 
भावार्थ : -- माया  भोग विलासिता लाती है लक्ष्मी वैभव लाती है   माया जब जाती है मलीन कर जाती है लक्ष्मी जब जाती है कुलीन कर जाती है ॥

संस्कार अरु संस्कृति लक्ष्मी के दो काज ।
बिकृति मति कुत्सित कृति कर माया करए ब्याज ॥ २९ ४४ ॥ 
भावार्थ : -- मनुष्य जाति को परमार्जित कर उसे सुसंस्कृत करना लक्ष्मी  के ये दो प्रमुख कार्य हैं । माया बुद्धि को विकृत करती है वक्र-बुद्धि पाप कर्मों के द्वारा छल व् कपट कर धूर्ततापूर्ण व्यवहार करती है ॥

धर्मोचित करम करत  सन मारग सों आए । 
लखमी नहीं माया है जब बिलास मैं जाए ॥ २९४५-क ॥ 

उपजित जीवनोपचयन बैभव के परिभास । 
संचित साधन सम्पदा भोगै भोग बिलास ॥ २९४५ -ख ॥ 

भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो  ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो  त्याग हो दान हो ) ऐसे  कर्म करते हुवे उत्तम  मार्ग से प्राप्त अर्थ का भी जब भोग विलास में उपयोग हो तो वह माया है ॥

भावार्थ : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन ही वैभव व् संचित साधन सम्पदा का उपभोग भोग विलासित की परिभाषा है ॥ 
वैभव : -- सृष्टि को संचालित करने हेतु आवश्यक शक्ति सामर्थ्य 
विलास : -- जीविका के साधनों का व्युत्पादित संकलन से प्राप्त सुख का  अधिकाधिक उपभोग भी विलासिता है 

धर्मोचित करम करत  सन मारग सों आए । 
सो अर्थ सार  गहै जो धर्म करम मैं जाए ॥२९४५ ॥ 
भावार्थ : -- जो धर्म की दृष्टि से उचित हो  ( जिस कर्म में दया हो सत्य हो  त्याग हो दान हो ) ऐसे  कर्म करते हुवे उत्तम  मार्ग से प्राप्त अर्थ भी तभी सार्थक होता है जब वह पुण्य के अर्जन में नियोजित हो ॥

बसंत रितु आयो लखि डारि दियो द्रुम पात । 
ताते नव पल्लब भया दिया दूर नहि जात ॥ 
----- ॥ रास बिहारी ॥ -----
बसंत ऋतू को आता देख वृक्ष अपने पत्र त्याग देते हैं । इस क्रिया से उन्हें  नव पल्लव प्राप्त होते हैं ।
" दिया कहीं नहीं जाता वह पुनश्च प्राप्त हो जाता है ॥ "

सुचित  सुचालि सील बिरध सद गुण धरम अधीन । 
निसदिन दान धरम करए सोई होत  कुलीन ॥२९४६ ॥ 
भावार्थ : -- शुचिता, उत्तम आचार विचार, सदाचरण व्  सद्गुणों से युक्त कुल उत्तम नियमो के अधीन होकर नित्य प्रति दान कर पुण्य अर्जित करता है वह उत्तम कुल कहलाता है ॥


सच्चरिता सत्संकलपि कल  दंपति के अंस । 
तासो जनित जनिमन कर होत रचित एक बंस ॥ २९४७ ॥ 
कुल कैसे बनता है : -- रक्त संबंधों से अन्यथा उत्तम आचार व् विचार से युक्त एक सूत्र में आबद्ध चरित्रवान दम्पति की संतति कुल का निर्माण करती हैं ।।

अकृत कृत अभच्छ भच्छत जो जिउ जिउती जोए । 
वाका जीवन जग माहि प्रसंसनीअ न होए ॥ २९४८ ॥ 
भावार्थ : -- अभक्ष्य का भक्षण कर निषिद्ध कार्य  करते हुवे जीविका धारण करने वाले मनुष्य का  जीवन संसार में प्रशंसनीय नहीं होता,  ऐसे जीवन से वह  क्षुद्र प्रकृति को प्राप्त होता है ॥

दान धरम के सँग  होत अधम मनस के नास । 
जहाँ सुचिता बसी तहाँ लख्मी करे निवास ॥ २९४९॥ 
भावार्थ : -- वेदों में कहा गया है कि दान धर्म व् सत्कर्म से  क्षुद्र मानसिकता  का नाश होता है । जहाँ पवित्रता वास करती है लक्ष्मी का वहीँ निवास होता है ॥

