हम बासी ता देस के जहँ धरती कर कोष ।
घर घर सुख रासिहि रहैं जन जन मन संतोष ।२८२१ ।
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं जहाँ धरती के कर में कोष होता है । घर घर में सुख की राशि रहती है और जन जन के मन में संतोष रहता है ॥
हम वासी ता देस के जाति बरन जहँ आहि ।
नैन मिलावा चाहि जौ सैन मिलावा ताहि ।२८२२ ।
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं जहाँ स्वर्ण भी है रजत भी है ताँबा और लोहा भी भरपूर है । जो हमसे हमसे दृष्टि मिलाना चाहता है हम उसे सेना से मिला देते हैं ।। कोई लोहा ले के तो दिखाए.....
काँसा व् पीतल मिश्रित धातु है
हम वासी ता देस के दरस न पावै दास ।
जल मुतियन की झालरी खन खन रतन प्रगास ।२८२३ ।
भावार्थ : - हम उस देश के निवासी हैं जहाँ सभी पति हैं दास के तो दरसन भी दुर्लभ हैं यहाँ का जल जैसे मोतियों की झालर है और खंड खंड में रत्न प्रकाशित होते हैं ॥
हम वासी ता देस के जहाँ पुरुष की आन ।
दुःख सुख को ब्यापै नहि सब दिन एक समान ॥
------ ॥ संत कबीर दास ॥ -----
ग्यान की गुन धर्म की साँची मूरत ब्रम्ह ।
बोले सो तो बाउरा परम ग्यानी हम्ह ।२८२४ ।
भावार्थ :-- ब्राम्हण मनुष्य जाति का परिष्कृत रूप है, जैसे अग्नि में तपकर स्वर्ण शुद्धता को प्राप्त होता है वैसे ही यह जाति पीढ़ियों की त्याग व् तपस्या का परिणाम है ॥ जो यह कहता हो कि हम ज्ञानी हैं जो पूछना है पूछ लो वह मोह के विवश है ॥
तपो भुइ जब तपन लगे सुबरन लौन जगाए ।
ग्यान के गुन धरम के जन जन भूषन पाए ।२८२५ ।
भावार्थ : -- जब मनुष्य जाति वर्षों-वर्ष वनों में तपस्या करती है तब वह स्वर्ण कांति से युक्त हो जाती है उसके द्वारा जन जन को ज्ञान व् गुणों का वर्द्धन करने वाले आवश्यक धर्म स्वरूप आभूषणों की प्राप्ति होती है ॥
जो कुधात कुसंग करे सुबरन मल मलिनाए ।
गहे ग्यान गवाएँ के अपने गुन बिसराए ।२८२६ ।
भवार्थ : - आभूषणों में परिणित होना यह स्वर्ण का गुण धर्म है । यदि स्वर्ण किसी कुधातु अथवा विष का कुसंग करने से उसके अपने गुण धर्म विस्मृत हो जाते हैं यह विस्कृत गुण धर्म उसके संचित ज्ञान का ह्रास कर देता है ॥
रजता संगत राज है रजता संगत रूप ।
रजता रावन रूप है रजता राम सरूप ।२८२७ ।
भावार्थ : -- रजत यदि तापस चरण चले तो यह ईश्वरीय प्रतिमूर्ति होकर जगत का प्रबंधन करता है रजो गुण रुचियों का जनक है रजता में रसिता हो तो यह अन्धकार में परिणित हो जाता है अन्यथा यह प्रकाशित है ॥रजता वेश में तमसा हो तो रावण राज स्थापित होता है सात्विक वेश में रजता हो तो राम राज स्थापित होता है ॥
तामा भाजन रूप लिए भरे रहे भंडार ।
जीउ धन की जोग रखे जोग जोग कर धार ।२८२८ ।
भावार्थ : -- ताम्बा यदि तापस चरण चरे तो यह पात्र में परिणित होता है । यह जन जन का पात्र होकर उनके जीवन धन जैसे जल अन्न रूपी रत्नों को संजोकर रखता हैं और उसे पात्र को ही प्रदान करता हैं ॥
एक पीतर एक तामरा जो घर भाजन दोए ।
एक भाजन कर ओषधि दूसर बिष धर होए ।२८२९ ।
भावार्थ : -- एक पीतल और एक ताम्बा है यदि घर में ये दो प्रकार की धातु के भाजन हैं एक भाजन संञ्चित सामग्री को औषधि दूसरा विषधर होकर उसे विषाक्त कर देता हो तो कौन उत्तम है ?
