बुधवार, 1 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७६-२७७ ॥ -----

घन है कि धूम गहन है गर्जहि रसिहि कि नाहि । 
काल करम बाताभिरत भए जनमत तस ताहि ।२७६१ ।

भावार्थ : -- घन है कि धूम गहन है घन है तो गरज क्यों रहे हैं बरसेंगे कि नहीं । कुछ इस प्रकार का संदेह जनमत संग्रहण में भी रहता । भ्रष्टाचारिता जनाचरण में इस प्रकार व्याप्त हो चुकी थी की जनमत की विश्वसनीयता पर भी संदेह होने लगा । यह जनमत आकड़ों की काली कलाकारी तो नहीं है यदि जनमत है तो कैसे जनों का है गधे पच्चीसों का तो नहीं है निर्वंशियों  का कितना है ॥ इन्हीं कारणों से  जनमत तथाकथित हो चला ॥ 

जनमत जाके संग  नहि सो तो सासन माहि । 
कहन  में तो लोकतंत्र रहन अबरु कछु आहि ।२७६२ । 
भावार्थ : -- यह तथाकथित जनमत भी जिसके विपक्ष में जाता वह शासक होता व् जिसके पक्ष में जाता वह उसके अधीन होता । लोक तंत्र केवल कहावतों में ही रह गया वस्तुत: इसका स्थान किसी अन्यादृश -तंत्र ने ले लिया ॥  

अन्यादृश -तंत्र = सबके मतों का खंडन कर अपने पक्ष की स्थापना करने वाला विचित्र प्रकार का तंत्र 

फिरंगी फिरी चली गए रह गए वाके भूत । 
नीति रीति जाने नहीं ,लड़ने में मजबूत ।२७६३। 

हीन चरित को पोस  के सील चरित को सोस  । 
उड़न खटोले उड़ चले नौ  दिन अरधहि  कोस ।२७६४ । 
भावार्थ : -- शील चरित्र का शोषण कर हीन  चरित्र  का पोषण करते हुवे यह शासन  उड़न खटोले पर भी नौ दिन में केवल  आधा कोस ही चलता ॥

करे सिखर की बारता दरसे नहीं पहाड़ । 
सिखरिणी सी बात करें नियार किए नेवाड़ ।२७६५। 
भावार्थ : -- जीवन में कभी पहाड़ देखा नहीं और शिखर की वार्ता करते । भलाई को कोसों दूर कर  भली भली बात करते  ॥

पति से न्यारे होकर सती होने की बात करना.....

प्रथम भोजन दूज बसन तीजे साधन होहि । 
 अन्यान्य का कीजिये जब तिन जीवन जोहि ।२७६६। 
भावार्थ : --  सर्व प्रथम भोजन दूजे वस्त्र तत्पश्चात साधन की आवश्यकता होती है । अन्यान्य  का क्या कीजिएगा जब जीवन  इन्हीं आवश्यकताओं को तरस रहा हो  ।  साधनों की क्या कहिए देश  की कितनी ही  जनसँख्या को भोजन भी कठिन था वस्त्र कठिन थे, शासन अपनी प्राथमिकताएं तय करने में असफल हो रहा था  शासकगण यथार्थ से दूर सपनों के प्रपंच में पड़े थे ।

रजस बेसु तामसि  राज चहुँ पर छाए ब्याज । 
मन मन मैं बिलास भवन, महात्मन् कहँ आज ।२७६७। 
भावार्थ : -- राजस वेश में तामसी शासन है चारों और छल कपट सहित व्यभिचारिता व्याप्त थी  लोग प्रतीक्षा में  रहते कि कोई महात्मा अवतार लें और सब कुछ ठीक कर दें । मनों की बस्तियों में मंदिर के स्थान पर विलास भवन बसे होते  ऐसे समय में महात्मा कहाँ से आएँ ॥

जगत जनावत कहा मैं जान मान जग माहि । 
जानहि नहि  सो आपहीं जानि  त मानिहि नाहि ।२७६८। 
भावार्थ : -- जो सब जनों से  कहता फिरता कि जी मैं तो  संसार में जाना-माना हूँ मुझे सब पहचानते  हैं । सबके मतों का खंडन कर अपने पक्ष की स्थापना करने वाला वह अतिवादी स्वयं को ही नहीं जानता, जो जानता भी तो मानता नहीं ॥

मानव धरम नुहार के पहिले मानस होएँ । 
बहोरि गुन गन  धार के सोच करें अरु कोए ।२७६९। 
भावार्थ : -- मनुष्योचित  धर्म व् कर्म का अनुपालन कर सर्वप्रथम हम मनुष्य बनें । तत्पश्चात आवश्यक गुणों को संकलित कर अन्यान्य का विचार करें ।

जीवन सहज सरूप जब सब सुख साधन पाए । 
भरे रहे जी आपना पर जी दरसे नाए  ।२७७०। 
भावार्थ  : -- जीवन को जब सुख साधन सहज स्वरूप में प्राप्त होने लगते हैं । संसार के रसों से जी भरा रहता होता है तब पराया जी  दिखाई नहीं देता । हमें पराया जी दिखाई दे तो हम मनुष्य हैं ॥ 

चोर चहे बँध हीनता चहे दासता आन । 
जहाँ उददान चाह किए मानस  तिन्हनि जान  ।२७७१ । 
भावार्थ : -- चोर निरंकुशता की पराए दासता की चाह करते हैं । जहाँ उचित विबंधन की चाह करे तो वह मनुष्य हैं ॥ 

जन मानस  सब एकए हैं , बिलगित होत सुभाए । 
तामें जनमत  जगत भए बिलग बिलग समुदाए ।२७७२। 
भावार्थ : - मानव की शारीरिक संरचना एक जैसी ही होती है वे  स्वभावतस भिन्न होते हैं  ॥ भिन्न -भिन्न  स्वभाव के अंतर्गत जन्मे जातकों द्वारा विश्व में विभिन्न समुदायों का प्रादुर्भाव हुवा ॥ इन समुदायों को सभ्यत्व हेतु  उत्तम गुणों की आवश्यकता पड़ी, उत्तम गुणों की प्राप्ति हेतु फिर धर्म प्रवर्तित हुवे ॥ 

स्पष्टीकरण : -- मानवीय संवदनाओं को गुणों की आवश्यकता नहीं होती ।यह संवेदनाएं पशुओं में न्यून होती हैं । 

धरम  बिहीन मात  पिता चरन हीन  संतान । 
अधो पतिता होत सकल अनगढ़ निज अनुमान ।२७७३ । 
भावार्थ : -- धर्म विहीन मात पिता की संतान गुणहीन होती है । ज्ञान विज्ञानं से अन्यथा जीवन के प्रति उनका  अपना ही आंकलन होता है ऐसे आंकलन का अनुकरण मनुष्य को  असभ्य बनाता है  और उसके  पतन का कारण बनता हैं । 


" मनुष्य अपना उत्थान करे  पतन न करे क्योंकि वह आप ही शत्रु है और आपही  मित्र है "
 ----- । भगवान श्री कृष्ण ॥ -----

धर्म पतिता को होत न दिसा पंथ की सूझ । 
कवन हम कहाँ ते आए चले कहाँ  नहि बूझ ।२७७४। 
भावार्थ : -- धर्म से पतित समुदाय में दिशा व् पंथ निर्धारण करने की शक्ति नहीं होती  । हम कौन हैं कहाँ से आए हैं कहाँ जा रहे हैं यह उन्हें संज्ञात नहीं होता  हैं ॥

" धर्म मानव जीवन की यात्रा का पथ प्रदर्शक है.....  नाम उसका परिचय व् जाति  उसकी पहचान है....."

जग जीवन जग जोग के किए जब जीउ न्यास । 
पंच भूत परिगहत भए क्रमबत तासु बिकास ।२७७५। 
भावार्थ : -- विशाल  बम्हाण्ड की व्युत्पत्ति महत्तत्त्व से हुई ।  सर्वप्रथम हिरण्यमई अंड में  ब्रम्हा जी का प्रादुर्भाव हुवा, यह अंड  सब और से जल से परिगत है  जल के बाहर तेज का तेज के बाहर  वायु परिगत  है वायु आकाश से और आकाश भूतादि से परिगत  है अहमेव को महतत्व ने घेरा है महतत्व अव्यक्त-मूल प्रकृति से घिरा है इस प्रकार  एक अंड  का निर्माण होता है जो ब्रम्हांड  की व्युत्पत्ति का कारण  बना महतत्व की विखंडन से सत्त्व प्राप्त होगा । ( पद्म पुराण )
                        इस प्रकार जग जीवन ने ब्रम्हांड का संयोग कर जब उसमें प्राण प्रतिष्ठित किए तब पंच भूत ( पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश ) को परिग्रहित कर जीवों का  क्रमगत  विकास हुवा ॥

छोटे कन सँजोई के होए बर ब्रम्हांड । 
कतिपय कहनाउत कहत रचिते बृहद कांड ।२७७६। 
भावार्थ : -- छोटे छोटे कणों के संयुग्मन से  एक बड़े ब्रम्हांड की रचना हो गई । कुछ छोटे छोटे प्रसंग मिलकर बड़े बड़े कांड रच देते है ॥ 

कुछ छोटी छोटी घटनाएं बड़ी घटनाओं का कारण बनती है..... 

मानस जाति उपजत जब करे उचित सब काज । 
बहुरि समायत रूप सों भयउ जाति समाज ।२७७७ । 
भावार्थ : -- जीवों की क्रमगत उन्नति के  फलस्वरूप मनुष्य जाति का प्रादुर्भाव हुवा ( विज्ञान  के अनुसार )। यह जाति  मनुष्योचित कर्म का अनुपालन करती  इन सतकर्मों से फिर  कृषि कर्म रूपी सुन्दर प्रतिफल प्राप्त हुवा । अब यह जाति विस्तारित न होकर कर्मगत जाति व समाज में परिवर्तित हो गई ॥ जिस समुदाय ने ज्ञान के  संज्ञान में जितनी अधिक शीघ्रता की वह उतना सभ्य होता गया ॥

भाषा भूसा ने कृते एक परिगत परिवेस । 
ऐसे देसज के संग जनमें एक  एक देस  ।२७७८। 
भावार्थ : --  भाषा, भूसा, वासा आदि के  आकार वंत होते ही एक परिवेश का निर्माण होने लगा । भाषा से संपन्न  भूषा धारी देशजों से परिवेष्टित एक एक देश आकृति लेने  लगे ।

अचार विचार के संग  करे अहार बिहार । 
निरंतर  ब्यबहार सों  प्रचरे देसाचार ।२७७८। 
भावार्थ : --  अपने  अपने आचरण व् विचारों के साथ ये देशज आहार व् विहार करने लगे । निरंतर के व्यवहार से कुछ गति लोकगत होने से फिर देश विशेष में  रीति व् नीति प्रचलित होने लगी ॥

बासा भूसा संग जब भाषा लेइ  अकार ।
सभी काल सम्पन होत भै अचरज  के पार ।२७७९ । 
भावार्थ : --  उस काल में वासा के संग  भाषाओं की व्युत्पत्ति व् उनकी समृद्धि चमत्कारी  थी तो  इस काल में मानव विज्ञानं की  समृद्धि चमत्कारी  थी ।

" आश्चर्य की सीमाओं को पार करने वाली घटनाएँ ही चमत्कार है....."

सभ्येतर जो मानसा रहे कबहु बन जाति  । 
सुघर समाज  सरूप भै सनै सनै एहि भाँति  ।२७८०। 
भावार्थ : - जो मानव सभ्यता से इतर कभी वन मानुष  हुवा करता था । उत्तरोत्तर परिवर्द्धन से वह  शनै: शनै:  शिष्ट समाज  में  परिणित होता गया  ॥

 जल जब अपनी मर्यादा भूल जाता है तब थल में विकार उत्पन्न हो जाते हैं.....









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