" जब तक सिर पर  माया नाचती है तब तक क्षुद्रता का आभास नहीं होता.....॥"

जीउ जीउ जी जीवते ऐसी जीवति जाकि । 
जीवनारथ सार गहत, सुफल जीवनी वाकि ॥ २९५० ॥ 
----- ॥ दान की महिमा से साभार ॥ -----
भावार्थ : -- जिसकी आजीविका पाषाणों में भी प्राण प्रतिष्ठित कर  प्राणियों को जीवन शक्ति प्रदान करे उसका जीवन सार्थक होकर सफल हो जाता है ॥


रविवार, 20 सितंबर 2015

----- ॥ दोहा-दशम २९३॥ -----

कदाचार एहि  देश में भयउ छूत  के रोग । 
जब महमारी रूप लिए रोगी भए सब लोग ॥२९३१ ॥ 
भावार्थ  : -- अब व्यभिचार भ्रष्टाचार जैसे कदाचरण ने इस देश में संक्रामक रोग का रूप ले लिया । जब  महामारी मची तब सभी वसति वासी इस रोग से ग्रस्त हो गए ॥ 

धौल गिरि सम देस जब होत  भूत बसबास । 
आनइ बसती सुख बसे  सम्पद आन निबास ॥२९३२ ॥ 
भावार्थ : --  हिमालय पर्वत जैसा कुलीन देश जब मलिन बस्ती में परणित  हो जाता है तब उसका सुख किसी अन्य  बसती में जा बसता है  व् सम्पद  अन्यत्र  निवासित हो जाती है ॥  

हिंसारत अकरम सील, जो को बिषय बिलासि । 
अस मलीमस मानस जन  बन चहँ तहँ के बासि  ॥ २९३३ ॥ 
भावार्थ : - जो हिंसा में आनद मनाते हैं जो आलस्य से भरपूर हैं जो "  पीओ-खाओ और आनंद करो"  के सिद्धांत में जिसकी रूचि होती, ऐसा पापी जनमानस  उस मलिन भवन में निवास हेतु उत्सुक रहता  ॥

काया काली काग सी, कूकर का सा सोर । 
एक देस जहाँ देखिया साहुकार से चोर ॥ २९३४ ॥ 
भावार्थ : -- काया तो काले कौंवे सी है भूंकनी बोली है  । ये  देश ऐसा बन गया कि  जहाँ चोर भी साहूकार जैसे दिखाई देते ॥
उत्तर : -- टी बी 

पप्पा सो परिचै नहीं, दद्दा रहिगा दूर । 
लल्ला लौ  लागी रहे, नन्ना सदा हजूर ।। 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- उस भवन में एक पापी ऐसा था जिसका पापा का परिचय नहीं, काहे  की दद्दा दूर रह गया न । फिर ? फिर क्या नाना नाना कहते लल्ला काले कुकरम में लगा रहता  इस प्रकार उसका जीवन असफल होता गया  ।। ईब  बता कौन  ?

एक शोक सूचना : --

नेम निर्बंध नहि रहे निर्मम भए निर्बाध । 
अपने घर की जोग रह, मुकुत फिरै अपराध ।। २९३५॥ 
भावार्थ : --  नियम व् निर्बन्धन नहीं रहे छोटे  छोटे अपाहिज बच्चों को अनाथ करने वाले निर्मम  निर्दयी आतताई निरंकुश हो गए हैं, अपराध मुक्त विचरण कर रहा है अत: जन-साधारण अपने घर की सुरक्षा स्वयं करे, सुचना समाप्त हुई धन्यवाद !  ॥ 

 अंधेरी नगरी भई चौपट देस द्वार । 
जो चहे सो आन बसे कोइ नहीं रखबार ॥२९३६॥  
भावार्थ : -- जब  नगरों में नियम व् नीति का अभाव होता है तब देश का द्वार रक्षकों से विहीन होकर चौपट हो जाता है फिर अपना आधार ढूंढते हुवे पराए देश के लोग ऐसे चौपट देश में आ बसते हैं  ।। 

अंधेरी सब नगर किए  जोको चौपट देस । 
होत तहँ  प्रतिबेसिहु  के नित निर्बाध प्रबेस ॥२९३७॥  
भावार्थ : -- नियम व् नीतियों का अभाव किए जो कोई देश चौपट हो जाता है, प्रतिवेशियों का भी वहां नित्य निर्बाध प्रवेश होता रहता है ॥ 

