अधृत अधमतस काल यह रँगे मलिनई रंग ।
न खावन का सऊर है नहि पहिरन के ढंग ।२७९१।
भावार्थ : -- आधुनिक कहलाने वाला यह वर्तमान पाप कर्म में इस भांति संलिप्त है कि न तो उसे खाने का शऊर है न पहनने का ढंग है ॥
प्रान जेत भोजन रहे प्यास जेतक पानि ।
रहनए भर कू बासना रह उपजोगि ग्यान ।२७९२।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- प्राण में प्राण रहे इतना भोजन हो, सभी कंठ की प्यास को तृप्त करे इतना पानी हो । रहने भर के लिए वासन हो, पहनने भर के लिए वस्त्र हों,ज्ञान हो तो उपयोगी हो ज्ञान-विज्ञानं का दुरूपयोग न हो ।
" जो ज्ञान-विज्ञान संसार को कष्टकारी हो वह ज्ञान-विज्ञान व्यर्थ है....."
आगे जी के जोउने मीही रतन के मोल ।
तिल तिल कर घर आइही तुल सुबरन के तोल ।२७ ९३।
भावार्थ : -- कारण कि इस समय जो अन्न अधिमूल्य में प्राप्त हो रहे हैं आने वाले समय में यह रत्नों के मोल, स्वर्ण के समरूप तुल, थोड़ा थोड़ा कर घर आएगा । तुम झोला भर डॉलर दोगे तो कोई दो चार कण अन्न देगा झोला भर ले जाना है तो एक परमाणु बम दे पानी चाहिए....? तो दो दे.....भूखे पेट तो बम भी नहीं फूटते.....
होवनहारी आपने देखिहि जब इतिहास ।
बिनासोन्मुख बिकास के, करिहि हाँस उपहास ।२७९४।
भावार्थ : -- आने वाला समय विनाश की विभीषिका पर बैठ कर जब अपना इतिहास देखेगा तब वह तुम्हारे इस विकास का हंस हंस कर उपहास करेगा । ऐसे : -- देखो इन उजड्डों को इसको ये विकास बोलते थे,, वो उनको देखो ऐसो को ये पिछड़े बोलते थे, और उस प्रेजि-डाँस को देखो उसका वो धौला-महल..? इसको ये लोग लोकतंत्र बोलते थे.....
जे जनता के राज अरु जे सेबक के साज ।
राजधिराजहु लजौरे करे न कोऊ काज ।२७९५।
भावार्थ : -- जनता का राज देखो, जन सेवक के साज देखो, ये साज तो राज तंत्र के महाधिराज को भी लज्जित कर दे, और कार्य के नाम पर केवल कहनी कहनी कहनी, करनी कुछ नहीं.....
पढ़ लिख अनपढ़ होत भए अनगढ़ सब संसार ।
ऊंचा जीवन जोउना ओछे करे विचार ।२७९६ ।
भावार्थ : -- पढ़ लिख कर भी अनपढ़ रहते हुवे इस प्रकार यह संसार असभ्य, अशिष्ट होता जाएगा । कारण कि ऊंची जीवन शैली विचारों को निम्न कोटि का कर देती है ऊँचा जीवन नीचे विचार से मनुष्य अँध मति हो जाता है फिर उसे भले-बुरे का भान नहीं होता ॥
सुघर देसाचार संग सत आहार विहार ।
साँचे माणिक रतन सम सुथरे होत विचार ।२७९७ ।
भावार्थ : -- सात्विक आहार-विहार के सह उत्तम देशाचार से विचार सुविचार होकर रत्न के समान हो जाते हैं । इन रत्नों का प्रकाश भविष्य का दिशानिर्दशन करता हुवा उसे सन्मार्गी बनाता हैं ॥
खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा समय के अनुसार ही होनी चाहिए....
