चाहे केतक नीच रहँ चाहे केतक ऊँच ।
दयामई डीठी रखेँ वाकी ऊँच पहूँच ॥ २८७१ ॥
भावार्थ : -- नीची हो चाहे ऊंंची हो जिसकी दृष्टि में प्राणी मात्र के लिए दया हो वही शाखा परम पद की अधिकारी होती है ॥
ते खादन को ताजिये जो को जीवन लेइ ।
पीर परे तन आपना औरन पीरा देइ ॥ २८७२ ॥
भावार्थ : - उन खाद्य पदार्थों व् आच्छादनों का सर्वथा त्याग करना चाहिए जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी को जीवन से हीन करते हो जो अपने शरीर के सह अन्य जन-जीवों को कष्ट देकर प्राप्त होते हों ।
ऐसे त्याग से परम पद की योग्यता प्राप्त होती है ॥
पेड़ काटना भी अब अधर्म की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है .....
जाकी बोली बँध नहीं साँच नहि मन माहि ।
ताके संग न चालिये छाँड़े पैड़ा जाहि ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ ----
भावार्थ : -- जिसके वचनों में नियम-विबंधन न हो मनोभावों में सत्य का पुट न हो । उसके संग नहीं होंना चाहिए उसका समर्थन नहीं करना चाहिए कारन की ऐसे लोग अपने वचनों से जाने कब फिर जाएं ॥
झूठ बचन कवलित काल साँच बचन जग कंत ।
झूठा नीरा निर्गुना साँचा तन गुनवंत ॥ २८७३ ॥
भावार्थ : -- असत्य वचनों से हम काल को व् सत्य वचनों से ईश्वर को प्राप्त होते हैं । असत्य वचनों से यह शरीर गुणहीन व् सत्य वचनों से गुणवंत होता है ॥
सत्य वचन गुणों की प्राप्ति हेतु एक आवश्यक धर्म है । धनी तो कोई भी बन जाता है, गुणी बनना कठिन है.....
गुणों की प्राप्ति के लिए धर्म परम आवश्यक है.....
जो जग साँचा बानिया साँचहि वाकी बान ।
जिन जिन भाजन जानिया देइ लाह कर दान ।२८७४ ।
भावार्थ : -धधा तो चोर डाकू भी कर लेते हैं साँचे व्यापारी का व्यापार भी साँचा ही होना चाहिए । उसका धर्म है कि वह प्राप्त लाभ सत्पात्र को दान करता रहे तभी वह गुणवंत होता है ॥
जो तू साँचा ब्रम्हना,साँचे दे उपदेस ।
प्रगसत साँची आपनी, रहियो तापस वेस ।२८७५ ।
भावार्थ :--मृषावादी के मुख से सत्य शोभा नहीं देता जैसे : -- मैं कुछ न छोड़ूँ किन्तु तुम ये छोड़ो तुम वो छोड़ो ।सत्यवादी को ही सत्य का उपदेश देना चाहिए त्याग व् तपस्या का अनुशरण करते हुवे स्वयं का सत्य प्रकट करते रहना चाहिए ॥
मैं मै की प्रतिमूरति घट घट भीतर होइ ।
तू अरु तुम का तोमना हेर रहे सब कोइ ॥ २८७६ ॥
भावार्थ : -- मैं मैं की प्रतिमा घट घट में प्राप्त होने लगी । तू और तुम का वो प्रथम सुर अब ढूंढने से भी नहीं मिलता । मैं तो सब हैं ये तू कहाँ है ?
साँचा कंचन साँच है झूठा काँचा काँच ।
ए मोले ते मिले नहि ए मिले टका के पाँच ।२८७७ ।
भावार्थ : -- सत्यवादी खरा सोना होता है जो मोल देने पर भी नहीं मिलता । झूठा कच्चा कांच होता जो टके में पांच मिलता ॥
दया हरिदय नहीं रही देय रहेउ न दान ।
तपस अनुशरण में नहीं झूठे झूठ बखान ॥ २८७८॥
भावार्थ : -- जब हृदयों में दया नहीं रही दान देय नहीं रहा लेय हो गया । तप अनुशरण में नहीं रहा सत्य आचरण में नहीं रहा यह केवल भाषण में ही परिसिमित हो गया ॥
बिसरत बीती आपनी बिसरे बीता काल ।
सोर रहै न अधुनै के, कल की नहीं सँभाल ॥ २८७९ ।।
भावार्थ : -- पूर्व घटित घटनाओं के विस्मृत होने से अतीत विस्मृत होने लगता है। विस्मृत होते अतीत से वर्तमान का चिंतन नहीं होता, जब वर्तमान का चिंतन नहीं होता तब भविष्य की सहेज नहीं होती ॥
और इतिहास अपने आप को दोहराने लगता है.....
सोए रहे सिर दिन चढ़े जाग जाग कर भोर ।
बीते को सुमिरत करौ सबहि काल कर सोर ॥ २८८०॥
भावार्थ : --निद्रामग्न रहे तो दिन सिर पर चढ़ आता है इसलिए जग जग के भोर करनी चाहिए । अपने अतीत को समरण करते तीनों ही काल का चिंतन करते रहना चाहिए चिंतन से ही सहेज होती है ॥
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