भयकारी निर्भय  होत प्रबिषि तहाँ अगाध । 
तेहि  माझ सौभाग बस गहे कोउ एक आध ॥२९३८॥ 
भावार्थ : -- सीमाओं के निरंतर अतिक्रमण से वहां भयकारियों अत्यधिक संख्या में  निर्भीक होकर प्रवेश करते हैं सौभाग्य से  उनमें  कोई एक आध ही धरा जाता है ॥ 

आतताई गहि गयो लोग बजावै थाल । 
सासन घारै पालना पले पलक जूँ लाल ॥ २९३९ ॥  
भावार्थ : -- धरा गया भई धरा गया आतंकवादी धरा गया लोग थाली बजाते हैं मानो आतंकवादी धरा न गया हो जनम लिया हो  । सत्ताधारियों के  सोने के  पालने में वह ऐसे पलता है.....जैसे पलकों में किसी का लाल पलता हो ॥ जितना धन उसके पलने में व्यय होता है उतने में तो एक गांव पल जाता है ॥  

एक कहा मैं दासा हूँ  दूज कहा मैं नीच । 
दोउ सभा जब मेल किए  रहँ  तहँ कीचहि कीच ॥ २९४०॥ 
भावार्थ : -- एक ने कहा मैं दास हूँ दूसरे ने कहा मैं नीच हूँ । ये दोनों किसी सभा में मिल जावे वहां कीचड़ होना ही है जहाँ कीचड़ होगा वहां मच्छर होंगे ॥ 










शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७७ -----

" बेट्टी बचाओ- बेटी बडाओ" बडा ले.....!!!"

राजू का दूसरा मास्टर : -- ( धीरे से ) इस बुढ़ापे में.. ?

" दूसरी ले आ"

राजू का दूसरा मास्टर : -- जो लफ़ूट बढ़  गयो तो..?

"  नारे आले के पास छोड आइये "

राजू का दूसरा मास्टर : -- लफ़ूट न

" नं न दूसरी न, ओर कहिये तए बडा ले म्हारे कण तो बढ़ती कोना "
लुगाया की बी के दुर्दसा होरी सै 

रविवार, 13 सितंबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७६ -----

राजू : -- मास्टर जी ! अब धरना प्रदर्शन में अनशन कब होगा ?

" तेरे को अनशन से क्या लेना ? "

राजू : -- मास्टर जी ! वहां मीठे मीठे फल खाने को और उनका मीठा रस पीने को मिलेगा न.....

" चुब्बे भिखारी ! इतने महंगे पदार्थ तेरे को कौन देगा..... और इस फोटो की दूकान को बंद कर.....

----- ॥ दोहा-दशम२९१-२९२॥ -----


कंद मूल फल खाए के भए जो धरना धारि । 
सत्ता सूत हथियाए तो भए कस माँसाहारि ।२९११ । 

भावार्थ : -- पाठशाला में हमें पढ़ाया गया था कि फल-फूल खा खा के महात्मा लोग धरना धारी बने थे तब यह देश स्वतन्त्र हुवा था । सत्ता हाथ में आते ही वे ही क्रांतिकारी मांस आहार कर हिंसा वादी कैसे बन गए ? 

एक अहिंसा एक अनसन बरे चरन जन दोइ । 
स्वाधीन होत ए  देस हिंसक कैसे होइ ॥ २९१२॥ 

भावार्थ : -- भारत के जनमानस ने एक अहिंसा और एक अनशन इन दो आचरणों को वरन कर अहिंसक आंदोलन से देश को स्वत्रन्त्र किया था  । स्वाधीन होते ही यह हिंसा वादी कैसे हो गया ॥ 

कोइ भारत मातु कह पयसि पयस करि ओक । 
ऐंचतान को रकत गहँ जोइ लगे थन जोँक ॥२९१३ ॥ 

भावार्थ : -- कोई भारत को माता माता कहकर ओंक कर उसका अमृत ही ग्रहण करता रहा । थन से चिपके जोंक के जैसे कोई  उसे कष्ट दे देकर उसका रक्त पीता रहा कौन है ये ? 


 भजे नहि जो  राम नाम पूजे नाही गंग । 
बरियाए जो दास करे तेहि लगावैं अंग ॥ २९१ ४ ॥ 

भावार्थ : -- यह देश राम का देश है, गंगा जी से जगत में प्रसिद्ध है जो इस देश में रहते हैं इस देश का खाते हैं राम नाम में उनकी श्राद्ध नहीं है गंगा जी का जो आदर नहीं करते ।  जिन्होंने बलपूर्वक इस देश  को दास बनाया क्या वह अंगीकार करने योग्य हैं ? 


