तैसो उपजन पाइये जैसे बिआ बुआन ।
बिन गुन ग्यान सहुँ होत संतमसी संतान ।२७४१ ।
भावार्थ : --जैसे बीज बोए जाते उपज भी वैसी ही प्राप्त होगी इस तथ्य को आधार कर गुण लक्षण व् ज्ञान हीनता से आसुरी माया के प्रति महामोहि संतान ही उत्पन्न होती ॥
गुनकारी धरम बिहीन, जो बुए बिआ पुरान ।
संतमस संतान रूप उपजे यह खलिहान ।२७४२।
भावार्थ : -- पूर्व में उत्तम गुणों के लिए लाभकारी धर्म से रहित जिन बीजों को बोया गया था । सत्ता व् माया की महामोही संतान उसी खेत की उपज थी जो सत्ता व् पैसा के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती ॥
नीँद न देखे साथरी काल न देखे काल ।
अँधानुगामी न देखे चलनहार की चाल ।२७४३।
भावार्थ : -- नींद खटिया पलौवन नहीं देखती, आती है तो कहीं भी आ जाती है नहीं आती तो कहीं नहीं आती ॥ मृत्यु समय नहीं देखती कभी भी आ जाती है । उसी प्रकार अंधे चरणानुग के नयन चरणहारी की चाल नहीं देखते ॥
धन सम्पद सों सबहि को धनपति पद की चाह ।
चाह पूरन जोग जतन कर चाहेँ को नाह ।२७४४।
भावार्थ : -- धन सम्पद व् धनपति पद की सभी को चाह होती । किन्तु उसके लिए आवश्यक योग्यता व युक्ति कोई नहीं चाहता ॥
धर्माचरन संग चरे सनमारग जो कोइ ।
जगहित परमारथ करे धनपति पद हुँत सोइ ।२७४५ ।
भावार्थ : -- जो धर्म के चार चरण सत्य, शौच, दान, त्याग के संग सन्मार्ग पर चलता हो । जगहित हेतु परमार्थ करता हो प्रचार हेतु नहीं वह धनपति पद के योग्य होना चाहिए ।
होना तो ये चाहिए वो चाहिए होता कुछ और
मृषा वादन संग करे कल कर्म जो कोइ ।
कूट कुटिल कुचाल चरे धनपत पद गह सोइ ।२७४६।
भावार्थ : -- स्वेच्छाचारिता के शासन में जो मृषा वादन कर काले कारनामे करता लुकते छिपते कुटिल कुचालें चलता वही धनपत के पद को सुशोभित करता ॥
बिगड़े देसाचार नै सब कहुँ भरे बिकार ।
सुधार संग सँभार कू सब जन रहैं जुहार ।२७४७ ।
भावार्थ: -- बिगड़े हुवे आचार- विचार ने सब कही विकार भर दिया इन विकारों को सुधार व् देश को सहजने के लिए सब लोग प्रतीक्षा में रहते ॥
गोरों जैसी चाम किए काले काले लोग ।
सँकरे मन के मानसा नहीं केहि के जोग ।२७४८ ।
भावार्थ : -- संकीर्ण मानसिकता से युक्त गोरों जैसी चमड़ी वाले लोग काले ही होते । और किसी योग्य नहीं होते ॥
बड़ी बड़ी बातें करें छोटे करे बिचार ।
केसरी की खाल ज्यूँ काढ़े सिंग सियार ।२७४९ ।
भावार्थ : - जैसे शेर की खाल में सिंग निकाले सियार होता ही वैसे ही कुछ छुद्र विचार वाले लोग होते जो बातें बहुंत बड़ी बड़ी करते ।
बड़े न सिर पर धारिये छोटा करे गुहार ।
छोटे के करतब संग सधै बड़े के कार ।२७५० ।
भावार्थ :-- छोटा आह्वान कर कहता है बड़ों को सिर पर नहीं धरना चाहिए । छोटों की कलाकारी से ही बड़ों के कार्य सिद्ध होते हैं और छोटी छोटी कलाकारियों से ही कोई बड़ा कलाकार बनता है ॥