जीवन साधन धन सरिस जल कन रतन समान ।
जो इ जग जुगाड़ रखे सोइ जगत धनवान ।२७९८ ।
भावार्थ : -- यदि जीवन के साधन यदि वास्तविक धन है तो जीवन आधार जल व् अन्न वास्तविक रत्न हैं । डॉलर हीरे मोती नहीं ॥ जो धन का भंडारी हो व् रत्नों को अधिकधिक प्रबंधक हो जगत में वही धनी है ॥
जीवन पंथ में जान जग कब रन खेलाए ।
अपने जोग सँभार के जागत जोड़ लगाए ।२७९९ ।
भावार्थ : -- जीवन के पंथ में यह विश्व न जाने कब रण खेला दे । इसलिए अपने रत्नों का धन के भंडारों का अपने वास्तविक उत्पादन का जोड़ लगा कर रखें केवल अस्त्र से काम नहीं चलेगा ।।
यह जग बाहु चढ़ाए जब बँधे सबहि बैपार ।
धर मिले न धराउ मिले मिले न कतहु उधार ।२८०० ।
भावार्थ : -- जब यह विश्व रण करने पर उतर आता है तब सारे व्यापार अवरुद्ध हो जाते हैं मुद्रा का कोई मूल्य नहीं होता । आने वाली वस्तुएं आती नहीं जाने वाली जाती नहीं चाँदी सोना डॉलर पौंड के बदले अन्न-जल देकर कोई शत्रु को थोड़े ही पालेगा । जितना अन्न है, जल है, ईंधन है, उतने में ही काम चलाना पड़ता है ॥ जहाज रानी की कहानी वायु यान की कथा तो ईंधन के बिना प्रारम्भ ही नहीं होती । न धरी धरोहरें मिलती हैं न धर मिलते हैं फिर तो कोई उधारी भी नहीं मिलती ॥
जब जग रन खेलाए तब हित चिंतक कू देख ।
अपने पराए जान के , जोग रखेँ लिख लेख ।२८०१।
भावार्थ : - जब यह विश्व रण करने पर उद्यत हो जाए तब हित चिंतको व् अहित चिंतक पर दृष्टि बना रखे । अपने पराए का ज्ञान कर सबका प्रपंच लिखित में रखें ॥
भूखा को नहि सोइये, करिहौ ऐसो काज ।
आपदा कबहुँ होइये, रह सब काल समाज ।२८०२।
भावार्थ : -- देख में भूखा कोई नहीं सोए इतना प्रबंध कर रखना चाहिए । आपदा किसी समय भी आ सकती है उस हेतु सदैव तैयार रहना चाहिए । युद्ध भी एक आपदा ही है इसमें सहयोग नहीं मिलता । इस आपदा में कोई पानी कोई नहीं देता, खाना भी नहीं देता । अब जब जब आपदा आई, विकसित देशों पर आई तो उन्हें सबसे अधिक पानी चाहिए था..... सोना नहीं चांदी नहीं हीरे नहीं मोती नहीं डॉलर-पौंड नहीं.....
साँच रतन पहिचान के सांचे धन को पास ।
जोड़ रखे सो साइयाँ, तोड़े वाके दास ।२८०३।
भावार्थ : -- जो पृथ्वी के वास्तविक रत्नों की परख रखेगा, वास्तविक धन के भंडार ( फिक्स डिपॉजिट ) सँजो कर अपने पास रखेगा वह स्वामी होगा । जो इन्हें तोड़ के विलासिता में अपव्यय करेगा वह उसका दास होगा ॥
सम्पद गति तस होइये गहे जैसेउ पानि ।
राम गाहे जग हित करे रावण गहे त हानि ।२८०४।
भावार्थ : -- सम्पदा जैसे हस्त में होती है उसकी गति भी वैसी ही होती है । रावण द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा विश्व का विनाश करती है भगवान श्री राम द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा कल्याण करती है ॥
जब जग कतहुँ पीर परे रखे रतन दे दान ।
दुर्नीति कर भीड़ पड़े तीन दे देत ग्यान ।२८०५।
भावार्थ : -- जब जगत में कहीं कोई पीड़ा में पड़ा हो तो संजोए हुवे वास्तविक रत्नों का दान करना चाहिए । कोई नीति विरुद्ध आचरण करते लड़ भिड़े तो उसे पराजित कर तत्पश्चात सन्मार्ग में लगाते हुवे उन रत्नों करना चााहिए ॥
अधर्मी को पीर परे रखे रतन कर दान ।
सन्मार्ग लिए जाए जो तिनके देत ग्यान ।२८०६।
भावार्थ : - यदि किसी विलासाँध अधर्मी पर आपदा आन पड़े तब उसे सन्मार्ग दर्शयिता ज्ञान देते हुवे उन रत्नों का दान करना चाहिए । जैसे आहार-विहार ठीक करो, बुलेट को भूल जाओ, ज्यादा हवा में मत उड़ो, देखा हवाई-अड्डे कैसे डूबते हैं कितने पेड़ थे वहां ? आदि आदि..... यदि ठीक नहीं किया तो अगली बार पानी नहीं मिलेगा .....
सतयुग में जो रीत रहि कलजुग में बिपरीत ।
भावार्थ : -- जबसे ये दुष्टों के अधीन हुवा है तबसे किसान भूमि हीन हो गए उसमें हरिन्मणि नहीं रहे, नदियों मलीन हो गई उनमें हीरे मोती नहीं रहे ॥
वे देश के विद्रोही है जो नदियों को मलीन करते हैं और किसानों को भूमि-हीन.....
पहिले जो बरियाए भए, सिंहासन आसीन ।
निजस्वार्थतस अजहुँ ताहि चुनि चुनि होए अधीन ।२८०९ ।
भावार्थ : -- भारत का भविष्य काल जब अपना इतिहास देखेगा तब उपहास कर कहेगा देखो जिन लोगों ने बलपूर्वक भारत का सिंहासन छीना था अपने छोटे छोटे स्वार्थ हेतु प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष रूप से उनका ही चुनाव कर उनके दास बन गए.....॥
करे राज बरियाए तो जन जन कहँ पितु माइ ।
हस्त गहे भाई कहे कंठ गहे कह साँइ ।२८१०।
भावार्थ : -- जब विदेशी भारत पर बलपूर्वक राज किए तो जनता ने उन्हें माई-बाप बना लिया । जब हाथ पकड़ लिए तब भाई बाप बना लिया जब कंठ जा लगे तब खसम बना लिया । देखो इनके भाई-चारे को.....
न खावन का सऊर है नहि पहिरन के ढंग ।२७९१।
भावार्थ : -- आधुनिक कहलाने वाला यह वर्तमान पाप कर्म में इस भांति संलिप्त है कि न तो उसे खाने का शऊर है न पहनने का ढंग है ॥
प्रान जेत भोजन रहे प्यास जेतक पानि ।
रहनए भर कू बासना रह उपजोगि ग्यान ।२७९२।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- प्राण में प्राण रहे इतना भोजन हो, सभी कंठ की प्यास को तृप्त करे इतना पानी हो । रहने भर के लिए वासन हो, पहनने भर के लिए वस्त्र हों,ज्ञान हो तो उपयोगी हो ज्ञान-विज्ञानं का दुरूपयोग न हो ।
" जो ज्ञान-विज्ञान संसार को कष्टकारी हो वह ज्ञान-विज्ञान व्यर्थ है....."
आगे जी के जोउने मीही रतन के मोल ।
तिल तिल कर घर आइही तुल सुबरन के तोल ।२७ ९३।
भावार्थ : -- कारण कि इस समय जो अन्न अधिमूल्य में प्राप्त हो रहे हैं आने वाले समय में यह रत्नों के मोल, स्वर्ण के समरूप तुल, थोड़ा थोड़ा कर घर आएगा । तुम झोला भर डॉलर दोगे तो कोई दो चार कण अन्न देगा झोला भर ले जाना है तो एक परमाणु बम दे पानी चाहिए....? तो दो दे.....भूखे पेट तो बम भी नहीं फूटते.....
होवनहारी आपने देखिहि जब इतिहास ।
बिनासोन्मुख बिकास के, करिहि हाँस उपहास ।२७९४।
भावार्थ : -- आने वाला समय विनाश की विभीषिका पर बैठ कर जब अपना इतिहास देखेगा तब वह तुम्हारे इस विकास का हंस हंस कर उपहास करेगा । ऐसे : -- देखो इन उजड्डों को इसको ये विकास बोलते थे,, वो उनको देखो ऐसो को ये पिछड़े बोलते थे, और उस प्रेजि-डाँस को देखो उसका वो धौला-महल..? इसको ये लोग लोकतंत्र बोलते थे.....
जे जनता के राज अरु जे सेबक के साज ।
राजधिराजहु लजौरे करे न कोऊ काज ।२७९५।
भावार्थ : -- जनता का राज देखो, जन सेवक के साज देखो, ये साज तो राज तंत्र के महाधिराज को भी लज्जित कर दे, और कार्य के नाम पर केवल कहनी कहनी कहनी, करनी कुछ नहीं.....
पढ़ लिख अनपढ़ होत भए अनगढ़ सब संसार ।
ऊंचा जीवन जोउना ओछे करे विचार ।२७९६ ।
भावार्थ : -- पढ़ लिख कर भी अनपढ़ रहते हुवे इस प्रकार यह संसार असभ्य, अशिष्ट होता जाएगा । कारण कि ऊंची जीवन शैली विचारों को निम्न कोटि का कर देती है ऊँचा जीवन नीचे विचार से मनुष्य अँध मति हो जाता है फिर उसे भले-बुरे का भान नहीं होता ॥
सुघर देसाचार संग सत आहार विहार ।
साँचे माणिक रतन सम सुथरे होत विचार ।२७९७ ।
भावार्थ : -- सात्विक आहार-विहार के सह उत्तम देशाचार से विचार सुविचार होकर रत्न के समान हो जाते हैं । इन रत्नों का प्रकाश भविष्य का दिशानिर्दशन करता हुवा उसे सन्मार्गी बनाता हैं ॥
खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा समय के अनुसार ही होनी चाहिए....
जीवन साधन धन सरिस जल कन रतन समान ।
जो इ जग जुगाड़ रखे सोइ जगत धनवान ।२७९८ ।
भावार्थ : -- यदि जीवन के साधन यदि वास्तविक धन है तो जीवन आधार जल व् अन्न वास्तविक रत्न हैं । डॉलर हीरे मोती नहीं ॥ जो धन का भंडारी हो व् रत्नों को अधिकधिक प्रबंधक हो जगत में वही धनी है ॥
जीवन पंथ में जान जग कब रन खेलाए ।
अपने जोग सँभार के जागत जोड़ लगाए ।२७९९ ।
भावार्थ : -- जीवन के पंथ में यह विश्व न जाने कब रण खेला दे । इसलिए अपने रत्नों का धन के भंडारों का अपने वास्तविक उत्पादन का जोड़ लगा कर रखें केवल अस्त्र से काम नहीं चलेगा ।।
यह जग बाहु चढ़ाए जब बँधे सबहि बैपार ।
धर मिले न धराउ मिले मिले न कतहु उधार ।२८०० ।
भावार्थ : -- जब यह विश्व रण करने पर उतर आता है तब सारे व्यापार अवरुद्ध हो जाते हैं मुद्रा का कोई मूल्य नहीं होता । आने वाली वस्तुएं आती नहीं जाने वाली जाती नहीं चाँदी सोना डॉलर पौंड के बदले अन्न-जल देकर कोई शत्रु को थोड़े ही पालेगा । जितना अन्न है, जल है, ईंधन है, उतने में ही काम चलाना पड़ता है ॥ जहाज रानी की कहानी वायु यान की कथा तो ईंधन के बिना प्रारम्भ ही नहीं होती । न धरी धरोहरें मिलती हैं न धर मिलते हैं फिर तो कोई उधारी भी नहीं मिलती ॥
जब जग रन खेलाए तब हित चिंतक कू देख ।
अपने पराए जान के , जोग रखेँ लिख लेख ।२८०१।
भावार्थ : - जब यह विश्व रण करने पर उद्यत हो जाए तब हित चिंतको व् अहित चिंतक पर दृष्टि बना रखे । अपने पराए का ज्ञान कर सबका प्रपंच लिखित में रखें ॥
भूखा को नहि सोइये, करिहौ ऐसो काज ।
आपदा कबहुँ होइये, रह सब काल समाज ।२८०२।
भावार्थ : -- देख में भूखा कोई नहीं सोए इतना प्रबंध कर रखना चाहिए । आपदा किसी समय भी आ सकती है उस हेतु सदैव तैयार रहना चाहिए । युद्ध भी एक आपदा ही है इसमें सहयोग नहीं मिलता । इस आपदा में कोई पानी कोई नहीं देता, खाना भी नहीं देता । अब जब जब आपदा आई, विकसित देशों पर आई तो उन्हें सबसे अधिक पानी चाहिए था..... सोना नहीं चांदी नहीं हीरे नहीं मोती नहीं डॉलर-पौंड नहीं.....
