आतम अंतर बासिया काया है आबास ।
तब लग बसती बसि रहए जबलग साँसे साँस ।२८८१ ।
भावार्थ : -- काया गृह है और आत्मा अंतर-गृही है । यह वसति तब तक वासित रहती ही जब तक साँस रहते हैं ॥
उजरे उजरे छाजना उजरे उजरे चैल ।
धोए पूँछे गेह रहए गेही मेले मैल ॥ २८८२ ॥
भावार्थ : -- उजली-उजली चर्म उसपर उजले-उजले वस्त्र । घर तो स्वच्छ है किन्तु घरवाले कितने मलिन हैं ॥
छापर कपार तन करे खाए जेत खद्यान ।
सो सब लेखा मैं चढ़ा पहुंचे मुए समसान ॥ २८८३ ॥
भावार्थ : -- जितना छप्पर सिर किया जितना कापर तन किया जितना खाद्यान खाया जैसा खाया उन सबको बही -खाते में चढ़ा कर मनुष्य मरणोपरांत श्मसान पहुंचता हैं जहां जगत्पति उसका ऑडिट करते हैं ॥
करे पाप एक पालड़े दूज धरम को धार ।
करम का तुला दंड लिए तौले तौलनहार ॥ २८८४ ॥
भावार्थ : -- एक पलड़े में पाप व् दूजे में धर्म रखा जाता है कर्म के तुला दंड में तौलने वाला पाप पुण्य की तुलना करता है, ततपश्चात तुम्हारे आगामिक आवास का निर्धारण होता है ॥
खेत बिनसे बन बिनसे बिनसे तरुबर छाँउँ ।
जब पंखी बासा बसे मिले न कतहूँ ठाउँ ॥ २८८५ ॥
भावार्थ : -- खेत का नाश किया वन का नाश किया तरुवर की छाँव नष्ट किए ।जब पक्षी का आवास मिला तब कहीं वसति नहीं मिली ॥
दाता ने जीवन दिया लिखा लेख में लेह ।
बाँचे कोरी पीठिका लिखा नहीं किछु देह ॥ २८८६ ॥
भावार्थ : -- जीवन तो दाता ने दिया तुम्हारे बही ने लिखा 'लिया ' । जब देनी पृष्ठिका बाँची गई वह अलिखित मिली ॥
जी साधन जो धन मिला लिखा लेख में लाह ।
सो धन केतक साधिया, लिखे मिले किछु नाह ।२८८७ ।
भावार्थ : -- जीवन के साधन स्वरूप अन्न जल वसन वासन रूपी धन मिला प्राप्त प्राप्त लिखा । उस धन को साध्य करने के साधन की युक्तियाँ अलिखित ही रही ॥ दूध तो पी लिया गांय पाली.....नहीं, अन्न तो खा लिया बीज बोने की युक्तियाँ की ? ..... नहीं..... मेंढक कहीं के तेरे होनहार क्या खाएंगे क्या पिएंगे.....
पाप कर्म अतिसय करे धर्म करे किछु नाए ।
छोटे छोटे अर्थ हुँत मनुज जनम बिनसाए ॥ २८८८ ॥
भावार्थ : -- पाप कर्म अतिशय किये पुण्य कुछ भी नहीं किया । छोटे छोटे प्रयोजन सिद्ध करने में मानव जन्म को नष्ट कर दिया ।
जननी ने जब जन्माया रोया मार दहाड़ ।
भाग बँधा जग आपना भया तिल्ल ते ताड़ ॥२८८९ -क ॥
बचपन खेलन में गया बयस भई कुल बीस ।
सील चरन अपनाए के किया बिरध की रीस ? ॥ -ख ॥
बयो हास कर अधस् भए जोग बरस चालीस ।
धर्मा चरनी होइ के सुमिरा नित जगदीस ? ॥ -ग ॥
मरनि द्वारि नियराई भय साठ के पार ।
अपनी बँधनी बाँधि कै जोगा जोख सँभार ? ॥- घ ॥
काल करम छूटे नहीं छूटे तन ते प्रान ।
चारी कंधे चाढ़ के पहुँच गया समसान ॥-ढ़ ॥
अब भगवान मुक्ति देंगे..... ले ले
घर का रहा न घाट का रहा बिनहि आघाट ।
मरन परे मिरतक भया चढ़ा धर्म की खाट ॥ २८९० ॥
भावार्थ : -- जब तक जीवित रहा मर्यादा हीन होकर घर का रहा न घाट का कहता फिरा मुझे धर्म की अपेक्षा नहीं है मैं तो धर्म निरपेक्ष हूँ । मरने के पश्चात जब मृतक हो गया तब कैसे टाँग उठाकर खट से धर्म की खाट चढ़ गया और कफ़न में दुबक गया ॥ ये धर्म निरपेक्ष खाट तो क्या कफ़न भी नहीं देता
