शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८८ ॥ -----

आतम अंतर बासिया काया है आबास । 
तब लग बसती बसि रहए जबलग साँसे साँस ।२८८१ । 
भावार्थ : --  काया गृह  है और आत्मा अंतर-गृही है । यह वसति तब तक वासित रहती ही जब तक साँस रहते हैं ॥

उजरे उजरे छाजना उजरे उजरे चैल । 
धोए पूँछे गेह रहए गेही मेले मैल ॥ २८८२ ॥ 
भावार्थ  : --  उजली-उजली चर्म उसपर उजले-उजले वस्त्र । घर तो स्वच्छ है  किन्तु घरवाले कितने मलिन हैं ॥ 
छापर कपार तन करे खाए जेत खद्यान । 
सो सब  लेखा मैं चढ़ा पहुंचे मुए समसान ॥ २८८३ ॥ 
भावार्थ : -- जितना छप्पर सिर किया जितना कापर तन किया जितना खाद्यान खाया जैसा खाया उन सबको  बही -खाते  में चढ़ा कर मनुष्य मरणोपरांत श्मसान पहुंचता हैं जहां जगत्पति उसका ऑडिट करते हैं ॥
करे पाप एक पालड़े दूज धरम को धार । 

करम का तुला दंड लिए तौले तौलनहार ॥ २८८४ ॥ 
भावार्थ : -- एक पलड़े में पाप व् दूजे में धर्म रखा जाता है कर्म के  तुला दंड में  तौलने वाला  पाप पुण्य की तुलना करता है,  ततपश्चात  तुम्हारे आगामिक  आवास का निर्धारण होता है  ॥

खेत बिनसे बन बिनसे बिनसे तरुबर छाँउँ । 
जब पंखी बासा बसे मिले न कतहूँ ठाउँ ॥ २८८५ ॥ 
भावार्थ : -- खेत का नाश किया वन का नाश किया तरुवर की छाँव नष्ट किए  ।जब पक्षी का आवास मिला तब कहीं वसति नहीं मिली ॥ 

दाता ने जीवन दिया लिखा लेख में लेह । 
बाँचे कोरी पीठिका लिखा नहीं किछु देह ॥ २८८६ ॥ 
भावार्थ : -- जीवन तो दाता ने दिया तुम्हारे बही ने लिखा 'लिया ' । जब देनी पृष्ठिका बाँची गई वह अलिखित मिली ॥ 

जी साधन जो धन मिला लिखा लेख में लाह । 
सो धन केतक साधिया, लिखे मिले किछु नाह ।२८८७ । 
 भावार्थ  : -- जीवन के साधन स्वरूप  अन्न जल वसन वासन रूपी धन मिला  प्राप्त प्राप्त लिखा । उस धन को साध्य  करने के साधन की युक्तियाँ अलिखित ही रही ॥ दूध तो पी लिया गांय पाली.....नहीं, अन्न तो खा लिया बीज बोने की युक्तियाँ की ? ..... नहीं..... मेंढक कहीं के तेरे होनहार क्या खाएंगे क्या पिएंगे.....

पाप कर्म अतिसय करे धर्म करे किछु नाए । 
छोटे छोटे अर्थ हुँत मनुज जनम बिनसाए ॥ २८८८ ॥ 
भावार्थ : -- पाप कर्म अतिशय किये पुण्य कुछ भी नहीं किया । छोटे छोटे प्रयोजन सिद्ध करने में मानव जन्म को नष्ट कर दिया । 

जननी ने जब जन्माया रोया मार दहाड़ । 
भाग बँधा जग आपना भया तिल्ल ते ताड़ ॥२८८९ -क ॥ 