साँच रतन पहिचान के सांचे धन को पास ।
जोड़ रखे सो साइयाँ, तोड़े वाके दास ।२८०३।
भावार्थ : -- जो पृथ्वी के वास्तविक रत्नों की परख रखेगा, वास्तविक धन के भंडार ( फिक्स डिपॉजिट ) सँजो कर अपने पास रखेगा वह स्वामी होगा । जो इन्हें तोड़ के विलासिता में अपव्यय करेगा वह उसका दास होगा ॥
सम्पद गति तस होइये गहे जैसेउ पानि ।
राम गाहे जग हित करे रावण गहे त हानि ।२८०४।
भावार्थ : -- सम्पदा जैसे हस्त में होती है उसकी गति भी वैसी ही होती है । रावण द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा विश्व का विनाश करती है भगवान श्री राम द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा कल्याण करती है ॥
जब जग कतहुँ पीर परे रखे रतन दे दान ।
दुर्नीति कर भीड़ पड़े तीन दे देत ग्यान ।२८०५।
भावार्थ : -- जब जगत में कहीं कोई पीड़ा में पड़ा हो तो संजोए हुवे वास्तविक रत्नों का दान करना चाहिए । कोई नीति विरुद्ध आचरण करते लड़ भिड़े तो उसे पराजित कर तत्पश्चात सन्मार्ग में लगाते हुवे उन रत्नों करना चााहिए ॥
अधर्मी को पीर परे रखे रतन कर दान ।
सन्मार्ग लिए जाए जो तिनके देत ग्यान ।२८०६।
भावार्थ : - यदि किसी विलासाँध अधर्मी पर आपदा आन पड़े तब उसे सन्मार्ग दर्शयिता ज्ञान देते हुवे उन रत्नों का दान करना चाहिए । जैसे आहार-विहार ठीक करो, बुलेट को भूल जाओ, ज्यादा हवा में मत उड़ो, देखा हवाई-अड्डे कैसे डूबते हैं कितने पेड़ थे वहां ? आदि आदि..... यदि ठीक नहीं किया तो अगली बार पानी नहीं मिलेगा .....
सतयुग में जो रीत रहि कलजुग में बिपरीत ।
तापर जग मैं होत रहि सदा सत्य की जीत ।२८०७।
आए इहां सो सबहि गए जीते रहे न कोए ।
जैसे अमरन पाइया तैसे साज सँजोए ।२८०८ -क ।
यह भारत की भुइ भई जब ते अधम अधीन ।
हरिया हरिमणि हीन भए नदिया भयउ मलीन ।२८० ८-ख ।
भावार्थ : -- जो यहाँ आए वे सभी गए रहा कोई नहीं । नाम अमर रखो या अमरीका, नाम रखने से और सौ बरस का सामान जोड़ रखने से कोई अमर थोड़े हो जाता है ॥
भारत-भूमि के सन्दर्भ में कहें तो पहले हम लोग भी सोचते थे की हम अमर हैं कहते थे सौर-मंडल में नौ गृह होते हैं ब्रम्हांड/आकाशगंगा जब परिकमा पूर्ण करता है उसे कल्प कहते हैं एक कल्प में चार युग होते हैं सत युग का मान चार सहस्त्र आठ शतकीय दिव्य वर्ष, त्रेता का तीन सहस्त्र छ: शतकीय दिव्य वर्ष, द्वापर का द्वि सहस्त्र चार शतकीय दिव्य वर्ष व् कलि का एक सहस्त्र द्वि शतकीय दिव्य वर्ष इस प्रकार कल्प का कुल मान द्वादस सहस्त्रिय दिव्य वर्ष का होता है दिव्य वर्ष मानव वर्ष से तीन सौ साठ गुना अधिक होता है कारण की मानव का वर्ष पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित है
पहले हम लोग भी सोचते थे हम अमर हैं..... अमर अमर कहते हुवे कब मर गए पता ही नहीं चला.....
