मंगलवार, 28 जुलाई 2015

----- मिनिस्टर राजू १७३ -----

राजू : --मास्टर जी ! मास्टर जी !! वो तो मर के इधरिच आ रहे हैं...,"

" उनको बोल इधर खोली खाली नहीं है, परली वाली गली में जाके भूँके।।,

राजू : -- किन्तु मास्टर जी वो तो  टर्र्र्र्र्र्र्र्ररर टर्र्र्र्र्र्र्र्ररर कर रहे  हैं

"  तो इधर नाले भी किधर खाली है उनको  मजनू का टिला वाले  गटर का पता दे दे..... 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८२ - २८३॥ -----

  हम बासी ता देस के जहँ धरती कर कोष । 
घर घर सुख रासिहि रहैं जन जन मन संतोष ।२८२१ । 
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं जहाँ धरती के कर में कोष होता है । घर घर में सुख की राशि रहती है   और जन जन के मन में संतोष रहता है ॥ 

 हम वासी ता देस के जाति  बरन जहँ आहि । 

नैन मिलावा चाहि जौ सैन मिलावा ताहि ।२८२२ । 
भावार्थ : -- हम उस देश के निवासी हैं  जहाँ स्वर्ण भी है रजत भी है ताँबा और लोहा भी भरपूर है । जो हमसे हमसे दृष्टि मिलाना चाहता है हम उसे सेना से मिला देते हैं ।। कोई लोहा ले के तो दिखाए.....

काँसा व् पीतल  मिश्रित धातु  है 

हम वासी ता देस के दरस न पावै दास । 
जल मुतियन की झालरी खन खन रतन प्रगास ।२८२३ । 
भावार्थ : - हम उस देश के निवासी हैं  जहाँ सभी पति हैं  दास के तो दरसन भी दुर्लभ हैं यहाँ का जल जैसे मोतियों की झालर है और खंड खंड में रत्न प्रकाशित होते हैं ॥ 

हम वासी ता देस के जहाँ पुरुष की आन । 
दुःख सुख को  ब्यापै नहि सब दिन एक समान ॥ 
------ ॥ संत कबीर दास ॥ -----

ग्यान  की गुन धर्म की साँची  मूरत ब्रम्ह । 
बोले सो तो बाउरा परम ग्यानी हम्ह ।२८२४  । 
भावार्थ :--  ब्राम्हण मनुष्य जाति  का परिष्कृत रूप है, जैसे अग्नि में तपकर स्वर्ण शुद्धता को प्राप्त होता है वैसे ही यह जाति पीढ़ियों की त्याग व् तपस्या का  परिणाम है ॥ जो यह कहता हो कि हम ज्ञानी हैं जो पूछना है पूछ लो वह मोह के विवश है ॥ 

तपो भुइ जब तपन लगे सुबरन लौन जगाए । 
ग्यान के गुन धरम के जन जन भूषन पाए ।२८२५ । 
भावार्थ : -- जब मनुष्य जाति वर्षों-वर्ष वनों में तपस्या करती है तब वह स्वर्ण कांति से युक्त हो जाती है उसके द्वारा जन जन को ज्ञान व् गुणों का वर्द्धन  करने वाले आवश्यक धर्म स्वरूप आभूषणों की प्राप्ति होती है ॥ 

जो कुधात कुसंग करे सुबरन मल मलिनाए । 
गहे ग्यान गवाएँ के अपने गुन बिसराए ।२८२६ । 
भवार्थ : -  आभूषणों में परिणित होना यह स्वर्ण का गुण धर्म है । यदि स्वर्ण किसी कुधातु अथवा विष का कुसंग करने से उसके अपने गुण धर्म  विस्मृत हो जाते हैं यह विस्कृत गुण धर्म उसके संचित ज्ञान का ह्रास  कर देता है ॥



रजता संगत  राज है रजता संगत रूप । 
रजता  रावन रूप है रजता राम सरूप ।२८२७ । 
भावार्थ : -- रजत यदि तापस चरण चले तो यह  ईश्वरीय प्रतिमूर्ति होकर जगत का प्रबंधन करता है  रजो गुण  रुचियों का जनक है  रजता में रसिता हो तो यह  अन्धकार में परिणित हो जाता है अन्यथा यह प्रकाशित है ॥रजता वेश में  तमसा हो तो रावण राज स्थापित होता है सात्विक वेश में रजता हो तो राम राज स्थापित होता है ॥

तामा भाजन रूप लिए भरे रहे भंडार । 
जीउ धन की जोग रखे जोग जोग कर धार ।२८२८ । 
भावार्थ : -- ताम्बा यदि तापस चरण चरे तो यह पात्र में परिणित होता है  । यह जन जन का पात्र होकर उनके  जीवन धन जैसे जल अन्न  रूपी रत्नों को संजोकर रखता हैं और उसे पात्र  को ही प्रदान करता हैं ॥

एक पीतर एक तामरा जो घर भाजन  दोए ।
एक भाजन कर ओषधि दूसर बिष धर होए ।२८२९ ।
भावार्थ : -- एक पीतल और एक ताम्बा है यदि  घर में ये दो प्रकार की धातु के भाजन हैं एक भाजन संञ्चित सामग्री को औषधि दूसरा विषधर होकर उसे विषाक्त कर देता हो  तो कौन उत्तम है ?

लुहा उपकरन रूप लिए जन जन भवन सुहाए । 
जो को मल मलिनाए  सो अपने गुन बिसराए ।२८३० । 
भावाथ : -- उपकरण में परिणित होना लोहे का गुणधर्म है । उपकरण रूप में वह  भवन शोभा होकर उनकी जन जन के सुश्रुता करता है । लोहा यदि मलिनता का कुसंग करे तो वह चूर्ण होकर अपने गुणों को नष्ट कर देता है ॥

साधु सज्जन संग करे मेल मलिनता धोए । 
जो को परसे पारसा लोहा सुबरन होए ।२८३१ । 
भवार्थ : -- साधु सज्जनों का संग कर लोहा अपनी मलिनता से मुक्त होता जाता है यदि पारस  से उसका स्पर्श हो जाए तो वह  स्वर्ण  में परिणित हो जाता है ॥ यह सत्य है की प्रत्येक चमकती धातु स्वर्ण नहीं होती, स्वर्ण अथवा पारस रूप को प्राप्त होकर स्वर्ण की सत्यता को भी अस्वीकार नहीं करना चाहिए ॥