परदेसी समुदाय जब रह रहँ अपने संग । 
बहुरि कवन कर होइया एही देस प्रलवंग ॥ २९१५॥ 
भावार्थ : -- जब अन्य देशों के धर्मगत समुदायों को साथ ही रहना था । फिर यह  देश विभाजित क्यों हुवा ?

खाल खाए एहि  देस के पूज पराई पौर ।
अजहुँ सोइ पापी भए सासन  के सिरमौर ॥२९१६ ॥ 
भावार्थ : --  जिनके राज में भारतीयों की दशा अत्यंत दयनीय थी जो खाल तो इस देश की खाते हैं  और परायों देश की पौड़ीयों को पूजते हैं वही पापी अब शासकों के सिरमौर हो गए ॥

जोइ भगता राम भजे ताते बैर बिरोध ।
अवध पूरी कह आपनी, अवराधन अवरोध ॥ २९१७ ॥ 
भावार्थ : -- जो कोई भक्त राम का नाम भजता है उसे ये दंगाबाज कहते हैं विप्लववादी कहते है । और अवधपुरी को अपना कहकर ये भारतियों की सेवा पूजा में विध्न करते हैं ॥ रामा- सेतु को ये आदम सेतु कहते हैं कश्मीर भी इनका  है अवध भी इनका है फिर भारतीयों का क्या है.....?

सासन  हर बिलास चहे आधीन नव अभिलास । 
गोसाईं पद खोए के होत परायो दास ॥ २९१८ ॥ 
भावार्थ : -- जब शासक भोग विलास में मग्न रहता है  और शासनाधीन जन मानस नित नव अभिलाषा करता है । तब  स्वामी पद गँवा कर वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दास हो जाते हैं  ॥

सासन हर विलास चहे अधीन रहे उदास । 
गोसाईं पद खोए के होत परायो दास ॥ २९१९ ॥ 
भावार्थ : -- जब शासक भोग विलास में मग्न रहता है  और शासनाधीन जन मानस उदासीन रहता हो । तब स्वामी पद गँवा कर वे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से दास हो जाते हैं ॥

गोसाईं पद खोइ के होए परायो दास  । 
सुख तब आन बसति बसे सम्पद आन निवास ॥ २९२० - क॥ 
भावार्थ : -- स्वामी पद  की हानि कर जन मानस जब  दास हो जाता है । तब सुख अन्यान्य  वसति का वासी हो जाता है,  सम्पदा अन्यान्य वास में निवासित हो जाती है  ॥

दासा होवै साइयाँ गोसाईं कर दास । 
सुख तब आन बसति बसे सम्पद आन निवास ॥ २९२०-ख ॥ 
भावार्थ : - जब दास स्वामी  और स्वामी दास बन जाते हैं तब सुख अन्यान्य  वसति का वासी हो जाता हैं ,  सम्पदा अन्यान्य वास में निवासित हो जाती हैं ॥

जीव हनए  हिंसा करै मार मुँही मुह खाए । ( संत कबीर दास ) 
धरम सभा सो अधर्मी बैठे करे न्याय ॥२९ २० ॥
भावार्थ : -- फिर तो जो जीवों की हत्या करते हैं जिन्हें हिंसा करने में आनंद मनाने वाले धर्माधिकरणक धार्मिक कृत्यों का निरिक्षण कर धर्म-अधर्म का निर्णय करते ॥

समरथ को सब सहारथ सहजिअ होत सहाइ ।
जो जग कातर दीनतर, तिनकी कहाँ सुनाइ ॥ २९२१ ॥
भावार्थ : -- समर्थ  की सभी सहायता करते हुवे उसके स्वभावगत मित्र हो जाते हैं । संसार में जो कातर होता है जो दीन की सुनवाई कहीं नहीं होती ॥

दूषन सन जन जन त्रसै दंड भयो उपहास । 
बासी पुर  भीतर बसै कार न कारावास ॥२९२२॥ 
भावार्थ : -- दूषण से सभी त्रस्त रहते हैं दंड उपहास बन कर रह जाता है वासी घरों में वस्तियों में नगरों में वासित मिलते हैं कारावास व्यर्थ हो जाते ॥