तब लग बसती बसि रहए जबलग साँसे साँस ।२८८१ ।
भावार्थ : -- काया गृह है और आत्मा अंतर-गृही है । यह वसति तब तक वासित रहती ही जब तक साँस रहते हैं ॥
उजरे उजरे छाजना उजरे उजरे चैल ।
धोए पूँछे गेह रहए गेही मेले मैल ॥ २८८२ ॥
भावार्थ : -- उजली-उजली चर्म उसपर उजले-उजले वस्त्र । घर तो स्वच्छ है किन्तु घरवाले कितने मलिन हैं ॥
छापर कपार तन करे खाए जेत खद्यान ।
सो सब लेखा मैं चढ़ा पहुंचे मुए समसान ॥ २८८३ ॥
भावार्थ : -- जितना छप्पर सिर किया जितना कापर तन किया जितना खाद्यान खाया जैसा खाया उन सबको बही -खाते में चढ़ा कर मनुष्य मरणोपरांत श्मसान पहुंचता हैं जहां जगत्पति उसका ऑडिट करते हैं ॥
करे पाप एक पालड़े दूज धरम को धार ।
करम का तुला दंड लिए तौले तौलनहार ॥ २८८४ ॥
भावार्थ : -- एक पलड़े में पाप व् दूजे में धर्म रखा जाता है कर्म के तुला दंड में तौलने वाला पाप पुण्य की तुलना करता है, ततपश्चात तुम्हारे आगामिक आवास का निर्धारण होता है ॥
खेत बिनसे बन बिनसे बिनसे तरुबर छाँउँ ।
जब पंखी बासा बसे मिले न कतहूँ ठाउँ ॥ २८८५ ॥
भावार्थ : -- खेत का नाश किया वन का नाश किया तरुवर की छाँव नष्ट किए ।जब पक्षी का आवास मिला तब कहीं वसति नहीं मिली ॥
दाता ने जीवन दिया लिखा लेख में लेह ।
बाँचे कोरी पीठिका लिखा नहीं किछु देह ॥ २८८६ ॥
भावार्थ : -- जीवन तो दाता ने दिया तुम्हारे बही ने लिखा 'लिया ' । जब देनी पृष्ठिका बाँची गई वह अलिखित मिली ॥
जी साधन जो धन मिला लिखा लेख में लाह ।
सो धन केतक साधिया, लिखे मिले किछु नाह ।२८८७ ।
भावार्थ : -- जीवन के साधन स्वरूप अन्न जल वसन वासन रूपी धन मिला प्राप्त प्राप्त लिखा । उस धन को साध्य करने के साधन की युक्तियाँ अलिखित ही रही ॥ दूध तो पी लिया गांय पाली.....नहीं, अन्न तो खा लिया बीज बोने की युक्तियाँ की ? ..... नहीं..... मेंढक कहीं के तेरे होनहार क्या खाएंगे क्या पिएंगे.....
पाप कर्म अतिसय करे धर्म करे किछु नाए ।
छोटे छोटे अर्थ हुँत मनुज जनम बिनसाए ॥ २८८८ ॥
भावार्थ : -- पाप कर्म अतिशय किये पुण्य कुछ भी नहीं किया । छोटे छोटे प्रयोजन सिद्ध करने में मानव जन्म को नष्ट कर दिया ।
जननी ने जब जन्माया रोया मार दहाड़ ।
भाग बँधा जग आपना भया तिल्ल ते ताड़ ॥२८८९ -क ॥
बचपन खेलन में गया बयस भई कुल बीस ।
सील चरन अपनाए के किया बिरध की रीस ? ॥ -ख ॥
बयो हास कर अधस् भए जोग बरस चालीस ।
धर्मा चरनी होइ के सुमिरा नित जगदीस ? ॥ -ग ॥
मरनि द्वारि नियराई भय साठ के पार ।
अपनी बँधनी बाँधि कै जोगा जोख सँभार ? ॥- घ ॥
काल करम छूटे नहीं छूटे तन ते प्रान ।
चारी कंधे चाढ़ के पहुँच गया समसान ॥-ढ़ ॥
अब भगवान मुक्ति देंगे..... ले ले
घर का रहा न घाट का रहा बिनहि आघाट ।
मरन परे मिरतक भया चढ़ा धर्म की खाट ॥ २८९० ॥
भावार्थ : -- जब तक जीवित रहा मर्यादा हीन होकर घर का रहा न घाट का कहता फिरा मुझे धर्म की अपेक्षा नहीं है मैं तो धर्म निरपेक्ष हूँ । मरने के पश्चात जब मृतक हो गया तब कैसे टाँग उठाकर खट से धर्म की खाट चढ़ गया और कफ़न में दुबक गया ॥ ये धर्म निरपेक्ष खाट तो क्या कफ़न भी नहीं देता
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