लुहा उपकरन रूप लिए जन जन भवन सुहाए ।
जो को मल मलिनाए सो अपने गुन बिसराए ।२८३० ।
भावाथ : -- उपकरण में परिणित होना लोहे का गुणधर्म है । उपकरण रूप में वह भवन शोभा होकर उनकी जन जन के सुश्रुता करता है । लोहा यदि मलिनता का कुसंग करे तो वह चूर्ण होकर अपने गुणों को नष्ट कर देता है ॥
साधु सज्जन संग करे मेल मलिनता धोए ।
जो को परसे पारसा लोहा सुबरन होए ।२८३१ ।
भवार्थ : -- साधु सज्जनों का संग कर लोहा अपनी मलिनता से मुक्त होता जाता है यदि पारस से उसका स्पर्श हो जाए तो वह स्वर्ण में परिणित हो जाता है ॥ यह सत्य है की प्रत्येक चमकती धातु स्वर्ण नहीं होती, स्वर्ण अथवा पारस रूप को प्राप्त होकर स्वर्ण की सत्यता को भी अस्वीकार नहीं करना चाहिए ॥
निगुने गाँव न बासिये सब गुण को बिनसाए ।
चंदन पड़िया चौँक मेँ ईंधन बदले जाए ।।
----- ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- निर्गुण मनुष्यों के गाँव न तो बसना चाहिए न ही उन्हें बसाना चाहिए । कारण कि गुणहीनों की संगती में गुणवानों के भी सभी गुण नष्ट हो जाते हैं । रसोई में साधारण लकड़ियों के साथ चन्दन भी ईंधन हो जाता है ॥
साखि सब्द बहूँतक सुना मिटा न मन का मोह ।
पारस तक पहुंचा नहीं रहा लोह का लोह ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
परखी जब परिहार गए पाहन भए मनि हीर ।
समर सूर दुत्कार गए मसक मार भए बीर ।२८३२।
भावार्थ : -- पारखी जब त्यागे जाते हैं तब पत्थर रत्न हो जाते हैं ।जब समर सूर दुत्कारे जाते हैं तब ताली मारों के बीच मच्छड़ मार परम वीर कहलाते हैं ॥
साधौ सेवा धरम मैं पाँवर होत न कोइ ।
काल कलुषित करे जग में पाँवर सोइ ।२८३३ ।
भावार्थ : -- सेवा धर्म से कोई नीचा नहीं हो जाता । जो कोई पाप कर्म करते हैं हिंसा करते हैं कातर जीवों का वध करते हैं संसार में नीच वही हैं ॥
ऊँची पीठ न लाखिये हेय नयन सो नीच ।
केत सिखर चढ़ाई किए आवैं नीचहि खीँच ।२८३४।
भावार्थ : -- ऊँची पीठ से नीचे को हेय दृष्टि से नहीं दर्शना चाहिए । कोई कितना ही शिखर चढ़े उसे नीचे आना ही होता है ॥
मनु रूप पर मान न कर पाँवर केहि न जान ।
सब जी जीता राखिये आपने जीउ समान ।२८३५ ।
भावार्थ : -- अपने मनुष्य होने पर घमंड नहीं करना चाहिए किसी को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए । इस संसार में सभी जीवों को जीवन का अधिकार है अत: प्राणिमात्र पर दया कर अपने प्राणों के सरिस ही सभी प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए ॥
नीचा नीचा किन कहा, जाकी नीची ठौर ।
जिन लोचन नहि लाखिया ताके नीचे और ।२८३६।
भावार्थ : -- भारतीय वर्ण व्यवस्था में नीच उसे कहा गया जिसके ओछे विचार हों जिसकी आँखों को यह दिखाई नहीं देता हो कि उसके नीचे भी एक दुनिया है ॥
चारि चरण जो चारिहैं सो तो धर्मी आहि ।
धरम धरम पुकार करे सेष सकल भरमाहि ।२८३६।
भावार्थ : -- जो सत्य तप दया व् दान का आचरण करता है वस्तुत: वही धर्मात्मा है धर्म धर्म की रट लगाए शेष सभी भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं ॥
दया दया निर्दय कहै दया न दाया होए ।
द्रवित हृदय करि आपना वाका भाजन सोए ।२८३७ ।