बचपन खेलन में गया बयस भई कुल बीस । 
सील चरन अपनाए के किया बिरध की रीस ? ॥ -ख ॥  

बयो हास कर अधस्  भए जोग बरस चालीस । 
धर्मा चरनी होइ के सुमिरा नित जगदीस ? ॥ -ग ॥  

मरनि द्वारि नियराई भय साठ के पार । 
अपनी बँधनी बाँधि कै जोगा जोख सँभार ? ॥- घ ॥ 

काल करम छूटे नहीं छूटे तन ते प्रान । 
चारी कंधे चाढ़ के  पहुँच  गया समसान ॥-ढ़ ॥ 

अब भगवान मुक्ति देंगे..... ले ले 

घर का रहा न घाट का रहा बिनहि आघाट । 
मरन  परे मिरतक भया चढ़ा धर्म की खाट ॥ २८९० ॥

भावार्थ : -- जब तक जीवित रहा मर्यादा हीन होकर घर का रहा न घाट का  कहता फिरा मुझे धर्म की अपेक्षा नहीं है मैं तो धर्म निरपेक्ष हूँ  । मरने के पश्चात जब मृतक हो गया तब कैसे टाँग उठाकर खट से धर्म की खाट चढ़ गया और कफ़न में दुबक गया ॥ ये धर्म निरपेक्ष खाट तो क्या कफ़न भी नहीं देता 




  

सोमवार, 17 अगस्त 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८७॥ -----


चाहे केतक  नीच रहँ चाहे केतक ऊँच । 
दयामई  डीठी रखेँ वाकी  ऊँच पहूँच ॥ २८७१ ॥ 
भावार्थ : -- नीची हो चाहे ऊंंची हो जिसकी दृष्टि में प्राणी मात्र के लिए दया हो वही शाखा परम पद की अधिकारी होती है ॥  
ते  खादन को ताजिये जो को जीवन लेइ । 
पीर परे तन आपना  औरन पीरा देइ ॥ २८७२ ॥ 
भावार्थ : - उन खाद्य पदार्थों व्  आच्छादनों का सर्वथा त्याग  करना चाहिए जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में किसी को जीवन से हीन करते हो  जो अपने शरीर के सह अन्य  जन-जीवों को कष्ट देकर प्राप्त होते हों  ।
ऐसे  त्याग से परम पद की योग्यता प्राप्त होती है ॥ 

पेड़ काटना भी अब अधर्म की श्रेणी में सम्मिलित हो गया है ..... 

जाकी बोली बँध नहीं साँच नहि मन माहि । 
ताके  संग न चालिये छाँड़े पैड़ा जाहि ॥ 
 ----- ॥ संत कबीर दास ॥ ----
भावार्थ : -- जिसके  वचनों में  नियम-विबंधन न हो मनोभावों में सत्य का पुट न हो । उसके संग नहीं होंना चाहिए उसका समर्थन नहीं करना चाहिए कारन की ऐसे लोग अपने वचनों से जाने कब फिर जाएं ॥ 

झूठ बचन कवलित काल साँच बचन जग कंत । 
झूठा नीरा निर्गुना साँचा तन गुनवंत ॥ २८७३ ॥  

भावार्थ : -- असत्य वचनों से हम काल को व् सत्य वचनों  से ईश्वर को प्राप्त होते हैं  । असत्य वचनों से यह शरीर  गुणहीन व् सत्य वचनों से गुणवंत होता है ॥ 

सत्य वचन गुणों की  प्राप्ति हेतु एक आवश्यक धर्म है ।  धनी तो कोई भी बन जाता है,  गुणी बनना कठिन है..... 

गुणों की प्राप्ति के लिए धर्म परम आवश्यक है..... 