निगुने गाँव न बासिये सब  गुण को बिनसाए । 
चंदन पड़िया चौँक मेँ ईंधन बदले जाए ।। 
----- ॥सन्त कबीर दास ॥ -----
भावार्थ : --  निर्गुण मनुष्यों के गाँव न तो बसना चाहिए न ही उन्हें बसाना चाहिए । कारण कि गुणहीनों की संगती में गुणवानों के भी सभी गुण  नष्ट हो जाते हैं । रसोई में  साधारण लकड़ियों के साथ चन्दन भी ईंधन हो जाता है ॥   

साखि सब्द बहूँतक सुना मिटा न  मन का मोह । 
पारस तक पहुंचा नहीं रहा लोह का लोह ॥ 
----- ॥ संत कबीर दास ॥ -----

परखी जब परिहार गए पाहन  भए मनि हीर । 
समर सूर दुत्कार गए मसक मार भए बीर ।२८३२। 
भावार्थ : -- पारखी जब त्यागे जाते हैं तब पत्थर रत्न हो जाते हैं ।जब समर सूर दुत्कारे जाते हैं तब ताली मारों के बीच मच्छड़ मार परम वीर कहलाते हैं ॥

साधौ  सेवा धरम मैं पाँवर होत  न कोइ । 
काल कलुषित करे जग में पाँवर सोइ ।२८३३ । 
भावार्थ : -- सेवा धर्म  से कोई नीचा नहीं हो जाता  । जो कोई पाप कर्म करते हैं हिंसा करते हैं  कातर जीवों का वध करते हैं संसार में नीच वही हैं ॥

ऊँची पीठ न  लाखिये हेय नयन सो नीच । 
केत सिखर चढ़ाई किए आवैं नीचहि खीँच ।२८३४। 
भावार्थ : -- ऊँची  पीठ से नीचे को  हेय दृष्टि से  नहीं दर्शना चाहिए । कोई कितना ही शिखर चढ़े उसे नीचे आना ही होता है ॥

मनु रूप पर मान न कर पाँवर केहि न जान । 
सब जी जीता राखिये आपने जीउ समान ।२८३५ । 
भावार्थ : --  अपने मनुष्य  होने पर घमंड नहीं करना चाहिए  किसी को भी तुच्छ नहीं समझना चाहिए । इस संसार में सभी जीवों को जीवन का अधिकार है अत: प्राणिमात्र पर दया कर अपने प्राणों के सरिस ही सभी प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए ॥

नीचा नीचा किन कहा, जाकी नीची ठौर । 
जिन लोचन नहि लाखिया ताके नीचे और ।२८३६।
भावार्थ : -- भारतीय वर्ण व्यवस्था में  नीच उसे  कहा गया जिसके ओछे विचार हों जिसकी आँखों को यह दिखाई नहीं देता हो कि उसके नीचे भी एक दुनिया है ॥ 

चारि चरण जो चारिहैं सो तो धर्मी आहि । 
धरम धरम पुकार करे सेष सकल भरमाहि ।२८३६। 
भावार्थ : -- जो सत्य तप  दया व् दान का आचरण करता है वस्तुत: वही धर्मात्मा है धर्म धर्म की रट लगाए शेष सभी भ्रम की स्थिति उत्पन्न करते हैं ॥

दया दया निर्दय कहै दया न दाया होए । 
द्रवित हृदय करि आपना वाका भाजन सोए ।२८३७ । 
भावार्थ : -- यदि निर्दय व् निर्मम दया की याचना करे तो वह दया का पात्र नहीं है जिसका ह्रदय प्राणिमात्र के कष्ट को देखकर द्रवित होने लगे दया का पात्र वही है ॥ 

दया दया निर्दोष कहँ दया न दाया कोए । 
दाता पद तिन दाइये जिन हरिदय दय होए ।२८३८-क । 

खूँट बँधे कसाई के कसक कसक जी देय । 
दंड पासक हँसी करे सहज रूप में लेय ॥ २८३८-ख ॥  
भावार्थ : -- एक निर्दोष दया के पात्र ने भी दया की याचना की किन्तु उसे वह प्राप्त नहीं हुवा । दयालु का पद उसी को देना चाहिए जिसका ह्रदय प्राणी मात्र के कष्ट को देखकर करुण होता हो ॥ 


दया धर्म का मूल है । जिसके अंत:करण में प्राणी मात्र के लिए दया हो, जिसे अपने किए पर पश्चाताप हो जिसके पूर्व के क्रियाकलापों से यह प्रतीत होता हो की अमुक अपराधी  भविष्य में  समाज, देश अथवा विश्व के लिए  उपयोगी हो सकता है  वह आतंकवादी ही क्यों न हो, दया का पात्र है ॥


>> हत्या  व्यक्तिगत उदेश्यों की पूर्ति हेतु व्यक्ति अथवा व्यक्तियों की की जाती है..,

>> आतंक जन समूह की  हत्या के सह समाज देश व् विश्व में भयकारी वातावरण  निर्मित करने के लिए होता है यह सोच समझ कर  किया जाने वाला अपराध है..,

>> फिर दोनों का दंड एक ही क्यों ? जबकि एक  अपराध जघन्य व् दुसरा अति अति अति जघन्य हो..,

भावार्थ : -- निर्मम के पाले पड़े हुवे निर्दोष त्राहि त्राहि  कर प्राण देते गए  उन्हें दया नहीं प्राप्त हुई कारण  की दयालु के पद पर पीठाधीश की दृष्टि में वह हेय थे घटिया थे । यही है भारत की अर्थगत शासन व्यवस्था ॥ 


भावार्थ : -- वहां कसाई  खूंटे बंधा निर्दोष  पशु तड़प तड़प कर प्राण देता है । और यहाँ  दंड वधिक द्वारा प्राण दंड के अधिकारी के प्राण  प्यार से पूछ पूछ कर लिए जाते हैं । जैसे भैया अब प्राण ले लूँ : -- भैया कहते है नहीं रे अभी  भाभी को बबुआ हुवा है । ( कुछ समय पश्चात ) भैया भैया अब प्राण ले  लूँ भैया कहते हैं : -- बबुआ  गबरू हो गवा है तनिक बिहा हो जाने दो,  बबुआ बच्चे वाला हो जाता है किन्तु भैया के प्राण नहीं लिए जाते । भैया के कुकर्मो का झंडा प्रहराने वाले चले जाते हैं किन्तु भैया नहीं जाते । जब संवेदनाएं मृत प्राय हो जाती हैं  धर्म के वेश में अधर्म शासन करने लगता है तब ऐसी कुत्सित परिस्थितियां  निर्मित होने लगती  हैं ॥