भावार्थ : -- यदि निर्दय व् निर्मम दया की याचना करे तो वह दया का पात्र नहीं है जिसका ह्रदय प्राणिमात्र के कष्ट को देखकर द्रवित होने लगे दया का पात्र वही है ॥
दया दया निर्दोष कहँ दया न दाया कोए ।
दाता पद तिन दाइये जिन हरिदय दय होए ।२८३८-क ।
खूँट बँधे कसाई के कसक कसक जी देय ।
दंड पासक हँसी करे सहज रूप में लेय ॥ २८३८-ख ॥
भावार्थ : -- एक निर्दोष दया के पात्र ने भी दया की याचना की किन्तु उसे वह प्राप्त नहीं हुवा । दयालु का पद उसी को देना चाहिए जिसका ह्रदय प्राणी मात्र के कष्ट को देखकर करुण होता हो ॥
दया धर्म का मूल है । जिसके अंत:करण में प्राणी मात्र के लिए दया हो, जिसे अपने किए पर पश्चाताप हो जिसके पूर्व के क्रियाकलापों से यह प्रतीत होता हो की अमुक अपराधी भविष्य में समाज, देश अथवा विश्व के लिए उपयोगी हो सकता है वह आतंकवादी ही क्यों न हो, दया का पात्र है ॥
>> हत्या व्यक्तिगत उदेश्यों की पूर्ति हेतु व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की की जाती है..,
>> आतंक जन समूह की हत्या के सह समाज देश व् विश्व में भयकारी वातावरण निर्मित करने के लिए होता है यह सोच समझ कर किया जाने वाला अपराध है..,
>> फिर दोनों का दंड एक ही क्यों ? जबकि एक अपराध जघन्य व् दुसरा अति अति अति जघन्य हो..,
भावार्थ : -- निर्मम के पाले पड़े हुवे निर्दोष त्राहि त्राहि कर प्राण देते गए उन्हें दया नहीं प्राप्त हुई कारण की दयालु के पद पर पीठाधीश की दृष्टि में वह हेय थे घटिया थे । यही है भारत की अर्थगत शासन व्यवस्था ॥
भावार्थ : -- वहां कसाई खूंटे बंधा निर्दोष पशु तड़प तड़प कर प्राण देता है । और यहाँ दंड वधिक द्वारा प्राण दंड के अधिकारी के प्राण प्यार से पूछ पूछ कर लिए जाते हैं । जैसे भैया अब प्राण ले लूँ : -- भैया कहते है नहीं रे अभी भाभी को बबुआ हुवा है । ( कुछ समय पश्चात ) भैया भैया अब प्राण ले लूँ भैया कहते हैं : -- बबुआ गबरू हो गवा है तनिक बिहा हो जाने दो, बबुआ बच्चे वाला हो जाता है किन्तु भैया के प्राण नहीं लिए जाते । भैया के कुकर्मो का झंडा प्रहराने वाले चले जाते हैं किन्तु भैया नहीं जाते । जब संवेदनाएं मृत प्राय हो जाती हैं धर्म के वेश में अधर्म शासन करने लगता है तब ऐसी कुत्सित परिस्थितियां निर्मित होने लगती हैं ॥
मोरल ऑफ द स्टोरी
ऊँचे पदासीत् होत रचे न सातिक बाट ।
खाट दै सो आपने दुर्जन को दए ठाट ।२८४० ।
भावार्थ : -- ऊँचा स्थान प्राप्त करके भी (किसी भी क्षेत्र में )जो सन्मार्ग का निर्माण न करे वह दुर्जनों को ठाट-बाट देकर स्वयं को कष्टकारी मृत्यु देता है ॥
घर घर सुख रासिहि रहैं जन जन मन संतोष ।२८२१ ।
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं जहाँ धरती के कर में कोष होता है । घर घर में सुख की राशि रहती है और जन जन के मन में संतोष रहता है ॥
हम वासी ता देस के जाति बरन जहँ आहि ।
नैन मिलावा चाहि जौ सैन मिलावा ताहि ।२८२२ ।
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं जहाँ स्वर्ण भी है रजत भी है ताँबा और लोहा भी भरपूर है । जो हमसे हमसे दृष्टि मिलाना चाहता है हम उसे सेना से मिला देते हैं ।। कोई लोहा ले के तो दिखाए.....
काँसा व् पीतल मिश्रित धातु है
हम वासी ता देस के दरस न पावै दास ।
जल मुतियन की झालरी खन खन रतन प्रगास ।२८२३ ।
भावार्थ : - हम उस देश के निवासी हैं जहाँ सभी पति हैं दास के तो दरसन भी दुर्लभ हैं यहाँ का जल जैसे मोतियों की झालर है और खंड खंड में रत्न प्रकाशित होते हैं ॥
हम वासी ता देस के जहाँ पुरुष की आन ।
दुःख सुख को ब्यापै नहि सब दिन एक समान ॥
------ ॥ संत कबीर दास ॥ -----
ग्यान की गुन धर्म की साँची मूरत ब्रम्ह ।
बोले सो तो बाउरा परम ग्यानी हम्ह ।२८२४ ।
भावार्थ :-- ब्राम्हण मनुष्य जाति का परिष्कृत रूप है, जैसे अग्नि में तपकर स्वर्ण शुद्धता को प्राप्त होता है वैसे ही यह जाति पीढ़ियों की त्याग व् तपस्या का परिणाम है ॥ जो यह कहता हो कि हम ज्ञानी हैं जो पूछना है पूछ लो वह मोह के विवश है ॥
तपो भुइ जब तपन लगे सुबरन लौन जगाए ।
ग्यान के गुन धरम के जन जन भूषन पाए ।२८२५ ।
भावार्थ : -- जब मनुष्य जाति वर्षों-वर्ष वनों में तपस्या करती है तब वह स्वर्ण कांति से युक्त हो जाती है उसके द्वारा जन जन को ज्ञान व् गुणों का वर्द्धन करने वाले आवश्यक धर्म स्वरूप आभूषणों की प्राप्ति होती है ॥
जो कुधात कुसंग करे सुबरन मल मलिनाए ।
गहे ग्यान गवाएँ के अपने गुन बिसराए ।२८२६ ।
भवार्थ : - आभूषणों में परिणित होना यह स्वर्ण का गुण धर्म है । यदि स्वर्ण किसी कुधातु अथवा विष का कुसंग करने से उसके अपने गुण धर्म विस्मृत हो जाते हैं यह विस्कृत गुण धर्म उसके संचित ज्ञान का ह्रास कर देता है ॥
रजता संगत राज है रजता संगत रूप ।
रजता रावन रूप है रजता राम सरूप ।२८२७ ।
भावार्थ : -- रजत यदि तापस चरण चले तो यह ईश्वरीय प्रतिमूर्ति होकर जगत का प्रबंधन करता है रजो गुण रुचियों का जनक है रजता में रसिता हो तो यह अन्धकार में परिणित हो जाता है अन्यथा यह प्रकाशित है ॥रजता वेश में तमसा हो तो रावण राज स्थापित होता है सात्विक वेश में रजता हो तो राम राज स्थापित होता है ॥
तामा भाजन रूप लिए भरे रहे भंडार ।
जीउ धन की जोग रखे जोग जोग कर धार ।२८२८ ।
भावार्थ : -- ताम्बा यदि तापस चरण चरे तो यह पात्र में परिणित होता है । यह जन जन का पात्र होकर उनके जीवन धन जैसे जल अन्न रूपी रत्नों को संजोकर रखता हैं और उसे पात्र को ही प्रदान करता हैं ॥
एक पीतर एक तामरा जो घर भाजन दोए ।
एक भाजन कर ओषधि दूसर बिष धर होए ।२८२९ ।
भावार्थ : -- एक पीतल और एक ताम्बा है यदि घर में ये दो प्रकार की धातु के भाजन हैं एक भाजन संञ्चित सामग्री को औषधि दूसरा विषधर होकर उसे विषाक्त कर देता हो तो कौन उत्तम है ?
लुहा उपकरन रूप लिए जन जन भवन सुहाए ।
जो को मल मलिनाए सो अपने गुन बिसराए ।२८३० ।
भावाथ : -- उपकरण में परिणित होना लोहे का गुणधर्म है । उपकरण रूप में वह भवन शोभा होकर उनकी जन जन के सुश्रुता करता है । लोहा यदि मलिनता का कुसंग करे तो वह चूर्ण होकर अपने गुणों को नष्ट कर देता है ॥
साधु सज्जन संग करे मेल मलिनता धोए ।
जो को परसे पारसा लोहा सुबरन होए ।२८३१ ।
भवार्थ : -- साधु सज्जनों का संग कर लोहा अपनी मलिनता से मुक्त होता जाता है यदि पारस से उसका स्पर्श हो जाए तो वह स्वर्ण में परिणित हो जाता है ॥ यह सत्य है की प्रत्येक चमकती धातु स्वर्ण नहीं होती, स्वर्ण अथवा पारस रूप को प्राप्त होकर स्वर्ण की सत्यता को भी अस्वीकार नहीं करना चाहिए ॥
निगुने गाँव न बासिये सब गुण को बिनसाए ।
चंदन पड़िया चौँक मेँ ईंधन बदले जाए ।।
----- ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : -- निर्गुण मनुष्यों के गाँव न तो बसना चाहिए न ही उन्हें बसाना चाहिए । कारण कि गुणहीनों की संगती में गुणवानों के भी सभी गुण नष्ट हो जाते हैं । रसोई में साधारण लकड़ियों के साथ चन्दन भी ईंधन हो जाता है ॥
साखि सब्द बहूँतक सुना मिटा न मन का मोह ।
पारस तक पहुंचा नहीं रहा लोह का लोह ॥
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----
परखी जब परिहार गए पाहन भए मनि हीर ।
समर सूर दुत्कार गए मसक मार भए बीर ।२८३२।
भावार्थ : -- पारखी जब त्यागे जाते हैं तब पत्थर रत्न हो जाते हैं ।जब समर सूर दुत्कारे जाते हैं तब ताली मारों के बीच मच्छड़ मार परम वीर कहलाते हैं ॥
साधौ सेवा धरम मैं पाँवर होत न कोइ ।
काल कलुषित करे जग में पाँवर सोइ ।२८३३ ।
भावार्थ : -- सेवा धर्म से कोई नीचा नहीं हो जाता । जो कोई पाप कर्म करते हैं हिंसा करते हैं कातर जीवों का वध करते हैं संसार में नीच वही हैं ॥
ऊँची पीठ न लाखिये हेय नयन सो नीच ।
केत सिखर चढ़ाई किए आवैं नीचहि खीँच ।२८३४।
भावार्थ : -- ऊँची पीठ से नीचे को हेय दृष्टि से नहीं दर्शना चाहिए । कोई कितना ही शिखर चढ़े उसे नीचे आना ही होता है ॥
मनु रूप पर मान न कर पाँवर केहि न जान ।
सब जी जीता राखिये आपने जीउ समान ।२८३५ ।
भावार्थ : -- अपने मनुष्य होने पर घमंड नहीं करना चाहिए किसी को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए । इस संसार में सभी जीवों को जीवन का अधिकार है अत: प्राणिमात्र पर दया कर अपने प्राणों के सरिस ही सभी प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए ॥
नीचा नीचा किन कहा, जाकी नीची ठौर ।
जिन लोचन नहि लाखिया ताके नीचे और ।२८३६।
भावार्थ : -- भारतीय वर्ण व्यवस्था में नीच उसे कहा गया जिसके ओछे विचार हों जिसकी आँखों को यह दिखाई नहीं देता हो कि उसके नीचे भी एक दुनिया है ॥
चारि चरण जो चारिहैं सो तो धर्मी आहि ।
धरम धरम पुकार करे सेष सकल भरमाहि ।२८३६।