बांधनिहारा भाँवरे सारे बंधन तोड़ । 
सर ऊपर आरा सहे दीन रहै हथ जोड़ ॥ २९ २३ ॥ 
भावार्थ : --  नियम नियोगी ही नियम तोड़ते फिरते ।  दरिद्र अपने सिर पर आरे के दंश सहन करते कर जोड़े खड़े रहते और शासन व्यवस्था व्यर्थ हो जाती.....
भयऊ कठिन कराल
स्वामी बनने के  लिए क्या करना चाहिए : --               

समस्याए इस देस की हुई असमाधेय । 
अपने मत का मान कर कूद कूद मत देय ॥ २९२४ ॥ 
भावार्थ : -- ( समझाने वाले ने समझाया  )शासकों के पास देश की समाधेय समस्याओं  का  कोई समाधान नहीं है । हे जन मानस !  अपने मत का सम्मान कर इसे जिस किसी को भी मत दे । इस चुनाव प्रणाली में कोई भी ऐरा गैरा शासक बन जा रहा है  ॥


जान मोल मत आपना दाता देय न देय । 
सासन हर के लेख मैं लिखे लेय ही लेय ॥२९२५ ॥ 
भावार्थ : -- अपने मत का मूल्य जानकर दाता मत देता न देता । किन्तु सत्ताधारियों  के लेखों में  लिया लिया और लिया ही लिखा जाता ॥

समस्याए इस देस की हुई असमाधेइ  । 
भाग धेय धन आपना जेहि केहि कर देइ  ॥ २९२५॥ 
भावार्थ : -- इस  देश की समाधेय समस्याएँ सत्ताधारियों से असमाधेय हो चली थी दाता  अपना देय कर जिस किसी को भी दे देते ॥ 

भागधान निधेयक पद गह जब लोग पराए । 
दानवान को चाहिए वाके कर नहि दाए ॥ २९२६ ॥ 
भावार्थ : -- ( समझाने वाले पुनश्च समझाते ) जब भाग धान निधेयक का पद कोई  अभारतीय ग्रहण कर ले तब दाता को चाहिए कि वह अपना देय  कर उसे न देवे,  इस देश को दास बनाने वालों को तो कदापि नहीं देना चाहिए ॥

सासन  के प्रबंध भवन धरे धंध आधार । 
समास के दरार पड़े  चौपट करे द्वार ॥२९२७ ॥ 
भावार्थ : --  भारत की शासन व्यवस्था का भवन ठगविद्या  पर आधारित कर  भवन के द्वार को चौपट कर दिया गया  वहां कोई भी प्रवेश कर सकता था  ऐसे भवन में समस्याओं की दरारे तो पड़नी ही थी ॥


 कूट कपट कर कील पर, छल छाया की छाँत । 
 धूत कृत के भीत करे, निस दिन होत निपात ॥ २९२६ ॥ 
भावार्थ : -- मिथ्या वादिता के स्तम्भ और  असद आचरण  की भीतिका पर छल कपट की छत गोले के रूप में जब तब जन मानस के सिर पर गिरती ॥

काल कवलित होत जान केतक लोग सिधाए । 
घात खाए केत न केत गने त  गन नहि पाए ॥ २९२७ ॥ 
भावार्थ : -- गिरती हुई छत रूपी आतंकी गोलों से काल का ग्रास बनकर कितने ही लोग चल बसे । कितने धायल हुवे चूँकि यह अनगिनत थे अत: इनकी गणना ही नहीं हुई ॥

हम जाने थे खाएँगे जीम जीम बहु माल ।
ज्यों का त्यों ही रही गया पकड़ि लिए गया काल ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----

भोग बिलासा में भया अधमी घर संसार । 
मरा मिला जहँ मानसा, खाने को तैयार ॥ २९२८ ॥ 
भावार्थ : -- उस शासन प्रबंधन रूपी भवन का परिवार भोग विलास में तामसी प्रवृति का हो गया अब उसे मनुष्य भी कहीं मरा मिलता तो वह उसे भी खाने को तैयार रहता ॥

जीव हिंसा करि भए जब अधमी सब संसार ।
धरम संग को छाँड़ के करिये धर्म प्रसार ॥२९२९ ॥
भावार्थ : -- जीवों की हिंसा कर संसार में जब अधर्मी ही अधर्मी  हो जाए तब पाखण्ड के प्रचार का त्यागकर धर्म का प्रसार करना चाहिए । कैसे ? ऐसे प्राणी मात्र पर  दया करें ये धर्म है सदा सत्य बोलें ये धर्म है  त्याग करें ये धर्म है त्याग करें किसका ?  सुख का । दान करें किसका ? पुण्य का पाप के दान से पाप बढ़ता है ।

