सुख साधन सम्पन होत मानस जग एहि काल ।
बाहिर दरसे मानसा भीतर सोहि ब्याल ।२७८१।
भावार्थ : -- सुखप्रद साधनों से संपन्न मनुष्य का बाह्यचरण करता हुवा इस काल के मनुष्य की अंतरगति पुनश्च हिंसक व् असभ्य पशु सदृश्य हो गई ॥
नयन दिखाई दिए नहीं दूसर के संताप ।
वह मानस पसु है जो खावै आपहि आप ।२७८२।
भवार्थ : -- जिसकी दृष्टि को स्वयं से अतिरिक्त अन्य किसी का संताप दर्शित न हो, जो स्वयं ही खाता हो वह मनुष्य पशु के सदृश्य है ॥
रहन सहन अस होइये जो जग को सुख दाए ।
जाके सुख सँग दुःख परे, सो तो मानस नाए ।२७८३।
भावार्थ : -- मनुष्य की जीवन चर्या ऐसी होनी चाहिए जो संसार को सुख प्रदान करे । जिसकी चर्या संसार के लिए कष्ट कर हो वह मनुष्य मनुष्य नहीं ॥
कलुष करम की कलिमा छाए जगत एहि काल ।
बाहिर सो भल मानसा, भीतर सोहि ब्याल ।२७८४ ।
भावार्थ : -- इस काल में पाप कर्म की कालिमा संसार में इस भांति व्याप्त हो चली है कि भद्रता के दर्शन बाहर से ही हो रहे हैं अंतरमन से तो सभी अभद्र व् असभ्य हैं ॥
क्रांकीटी जंगलों के जंगली पहले अंतर जगत सुधारो फिर बाहर की सुधि करो.....
नेम रहे न बंध रहे रहे न कतहुँ न्याय ।
जहँ अस जंगल राज तहँ चहुँ पर ब्यालहि पाए ।२७८५ ।
भावार्थ : -- नियम न हो निरंबंध न हो न्याय-व्याय भी न हो । जहाँ ऐसा जंगल राज हो वहां फिर चारों ओर मनुष्य के वेश में फिर जंगली जंतु ही मिलेंगे ॥
सहज रूप में लाहिया अजहुँ काल जो चाह ।
जाने होवनिहार कू सो सब मिलिहि कि नाह ।२७८६ ।
भावार्थ : -- अधुनातन काल की आवश्यकताएं सहज रूप में सुलभ हो रही है । भविष्य काल को जाने यह सब प्राप्त होगा भी कि नहीं ॥ वंचित भविष्य काल धिक्कारेगा , हमने ऐसे शासको को सिरोधार किया जिन्होने एक हस्ताक्षर के लिए ऊर्जा का कितना अपव्यय किया ॥
अंकन हुँत एक आखरी चढ़त फिरैं बैमान ।
धूनि छेपक होत जात कहन कहें जा कान ।२७८७।
भावार्थ : -- एक हस्ताक्षर के लिए जो विमानों का प्रयोग करेंगे , ध्वनि क्षेपक के होते हुवे भी जो अपनी कहानी विमान चढ़ के कान में कहते दिखाई देंगे तो भविष्यकाल उन्हें उजड्ड ही कहेगा ॥
अजहुँ जग में जेहि भाँति भोग रहे भव भोग ।
भवितब में धिक् धिक् करिहि अनगढ़ कह सब लोग ।२७८८ ।
भावार्थ : -- वर्तमान में भूमि के सुख साधनों का जिस भांति दुरुपयोग हो रहा है ( थाली लिए पूरा कंठ भरे उसी में उलट दिए ) । भविष्य में धिक्कारते हुवे उन्हें सब लोग असभ्य अशिष्ट उजड्ड और जाने क्या क्या कहेंगे ॥
बीती बतियाँ सोंहि हम हम सों होवनिहार ।
जाग लगे उजियार है न तरु गहन अँधियार ।२७८९ ।
भावार्थ : -अतीत से यह वर्त्तमान है वर्तमान से भविष्य होगा । अतीत जागृत था तो हम प्रकाशित हैं यदि हम जागृत रहे तो भविष्य भी प्रकाशित रहेगा अन्यथा उसके चारों ओर अंधेरा ही अन्धेरा होगा ॥
रे अधुनातन काल तू कल का कलुष अतीत ।
अंतर जगत सुधार के सुघर रूप में बीत ।२७९०।
भावार्थ : -- हे वर्तमान काल तू कल का कलुषित अतीत मत बन अपने अंतर जगत को सुधार और सभ्य व् सभाजित रूप में व्यतीत हो ॥
