एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ ।
करे हितारथ आपना साँच अर्थ को छोड़ ।२८५१।
भावार्थ : --एक शब्द को तोड़ कर उसके संग नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥
यह बिद्बन के वचन रहे यही सुजन की बानि ।
सार समुझै बिनहि गहै,करै सब्द बहु हानि ।२८५२।
भावार्थ : - यह विद्वानों का व् सुधीजनों का यह मत है की यदि शब्द के सार को पूर्णत: ज्ञात किए बिना उसे ग्रहण कर लिया जाए तो वह शब्द अतिसय हानि कारित करता है ॥
सीखे सुनै विचार लें,ताहि सबद सुख देय ।
बिना समुझए सब्द गहै, कछु न लाहा लेय ।।
----= ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- भली भांति चिंतन- मनन कर ततपश्चात ग्रहण किए गए शब्द सुखदाई होते हैं । बिना विचार किए ग्रहण किए शब्द सदैव हानिकारक होते हैं ॥
मूरख मुख मन मानसा कंठ रसन की माल ।
जैसे सब्द पिरोइये तैसी वाकी चाल ।२८५३।
भावार्थ : -- निर्बुद्ध मुख के कंठ ने एक जिह्वा मालित की हुई है । जैसे शब्द पिरो दीजिए वह वैसा ही चाल चलता है ॥
जो शब्द जग दीन करे सिंधु कोष सो मीन ।
कंठ रतन मनि मोतिया,पूर रसन कर पीन ।२८५४ ।
भावार्थ : -शब्द में अतिशय शक्ति होती है एक शब्द जीवन का एक मृत्यु का कारण बन जाता है । जो शब्द कंठ की रसना माल में पूरित होकर संसार की दुर्दशा करते हैं शब्द कोष के रत्नाकर में वह शब्द मीन के सदृश्य होते है । जो शब्द लाभकारी होकर संसार का कल्याण करते हैं वह कंठ में माणिक मुक्ता जैसे रत्नों के समरूप होते हैं ॥
निर्बुध समुझै आन जो अपने को बुधवान ।
ऐसेउ पर कृपाकरत सन्मति दै भगवान ।२८५५।
भावाथ : -- जो दूसरों को निर्बुद्ध समझ का स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं । हे भगवान ! उसपर सद्बुद्धि की कृपा बरसे ॥
नैनन चाढ़ी निंदिया देही चढिया मास ।
खावन माही भूलया याके अर्थ बिकास ।२८५६।
भावार्थ : - नयन निद्रा के देह में मांस के वशीभूत रहे । चारों पहर चौसठ घडी मनुष्य खाने में ही लगा रहे । अधुनातन विकास का यही अर्थ है ॥
एक बिकास मुख वासिहैं समानार्थ बिनास ।
गेह पति पद हीन किए गेहि बनावै दास ।२८५७ ।
भावार्थ : -- एक विकास मुख में बसा हुवा है जो विनास का समानार्थी शब्द है । यह घर को स्वामी के पद से विहीन कर गृह स्वामी को दास बनाता है ॥ जब गृह स्वामी दास बन जाएंगे तब देश का दास बनना निश्चित है चार तो हो गए....टुकड़े और क्या..... फिर दस होना निश्चित है.....
एक बिकासि मुख वासिहैं समानार्थ विकास ।
गेह पति पद पानि रहे रहे न कोऊ दास ।२८५८।
भावार्थ : -- एक विकास मुख ऐसा बसाओ जिसका अर्थ भी विकास ही हो ॥ घरों में पति का पद प्रतिष्ठित हो कोई भी दास न रहे ॥
भूली बीती आपनी, भूल परे इतिहास ।
दासा पथ सब बढ़ चले, जप एक सब्द बिकास ।२८५९।
भावार्थ : -- विकास विकास का जाप क्या दे दिया भारत के निवासी आप बीती भूल गए उनको इतिहास विस्मृत हो गया । वह पुनश्च दास बनने के पथ पर चल पड़े ॥ दूध के जले को छाछ भी फूँक फूँक के पीणी चाहिए, तै तो दो बार जल ग्यो ॥
सब्द कोष सागर सरिस पोथी परबत सोहिँ ।
यहां रतन मनि मोतिया इहाँ पारसा जोहि ।२८६० ।
भावार्थ : -- ओर सुण : -- शब्द कोष यदि सागर है तो पोथी पर्वत है ॥ सागर माणिक मोती जैसे रत्न व् पर्वत पारस ग्रहण किए होते हैं ॥
करे हितारथ आपना साँच अर्थ को छोड़ ।२८५१।
भावार्थ : --एक शब्द को तोड़ कर उसके संग नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥
यह बिद्बन के वचन रहे यही सुजन की बानि ।
सार समुझै बिनहि गहै,करै सब्द बहु हानि ।२८५२।
भावार्थ : - यह विद्वानों का व् सुधीजनों का यह मत है की यदि शब्द के सार को पूर्णत: ज्ञात किए बिना उसे ग्रहण कर लिया जाए तो वह शब्द अतिसय हानि कारित करता है ॥
सीखे सुनै विचार लें,ताहि सबद सुख देय ।
बिना समुझए सब्द गहै, कछु न लाहा लेय ।।
----= ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- भली भांति चिंतन- मनन कर ततपश्चात ग्रहण किए गए शब्द सुखदाई होते हैं । बिना विचार किए ग्रहण किए शब्द सदैव हानिकारक होते हैं ॥
मूरख मुख मन मानसा कंठ रसन की माल ।
जैसे सब्द पिरोइये तैसी वाकी चाल ।२८५३।
भावार्थ : -- निर्बुद्ध मुख के कंठ ने एक जिह्वा मालित की हुई है । जैसे शब्द पिरो दीजिए वह वैसा ही चाल चलता है ॥
जो शब्द जग दीन करे सिंधु कोष सो मीन ।
कंठ रतन मनि मोतिया,पूर रसन कर पीन ।२८५४ ।
भावार्थ : -शब्द में अतिशय शक्ति होती है एक शब्द जीवन का एक मृत्यु का कारण बन जाता है । जो शब्द कंठ की रसना माल में पूरित होकर संसार की दुर्दशा करते हैं शब्द कोष के रत्नाकर में वह शब्द मीन के सदृश्य होते है । जो शब्द लाभकारी होकर संसार का कल्याण करते हैं वह कंठ में माणिक मुक्ता जैसे रत्नों के समरूप होते हैं ॥
निर्बुध समुझै आन जो अपने को बुधवान ।
ऐसेउ पर कृपाकरत सन्मति दै भगवान ।२८५५।
भावाथ : -- जो दूसरों को निर्बुद्ध समझ का स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं । हे भगवान ! उसपर सद्बुद्धि की कृपा बरसे ॥
नैनन चाढ़ी निंदिया देही चढिया मास ।
खावन माही भूलया याके अर्थ बिकास ।२८५६।
भावार्थ : - नयन निद्रा के देह में मांस के वशीभूत रहे । चारों पहर चौसठ घडी मनुष्य खाने में ही लगा रहे । अधुनातन विकास का यही अर्थ है ॥
एक बिकास मुख वासिहैं समानार्थ बिनास ।
गेह पति पद हीन किए गेहि बनावै दास ।२८५७ ।
भावार्थ : -- एक विकास मुख में बसा हुवा है जो विनास का समानार्थी शब्द है । यह घर को स्वामी के पद से विहीन कर गृह स्वामी को दास बनाता है ॥ जब गृह स्वामी दास बन जाएंगे तब देश का दास बनना निश्चित है चार तो हो गए....टुकड़े और क्या..... फिर दस होना निश्चित है.....
एक बिकासि मुख वासिहैं समानार्थ विकास ।
गेह पति पद पानि रहे रहे न कोऊ दास ।२८५८।
भावार्थ : -- एक विकास मुख ऐसा बसाओ जिसका अर्थ भी विकास ही हो ॥ घरों में पति का पद प्रतिष्ठित हो कोई भी दास न रहे ॥
भूली बीती आपनी, भूल परे इतिहास ।
दासा पथ सब बढ़ चले, जप एक सब्द बिकास ।२८५९।
भावार्थ : -- विकास विकास का जाप क्या दे दिया भारत के निवासी आप बीती भूल गए उनको इतिहास विस्मृत हो गया । वह पुनश्च दास बनने के पथ पर चल पड़े ॥ दूध के जले को छाछ भी फूँक फूँक के पीणी चाहिए, तै तो दो बार जल ग्यो ॥
सब्द कोष सागर सरिस पोथी परबत सोहिँ ।
यहां रतन मनि मोतिया इहाँ पारसा जोहि ।२८६० ।
भावार्थ : -- ओर सुण : -- शब्द कोष यदि सागर है तो पोथी पर्वत है ॥ सागर माणिक मोती जैसे रत्न व् पर्वत पारस ग्रहण किए होते हैं ॥
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