मंगलवार, 4 अगस्त 2015

--- ॥ दोहा-दशम २८५ ॥ -----

एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ । 
करे हितारथ आपना साँच अर्थ  को  छोड़ ।२८५१। 
भावार्थ : --एक शब्द  को तोड़ कर उसके संग  नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों  के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥

यह बिद्बन के वचन रहे यही सुजन  की बानि । 
सार समुझै बिनहि गहै,करै सब्द बहु हानि ।२८५२। 
भावार्थ : - यह विद्वानों का व् सुधीजनों का यह मत है की यदि शब्द के सार को  पूर्णत: ज्ञात किए बिना उसे ग्रहण कर लिया जाए तो वह शब्द अतिसय हानि कारित करता है ॥

सीखे सुनै विचार लें,ताहि सबद सुख देय । 
बिना समुझए सब्द गहै, कछु न लाहा लेय ।। 
----= ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : --  भली भांति चिंतन- मनन कर ततपश्चात ग्रहण किए गए  शब्द सुखदाई होते हैं । बिना विचार किए  ग्रहण किए शब्द सदैव हानिकारक होते हैं ॥

 मूरख मुख मन मानसा कंठ रसन की माल । 
जैसे सब्द पिरोइये तैसी वाकी चाल ।२८५३। 
भावार्थ : -- निर्बुद्ध मुख के कंठ ने एक जिह्वा मालित की हुई है ।  जैसे शब्द पिरो दीजिए वह वैसा ही चाल  चलता है ॥ 

जो शब्द जग दीन करे सिंधु कोष सो मीन । 
कंठ रतन मनि मोतिया,पूर रसन कर पीन ।२८५४ । 
भावार्थ : -शब्द में अतिशय  शक्ति होती है एक शब्द जीवन का  एक मृत्यु  का कारण बन जाता है । जो शब्द कंठ की रसना माल में पूरित होकर संसार की  दुर्दशा करते हैं शब्द कोष के रत्नाकर में वह शब्द मीन के सदृश्य होते है । जो शब्द  लाभकारी होकर संसार का  कल्याण करते हैं वह कंठ में माणिक मुक्ता जैसे रत्नों के समरूप होते हैं ॥ 

निर्बुध समुझै आन जो अपने को बुधवान । 
ऐसेउ पर  कृपाकरत सन्मति दै भगवान ।२८५५। 
भावाथ : -- जो दूसरों को निर्बुद्ध समझ का स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं ।  हे भगवान ! उसपर सद्बुद्धि की कृपा बरसे ॥

नैनन चाढ़ी निंदिया देही चढिया मास । 
खावन माही भूलया याके अर्थ बिकास ।२८५६। 
भावार्थ : - नयन निद्रा के  देह में मांस के वशीभूत रहे । चारों पहर चौसठ घडी मनुष्य खाने में ही लगा रहे । अधुनातन विकास का यही अर्थ है ॥ 

 एक बिकास मुख वासिहैं समानार्थ बिनास । 
गेह पति पद हीन  किए गेहि बनावै दास ।२८५७ । 
भावार्थ : -- एक विकास मुख में बसा हुवा है जो विनास का समानार्थी शब्द है । यह घर को स्वामी के पद से विहीन कर गृह स्वामी को दास बनाता है ॥ जब गृह स्वामी दास बन जाएंगे तब देश का दास बनना निश्चित है  चार तो हो गए....टुकड़े और क्या..... फिर दस होना निश्चित है..... 

 एक बिकासि  मुख वासिहैं समानार्थ विकास । 
गेह पति पद पानि रहे रहे न कोऊ दास ।२८५८। 
भावार्थ : -- एक विकास मुख ऐसा बसाओ जिसका अर्थ भी विकास ही हो ॥ घरों में पति का पद प्रतिष्ठित हो कोई भी दास न रहे ॥

भूली बीती आपनी, भूल परे इतिहास । 
दासा पथ सब बढ़  चले, जप एक सब्द बिकास ।२८५९। 
भावार्थ : -- विकास विकास का जाप क्या दे दिया भारत के निवासी आप बीती भूल गए उनको इतिहास  विस्मृत हो गया । वह पुनश्च दास बनने के पथ पर चल पड़े ॥ दूध के जले को छाछ भी फूँक फूँक के पीणी चाहिए,  तै तो दो बार जल ग्यो ॥

सब्द कोष सागर सरिस पोथी परबत सोहिँ । 
यहां रतन मनि मोतिया इहाँ पारसा जोहि  ।२८६०  । 
भावार्थ : -- ओर  सुण : --  शब्द  कोष यदि सागर है तो पोथी पर्वत है ॥ सागर माणिक मोती जैसे  रत्न व् पर्वत  पारस  ग्रहण किए होते हैं ॥

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