भावार्थ : -- जो सत्य तप दया व् दान का आचरण करता है वस्तुत: वही धर्मात्मा है धर्म धर्म की रट लगाए शेष सभी भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं ॥
दया दया निर्दय कहै दया न दाया होए ।
द्रवित हृदय करि आपना वाका भाजन सोए ।२८३७ ।
भावार्थ : -- यदि निर्दय व् निर्मम दया की याचना करे तो वह दया का पात्र नहीं है जिसका ह्रदय प्राणिमात्र के कष्ट को देखकर द्रवित होने लगे दया का पात्र वही है ॥
दया दया निर्दोष कहँ दया न दाया कोए ।
दाता पद तिन दाइये जिन हरिदय दय होए ।२८३८-क ।
खूँट बँधे कसाई के कसक कसक जी देय ।
दंड पासक हँसी करे सहज रूप में लेय ॥ २८३८-ख ॥
भावार्थ : -- एक निर्दोष दया के पात्र ने भी दया की याचना की किन्तु उसे वह प्राप्त नहीं हुवा । दयालु का पद उसी को देना चाहिए जिसका ह्रदय प्राणी मात्र के कष्ट को देखकर करुण होता हो ॥
दया धर्म का मूल है । जिसके अंत:करण में प्राणी मात्र के लिए दया हो, जिसे अपने किए पर पश्चाताप हो जिसके पूर्व के क्रियाकलापों से यह प्रतीत होता हो की अमुक अपराधी भविष्य में समाज, देश अथवा विश्व के लिए उपयोगी हो सकता है वह आतंकवादी ही क्यों न हो, दया का पात्र है ॥
>> हत्या व्यक्तिगत उदेश्यों की पूर्ति हेतु व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की की जाती है..,
>> आतंक जन समूह की हत्या के सह समाज देश व् विश्व में भयकारी वातावरण निर्मित करने के लिए होता है यह सोच समझ कर किया जाने वाला अपराध है..,
>> फिर दोनों का दंड एक ही क्यों ? जबकि एक अपराध जघन्य व् दुसरा अति अति अति जघन्य हो..,
भावार्थ : -- निर्मम के पाले पड़े हुवे निर्दोष त्राहि त्राहि कर प्राण देते गए उन्हें दया नहीं प्राप्त हुई कारण की दयालु के पद पर पीठाधीश की दृष्टि में वह हेय थे घटिया थे । यही है भारत की अर्थगत शासन व्यवस्था ॥
भावार्थ : -- वहां कसाई खूंटे बंधा निर्दोष पशु तड़प तड़प कर प्राण देता है । और यहाँ दंड वधिक द्वारा प्राण दंड के अधिकारी के प्राण प्यार से पूछ पूछ कर लिए जाते हैं । जैसे भैया अब प्राण ले लूँ : -- भैया कहते है नहीं रे अभी भाभी को बबुआ हुवा है । ( कुछ समय पश्चात ) भैया भैया अब प्राण ले लूँ भैया कहते हैं : -- बबुआ गबरू हो गवा है तनिक बिहा हो जाने दो, बबुआ बच्चे वाला हो जाता है किन्तु भैया के प्राण नहीं लिए जाते । भैया के कुकर्मो का झंडा प्रहराने वाले चले जाते हैं किन्तु भैया नहीं जाते । जब संवेदनाएं मृत प्राय हो जाती हैं धर्म के वेश में अधर्म शासन करने लगता है तब ऐसी कुत्सित परिस्थितियां निर्मित होने लगती हैं ॥
मोरल ऑफ द स्टोरी
ऊँचे पदासीत् होत रचे न सातिक बाट ।
खाट दै सो आपने दुर्जन को दए ठाट ।२८४० ।
भावार्थ : -- ऊँचा स्थान प्राप्त करके भी (किसी भी क्षेत्र में )जो सन्मार्ग का निर्माण न करे वह दुर्जनों को ठाट-बाट देकर स्वयं को कष्टकारी मृत्यु देता है ॥
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