रविवार, 19 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८१ ॥ -----

घोर घाउ कर होत जूँ कर ते कठिन कृपान । 
कुकरतार ते कठिन तूँ वाके नेम बिधान ।२८११। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार हाथ की चोट से गहरी हाथ में गहि कृपाण की चोट होती है । उसी प्रकार कुशासक की तुलना में  उसके नियम व् विधान से हानि अधिक होती ॥

चोर चुरा धन सम्पदा धरि जो देस पराए । 
धार धरोहर  धार सो रतन बिसा  लिए जाएँ ।२८१२। 
भावार्थ: =   चोर उचक्के डाकू-लुटरे भारत की धन सम्पदा को डाका-चोरी कर विदेशों  में रखते । इसी रखी हुई सम्पदा से फिर वही  यहाँ निवेश करते और उसी सम्पदा से वास्तविक रत्नों  का भी विक्रय करते ॥ इसको ये लोग अर्थ-नीति बोलते थे ॥

को तो उपबन सींच गए कोउ खाए फल चोर । 
को घट थोरहु बहुँत भा, को घट बहुंतहि थोर ।२८१३। 
भावार्थ: --  कोई उपवन सींच गया किसी न चोरी कर कर के फल खाए । किसी देह को थोड़ा भी बहुंत था किसी
को बहुंत भो थोड़ा लगता । कोई कार कर गया कोई प्रचार कर गया कोई भार हर गया कोई उधार कर गया ॥

ग्यान बिग्याननुहरे सोई जगत बिधान । 
अह  रे सबते नियारे तिनके किए अनुमान ।२८१४ । 

भावार्थ : -- जो ज्ञान-विज्ञान का अनुशरण करे संसार का वही विधान होता । इनका किया अनुमान तो सबसे निराला होता ॥ जिसको ये लोग संविधान बोलते थे ॥ 

फूल  फिरे अरु फले नहि, करे न जग कल्यान । 
नवल नवान मैल  मले ताते भले पुरान ।२८१५ । 
भावार्थ : --जो विचार फली भूत न हो केवल  फूला फिरता हो वह किसी का कल्याण  नहीं करता । पापाचारी नई बात से धर्माचारी पुरानी बात अच्छी होती है । पापाचारी पुरानी बात से धर्माचारी नई बात अच्छी होती है ॥  

बेद  पुरान कहे बचन , पग पग किए अपमान । 
तिनके मुख जो कहब दिए पुरान होब नवान  ।२८१६। 
भावार्थ : -- वेद पुराणों के  विहित वचनों का उन्होंने  पग पग पर अपमान किया  ।  इनका अनुमान चाहे पुराना ही क्यों न हो नया कहलाता ।  जिस लोकतंत्र की  कल्पना वैदिक काल में हुई उसे वे विदेशी कल्पना कह कर नया कहते ॥ 

राज नीति राजा करें, सेवक सेवा धर्म । 
कुमारग चारि बिधि करे उलटे भए कर्म ।२८१७। 
भावार्थ : -- राज्य को  नीतियुक्त संचालन करने का मार्ग दर्शाने वाली नीति का निर्धारण करना यह राजा का कर्त्तव्य है । जन-सेवक का कर्त्तव्य है कि वह सेवा सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुवे लोकोपकारी कार्य करे । कुमार्ग चारियों  ने  कुछ ऐसे विधान रचे कि उक्त कर्त्तव्यों का क्रम  विपरीत हो गया ॥ 

भूप रूप जन बिधि करे बिधिकर भए जन भूप । 
छाँए सीस किए आपने भूप सीस कर धूप ।२८१८। 
भावार्थ : -- जन- साधारण ही राजा है यह केवल भारत के संविधान में ही उल्लखित रहा । व्यवहार में जन -सेवक  राजा हो गए और राजा के भाग की छाँव को अपने सिर ओड कर राज करने लगे ।। 

देस पराए लोग इहाँ आन बसे  बरियाए । 
पयस्वती के रकत पिए खाल खीँच के खाए ।२८१९ - क । 

आए चले दुइ चैल लिए  मैल मले मन भाए । 
पेल पालि पुनि गैल  किए हिंसक रहे सुभाए ।२८१९- ख । 
भावार्थ : -- भारत में पर देशी लोग  बलपूर्वक आए व् बलपूर्वक ही वास  करने लगे । ये इस जल और दुग्ध से परिपूर्ण धरा का रक्त ही पीते और सस्य को परिहार कर उसकी खाल खिंच खिंच कर खाते ॥ 

भावार्थ : -- ये स्वभाव से ही हिंसा वादी लोग जब चले थे तब इनके पास केवल तन ढांपने के ही वस्त्र थे, तन अन्न से खाली था किन्तु मन  मैल से  भरा था । पहले सीमाओं  का उल्लंघन किया फिर युद्ध को उद्यत हो गए ॥ इस प्रकार भारत में मुसलमानों का पदार्पण हुवा । क्या ये भारत के शासन का चुनाव करने के अधिकारी हैं ?  अगर-मगर नहीं हाँ या ना.....

बैपारी कह आपनी पहिरे भूषन बास । 
पहिले देस निबास किए, बहुरि करे जन दास ।२८२०। 
भावार्थ : -- अपने आप को बनिया कहकर मन को भाने वाले वस्त्र धारण कर ये क्रिस्तानी भारत आए पहले यहाँ निवास किए ततपश्चात परदेशी शासक की विलासिताओं का लाभ उठाकर इसे अपना दास बना लिया ॥ क्या ये भारत के शासन का चुनाव करने के अधिकारी हैं ?  अगर-मगर नहीं हाँ या ना.....









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