बाहिर दरसे मानसा भीतर सोहि ब्याल ।२७८१।
भावार्थ : -- सुखप्रद साधनों से संपन्न मनुष्य का बाह्यचरण करता हुवा इस काल के मनुष्य की अंतरगति पुनश्च हिंसक व् असभ्य पशु सदृश्य हो गई ॥
नयन दिखाई दिए नहीं दूसर के संताप ।
वह मानस पसु है जो खावै आपहि आप ।२७८२।
भवार्थ : -- जिसकी दृष्टि को स्वयं से अतिरिक्त अन्य किसी का संताप दर्शित न हो, जो स्वयं ही खाता हो वह मनुष्य पशु के सदृश्य है ॥
रहन सहन अस होइये जो जग को सुख दाए ।
जाके सुख सँग दुःख परे, सो तो मानस नाए ।२७८३।
भावार्थ : -- मनुष्य की जीवन चर्या ऐसी होनी चाहिए जो संसार को सुख प्रदान करे । जिसकी चर्या संसार के लिए कष्ट कर हो वह मनुष्य मनुष्य नहीं ॥
कलुष करम की कलिमा छाए जगत एहि काल ।
बाहिर सो भल मानसा, भीतर सोहि ब्याल ।२७८४ ।
भावार्थ : -- इस काल में पाप कर्म की कालिमा संसार में इस भांति व्याप्त हो चली है कि भद्रता के दर्शन बाहर से ही हो रहे हैं अंतरमन से तो सभी अभद्र व् असभ्य हैं ॥
क्रांकीटी जंगलों के जंगली पहले अंतर जगत सुधारो फिर बाहर की सुधि करो.....
नेम रहे न बंध रहे रहे न कतहुँ न्याय ।
जहँ अस जंगल राज तहँ चहुँ पर ब्यालहि पाए ।२७८५ ।
भावार्थ : -- नियम न हो निरंबंध न हो न्याय-व्याय भी न हो । जहाँ ऐसा जंगल राज हो वहां फिर चारों ओर मनुष्य के वेश में फिर जंगली जंतु ही मिलेंगे ॥
सहज रूप में लाहिया अजहुँ काल जो चाह ।
जाने होवनिहार कू सो सब मिलिहि कि नाह ।२७८६ ।
भावार्थ : -- अधुनातन काल की आवश्यकताएं सहज रूप में सुलभ हो रही है । भविष्य काल को जाने यह सब प्राप्त होगा भी कि नहीं ॥ वंचित भविष्य काल धिक्कारेगा , हमने ऐसे शासको को सिरोधार किया जिन्होने एक हस्ताक्षर के लिए ऊर्जा का कितना अपव्यय किया ॥
अंकन हुँत एक आखरी चढ़त फिरैं बैमान ।
धूनि छेपक होत जात कहन कहें जा कान ।२७८७।
भावार्थ : -- एक हस्ताक्षर के लिए जो विमानों का प्रयोग करेंगे , ध्वनि क्षेपक के होते हुवे भी जो अपनी कहानी विमान चढ़ के कान में कहते दिखाई देंगे तो भविष्यकाल उन्हें उजड्ड ही कहेगा ॥
अजहुँ जग में जेहि भाँति भोग रहे भव भोग ।
भवितब में धिक् धिक् करिहि अनगढ़ कह सब लोग ।२७८८ ।
भावार्थ : -- वर्तमान में भूमि के सुख साधनों का जिस भांति दुरुपयोग हो रहा है ( थाली लिए पूरा कंठ भरे उसी में उलट दिए ) । भविष्य में धिक्कारते हुवे उन्हें सब लोग असभ्य अशिष्ट उजड्ड और जाने क्या क्या कहेंगे ॥
बीती बतियाँ सोंहि हम हम सों होवनिहार ।
जाग लगे उजियार है न तरु गहन अँधियार ।२७८९ ।
भावार्थ : -अतीत से यह वर्त्तमान है वर्तमान से भविष्य होगा । अतीत जागृत था तो हम प्रकाशित हैं यदि हम जागृत रहे तो भविष्य भी प्रकाशित रहेगा अन्यथा उसके चारों ओर अंधेरा ही अन्धेरा होगा ॥
रे अधुनातन काल तू कल का कलुष अतीत ।
अंतर जगत सुधार के सुघर रूप में बीत ।२७९०।
भावार्थ : -- हे वर्तमान काल तू कल का कलुषित अतीत मत बन अपने अंतर जगत को सुधार और सभ्य व् सभाजित रूप में व्यतीत हो ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें