शुक्रवार, 26 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७४॥ -----

तैसो उपजन पाइये जैसे बिआ बुआन । 
बिन गुन ग्यान सहुँ होत संतमसी संतान  ।२७४१ । 
भावार्थ : --जैसे बीज बोए जाते उपज भी वैसी ही प्राप्त होगी इस  तथ्य को आधार कर  गुण लक्षण व् ज्ञान हीनता से आसुरी माया के प्रति महामोहि संतान ही उत्पन्न होती ॥

गुनकारी धरम बिहीन, जो बुए बिआ पुरान । 
 संतमस संतान रूप  उपजे यह खलिहान ।२७४२। 
भावार्थ : -- पूर्व में उत्तम गुणों के लिए लाभकारी धर्म से रहित जिन बीजों को बोया गया था । सत्ता व् माया की महामोही संतान  उसी खेत  की उपज थी जो  सत्ता व् पैसा के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती ॥

नीँद न देखे साथरी काल न देखे काल । 
अँधानुगामी न देखे चलनहार की चाल ।२७४३। 
भावार्थ : -- नींद खटिया पलौवन नहीं देखती, आती है तो कहीं भी आ जाती है नहीं आती तो कहीं नहीं आती ॥ मृत्यु समय नहीं देखती  कभी भी आ जाती है । उसी प्रकार अंधे चरणानुग  के नयन चरणहारी की चाल  नहीं देखते ॥

धन सम्पद सों  सबहि को धनपति पद की चाह । 
चाह पूरन  जोग जतन कर चाहेँ को नाह ।२७४४। 
भावार्थ : -- धन सम्पद व्  धनपति पद की सभी को चाह होती । किन्तु उसके लिए आवश्यक योग्यता व युक्ति कोई नहीं चाहता ॥

धर्माचरन  संग चरे सनमारग जो कोइ । 
जगहित परमारथ करे धनपति पद हुँत सोइ ।२७४५ । 
भावार्थ : -- जो धर्म के  चार  चरण  सत्य, शौच,  दान, त्याग के संग सन्मार्ग पर चलता हो । जगहित हेतु परमार्थ करता हो  प्रचार हेतु नहीं वह  धनपति पद के योग्य होना चाहिए ।

होना तो ये चाहिए वो चाहिए होता कुछ और

 मृषा वादन संग करे कल कर्म जो कोइ । 
कूट कुटिल कुचाल  चरे धनपत पद गह सोइ ।२७४६। 
भावार्थ : -- स्वेच्छाचारिता  के शासन में जो मृषा  वादन कर काले  कारनामे करता लुकते  छिपते कुटिल कुचालें चलता वही धनपत के पद को सुशोभित करता ॥

बिगड़े देसाचार नै सब कहुँ भरे बिकार । 
सुधार संग सँभार कू सब जन रहैं जुहार ।२७४७ । 
भावार्थ: -- बिगड़े हुवे आचार- विचार ने सब कही विकार भर दिया इन विकारों को सुधार  व् देश को सहजने के लिए सब लोग प्रतीक्षा में रहते ॥

गोरों जैसी चाम किए काले काले लोग । 
सँकरे मन के मानसा नहीं  केहि के जोग ।२७४८ । 
भावार्थ : -- संकीर्ण मानसिकता से युक्त  गोरों जैसी चमड़ी वाले लोग  काले ही होते  । और  किसी योग्य नहीं होते ॥ 

बड़ी बड़ी बातें करें छोटे करे बिचार । 
केसरी की खाल ज्यूँ  काढ़े सिंग सियार ।२७४९ । 
भावार्थ : -  जैसे शेर की खाल में सिंग निकाले सियार होता ही वैसे ही कुछ छुद्र विचार वाले लोग होते जो बातें बहुंत बड़ी बड़ी करते ।


बड़े न सिर पर धारिये छोटा करे गुहार । 
छोटे के करतब संग सधै बड़े के कार ।२७५० । 
भावार्थ :-- छोटा आह्वान कर कहता है बड़ों को सिर पर नहीं धरना चाहिए ।  छोटों की कलाकारी से ही बड़ों के कार्य सिद्ध होते हैं और छोटी छोटी कलाकारियों से ही कोई बड़ा कलाकार बनता है ॥ 

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