 जो जग साँचा बानिया साँचहि वाकी बान । 
जिन जिन भाजन जानिया देइ लाह कर दान ।२८७४ । 
भावार्थ : -धधा तो चोर डाकू भी कर लेते हैं साँचे व्यापारी का व्यापार भी साँचा ही होना चाहिए ।  उसका धर्म है कि वह प्राप्त लाभ सत्पात्र  को दान करता रहे तभी वह गुणवंत होता है  ॥ 

जो तू साँचा ब्रम्हना,साँचे दे उपदेस । 
प्रगसत साँची आपनी, रहियो तापस वेस ।२८७५ ।  
भावार्थ :--मृषावादी के मुख से सत्य शोभा नहीं देता जैसे : -- मैं कुछ न छोड़ूँ किन्तु तुम ये छोड़ो तुम वो छोड़ो ।सत्यवादी को ही सत्य का उपदेश देना चाहिए  त्याग व् तपस्या  का अनुशरण करते हुवे स्वयं का सत्य प्रकट करते रहना चाहिए ॥ 

 मैं मै की प्रतिमूरति घट घट भीतर होइ । 
तू अरु तुम का तोमना हेर रहे सब कोइ ॥ २८७६ ॥ 
भावार्थ : -- मैं मैं की प्रतिमा घट घट में प्राप्त होने लगी । तू और तुम का वो प्रथम सुर अब ढूंढने से भी नहीं मिलता । मैं तो सब हैं ये तू कहाँ है ? 

साँचा कंचन साँच है झूठा काँचा काँच । 
ए मोले ते मिले नहि ए मिले टका के पाँच ।२८७७ । 
भावार्थ : -- सत्यवादी खरा सोना होता है जो मोल देने पर भी नहीं मिलता । झूठा कच्चा कांच होता जो टके में पांच मिलता ॥ 

दया हरिदय नहीं रही देय रहेउ  न दान । 
 तपस  अनुशरण में नहीं झूठे झूठ बखान ॥ २८७८॥  
भावार्थ : -- जब हृदयों में  दया नहीं रही दान देय नहीं रहा लेय हो गया । तप अनुशरण में  नहीं रहा सत्य आचरण में नहीं रहा यह केवल भाषण में ही परिसिमित हो गया ॥ 



बिसरत बीती आपनी बिसरे बीता काल । 
सोर रहै  न अधुनै के, कल की नहीं सँभाल ॥ २८७९ ।।  
भावार्थ : --   पूर्व घटित घटनाओं के विस्मृत होने से अतीत विस्मृत होने लगता है। विस्मृत होते अतीत से वर्तमान का चिंतन नहीं होता,  जब वर्तमान का चिंतन नहीं होता तब भविष्य की सहेज नहीं होती ॥

और इतिहास अपने आप को दोहराने लगता है.....

सोए रहे सिर  दिन चढ़े जाग जाग कर भोर । 
बीते को सुमिरत  करौ  सबहि काल कर सोर ॥ २८८०॥ 
भावार्थ : --निद्रामग्न रहे तो दिन सिर पर चढ़ आता है इसलिए जग जग के भोर करनी चाहिए । अपने अतीत को समरण करते  तीनों ही काल का  चिंतन करते रहना चाहिए चिंतन से ही सहेज होती है ॥






--- ॥ दोहा-दशम २८६ ॥ -----,


मैल मलिन मनि मोतिया सागर सबहि  सँजोहि । 
तहँ पारस कहँ पाइबे, जो गिरि मलिनहि जोहि ।२८६१  । 
भावार्थ : -- मेल मलिन हो कि माणिक मुक्ता  सागर में सभी कुछ संकलित होता है । उसी पर्वत रूपी पोथी में पारस कहाँ  प्राप्त होगा जो मलिनता ग्रहण करती हो ॥

कबीर पंडत की कथा सो चोरन  की नाउ । 
सब अंधे मिली बैठिया भावै तहँ लिए जाउ । । 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- ये तो कबीर दास जी ने भी कहा ही  पंडत का संविधान उसके जैसा ही खंडत है वह तो उस चोर की नाउ के जैसे है जिसपर अविवेकी विराजमान हैं  वे चमड़ी-दमड़ी वाली कुरीतियों की ओर,  अधर्म की ओर दासता  की ओर जहाँ चाहे वहां ले जाए,  इसपर मति चढियो  ॥