मोरल ऑफ द स्टोरी 
ऊँचे पदासीत् होत रचे न सातिक बाट । 
खाट  दै सो आपने दुर्जन को दए ठाट ।२८४० । 
 भावार्थ : --  ऊँचा स्थान प्राप्त करके भी (किसी भी क्षेत्र में )जो सन्मार्ग का निर्माण न करे वह दुर्जनों को ठाट-बाट देकर स्वयं को कष्टकारी मृत्यु देता है ॥ 




बुधवार, 22 जुलाई 2015

----- मिनिस्टर राजू १७२ -----

" राजू ! चार पांच सौ वर्ष पश्चात  ये  नेता और अभिनेता पता है क्या बोलेंगे ?
राजू : -- क्या बोलेंगे मास्टर जी ?
" हम भी कभी मनुष्य थे..!!!!"
राजू : -- मास्टर जी ! मनुष्य तो ये अभी भी नहीं लगते  पर क्या करें मानना पड़ता है..... 

रविवार, 19 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २८१ ॥ -----

घोर घाउ कर होत जूँ कर ते कठिन कृपान । 
कुकरतार ते कठिन तूँ वाके नेम बिधान ।२८११। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार हाथ की चोट से गहरी हाथ में गहि कृपाण की चोट होती है । उसी प्रकार कुशासक की तुलना में  उसके नियम व् विधान से हानि अधिक होती ॥

चोर चुरा धन सम्पदा धरि जो देस पराए । 
धार धरोहर  धार सो रतन बिसा  लिए जाएँ ।२८१२। 
भावार्थ: =   चोर उचक्के डाकू-लुटरे भारत की धन सम्पदा को डाका-चोरी कर विदेशों  में रखते । इसी रखी हुई सम्पदा से फिर वही  यहाँ निवेश करते और उसी सम्पदा से वास्तविक रत्नों  का भी विक्रय करते ॥ इसको ये लोग अर्थ-नीति बोलते थे ॥

को तो उपबन सींच गए कोउ खाए फल चोर । 
को घट थोरहु बहुँत भा, को घट बहुंतहि थोर ।२८१३। 
भावार्थ: --  कोई उपवन सींच गया किसी न चोरी कर कर के फल खाए । किसी देह को थोड़ा भी बहुंत था किसी
को बहुंत भो थोड़ा लगता । कोई कार कर गया कोई प्रचार कर गया कोई भार हर गया कोई उधार कर गया ॥

ग्यान बिग्याननुहरे सोई जगत बिधान । 
अह  रे सबते नियारे तिनके किए अनुमान ।२८१४ । 

भावार्थ : -- जो ज्ञान-विज्ञान का अनुशरण करे संसार का वही विधान होता । इनका किया अनुमान तो सबसे निराला होता ॥ जिसको ये लोग संविधान बोलते थे ॥ 

फूल  फिरे अरु फले नहि, करे न जग कल्यान । 
नवल नवान मैल  मले ताते भले पुरान ।२८१५ । 
भावार्थ : --जो विचार फली भूत न हो केवल  फूला फिरता हो वह किसी का कल्याण  नहीं करता । पापाचारी नई बात से धर्माचारी पुरानी बात अच्छी होती है । पापाचारी पुरानी बात से धर्माचारी नई बात अच्छी होती है ॥  

बेद  पुरान कहे बचन , पग पग किए अपमान । 
तिनके मुख जो कहब दिए पुरान होब नवान  ।२८१६। 
भावार्थ : -- वेद पुराणों के  विहित वचनों का उन्होंने  पग पग पर अपमान किया  ।  इनका अनुमान चाहे पुराना ही क्यों न हो नया कहलाता ।  जिस लोकतंत्र की  कल्पना वैदिक काल में हुई उसे वे विदेशी कल्पना कह कर नया कहते ॥ 

राज नीति राजा करें, सेवक सेवा धर्म । 
कुमारग चारि बिधि करे उलटे भए कर्म ।२८१७। 
भावार्थ : -- राज्य को  नीतियुक्त संचालन करने का मार्ग दर्शाने वाली नीति का निर्धारण करना यह राजा का कर्त्तव्य है । जन-सेवक का कर्त्तव्य है कि वह सेवा सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्वहन करते हुवे लोकोपकारी कार्य करे । कुमार्ग चारियों  ने  कुछ ऐसे विधान रचे कि उक्त कर्त्तव्यों का क्रम  विपरीत हो गया ॥ 

भूप रूप जन बिधि करे बिधिकर भए जन भूप । 
छाँए सीस किए आपने भूप सीस कर धूप ।२८१८। 
भावार्थ : -- जन- साधारण ही राजा है यह केवल भारत के संविधान में ही उल्लखित रहा । व्यवहार में जन -सेवक  राजा हो गए और राजा के भाग की छाँव को अपने सिर ओड कर राज करने लगे ।। 

देस पराए लोग इहाँ आन बसे  बरियाए । 
पयस्वती के रकत पिए खाल खीँच के खाए ।२८१९ - क । 

आए चले दुइ चैल लिए  मैल मले मन भाए । 
पेल पालि पुनि गैल  किए हिंसक रहे सुभाए ।२८१९- ख । 
भावार्थ : -- भारत में पर देशी लोग  बलपूर्वक आए व् बलपूर्वक ही वास  करने लगे । ये इस जल और दुग्ध से परिपूर्ण धरा का रक्त ही पीते और सस्य को परिहार कर उसकी खाल खिंच खिंच कर खाते ॥ 

भावार्थ : -- ये स्वभाव से ही हिंसा वादी लोग जब चले थे तब इनके पास केवल तन ढांपने के ही वस्त्र थे, तन अन्न से खाली था किन्तु मन  मैल से  भरा था । पहले सीमाओं  का उल्लंघन किया फिर युद्ध को उद्यत हो गए ॥ इस प्रकार भारत में मुसलमानों का पदार्पण हुवा । क्या ये भारत के शासन का चुनाव करने के अधिकारी हैं ?  अगर-मगर नहीं हाँ या ना.....

बैपारी कह आपनी पहिरे भूषन बास । 
पहिले देस निबास किए, बहुरि करे जन दास ।२८२०। 
भावार्थ : -- अपने आप को बनिया कहकर मन को भाने वाले वस्त्र धारण कर ये क्रिस्तानी भारत आए पहले यहाँ निवास किए ततपश्चात परदेशी शासक की विलासिताओं का लाभ उठाकर इसे अपना दास बना लिया ॥ क्या ये भारत के शासन का चुनाव करने के अधिकारी हैं ?  अगर-मगर नहीं हाँ या ना.....









मंगलवार, 14 जुलाई 2015

----- मिनिस्टर राजू १७१ -----

" राजू ! तीन चार सौ साल के बाद वो भी समय आएगा जब फारस की खाड़ी भी उपग्रह छोड़ कर कहेगी " ये देखो रॉकेट साइंस.....पता है तब अमेरिका क्या बोलेगा ?

राजू : -- क्या बोलेगा  मास्टर जी ?

" ऐसी फुलझड़ियाँ हमने बहुंत छोड़ रखी हैं....."

राजू : -- हाँ उस समय इनकी दकियानूसी बातों को मानेगा भी कौन.....मास्टर जी गाना !!!

" गाना ? ओ अच्छा गाना !!! ये लो.....

शनिवार, 11 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७९-२८० ॥ -----

अधृत अधमतस काल यह रँगे मलिनई रंग ।
न खावन  का सऊर है नहि पहिरन के ढंग ।२७९१।
भावार्थ : -- आधुनिक कहलाने वाला यह वर्तमान पाप कर्म में इस भांति संलिप्त है कि न तो उसे खाने का शऊर है न पहनने का ढंग है ॥

प्रान जेत भोजन   रहे प्यास जेतक पानि । 
रहनए  भर कू बासना रह उपजोगि ग्यान ।२७९२। 
----- ॥  अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- प्राण में प्राण रहे इतना भोजन हो, सभी कंठ की प्यास को तृप्त करे इतना पानी हो । रहने भर के लिए वासन  हो, पहनने भर के लिए वस्त्र हों,ज्ञान हो तो उपयोगी हो ज्ञान-विज्ञानं का दुरूपयोग न हो ।

" जो ज्ञान-विज्ञान संसार को  कष्टकारी हो वह ज्ञान-विज्ञान  व्यर्थ है....."

आगे जी के जोउने मीही रतन के मोल । 
तिल  तिल कर घर आइही तुल सुबरन के तोल ।२७ ९३। 
भावार्थ : -- कारण कि इस समय जो अन्न  अधिमूल्य में प्राप्त हो रहे हैं आने वाले  समय में यह  रत्नों के मोल, स्वर्ण के समरूप तुल, थोड़ा थोड़ा कर घर आएगा । तुम  झोला भर डॉलर दोगे  तो कोई दो चार कण अन्न देगा झोला भर ले जाना है तो एक परमाणु बम दे पानी चाहिए....?  तो दो दे.....भूखे पेट तो बम भी नहीं फूटते.....

होवनहारी आपने देखिहि जब इतिहास । 
बिनासोन्मुख बिकास के, करिहि हाँस उपहास ।२७९४।
भावार्थ : --  आने वाला समय विनाश की विभीषिका पर बैठ कर जब अपना  इतिहास  देखेगा तब वह तुम्हारे इस विकास का हंस हंस कर उपहास करेगा । ऐसे : -- देखो इन उजड्डों को  इसको ये विकास बोलते थे,, वो उनको देखो ऐसो को ये पिछड़े बोलते थे,  और उस  प्रेजि-डाँस को देखो उसका  वो धौला-महल..? इसको ये लोग लोकतंत्र बोलते थे.....

जे जनता के राज अरु जे सेबक के साज । 
राजधिराजहु लजौरे करे न कोऊ काज ।२७९५। 
भावार्थ : -- जनता का राज देखो, जन सेवक के साज देखो, ये साज तो राज तंत्र के महाधिराज को भी लज्जित कर दे, और कार्य के नाम पर केवल कहनी कहनी कहनी,  करनी कुछ नहीं.....

पढ़ लिख अनपढ़ होत  भए  अनगढ़ सब संसार । 
ऊंचा जीवन जोउना ओछे करे विचार ।२७९६ । 
भावार्थ : -- पढ़ लिख कर भी अनपढ़  रहते हुवे इस प्रकार यह संसार असभ्य, अशिष्ट होता जाएगा । कारण कि ऊंची जीवन शैली विचारों को निम्न कोटि का कर देती है ऊँचा जीवन नीचे विचार से मनुष्य अँध मति हो जाता है फिर उसे  भले-बुरे का भान नहीं होता ॥

सुघर देसाचार संग सत आहार विहार । 
साँचे माणिक रतन सम सुथरे होत विचार ।२७९७ । 
भावार्थ : -- सात्विक आहार-विहार के सह उत्तम देशाचार से विचार सुविचार होकर रत्न के समान हो जाते हैं । इन रत्नों का प्रकाश  भविष्य का दिशानिर्दशन करता हुवा उसे सन्मार्गी बनाता  हैं ॥

खान-पान, रहन-सहन, वेश-भूषा समय के अनुसार ही होनी चाहिए....

जीवन साधन  धन सरिस जल कन  रतन समान । 
जो इ जग जुगाड़ रखे सोइ जगत धनवान ।२७९८ । 
भावार्थ : -- यदि जीवन के साधन यदि वास्तविक धन है तो  जीवन आधार जल व् अन्न वास्तविक रत्न हैं । डॉलर हीरे मोती नहीं ॥ जो धन का भंडारी  हो व् रत्नों को अधिकधिक प्रबंधक  हो जगत में वही धनी है ॥

जीवन पंथ में जान जग कब रन खेलाए । 
अपने जोग सँभार  के जागत जोड़ लगाए ।२७९९ । 
भावार्थ : -- जीवन के पंथ में यह विश्व न जाने कब रण खेला  दे । इसलिए अपने रत्नों का धन के भंडारों का अपने वास्तविक उत्पादन का जोड़ लगा कर रखें केवल अस्त्र से काम नहीं चलेगा ।।

यह जग बाहु चढ़ाए जब बँधे सबहि बैपार । 
धर मिले न धराउ मिले मिले न कतहु उधार ।२८०० । 
भावार्थ : -- जब यह विश्व रण करने पर उतर आता है तब सारे व्यापार अवरुद्ध  हो जाते हैं मुद्रा का कोई मूल्य नहीं होता । आने वाली वस्तुएं आती नहीं जाने वाली जाती नहीं चाँदी सोना डॉलर पौंड के बदले  अन्न-जल देकर कोई शत्रु को थोड़े ही पालेगा । जितना अन्न है, जल है, ईंधन है, उतने में ही काम चलाना पड़ता है ॥ जहाज  रानी की कहानी वायु यान की कथा तो ईंधन के बिना  प्रारम्भ ही नहीं होती ।  न धरी धरोहरें मिलती हैं  न धर मिलते हैं फिर तो कोई उधारी भी नहीं मिलती ॥

जब जग रन खेलाए तब हित चिंतक कू देख । 
अपने पराए जान के , जोग रखेँ  लिख लेख ।२८०१। 
भावार्थ : - जब यह विश्व रण  करने पर उद्यत हो जाए तब हित चिंतको व् अहित चिंतक पर दृष्टि बना रखे । अपने पराए का ज्ञान कर सबका प्रपंच लिखित में रखें ॥

भूखा को  नहि सोइये, करिहौ ऐसो काज । 
आपदा कबहुँ होइये, रह सब काल समाज ।२८०२। 
भावार्थ : -- देख में भूखा  कोई नहीं सोए इतना प्रबंध कर रखना चाहिए ।  आपदा किसी समय भी आ सकती है  उस हेतु सदैव तैयार रहना चाहिए । युद्ध  भी एक आपदा ही है इसमें सहयोग नहीं मिलता । इस आपदा में कोई पानी कोई नहीं देता, खाना भी नहीं देता ।  अब जब जब आपदा आई,  विकसित देशों पर आई तो उन्हें सबसे अधिक पानी चाहिए था..... सोना नहीं चांदी नहीं हीरे नहीं मोती नहीं डॉलर-पौंड नहीं.....

साँच रतन पहिचान के सांचे धन को पास । 
जोड़ रखे सो साइयाँ, तोड़े वाके  दास ।२८०३। 
भावार्थ : -- जो पृथ्वी के वास्तविक रत्नों की परख रखेगा,  वास्तविक धन के  भंडार ( फिक्स डिपॉजिट ) सँजो कर अपने पास रखेगा वह स्वामी होगा ।  जो इन्हें तोड़ के विलासिता में अपव्यय करेगा वह उसका दास होगा ॥

सम्पद गति तस होइये गहे  जैसेउ पानि । 
राम गाहे जग हित करे रावण गहे त हानि ।२८०४। 
भावार्थ : -- सम्पदा जैसे हस्त  में होती है उसकी गति भी वैसी ही होती है ।  रावण द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा  विश्व का विनाश करती है भगवान श्री राम द्वारा ग्रहण की हुई सम्पदा कल्याण करती है ॥

जब जग कतहुँ पीर परे रखे रतन दे दान । 
दुर्नीति कर भीड़ पड़े तीन दे देत ग्यान ।२८०५। 
 भावार्थ : -- जब जगत में कहीं कोई पीड़ा में पड़ा हो तो संजोए हुवे वास्तविक रत्नों का दान करना चाहिए । कोई नीति विरुद्ध आचरण  करते लड़ भिड़े तो उसे पराजित कर तत्पश्चात सन्मार्ग में लगाते हुवे उन रत्नों  करना चााहिए ॥

अधर्मी को पीर परे रखे रतन कर दान । 
सन्मार्ग  लिए जाए जो तिनके देत ग्यान ।२८०६। 
भावार्थ : - यदि किसी  विलासाँध अधर्मी पर आपदा आन पड़े तब उसे सन्मार्ग दर्शयिता ज्ञान देते हुवे उन रत्नों का दान करना चाहिए । जैसे आहार-विहार ठीक करो,  बुलेट को भूल जाओ, ज्यादा हवा में मत उड़ो, देखा  हवाई-अड्डे कैसे डूबते हैं कितने पेड़ थे वहां ? आदि आदि..... यदि ठीक नहीं किया तो अगली बार पानी नहीं मिलेगा .....

सतयुग में जो रीत रहि  कलजुग में  बिपरीत  ।
तापर जग मैं होत रहि  सदा सत्य की जीत ।२८०७।
भावार्थ : -- सतयुग में जो रीत रही कलयुग उसके विपरीत रहा, तथापि प्रत्येक काल में सत्य ही विजय प्राप्तकर्ता रहा ।।  सत्य धर्म का आचरण है ॥  

आए इहां सो सबहि गए जीते रहे न कोए । 
जैसे अमरन पाइया तैसे साज सँजोए ।२८०८ -क । 
यह भारत की भुइ भई जब ते अधम अधीन । 
हरिया हरिमणि  हीन भए नदिया भयउ मलीन  ।२८० ८-ख । 


भावार्थ : -- जो यहाँ आए वे सभी गए रहा कोई नहीं ।  नाम अमर रखो या अमरीका, नाम रखने से और सौ बरस का सामान जोड़ रखने से कोई अमर थोड़े हो जाता है  ॥  

                      भारत-भूमि के सन्दर्भ में कहें तो पहले हम लोग भी सोचते थे की हम अमर हैं कहते थे  सौर-मंडल में नौ गृह होते हैं ब्रम्हांड/आकाशगंगा जब परिकमा पूर्ण करता है उसे कल्प  कहते हैं एक कल्प में चार युग होते हैं सत युग का मान चार सहस्त्र आठ शतकीय दिव्य  वर्ष, त्रेता का  तीन सहस्त्र छ:  शतकीय दिव्य  वर्ष, द्वापर का द्वि सहस्त्र चार शतकीय दिव्य वर्ष व् कलि  का एक सहस्त्र द्वि शतकीय दिव्य वर्ष इस प्रकार कल्प का कुल मान  द्वादस सहस्त्रिय दिव्य वर्ष का होता है दिव्य वर्ष मानव वर्ष से तीन सौ साठ  गुना अधिक होता है कारण की मानव का वर्ष पृथ्वी की घूर्णन गति पर आधारित है

पहले हम लोग भी सोचते थे हम अमर हैं..... अमर अमर कहते हुवे कब मर गए पता ही नहीं चला..... 

भावार्थ : --  जबसे ये दुष्टों के अधीन हुवा है तबसे किसान भूमि हीन हो गए उसमें हरिन्मणि नहीं रहे, नदियों मलीन हो गई उनमें हीरे मोती नहीं रहे ॥ 

वे देश के विद्रोही है जो नदियों को मलीन करते हैं और किसानों को भूमि-हीन..... 

पहिले जो बरियाए भए, सिंहासन आसीन । 
निजस्वार्थतस अजहुँ ताहि चुनि चुनि होए अधीन ।२८०९ । 
भावार्थ : --  भारत का भविष्य काल जब अपना  इतिहास देखेगा तब उपहास कर कहेगा देखो जिन लोगों ने बलपूर्वक भारत का सिंहासन छीना था अपने छोटे छोटे स्वार्थ हेतु  प्रत्यक्ष व् अप्रत्यक्ष रूप से उनका ही चुनाव कर उनके दास बन गए.....॥

करे राज बरियाए तो जन जन कहँ  पितु माइ । 
हस्त गहे भाई कहे कंठ गहे कह साँइ ।२८१०। 
भावार्थ : --  जब विदेशी भारत पर बलपूर्वक राज किए तो जनता ने उन्हें माई-बाप बना लिया ।  जब हाथ पकड़ लिए तब  भाई बाप बना लिया जब कंठ जा लगे तब खसम बना लिया । देखो इनके भाई-चारे को.....













----- मिनिस्टर राजू १७० -----

" पता है दो तीन सौ साल बाद अमेरिका क्या बोलेगा..,?"

राजू : -- क्या बोलेगा  मास्टर जी ?

" हमारी कभी विमान की दूकान हुवा करती "थी " तब फारस की खाड़ी पता है क्या बोलेगी ?
राजू : -- क्या बोलेगी मास्टर जी ?

" वो अफ़ग़ानिस्तान से बोलेगी दे इसके कान के नीचे एक और बोल वो चलती तो हमारे  कारण से " थी "

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७८ ॥ -----

सुख साधन सम्पन होत  मानस जग एहि काल । 
बाहिर दरसे मानसा भीतर सोहि ब्याल ।२७८१। 
भावार्थ : -- सुखप्रद साधनों से  संपन्न मनुष्य का बाह्यचरण करता हुवा इस काल के मनुष्य की अंतरगति  पुनश्च हिंसक व् असभ्य पशु सदृश्य हो गई ॥

नयन दिखाई दिए  नहीं दूसर के संताप । 
वह मानस पसु  है जो खावै आपहि आप ।२७८२। 
भवार्थ : -- जिसकी दृष्टि को स्वयं से अतिरिक्त अन्य किसी का  संताप दर्शित न हो, जो स्वयं ही खाता हो वह मनुष्य पशु के सदृश्य है ॥

रहन सहन अस होइये जो जग को सुख दाए । 
जाके सुख सँग  दुःख परे, सो तो मानस नाए ।२७८३। 
भावार्थ : -- मनुष्य की जीवन चर्या ऐसी होनी चाहिए जो संसार को सुख प्रदान करे । जिसकी चर्या संसार के लिए कष्ट कर हो  वह मनुष्य मनुष्य नहीं ॥

कलुष करम की कलिमा छाए जगत एहि काल । 
बाहिर सो भल मानसा, भीतर सोहि ब्याल ।२७८४ । 
भावार्थ : -- इस काल में पाप कर्म की कालिमा संसार में इस भांति व्याप्त हो चली है कि भद्रता के दर्शन बाहर से ही हो रहे हैं अंतरमन से तो सभी अभद्र व् असभ्य हैं ॥ 

क्रांकीटी जंगलों  के जंगली पहले अंतर जगत सुधारो फिर बाहर  की सुधि करो.....

नेम रहे न बंध  रहे रहे न कतहुँ न्याय । 
जहँ  अस जंगल  राज तहँ चहुँ पर ब्यालहि  पाए ।२७८५ । 
भावार्थ : -- नियम न हो निरंबंध न हो न्याय-व्याय भी न हो । जहाँ ऐसा जंगल राज हो वहां फिर चारों ओर मनुष्य के वेश में  फिर जंगली जंतु ही मिलेंगे  ॥

सहज रूप में  लाहिया अजहुँ  काल जो चाह ।
जाने होवनिहार कू सो सब मिलिहि कि नाह ।२७८६ । 
भावार्थ : -- अधुनातन काल की आवश्यकताएं सहज रूप में सुलभ हो रही है । भविष्य काल को जाने  यह सब प्राप्त होगा भी कि नहीं ॥ वंचित भविष्य काल धिक्कारेगा , हमने ऐसे शासको को सिरोधार किया  जिन्होने  एक हस्ताक्षर के लिए ऊर्जा का कितना अपव्यय किया ॥

अंकन हुँत एक आखरी चढ़त फिरैं बैमान  । 
धूनि छेपक होत  जात   कहन कहें जा कान ।२७८७। 
भावार्थ : --  एक हस्ताक्षर के लिए जो विमानों का प्रयोग करेंगे , ध्वनि क्षेपक के  होते हुवे भी जो  अपनी कहानी विमान चढ़ के कान में कहते दिखाई देंगे तो भविष्यकाल उन्हें उजड्ड ही कहेगा ॥

अजहुँ जग में जेहि भाँति भोग रहे भव भोग । 
भवितब में धिक् धिक् करिहि  अनगढ़ कह सब लोग ।२७८८ । 
भावार्थ : -- वर्तमान में भूमि के सुख साधनों का  जिस भांति दुरुपयोग हो रहा है (  थाली लिए पूरा कंठ भरे उसी में उलट दिए ) । भविष्य में धिक्कारते हुवे  उन्हें सब लोग असभ्य  अशिष्ट उजड्ड और जाने क्या क्या कहेंगे ॥

बीती बतियाँ सोंहि हम  हम सों होवनिहार । 
जाग लगे उजियार है न तरु गहन अँधियार ।२७८९ । 
भावार्थ : -अतीत से यह वर्त्तमान है वर्तमान से भविष्य होगा  । अतीत जागृत था तो हम प्रकाशित हैं यदि हम जागृत रहे तो भविष्य भी प्रकाशित रहेगा अन्यथा उसके चारों ओर अंधेरा ही अन्धेरा होगा  ॥

रे अधुनातन काल तू कल का कलुष अतीत । 
अंतर जगत सुधार के सुघर रूप में बीत ।२७९०। 
भावार्थ : -- हे वर्तमान  काल तू कल का कलुषित अतीत मत बन  अपने अंतर जगत को सुधार और  सभ्य व् सभाजित रूप में व्यतीत हो ॥ 


बुधवार, 1 जुलाई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७६-२७७ ॥ -----

घन है कि धूम गहन है गर्जहि रसिहि कि नाहि । 
काल करम बाताभिरत भए जनमत तस ताहि ।२७६१ ।

भावार्थ : -- घन है कि धूम गहन है घन है तो गरज क्यों रहे हैं बरसेंगे कि नहीं । कुछ इस प्रकार का संदेह जनमत संग्रहण में भी रहता । भ्रष्टाचारिता जनाचरण में इस प्रकार व्याप्त हो चुकी थी की जनमत की विश्वसनीयता पर भी संदेह होने लगा । यह जनमत आकड़ों की काली कलाकारी तो नहीं है यदि जनमत है तो कैसे जनों का है गधे पच्चीसों का तो नहीं है निर्वंशियों  का कितना है ॥ इन्हीं कारणों से  जनमत तथाकथित हो चला ॥ 

जनमत जाके संग  नहि सो तो सासन माहि । 
कहन  में तो लोकतंत्र रहन अबरु कछु आहि ।२७६२ । 
भावार्थ : -- यह तथाकथित जनमत भी जिसके विपक्ष में जाता वह शासक होता व् जिसके पक्ष में जाता वह उसके अधीन होता । लोक तंत्र केवल कहावतों में ही रह गया वस्तुत: इसका स्थान किसी अन्यादृश -तंत्र ने ले लिया ॥  

अन्यादृश -तंत्र = सबके मतों का खंडन कर अपने पक्ष की स्थापना करने वाला विचित्र प्रकार का तंत्र 

फिरंगी फिरी चली गए रह गए वाके भूत । 
नीति रीति जाने नहीं ,लड़ने में मजबूत ।२७६३। 

हीन चरित को पोस  के सील चरित को सोस  । 
उड़न खटोले उड़ चले नौ  दिन अरधहि  कोस ।२७६४ । 
भावार्थ : -- शील चरित्र का शोषण कर हीन  चरित्र  का पोषण करते हुवे यह शासन  उड़न खटोले पर भी नौ दिन में केवल  आधा कोस ही चलता ॥

करे सिखर की बारता दरसे नहीं पहाड़ । 
सिखरिणी सी बात करें नियार किए नेवाड़ ।२७६५। 
भावार्थ : -- जीवन में कभी पहाड़ देखा नहीं और शिखर की वार्ता करते । भलाई को कोसों दूर कर  भली भली बात करते  ॥

पति से न्यारे होकर सती होने की बात करना.....

प्रथम भोजन दूज बसन तीजे साधन होहि । 
 अन्यान्य का कीजिये जब तिन जीवन जोहि ।२७६६। 
भावार्थ : --  सर्व प्रथम भोजन दूजे वस्त्र तत्पश्चात साधन की आवश्यकता होती है । अन्यान्य  का क्या कीजिएगा जब जीवन  इन्हीं आवश्यकताओं को तरस रहा हो  ।  साधनों की क्या कहिए देश  की कितनी ही  जनसँख्या को भोजन भी कठिन था वस्त्र कठिन थे, शासन अपनी प्राथमिकताएं तय करने में असफल हो रहा था  शासकगण यथार्थ से दूर सपनों के प्रपंच में पड़े थे ।

रजस बेसु तामसि  राज चहुँ पर छाए ब्याज । 
मन मन मैं बिलास भवन, महात्मन् कहँ आज ।२७६७। 
भावार्थ : -- राजस वेश में तामसी शासन है चारों और छल कपट सहित व्यभिचारिता व्याप्त थी  लोग प्रतीक्षा में  रहते कि कोई महात्मा अवतार लें और सब कुछ ठीक कर दें । मनों की बस्तियों में मंदिर के स्थान पर विलास भवन बसे होते  ऐसे समय में महात्मा कहाँ से आएँ ॥

जगत जनावत कहा मैं जान मान जग माहि । 
जानहि नहि  सो आपहीं जानि  त मानिहि नाहि ।२७६८। 
भावार्थ : -- जो सब जनों से  कहता फिरता कि जी मैं तो  संसार में जाना-माना हूँ मुझे सब पहचानते  हैं । सबके मतों का खंडन कर अपने पक्ष की स्थापना करने वाला वह अतिवादी स्वयं को ही नहीं जानता, जो जानता भी तो मानता नहीं ॥

मानव धरम नुहार के पहिले मानस होएँ । 
बहोरि गुन गन  धार के सोच करें अरु कोए ।२७६९। 
भावार्थ : -- मनुष्योचित  धर्म व् कर्म का अनुपालन कर सर्वप्रथम हम मनुष्य बनें । तत्पश्चात आवश्यक गुणों को संकलित कर अन्यान्य का विचार करें ।

जीवन सहज सरूप जब सब सुख साधन पाए । 
भरे रहे जी आपना पर जी दरसे नाए  ।२७७०। 
भावार्थ  : -- जीवन को जब सुख साधन सहज स्वरूप में प्राप्त होने लगते हैं । संसार के रसों से जी भरा रहता होता है तब पराया जी  दिखाई नहीं देता । हमें पराया जी दिखाई दे तो हम मनुष्य हैं ॥ 

चोर चहे बँध हीनता चहे दासता आन । 
जहाँ उददान चाह किए मानस  तिन्हनि जान  ।२७७१ । 
भावार्थ : -- चोर निरंकुशता की पराए दासता की चाह करते हैं । जहाँ उचित विबंधन की चाह करे तो वह मनुष्य हैं ॥ 

जन मानस  सब एकए हैं , बिलगित होत सुभाए । 
तामें जनमत  जगत भए बिलग बिलग समुदाए ।२७७२। 
भावार्थ : - मानव की शारीरिक संरचना एक जैसी ही होती है वे  स्वभावतस भिन्न होते हैं  ॥ भिन्न -भिन्न  स्वभाव के अंतर्गत जन्मे जातकों द्वारा विश्व में विभिन्न समुदायों का प्रादुर्भाव हुवा ॥ इन समुदायों को सभ्यत्व हेतु  उत्तम गुणों की आवश्यकता पड़ी, उत्तम गुणों की प्राप्ति हेतु फिर धर्म प्रवर्तित हुवे ॥ 

स्पष्टीकरण : -- मानवीय संवदनाओं को गुणों की आवश्यकता नहीं होती ।यह संवेदनाएं पशुओं में न्यून होती हैं । 

धरम  बिहीन मात  पिता चरन हीन  संतान । 
अधो पतिता होत सकल अनगढ़ निज अनुमान ।२७७३ । 
भावार्थ : -- धर्म विहीन मात पिता की संतान गुणहीन होती है । ज्ञान विज्ञानं से अन्यथा जीवन के प्रति उनका  अपना ही आंकलन होता है ऐसे आंकलन का अनुकरण मनुष्य को  असभ्य बनाता है  और उसके  पतन का कारण बनता हैं । 


" मनुष्य अपना उत्थान करे  पतन न करे क्योंकि वह आप ही शत्रु है और आपही  मित्र है "
 ----- । भगवान श्री कृष्ण ॥ -----

धर्म पतिता को होत न दिसा पंथ की सूझ । 
कवन हम कहाँ ते आए चले कहाँ  नहि बूझ ।२७७४। 
भावार्थ : -- धर्म से पतित समुदाय में दिशा व् पंथ निर्धारण करने की शक्ति नहीं होती  । हम कौन हैं कहाँ से आए हैं कहाँ जा रहे हैं यह उन्हें संज्ञात नहीं होता  हैं ॥

" धर्म मानव जीवन की यात्रा का पथ प्रदर्शक है.....  नाम उसका परिचय व् जाति  उसकी पहचान है....."

जग जीवन जग जोग के किए जब जीउ न्यास । 
पंच भूत परिगहत भए क्रमबत तासु बिकास ।२७७५। 
भावार्थ : -- विशाल  बम्हाण्ड की व्युत्पत्ति महत्तत्त्व से हुई ।  सर्वप्रथम हिरण्यमई अंड में  ब्रम्हा जी का प्रादुर्भाव हुवा, यह अंड  सब और से जल से परिगत है  जल के बाहर तेज का तेज के बाहर  वायु परिगत  है वायु आकाश से और आकाश भूतादि से परिगत  है अहमेव को महतत्व ने घेरा है महतत्व अव्यक्त-मूल प्रकृति से घिरा है इस प्रकार  एक अंड  का निर्माण होता है जो ब्रम्हांड  की व्युत्पत्ति का कारण  बना महतत्व की विखंडन से सत्त्व प्राप्त होगा । ( पद्म पुराण )
                        इस प्रकार जग जीवन ने ब्रम्हांड का संयोग कर जब उसमें प्राण प्रतिष्ठित किए तब पंच भूत ( पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, आकाश ) को परिग्रहित कर जीवों का  क्रमगत  विकास हुवा ॥

छोटे कन सँजोई के होए बर ब्रम्हांड । 
कतिपय कहनाउत कहत रचिते बृहद कांड ।२७७६। 
भावार्थ : -- छोटे छोटे कणों के संयुग्मन से  एक बड़े ब्रम्हांड की रचना हो गई । कुछ छोटे छोटे प्रसंग मिलकर बड़े बड़े कांड रच देते है ॥ 

कुछ छोटी छोटी घटनाएं बड़ी घटनाओं का कारण बनती है..... 

मानस जाति उपजत जब करे उचित सब काज । 
बहुरि समायत रूप सों भयउ जाति समाज ।२७७७ । 
भावार्थ : -- जीवों की क्रमगत उन्नति के  फलस्वरूप मनुष्य जाति का प्रादुर्भाव हुवा ( विज्ञान  के अनुसार )। यह जाति  मनुष्योचित कर्म का अनुपालन करती  इन सतकर्मों से फिर  कृषि कर्म रूपी सुन्दर प्रतिफल प्राप्त हुवा । अब यह जाति विस्तारित न होकर कर्मगत जाति व समाज में परिवर्तित हो गई ॥ जिस समुदाय ने ज्ञान के  संज्ञान में जितनी अधिक शीघ्रता की वह उतना सभ्य होता गया ॥

भाषा भूसा ने कृते एक परिगत परिवेस । 
ऐसे देसज के संग जनमें एक  एक देस  ।२७७८। 
भावार्थ : --  भाषा, भूसा, वासा आदि के  आकार वंत होते ही एक परिवेश का निर्माण होने लगा । भाषा से संपन्न  भूषा धारी देशजों से परिवेष्टित एक एक देश आकृति लेने  लगे ।

अचार विचार के संग  करे अहार बिहार । 
निरंतर  ब्यबहार सों  प्रचरे देसाचार ।२७७८। 
भावार्थ : --  अपने  अपने आचरण व् विचारों के साथ ये देशज आहार व् विहार करने लगे । निरंतर के व्यवहार से कुछ गति लोकगत होने से फिर देश विशेष में  रीति व् नीति प्रचलित होने लगी ॥

बासा भूसा संग जब भाषा लेइ  अकार ।
सभी काल सम्पन होत भै अचरज  के पार ।२७७९ । 
भावार्थ : --  उस काल में वासा के संग  भाषाओं की व्युत्पत्ति व् उनकी समृद्धि चमत्कारी  थी तो  इस काल में मानव विज्ञानं की  समृद्धि चमत्कारी  थी ।

" आश्चर्य की सीमाओं को पार करने वाली घटनाएँ ही चमत्कार है....."

सभ्येतर जो मानसा रहे कबहु बन जाति  । 
सुघर समाज  सरूप भै सनै सनै एहि भाँति  ।२७८०। 
भावार्थ : - जो मानव सभ्यता से इतर कभी वन मानुष  हुवा करता था । उत्तरोत्तर परिवर्द्धन से वह  शनै: शनै:  शिष्ट समाज  में  परिणित होता गया  ॥

 जल जब अपनी मर्यादा भूल जाता है तब थल में विकार उत्पन्न हो जाते हैं.....









----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...