बिन गुन ग्यान सहुँ होत संतमसी संतान ।२७४१ ।
भावार्थ : --जैसे बीज बोए जाते उपज भी वैसी ही प्राप्त होगी इस तथ्य को आधार कर गुण लक्षण व् ज्ञान हीनता से आसुरी माया के प्रति महामोहि संतान ही उत्पन्न होती ॥
गुनकारी धरम बिहीन, जो बुए बिआ पुरान ।
संतमस संतान रूप उपजे यह खलिहान ।२७४२।
भावार्थ : -- पूर्व में उत्तम गुणों के लिए लाभकारी धर्म से रहित जिन बीजों को बोया गया था । सत्ता व् माया की महामोही संतान उसी खेत की उपज थी जो सत्ता व् पैसा के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती ॥
नीँद न देखे साथरी काल न देखे काल ।
अँधानुगामी न देखे चलनहार की चाल ।२७४३।
भावार्थ : -- नींद खटिया पलौवन नहीं देखती, आती है तो कहीं भी आ जाती है नहीं आती तो कहीं नहीं आती ॥ मृत्यु समय नहीं देखती कभी भी आ जाती है । उसी प्रकार अंधे चरणानुग के नयन चरणहारी की चाल नहीं देखते ॥
धन सम्पद सों सबहि को धनपति पद की चाह ।
चाह पूरन जोग जतन कर चाहेँ को नाह ।२७४४।
भावार्थ : -- धन सम्पद व् धनपति पद की सभी को चाह होती । किन्तु उसके लिए आवश्यक योग्यता व युक्ति कोई नहीं चाहता ॥
धर्माचरन संग चरे सनमारग जो कोइ ।
जगहित परमारथ करे धनपति पद हुँत सोइ ।२७४५ ।
भावार्थ : -- जो धर्म के चार चरण सत्य, शौच, दान, त्याग के संग सन्मार्ग पर चलता हो । जगहित हेतु परमार्थ करता हो प्रचार हेतु नहीं वह धनपति पद के योग्य होना चाहिए ।
होना तो ये चाहिए वो चाहिए होता कुछ और
मृषा वादन संग करे कल कर्म जो कोइ ।
कूट कुटिल कुचाल चरे धनपत पद गह सोइ ।२७४६।
भावार्थ : -- स्वेच्छाचारिता के शासन में जो मृषा वादन कर काले कारनामे करता लुकते छिपते कुटिल कुचालें चलता वही धनपत के पद को सुशोभित करता ॥
बिगड़े देसाचार नै सब कहुँ भरे बिकार ।
सुधार संग सँभार कू सब जन रहैं जुहार ।२७४७ ।
भावार्थ: -- बिगड़े हुवे आचार- विचार ने सब कही विकार भर दिया इन विकारों को सुधार व् देश को सहजने के लिए सब लोग प्रतीक्षा में रहते ॥
गोरों जैसी चाम किए काले काले लोग ।
सँकरे मन के मानसा नहीं केहि के जोग ।२७४८ ।
भावार्थ : -- संकीर्ण मानसिकता से युक्त गोरों जैसी चमड़ी वाले लोग काले ही होते । और किसी योग्य नहीं होते ॥
बड़ी बड़ी बातें करें छोटे करे बिचार ।
केसरी की खाल ज्यूँ काढ़े सिंग सियार ।२७४९ ।
भावार्थ : - जैसे शेर की खाल में सिंग निकाले सियार होता ही वैसे ही कुछ छुद्र विचार वाले लोग होते जो बातें बहुंत बड़ी बड़ी करते ।
बड़े न सिर पर धारिये छोटा करे गुहार ।
छोटे के करतब संग सधै बड़े के कार ।२७५० ।
भावार्थ :-- छोटा आह्वान कर कहता है बड़ों को सिर पर नहीं धरना चाहिए । छोटों की कलाकारी से ही बड़ों के कार्य सिद्ध होते हैं और छोटी छोटी कलाकारियों से ही कोई बड़ा कलाकार बनता है ॥
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