कोई तेरी सीख के अपणी सिखी सिखाए । 
कोई भटके पँथी कू, सत्पथ पर लिए जाए ।२८६२ । 
भावार्थ : -- कोई  तेरी तो सीखता है अपनी सिखाता है । कोई दिग्भ्रमित पथिक का पथप्रदर्शन कर उसे सत्पथ की ओर  ले जाता है ।।

देस धरम बिसराए  गया जाति कू भूल । 
माटी मैला खाए के, पड़ा  आन  के मूल ।२८६३। 
भावार्थ : -- अपने  देश के आचार -विचार विस्मृत कर तू अपनी व्युत्पत्ति अपने मूल पुरुष को  भूल गया । मांस का भक्षण कर पराए मूल में पड़ा है ॥  डी इन ए किसको बोलते हैं इसको.....पहले  जाति छूटती है फिर धर्म छूटता है फिर देश ही छूट जाता है फिर हम कहीं के नहीं रहते

प्रथम छूटत जाति- धरम  बहोरि देस परिवेस । 
ऐसो छूटत जी  गयो  रहे नहीं कछु सेस ।२८६४। 
भावार्थ : --  जाति छूटने से धर्म भी छूट जाता है धर्म  से  देश-परिवेश छूट जाता है इस प्रकार जब  प्राण छूट जाते है  तब उसकी यह स्मृति भी सेष नहीं रहती  कि वह  कहाँ  से आया था  ।

जैसे नाम  बताओ : -- हरी शंकर : - भारत से आया है.....आगे  भटिंडा वाले..... हाँ पंजाब से आया है

नाम बताओ..... ताऊ !! हरियाणे से आया है,


नाम बताओ : -- काहे ? बिहार से आया है,

नाम बताओ : -- गांधी : -- पता नहीं,

सुमिरत  पितु जन आपने जनम रहे सुरताए । 
होतब के सुरत रहे त  मरनी नहीं बिसुराए ।। २८६५ ।।  

भावार्थ : -- पितृ जनों सहित अपने  वंश पुरुष की स्मृति बनी रहने से जन्म का स्मरण रहता है,  जन्म के स्मरण रहने से भवितव्यता का चिंतन रहता है भवितव्यता के चिंतन से मृत्यु विस्मृत नहीं होती ॥

जाति  बिहुरे कुल बिहुरे बिहुरे अपना गाँव ।
बैठे  पराई नाउँ त  पैठे पराए ठाँव ॥  २८६६ ॥

भावार्थ : -- नाम धर्म का प्रतिक है  नाम से जाति  पृथक हो जाए तो वंश ही पृथक हो जाता है । वंश के  पृथक होने से  जन्म स्थान पृथक हो जाता है ।  इस प्रकार  पराई नाव में बैठने से देश भी  पराया  हो जाता है  और वह नाव पराए- देश में पहुंचा देती है ।

रामायन गीता सार श्रुति सुख बेद पुरान । 
हिन्दू की पहचान यह हिन्दू का अस्थान ॥ २८६७ ॥ 
भावार्थ : --रामायण और गीता का सार,  सुमधुर वेद पुराण वैदिक धर्म के अनुयायियों की पहचान है यह भारत की भूमि इन्हीं हिन्दुओं का स्थान है ॥

पापमय चरन  परिहरै करो धरम की राख । 
अपने मूल मिलाए के रहियो अपने साख ॥ २८६८ ॥ 
भावार्थ : -- पाप संकल्पित आचरण का  परित्याग कर धर्म की रक्षा करें । अपने मूल में ही संयुक्त होकर हम अपनी ही शाखा में फलीभूत हों ॥

आन  कही पतियाए  के बिहुरे अपना मूल । 
बिगुने बिय बियाए तहँ जागे पेड़ बबूल ॥ २८६९ ॥ 
भावाथ : -- दूसरों  के अनुमानित कथनों पर विश्वास करते हुवे जो अपने मूल से वियुक्त हो जाते हैं वह बीज निर्गुण होते हुवे बबूल के पेड़ बनकर उत्पन्न होते हैं ॥

 पग धरे मग घाउ करे लागे सूल बबूल । 
फर फूर भरपूर फरे जागे अपने मूल ॥ २८७० ॥ 
भावार्थ : -- मूल से वियुक्त बबूल के सूल  मार्ग में बाधा बन कर चरणों में आघात करते हैं । जो अपने मूल से ही संयुक्त रहते हैं वह पुष्प संपन्न स्वरूप में  अपनी शाख, अपने मूल, अपनी धरती के लिए फलदायक होते हैं ॥ 

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

--- ॥ दोहा-दशम २८५ ॥ -----

एक सब्द को तोड़ संग दियो दूज को जोड़ । 
करे हितारथ आपना साँच अर्थ  को  छोड़ ।२८५१। 
भावार्थ : --एक शब्द  को तोड़ कर उसके संग  नए शब्द को जोड़ दिया गया और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों का निरूपित किया । अपना हित सिद्ध करने के लिए उक्त शब्दों  के वास्तविक अर्थ का अनर्थ कर दिया गया ॥

यह बिद्बन के वचन रहे यही सुजन  की बानि । 
सार समुझै बिनहि गहै,करै सब्द बहु हानि ।२८५२। 
भावार्थ : - यह विद्वानों का व् सुधीजनों का यह मत है की यदि शब्द के सार को  पूर्णत: ज्ञात किए बिना उसे ग्रहण कर लिया जाए तो वह शब्द अतिसय हानि कारित करता है ॥

सीखे सुनै विचार लें,ताहि सबद सुख देय । 
बिना समुझए सब्द गहै, कछु न लाहा लेय ।। 
----= ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : --  भली भांति चिंतन- मनन कर ततपश्चात ग्रहण किए गए  शब्द सुखदाई होते हैं । बिना विचार किए  ग्रहण किए शब्द सदैव हानिकारक होते हैं ॥

 मूरख मुख मन मानसा कंठ रसन की माल । 
जैसे सब्द पिरोइये तैसी वाकी चाल ।२८५३। 
भावार्थ : -- निर्बुद्ध मुख के कंठ ने एक जिह्वा मालित की हुई है ।  जैसे शब्द पिरो दीजिए वह वैसा ही चाल  चलता है ॥ 

जो शब्द जग दीन करे सिंधु कोष सो मीन । 
कंठ रतन मनि मोतिया,पूर रसन कर पीन ।२८५४ । 
भावार्थ : -शब्द में अतिशय  शक्ति होती है एक शब्द जीवन का  एक मृत्यु  का कारण बन जाता है । जो शब्द कंठ की रसना माल में पूरित होकर संसार की  दुर्दशा करते हैं शब्द कोष के रत्नाकर में वह शब्द मीन के सदृश्य होते है । जो शब्द  लाभकारी होकर संसार का  कल्याण करते हैं वह कंठ में माणिक मुक्ता जैसे रत्नों के समरूप होते हैं ॥ 

निर्बुध समुझै आन जो अपने को बुधवान । 
ऐसेउ पर  कृपाकरत सन्मति दै भगवान ।२८५५। 
भावाथ : -- जो दूसरों को निर्बुद्ध समझ का स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं ।  हे भगवान ! उसपर सद्बुद्धि की कृपा बरसे ॥

नैनन चाढ़ी निंदिया देही चढिया मास । 
खावन माही भूलया याके अर्थ बिकास ।२८५६। 
भावार्थ : - नयन निद्रा के  देह में मांस के वशीभूत रहे । चारों पहर चौसठ घडी मनुष्य खाने में ही लगा रहे । अधुनातन विकास का यही अर्थ है ॥ 

 एक बिकास मुख वासिहैं समानार्थ बिनास । 
गेह पति पद हीन  किए गेहि बनावै दास ।२८५७ । 
भावार्थ : -- एक विकास मुख में बसा हुवा है जो विनास का समानार्थी शब्द है । यह घर को स्वामी के पद से विहीन कर गृह स्वामी को दास बनाता है ॥ जब गृह स्वामी दास बन जाएंगे तब देश का दास बनना निश्चित है  चार तो हो गए....टुकड़े और क्या..... फिर दस होना निश्चित है..... 

 एक बिकासि  मुख वासिहैं समानार्थ विकास । 
गेह पति पद पानि रहे रहे न कोऊ दास ।२८५८। 
भावार्थ : -- एक विकास मुख ऐसा बसाओ जिसका अर्थ भी विकास ही हो ॥ घरों में पति का पद प्रतिष्ठित हो कोई भी दास न रहे ॥

भूली बीती आपनी, भूल परे इतिहास । 
दासा पथ सब बढ़  चले, जप एक सब्द बिकास ।२८५९। 
भावार्थ : -- विकास विकास का जाप क्या दे दिया भारत के निवासी आप बीती भूल गए उनको इतिहास  विस्मृत हो गया । वह पुनश्च दास बनने के पथ पर चल पड़े ॥ दूध के जले को छाछ भी फूँक फूँक के पीणी चाहिए,  तै तो दो बार जल ग्यो ॥

सब्द कोष सागर सरिस पोथी परबत सोहिँ । 
यहां रतन मनि मोतिया इहाँ पारसा जोहि  ।२८६०  । 
भावार्थ : -- ओर  सुण : --  शब्द  कोष यदि सागर है तो पोथी पर्वत है ॥ सागर माणिक मोती जैसे  रत्न व् पर्वत  पारस  ग्रहण किए होते हैं ॥

सोमवार, 3 अगस्त 2015

----- मिनिस्टर राजू १७४ -----


" राजू ! हमें सकूल में सिखाया गया मोहन दास महात्मा थे, जुआहर लाल पंडत थे, शास्त्री लाल बहादुर थे.....थे ?

राजू : -- नई 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८४ ॥ -----

बुधवान निरबोध रहे घर में रहे अभाउ । 
भाव जुगत का करिए जब बदले नहीं सुभाउ ।२८४१ । 
भावार्थ : -- जब घर में अभाव होता है तब बुद्धवान भी निर्बुद्ध हो जाता है । भाव होकर भी जब कोई अपने स्वभाव में बदलाव न करे तब भाव का क्या लाभ  । 

अर्थात  : -- भाव होने से स्वभाव नहीं बदलता, भाव होने से नीचा ऊंचा नहीं होता । नीचा  ऊँचा तब होता है जब उसे यह संज्ञान हो कि उसके नीचे भी एक संसार है ॥ 

ऊँची  पीठी पैठ के रहे नीच के नीच  । 
पदमन केहि पुकारिए फूल गहे जो कीच ।२८४२।  
भावार्थ  : -- ऊँचे पद का होकर भी कोई नीच का नीच रहे तब ऐसे पद प्रतिष्ठा का क्या लाभ  । पुष्पित होकर भी भगवान के चरणों में अर्पित न होकर कीचड़ को ही ग्रहण करे उसे पद्म कौन कहे। मनुष्य होकर भी जो पाशविक प्रवृति का त्याग न करे उसे मनुष्य कौन कहे ॥

जेतक ऊँची पीठ किए तेत नीच कर दीठ । 
ऊँचे ऊँची दीठ किए ता सैम कोउ न ढीठ ।२८४३। 
भावार्थ : --पीठिका जीतनी ऊँची हो दृष्टिका उतनी नीची होनी चाहिए । ऊँचे पीठिका पर भी जिसकी  दृष्टि ऊंची ही रहे उसके समान निर्दय कोई नहीं ॥ 

अजहुँ हम्हरे देस जो करते बाधहि बाध । 
साधु  कहै तिन साधुता अधम कहे अपराध ।२८४४-क  । 