भ्रष्टचरण के संग मैं बाढ़े  अति आचार ।
शासन के प्रबंध भवन भयऊ भूतागार ॥२९३०- क ॥
भावार्थ : -- चूँकि इस भवन की नीव ही पाखंडवाद ( बगुला वाद )पर आधारित थी अत:  सुख को भोगने के लिए धन की आवश्यकता होती जो पाखंड वाद में भ्रष्ट रीति  से सरलता पूर्वक प्राप्त हो जाता । परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार के संग अत्याचार बढ़ने लगा ऐसी बढ़ोतरी ने शासन के इस प्रबंध भवन को मलिन भवन व्  देश को मलिन बस्ती में परिणित कर दिया ।

मलिन भवन की मैलाइ केहि  बिधि कहि  न जाइ । 
अति अचारी रूप  में माखी मसक जनाए  ॥।२९३०-ख ॥ 
भावार्थ : -- इस मलिन भवन की मलिनता वर्णनातीत है । अब इसमें अत्याचारी का रूप लिए मख्खी मच्छर उपजने लगे ॥ 





शनिवार, 12 सितंबर 2015

-----॥ पृच्छा-परीक्षा ४ ॥ -----

>> बिलकुल सही..... यदि वास्तव में ये मूलत: भारत के हैं और यदि बांग्ला देश भारत का मित्र देश है तो इनके बसने के लिए उससे भूमि की भी मांग करनी चाहिए.....वैसे ६९ वर्ष हो गए संविधान लागू हुवे अबतक देशवासियों यह ज्ञात नहीं है कौन इस देश का मित्र देश है कौन शत्रु और कौन तटस्थ..... क्या करते रहते हैं इस देश के विदेश मंत्री क्या संसद मख्खियां मारने के लिए है.....?   

>> कौन सा धर्मगत समुदाय सबसे अधिक प्रत्यक्ष कर देता है, कौन सा जातिगत समाज सबसे अधिक प्रत्यक्ष कर देता है....?

>> मुसलमानों के राज में भारतीयों की दयनीय अवस्था को क्यों छिपाया गया.... ? 

>> जब अन्य देशों के धर्मगत समुदायों को साथ ही रहना था । फिर यह  देश विभाजित क्यों हुवा ?

 राजू : -- देश  था कपड़ा नहीं था जो काट के बाँट दिया..... , यह और कितना बँटेगा ? निर्वस्त्र ही करोगे क्या.....? 

सोमवार, 7 सितंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम २९० ॥ -----

गयउ बरसकर बरस बिनु बीते पावस काल । 
देस माहि अकाल परे सेन करे हटताल ॥ २९०१ ॥ 

भावार्थ : -- बादल बिन बरसे ही चले गए पावस काल व्यतीत हो चला ,  देश में अकाल पड़ गया तब  सेना हड़ताल कर रही थी ॥ कैसी सेना है ये.....? 

एक संग एकहि कलहने गने सैन कर कोष । 

सीवाँ पार करि करि घर भीतर बसे पड़ोस ॥२९०२ ॥ 
भावार्थ : -- हस्त सिद्धि को गिनकर कर ये सेना आपस में ही लड़ती रही । वहां पड़ोसी निरंतर सीमा पार करते कश्मीर में बसते भारत के  वाशिंदे हो गए । अब वे हमारे अधिकार को अपना किए हैं । 

कितने सुरक्षित है हम.....? 

 पराए केरे आपने रहे नहीं किछु भेद । 
देस धरम बिनसाए के करे मूर परिछेद ॥ २९०३ ॥ 
भावार्थ : -- अपने पराए में कुछ भेद न कर भारत एक अराष्ट्रवादी देश बनता जा रहा है ।यह अभेद नीति देश के आचार -विचार को ही नष्ट कर अब भारत व् भारत वंशियों की जड़ों को काटने पर तूली है ॥ 

दरस रहे परदेसिआ  बसे बसति सब कूल । 
कहाँ भारत कहँ भारती कहँ भारत के मूल ॥ २९०४॥  
भावार्थ : -- देश के सीमांत प्रदेशों में जहाँ तक देखो  परदेश के लोग ही बसे दिखाई देते हैं । भारत की सीमाएं कहाँ हैं भारतीय कहाँ है भारत का वह मूल निवासी कहाँ निवासरत है ॥ कश्मीर तो मुसलमानों का ही हो गया है सत्ता धारी भारतीयों को केवल शब्दों से बहला रहे हैं की ये तुम्हारा है ॥ 

ऐसो सासक सिर धरे देस धर्म गए भूल । 
लगे उपार्जन आपनी पोस पराई मूल ॥ २९०५ ॥ 
भावार्थ : -- भारतीय ऐसे शासकों को सिरौधार करते आ रहे हैं जो देश का परिवेश छिन्न -भिन्न कर उसकी जड़ों को उखाड़ रहें  हैं और अन्यान्य की जड़ें यहाँ सुदृढ़ कर रहे हैं  ।

परदेसज  समुदाय के  जहँ निर्बाध प्रबेस । 
एक दिन अवसी होइहीं खंड खंड सो देस ॥२९०६ ॥ 
भावार्थ : -- सावधान !!!यह भारत का अनुभव कहता है कि जिस देश में परदेसी समुदाय का निर्बाध प्रवेश हो रहा है । एक समय वह निश्चित ही खंड खंड होकर अवशेष मात्र रह जाएगा  ।। 

संविधान कहे ए देसज  धरम भरोसे नाए । 
जब कहे तब केत रहे अजहुँ केत गनि पाए ॥ २९०७॥ 
भावार्थ : -- जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है विश्व की कुल जनसँख्या में वे लगभग १५ % हैं । भारत के संविधान में जब यह कहा  गया कि यहाँ के निवासी धर्म के भरोसे नहीं हैं, उन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है । यह धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है जिन्हें धर्म की अपेक्षा नहीं है  जब यह कहा गया तब ऐसे अधर्मी कितने थे अब कितने हैं ? 

 दया सोहि हरिदै भरे करे धरम का दान । 
साँच मन तन आँच धरे ते जन धर्मी जान ॥ २९०८ ॥ 
भावार्थ : -- दया भरे ह्रदय के साथ जो अपने पुण्यों का दान करता हो जो सत्य का आचरण करता हो  जिसका विग्रह त्याग रूपी अगन से तपायमान हो वह मनुष्य धर्मी है  ॥ ये धरनिरपेक्ष कौन है कैसे हैं ? 

खादक खादन छांड के अखादन जोइ खात । 
सोइ अधमतस समुदाय  सोइ अधमतस जात ॥२९०९-क॥ 
भावार्थ : -- खाने योग्य खाद्यान को त्याग कर जो अखाद्य को खाए ऐसे समुदाय ऐसे समाज  निम्न पद को प्राप्त होते हैं ॥ 
करतब काज न कार के  करें अकरतब काज । 
पैहैं पाँवर पतित पद गह सो धर्म समाज ॥२९०९-ख ॥ 
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य न कर न करने योग्य कार्य करे ऐसे समुदाय ऐसे समाज पतित होकर निम्न पद को प्राप्त होते हैं ॥ 

कागा मोती चुगी कै खाए चाहे न खाए । 
हंस बांस को चाहिये घुन के कन बिसराए ॥ २९१०॥ 
भावार्थ : -- कौंवा मांस छोड़े न छोड़े कौवा मोती चुग कर खाए न खाए हंस के वंशजों को तो घुन के कणों का त्याग कर देना चाहिए ॥ 

रविवार, 6 सितंबर 2015

--- ॥ दोहा-दशम २८९॥ -----


ऊंची पीठी पैठ पुनि लिखा भाग में खाट । 
कर चरन  मुख सीउँ नयन लखे मरन की बाट ॥ २८९१  ॥ 

भावार्थ : -- भला मृत्यु की भी कोई प्रतीक्षा करता है, इतने ऊंचे पद को प्राप्त होकर भी जिसने  अपने भाग्य में खटिया लिखी वह पापी अब कर चरण और मुख में पक्ष का आघात खाकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है ॥ 

राजा की बिरदाबली सेबक की कुसलाइ । 
ऐसी हेली जग हेतु, होत सदा सुखदाइ ॥ २८९२॥ 

भावार्थ : -- राजा की कीर्ति कथा और सेवक की कुशलता का सम्मिलन जगत हेतु सदा सुखदायक होता है ॥ 

राजा जब सेबा करे सबक राजे राज । 
ऐसी चलनि हो निकले सब कहुँ छाए ब्याज ॥ २८९३॥ 

भावार्थ : -- स्वामी तो सेवा करे और सेवक राज करे ऐसे चलन से जगत में छल कपट दुष्टता, धूर्तता व्याप्त हो जाती है ॥ 

 गेही भए बिन गृहस्थी बिरागी बिनु बिराग । 
दाने बिन दातार भए त्यागी बिनु त्याग ॥ २८९४ ॥ 

भावार्थ : -- फिर तो बिना एक्टिंग के एक्टर जैसे बिना गृहस्थी के गृहस्थ, बिना वैराग्य करे वैरागी, बिना दान करे दातार और बिना  त्याग करे त्यागी हो जाते हैं ॥ अर्थात  योग्यता महत्वहीन हो जाती है.....