भावार्थ : -- सतयुग में जो रीत रही कलयुग उसके विपरीत रहा, तथापि प्रत्येक काल में सत्य ही विजय प्राप्तकर्ता रहा ।। सत्य धर्म का आचरण है ॥
आए इहां सो सबहि गए जीते रहे न कोए ।
जैसे अमरन पाइया तैसे साज सँजोए ।२८०८ -क ।
हरिया हरिमणि हीन भए नदिया भयउ मलीन ।२८० ८-ख ।
भावार्थ : -- जो यहाँ आए वे सभी गए रहा कोई नहीं । नाम अमर रखो या अमरीका, नाम रखने से और सौ बरस का सामान जोड़ रखने से कोई अमर थोड़े हो जाता है ॥
भारत-भूमि के सन्दर्भ में कहें तो पहले हम लोग भी सोचते थे की हम अमर हैं कहते थे सौर-मंडल में नौ गृह होते हैं ब्रम्हांड/आकाशगंगा जब परिकमा पूर्ण करता है उसे कल्प कहते हैं एक कल्प में चार युग होते हैं सत युग का मान चार सहस्त्र आठ शतकीय दिव्य वर्ष, त्रेता का तीन सहस्त्र छ: शतकीय दिव्य वर्ष, द्वापर का द्वि सहस्त्र चार शतकीय दिव्य वर्ष व् कलि का एक सहस्त्र द्वि शतकीय दिव्य वर्ष इस प्रकार कल्प का कुल मान द्वादस सहस्त्रिय दिव्य वर्ष का होता है दिव्य वर्ष मानव वर्ष से तीन सौ साठ गुना अधिक होता है कारण की मानव का वर्ष पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित है
पहले हम लोग भी सोचते थे हम अमर हैं..... अमर अमर कहते हुवे कब मर गए पता ही नहीं चला.....
भावार्थ : -- जबसे ये दुष्टों के अधीन हुवा है तबसे किसान भूमि हीन हो गए उसमें हरिन्मणि नहीं रहे, नदियों मलीन हो गई उनमें हीरे मोती नहीं रहे ॥
वे देश के विद्रोही है जो नदियों को मलीन करते हैं और किसानों को भूमि-हीन.....
पहिले जो बरियाए भए, सिंहासन आसीन ।
निजस्वार्थतस अजहुँ ताहि चुनि चुनि होए अधीन ।२८०९ ।
भावार्थ : -- भारत का भविष्य काल जब अपना इतिहास देखेगा तब उपहास कर कहेगा देखो जिन लोगों ने बलपूर्वक भारत का सिंहासन छीना था अपने छोटे छोटे स्वार्थ हेतु प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष रूप से उनका ही चुनाव कर उनके दास बन गए.....॥
करे राज बरियाए तो जन जन कहँ पितु माइ ।
हस्त गहे भाई कहे कंठ गहे कह साँइ ।२८१०।
भावार्थ : -- जब विदेशी भारत पर बलपूर्वक राज किए तो जनता ने उन्हें माई-बाप बना लिया । जब हाथ पकड़ लिए तब भाई बाप बना लिया जब कंठ जा लगे तब खसम बना लिया । देखो इनके भाई-चारे को.....
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें