सोमवार, 17 अगस्त 2015

--- ॥ दोहा-दशम २८६ ॥ -----,


मैल मलिन मनि मोतिया सागर सबहि  सँजोहि । 
तहँ पारस कहँ पाइबे, जो गिरि मलिनहि जोहि ।२८६१  । 
भावार्थ : -- मेल मलिन हो कि माणिक मुक्ता  सागर में सभी कुछ संकलित होता है । उसी पर्वत रूपी पोथी में पारस कहाँ  प्राप्त होगा जो मलिनता ग्रहण करती हो ॥

कबीर पंडत की कथा सो चोरन  की नाउ । 
सब अंधे मिली बैठिया भावै तहँ लिए जाउ । । 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- ये तो कबीर दास जी ने भी कहा ही  पंडत का संविधान उसके जैसा ही खंडत है वह तो उस चोर की नाउ के जैसे है जिसपर अविवेकी विराजमान हैं  वे चमड़ी-दमड़ी वाली कुरीतियों की ओर,  अधर्म की ओर दासता  की ओर जहाँ चाहे वहां ले जाए,  इसपर मति चढियो  ॥

कोई तेरी सीख के अपणी सिखी सिखाए । 
कोई भटके पँथी कू, सत्पथ पर लिए जाए ।२८६२ । 
भावार्थ : -- कोई  तेरी तो सीखता है अपनी सिखाता है । कोई दिग्भ्रमित पथिक का पथप्रदर्शन कर उसे सत्पथ की ओर  ले जाता है ।।

देस धरम बिसराए  गया जाति कू भूल । 
माटी मैला खाए के, पड़ा  आन  के मूल ।२८६३। 
भावार्थ : -- अपने  देश के आचार -विचार विस्मृत कर तू अपनी व्युत्पत्ति अपने मूल पुरुष को  भूल गया । मांस का भक्षण कर पराए मूल में पड़ा है ॥  डी इन ए किसको बोलते हैं इसको.....पहले  जाति छूटती है फिर धर्म छूटता है फिर देश ही छूट जाता है फिर हम कहीं के नहीं रहते

प्रथम छूटत जाति- धरम  बहोरि देस परिवेस । 
ऐसो छूटत जी  गयो  रहे नहीं कछु सेस ।२८६४। 
भावार्थ : --  जाति छूटने से धर्म भी छूट जाता है धर्म  से  देश-परिवेश छूट जाता है इस प्रकार जब  प्राण छूट जाते है  तब उसकी यह स्मृति भी सेष नहीं रहती  कि वह  कहाँ  से आया था  ।

जैसे नाम  बताओ : -- हरी शंकर : - भारत से आया है.....आगे  भटिंडा वाले..... हाँ पंजाब से आया है

नाम बताओ..... ताऊ !! हरियाणे से आया है,


नाम बताओ : -- काहे ? बिहार से आया है,

नाम बताओ : -- गांधी : -- पता नहीं,

सुमिरत  पितु जन आपने जनम रहे सुरताए । 
होतब के सुरत रहे त  मरनी नहीं बिसुराए ।। २८६५ ।।  

भावार्थ : -- पितृ जनों सहित अपने  वंश पुरुष की स्मृति बनी रहने से जन्म का स्मरण रहता है,  जन्म के स्मरण रहने से भवितव्यता का चिंतन रहता है भवितव्यता के चिंतन से मृत्यु विस्मृत नहीं होती ॥

जाति  बिहुरे कुल बिहुरे बिहुरे अपना गाँव ।
बैठे  पराई नाउँ त  पैठे पराए ठाँव ॥  २८६६ ॥

भावार्थ : -- नाम धर्म का प्रतिक है  नाम से जाति  पृथक हो जाए तो वंश ही पृथक हो जाता है । वंश के  पृथक होने से  जन्म स्थान पृथक हो जाता है ।  इस प्रकार  पराई नाव में बैठने से देश भी  पराया  हो जाता है  और वह नाव पराए- देश में पहुंचा देती है ।

रामायन गीता सार श्रुति सुख बेद पुरान । 
हिन्दू की पहचान यह हिन्दू का अस्थान ॥ २८६७ ॥ 
भावार्थ : --रामायण और गीता का सार,  सुमधुर वेद पुराण वैदिक धर्म के अनुयायियों की पहचान है यह भारत की भूमि इन्हीं हिन्दुओं का स्थान है ॥

पापमय चरन  परिहरै करो धरम की राख । 
अपने मूल मिलाए के रहियो अपने साख ॥ २८६८ ॥ 
भावार्थ : -- पाप संकल्पित आचरण का  परित्याग कर धर्म की रक्षा करें । अपने मूल में ही संयुक्त होकर हम अपनी ही शाखा में फलीभूत हों ॥

आन  कही पतियाए  के बिहुरे अपना मूल । 
बिगुने बिय बियाए तहँ जागे पेड़ बबूल ॥ २८६९ ॥ 
भावाथ : -- दूसरों  के अनुमानित कथनों पर विश्वास करते हुवे जो अपने मूल से वियुक्त हो जाते हैं वह बीज निर्गुण होते हुवे बबूल के पेड़ बनकर उत्पन्न होते हैं ॥

 पग धरे मग घाउ करे लागे सूल बबूल । 
फर फूर भरपूर फरे जागे अपने मूल ॥ २८७० ॥ 
भावार्थ : -- मूल से वियुक्त बबूल के सूल  मार्ग में बाधा बन कर चरणों में आघात करते हैं । जो अपने मूल से ही संयुक्त रहते हैं वह पुष्प संपन्न स्वरूप में  अपनी शाख, अपने मूल, अपनी धरती के लिए फलदायक होते हैं ॥ 

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