बुधवान निरबोध रहे घर में रहे अभाउ ।
भाव जुगत का करिए जब बदले नहीं सुभाउ ।२८४१ ।
भावार्थ : -- जब घर में अभाव होता है तब बुद्धवान भी निर्बुद्ध हो जाता है । भाव होकर भी जब कोई अपने स्वभाव में बदलाव न करे तब भाव का क्या लाभ ।
अर्थात : -- भाव होने से स्वभाव नहीं बदलता, भाव होने से नीचा ऊंचा नहीं होता । नीचा ऊँचा तब होता है जब उसे यह संज्ञान हो कि उसके नीचे भी एक संसार है ॥
ऊँची पीठी पैठ के रहे नीच के नीच ।
पदमन केहि पुकारिए फूल गहे जो कीच ।२८४२।
भावार्थ : -- ऊँचे पद का होकर भी कोई नीच का नीच रहे तब ऐसे पद प्रतिष्ठा का क्या लाभ । पुष्पित होकर भी भगवान के चरणों में अर्पित न होकर कीचड़ को ही ग्रहण करे उसे पद्म कौन कहे। मनुष्य होकर भी जो पाशविक प्रवृति का त्याग न करे उसे मनुष्य कौन कहे ॥
जेतक ऊँची पीठ किए तेत नीच कर दीठ ।
ऊँचे ऊँची दीठ किए ता सैम कोउ न ढीठ ।२८४३।
भावार्थ : --पीठिका जीतनी ऊँची हो दृष्टिका उतनी नीची होनी चाहिए । ऊँचे पीठिका पर भी जिसकी दृष्टि ऊंची ही रहे उसके समान निर्दय कोई नहीं ॥
अजहुँ हम्हरे देस जो करते बाधहि बाध ।
साधु कहै तिन साधुता अधम कहे अपराध ।२८४४-क ।
पहने पानी पातरा नाम धरे को सोन ।
धीमन ताको धोइये निकसे वाको होन ।२८४४ -ख ।
भावार्थ : -- पानी पत्र चढ़ा कर नाम स्वर्ण रख लेने से कोई स्वर्ण नहीं हो जाता । विचार शीलता से वंचक पांडित्य का प्रक्षालन करने से उसकी वास्तविकता तत्काल ही प्रकट हो जाती है ॥
भावार्थ : -- अब हमारे देश में जो निर्बाध रूप में उत्पीड़ित करते हैं उन्हें साधु कहो तो वह साधुवाद है यदि नीच कह दिया तो वह अपराध है ॥
मनमति के मत मान सब रीती उलटी होए ।
सोक पड़े तब हाँसिया उत्सउ पूरत रोए ।२८४५ ।
भावार्थ : -- धांधली बाजों,मनमानी करने वालों आपापंथियों के अनुमान को मान कर इस देश की सभी रीतियाँ ही उलटी हो गई । शोक पर प्रसन्नता व्यक्त होने लगी है मांगलिक कार्य रो रो कर सम्पन्न होने लगे हैं ।।
स्पष्टीकरण : -- शब्दकोष में लिखा है कि आपापंथी स्वभाव से ही घोटालेबाज होते हैं.....
जाति लच्छन बिगड़े जब बिगड़े देसाचार ।
औरन किन सँवारिए जब अपनी नहीं सँभार ।२८४६।
भावार्थ : -- अपनी जाति अपनी पहचान, अपने आधाराधायक त्याज्य जाते हैं गुण धर्म बिगड़ जाता है जब किसी देश के धर्म को बिगाड़ा जाता है । जब अपनी ही सहेज न हो तो कोई किसे और कैसे संवारे ॥
एक एड्स रोगी वह होता है जो बहिष्कार को सिरोधार कर प्रयास करता है कि कोई और इस रोग से पीड़ित न हो । दूसरा वह होता है जिसे बहिष्कार स्वीकार नहीं होता और पूरे समाज को रोगी बनाता जाता है.....
बासा भाषा भेष संग, बिगर गयो परिवेश ।
आन बसे परदेसिया भया देस अवसेष ।२८४७।
भावार्थ : -- जीवन चर्या बिगड़ गई भाषा बिगड़ गई भेष बिगड़ गया इस बिगड़ी के संग परिवेश बिगड़ गया । जबसे पराए आन बसे तब से यह देश बिगड़ गया ॥
करें पाप दुःख दावहीँ दे रुज सोक बिजोग ।
सँकरे मन के मानसा नहीं केहि के जोग ।२८४८ ।
भावार्थ : -- इनसे संकीर्ण मानसिकता से युक्त संकर योनिज जन्म लेते जो संसार के किसी योग्य नहीं होते । ये पाप आचरण में प्रवृत्ति होकर संसार को दुख ही देते इनके किए कुकरम से रोग वियोग और शोक की उत्पत्ति होती ॥
जिअत जीउ को सब रखे मुआ रखे नहि कोए ।
मुआ परन कहँ जाइबे,सोचत गहबर होए ॥ २८४९॥
भावार्थ : -- जीते जीउ को तो सब रखते हैं मरे को कोई नहीं रखता । ये मर जाएंगे तो कहाँ जाएंगे यह सोचकर घबराहट होती ॥
जीउति जगती देस के जनम मरन दुइ सींव ।
जाने को कब लाँघिये, सौ बरसी सब जीउ ॥ २८५० ॥
भावार्थ : -- जीव-धारियों के देश में जन्म-मरण रूपी दो सीमाएं है सभी जीवों को सौ वर्ष में ही अंतर्ध्यान होना है जाने कौन कब होए .....आजकल लोग मरते कहाँ है हमारे यहाँ तो अब मरनी पर भी मेवे बांटने लगे हैं पाने वाले कहते भाई अंतरध्यान होया सै....
भाव जुगत का करिए जब बदले नहीं सुभाउ ।२८४१ ।
भावार्थ : -- जब घर में अभाव होता है तब बुद्धवान भी निर्बुद्ध हो जाता है । भाव होकर भी जब कोई अपने स्वभाव में बदलाव न करे तब भाव का क्या लाभ ।
अर्थात : -- भाव होने से स्वभाव नहीं बदलता, भाव होने से नीचा ऊंचा नहीं होता । नीचा ऊँचा तब होता है जब उसे यह संज्ञान हो कि उसके नीचे भी एक संसार है ॥
ऊँची पीठी पैठ के रहे नीच के नीच ।
पदमन केहि पुकारिए फूल गहे जो कीच ।२८४२।
भावार्थ : -- ऊँचे पद का होकर भी कोई नीच का नीच रहे तब ऐसे पद प्रतिष्ठा का क्या लाभ । पुष्पित होकर भी भगवान के चरणों में अर्पित न होकर कीचड़ को ही ग्रहण करे उसे पद्म कौन कहे। मनुष्य होकर भी जो पाशविक प्रवृति का त्याग न करे उसे मनुष्य कौन कहे ॥
जेतक ऊँची पीठ किए तेत नीच कर दीठ ।
ऊँचे ऊँची दीठ किए ता सैम कोउ न ढीठ ।२८४३।
भावार्थ : --पीठिका जीतनी ऊँची हो दृष्टिका उतनी नीची होनी चाहिए । ऊँचे पीठिका पर भी जिसकी दृष्टि ऊंची ही रहे उसके समान निर्दय कोई नहीं ॥
अजहुँ हम्हरे देस जो करते बाधहि बाध ।
साधु कहै तिन साधुता अधम कहे अपराध ।२८४४-क ।
पहने पानी पातरा नाम धरे को सोन ।
धीमन ताको धोइये निकसे वाको होन ।२८४४ -ख ।
भावार्थ : -- पानी पत्र चढ़ा कर नाम स्वर्ण रख लेने से कोई स्वर्ण नहीं हो जाता । विचार शीलता से वंचक पांडित्य का प्रक्षालन करने से उसकी वास्तविकता तत्काल ही प्रकट हो जाती है ॥
भावार्थ : -- अब हमारे देश में जो निर्बाध रूप में उत्पीड़ित करते हैं उन्हें साधु कहो तो वह साधुवाद है यदि नीच कह दिया तो वह अपराध है ॥
मनमति के मत मान सब रीती उलटी होए ।
सोक पड़े तब हाँसिया उत्सउ पूरत रोए ।२८४५ ।
भावार्थ : -- धांधली बाजों,मनमानी करने वालों आपापंथियों के अनुमान को मान कर इस देश की सभी रीतियाँ ही उलटी हो गई । शोक पर प्रसन्नता व्यक्त होने लगी है मांगलिक कार्य रो रो कर सम्पन्न होने लगे हैं ।।
स्पष्टीकरण : -- शब्दकोष में लिखा है कि आपापंथी स्वभाव से ही घोटालेबाज होते हैं.....
जाति लच्छन बिगड़े जब बिगड़े देसाचार ।
औरन किन सँवारिए जब अपनी नहीं सँभार ।२८४६।
भावार्थ : -- अपनी जाति अपनी पहचान, अपने आधाराधायक त्याज्य जाते हैं गुण धर्म बिगड़ जाता है जब किसी देश के धर्म को बिगाड़ा जाता है । जब अपनी ही सहेज न हो तो कोई किसे और कैसे संवारे ॥
एक एड्स रोगी वह होता है जो बहिष्कार को सिरोधार कर प्रयास करता है कि कोई और इस रोग से पीड़ित न हो । दूसरा वह होता है जिसे बहिष्कार स्वीकार नहीं होता और पूरे समाज को रोगी बनाता जाता है.....
बासा भाषा भेष संग, बिगर गयो परिवेश ।
आन बसे परदेसिया भया देस अवसेष ।२८४७।
भावार्थ : -- जीवन चर्या बिगड़ गई भाषा बिगड़ गई भेष बिगड़ गया इस बिगड़ी के संग परिवेश बिगड़ गया । जबसे पराए आन बसे तब से यह देश बिगड़ गया ॥
करें पाप दुःख दावहीँ दे रुज सोक बिजोग ।
सँकरे मन के मानसा नहीं केहि के जोग ।२८४८ ।
भावार्थ : -- इनसे संकीर्ण मानसिकता से युक्त संकर योनिज जन्म लेते जो संसार के किसी योग्य नहीं होते । ये पाप आचरण में प्रवृत्ति होकर संसार को दुख ही देते इनके किए कुकरम से रोग वियोग और शोक की उत्पत्ति होती ॥
जिअत जीउ को सब रखे मुआ रखे नहि कोए ।
मुआ परन कहँ जाइबे,सोचत गहबर होए ॥ २८४९॥
भावार्थ : -- जीते जीउ को तो सब रखते हैं मरे को कोई नहीं रखता । ये मर जाएंगे तो कहाँ जाएंगे यह सोचकर घबराहट होती ॥
जीउति जगती देस के जनम मरन दुइ सींव ।
जाने को कब लाँघिये, सौ बरसी सब जीउ ॥ २८५० ॥
भावार्थ : -- जीव-धारियों के देश में जन्म-मरण रूपी दो सीमाएं है सभी जीवों को सौ वर्ष में ही अंतर्ध्यान होना है जाने कौन कब होए .....आजकल लोग मरते कहाँ है हमारे यहाँ तो अब मरनी पर भी मेवे बांटने लगे हैं पाने वाले कहते भाई अंतरध्यान होया सै....
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