पहने पानी पातरा नाम धरे को सोन । 
धीमन  ताको धोइये निकसे वाको होन ।२८४४ -ख । 
भावार्थ : -- पानी पत्र चढ़ा कर नाम स्वर्ण रख लेने से कोई स्वर्ण नहीं हो जाता । विचार शीलता से  वंचक पांडित्य  का प्रक्षालन करने से उसकी वास्तविकता तत्काल ही प्रकट हो जाती है ॥
भावार्थ : -- अब हमारे देश में जो निर्बाध रूप में उत्पीड़ित करते हैं उन्हें साधु कहो तो वह साधुवाद है यदि नीच कह दिया तो वह अपराध है ॥


मनमति के मत मान सब रीती उलटी होए । 
सोक पड़े तब हाँसिया उत्सउ पूरत रोए ।२८४५  । 
भावार्थ : -- धांधली बाजों,मनमानी करने वालों आपापंथियों के अनुमान को मान  कर इस देश की सभी रीतियाँ ही उलटी हो गई ।   शोक पर प्रसन्नता व्यक्त होने लगी है मांगलिक कार्य रो रो कर सम्पन्न होने लगे हैं ।।

स्पष्टीकरण : -- शब्दकोष में लिखा है कि आपापंथी स्वभाव से ही घोटालेबाज होते हैं.....

जाति लच्छन बिगड़े जब  बिगड़े देसाचार । 
औरन किन सँवारिए जब  अपनी नहीं सँभार ।२८४६। 
भावार्थ : -- अपनी जाति अपनी पहचान, अपने आधाराधायक त्याज्य  जाते हैं गुण धर्म बिगड़ जाता है जब किसी देश के  धर्म को बिगाड़ा जाता है । जब अपनी ही सहेज न हो तो कोई किसे और कैसे संवारे ॥

एक एड्स रोगी वह होता है जो बहिष्कार को सिरोधार कर प्रयास करता है कि कोई और इस रोग से  पीड़ित न हो । दूसरा वह होता है जिसे  बहिष्कार स्वीकार नहीं होता  और पूरे समाज को रोगी बनाता जाता है.....

बासा भाषा भेष संग, बिगर गयो परिवेश । 
आन बसे परदेसिया  भया  देस अवसेष ।२८४७। 
भावार्थ : -- जीवन चर्या  बिगड़ गई भाषा बिगड़ गई भेष बिगड़ गया इस बिगड़ी के संग परिवेश बिगड़ गया । जबसे पराए आन बसे तब से यह देश बिगड़ गया ॥


करें पाप दुःख दावहीँ दे रुज सोक बिजोग ।
सँकरे मन के मानसा नहीं  केहि के जोग ।२८४८ ।
भावार्थ : -- इनसे संकीर्ण मानसिकता से युक्त संकर योनिज जन्म लेते  जो संसार के  किसी योग्य नहीं होते । ये पाप आचरण में  प्रवृत्ति होकर संसार को दुख ही देते   इनके किए कुकरम से रोग वियोग और शोक की उत्पत्ति होती  ॥

जिअत जीउ  को सब रखे मुआ रखे नहि  कोए । 
मुआ परन  कहँ जाइबे,सोचत गहबर  होए ॥ २८४९॥ 
भावार्थ : -- जीते जीउ को  तो सब रखते हैं मरे को कोई नहीं रखता ।  ये मर जाएंगे तो कहाँ जाएंगे यह सोचकर घबराहट होती ॥ 

जीउति जगती देस के  जनम मरन  दुइ सींव । 
जाने को कब लाँघिये, सौ बरसी सब जीउ ॥ २८५० ॥  
भावार्थ : --  जीव-धारियों के देश में जन्म-मरण रूपी  दो सीमाएं है सभी जीवों को सौ वर्ष में ही अंतर्ध्यान होना है जाने कौन कब होए .....आजकल लोग मरते कहाँ है हमारे यहाँ तो अब मरनी पर भी मेवे बांटने लगे हैं पाने वाले कहते भाई अंतरध्यान होया सै.... 






----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...