"आरक्षण चिकित्सक अवश्य बना देता है किन्तु  चिकित्सा करना तो योग्यता  ही सिखाती है....."  

जिउ साधन सहजहि मिले जन जन होत निकाज । 
करिषि करषक हीन होत दसिन दसिन घटत अनाज ॥ २८९५॥ 

भावार्थ : -- जीव-साधन  सहज सुलभ हों तो जन मानस अकर्मण्य हो जाता है । कृषि कृषक विहीन हो जाती है और अनाज का उत्पादन निरंतर घटता जाता है ॥ उसपर पड़ा अकाल दुकाल के सदृश्य होता है.....

दास भरोस बिश्राम तो  दरिद काल का  पाल । 
राम भरोसे काम किए रहँ सम्पद सब काल ॥ २८९६ ॥ 

भावार्थ : -- सेवक के भरोसे स्वामी का विश्राम विपन्न काल का पालक है । स्वामी विश्रामी हो तो सेवक को सूट में और उसे  कच्छे में आते देर नहीं लगती । जो स्वामी ईश्वर पर भरोसा कर अपना कार्य स्वयं करें उसके सभी काल सम्पन्न होते हैं.....

साई ऐसो होइबे जैसो राजा राम । 
छाँड़ चले रस राजसी करे जगत के काम ॥ २८९७ ॥ 
भावार्थ : - स्वामी को राजा राम के जैसे होना चाहिए । जन्होंने राजपाट क त्याग कर सात्विक रूप में सत्कार्य करते हुवे जगत का कल्याण किया ॥ 

दासा ऐसो चाहिबे पहिरै एके लँगोट । 
उदकत नदपत डहकि गए जारि दियो परकोट ॥ २८९८ ॥ 
भावार्थ : -- दस को हनुमं लला के जैसे होना चाहिए जिन्होंने केवल एक ही लंगोट पहने  उदकते हुवे समुद्र को लाँघ गए और लंका सहित रावण के परकोट का दहन कर दिया ।। 

यहाँ  तो एक हस्ताक्षर  करने के लिए भी बैमान चाहिए.....
 कितना राजस्व व्यय होता है इस शासन पर ? और कितना होना चाहिए..... ? 

दासा ऐसो चाहिबे कारज में कुसलाए । 
अर्थ बिन सेतु बाँधि के, निज पत पार लगाए ॥ २८९९ ॥ 

भावार्थ : -- दास को ऐसा होना चाहिए जो अपना कार्य करने में कुशल हो योग्य हो । जो बिना धन के समुद्र में सेतु बांध दे और अपने स्वामी को दूसरे देश पहुंचा दे । 

यहाँ तो सीमा का उल्ल्ंघन  करने वाले घुसपैठियों के लिए भी परमाणु गोले चाहिए, जो एक हुंकार से भाग जाएं । एक गृहस्थ को चौकीदारी  में कितना धन व्यय करना चाहिए..... 
राजू : -- अरहर की टट्टी और गुजराती ताला = छोटी वस्तु की रक्षा के लिए अधिक व्यय करना,


दासा ऐसो चाहिबे जाके मन संतोष । 
मुकता दए गोसाइँया, मु लेइ पेटे पोष ॥ २९०० ॥

भावार्थ : --दास के मन संतोष हो । स्वामी मुक्ता भी दे तो केवल मु ले और कुता पर आसक्त न होकर अल्पतर में अपना पालन पोषण करे ॥

तभी देश का वर्तमान समृद्ध व् भविष्य संपन्न होगा..... 

शनिवार, 5 सितंबर 2015

----- मिनिस्टर राजू १७५ -----

राजू : -- मास्टर जी! ये कच्छे में रहने वाले पहनते क्या हैं ?

" कुछ नहीं"

राजू : --  मास्टर जी ! कुछ नहीं ?

" ये मुई दस लखटकिया सूट कुछ पहनने दे तब ना..... "  

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...