मंगलवार, 9 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७० ॥ -----

जोग जगारा मिटि गयो,छायो कालहि काल । 
कतहुँ परे सिर आपदा कतहुँ त करे अकाल ।२७०१ । 
भावार्थ : -- समृद्ध काल व्यतीत हो गया  था स्वतंत्रता वाली जागृति समाप्त हो गई और भारत स्वतंत्र भी नहीं हुवा फिर संविधान की सुसुप्ता ने लोगों को घेर लिया और इण्डिया के रूप में उसका अशुभ काल प्रारम्भ हो गया ॥ 

जागृति समाप्त हो गई लोग स्वतन्त्र भी नहीं हुवे और संविधान गले पड़ गया.....

स्पष्टीकरण : --विभाजन के पूर्व भारत ग्रामीण क्षेत्रों में बसा था जो अंग्रेजों की पहुँच से दूर था यह भारत सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा था जीवन यापन का मुख्य आधार कृषिकर्म था । विभाजन के पश्चात पूरा भारत अस्त-व्यस्त हो गया उस समय मुसलमानों ने ऐसा भयंकर उपद्रव किया कि प्रदेश विशेष के वंशज तितर-बितर हो गए ऐसा विभाजन से प्रभावित भारतवंशियों के पूर्वजों का कहना है ॥ 


अनगैरी अंस भए अब  भारत के  अवतंस । 
मारे मारे  फिरे जो रहे इहाँ के बंस ।२७०२ । 
भावार्थ :-- जो भारत से अपरिचित थे निरवंशी थे वे श्रेष्ठ नागरिक हो गए और भारत के वंशज मारे मारे फिरने लगे ॥ 

जेहि भुइ जनम जुगे जो भारत बंसी होए । 
कही पराई मान के अपना वंस बिगोए ।२७०३ । 
भारत : -- इस भूमि से जन्में जो भारतवंशी पराई कही को माने  उन्होंने अपना वंश  गँवा दिया ॥ 

हंस बकुल धिआनी भए,कागा हंस बिबेक । 
जो ए बिबेकी कही दिए सोई परम प्रबेक ।२७०५ । 

भावार्थ : --  हंस बगुला भगत हो गए कौंवे विवेकी हंस हो गए और नीर-क्षीर का निर्णय करने लगे। कागा तक तो ठीक कोई कोई तो आधा तितर और आधा बटेर हो गया, माने की आधा इस तरह का आधा उस तरह का बाकी इस-उस तरह का । अब जो ये विवेकी कहते वही परम श्रेष्ठ होता ॥  

बिष भरे हेम कलस जस गनत मिले पै पाँच । 
जोइ  करें सो सब सुकृत जोइ  कहें सो साँच ।२७०६। 
भावार्थ : -- ये विष से भरे स्वर्ण कलश के जैसे लाखों में कोई दो चार ही मिलते । ये कुकृत्य तो कभी करते ही नहीं..... जो करते वह सब सत्कृत होता, ये असत्य तो कभी कहते ही नहीं..... जो कहते सो सत्य ही कहते ॥ 

अर्थहन नीति नेम सन,उपजे अर्थ पिसाच । 
 देश भीत बिदेस बसत नचएँ बिदेसी नाच ।२७०७ । 
भावार्थ :--तदनन्तर अर्थ प्रधान शासन व्यवस्था की अपव्ययी नीति व् नियमों से अर्थ पिशाच उत्पन्न होने लगे  देश के भीतर बसे विदेश में इनका निवास होता ये विदेशी संस्कृति का अनुकरण करते । 

टीका :--भारतीय संस्कृति को ये अपनी सुविधानुसार ही वरन करते जब काम निकल जाता राम नाम असत्य हो जाता ॥ 

चारि बरन दमनाए  के भए बिबबरन के राज । 
राजकुल सम साज बरे,करें ब्याजहि ब्याज ।२७०८। 
भावार्थ:-- संक्षेप में कहें तो मुसलमान  व् गोरों के पश्चात  भारत के वंशज  का दमन करते हुवे उस पर विवर्ण राज करने लगे ।  राजवंशों की सी इनकी साज सज्जा रहती । मैं और मेरा की संकीर्ण मानसिकता इनसे  सोमनाथ  के लुटेरों को भी लज्जित करने वाले कुकरम करने को विवश कर देती ॥ 

चलाचली के चलन में भरमन  जाल अधीन । 
कलुष जात समुदाय किए कुलीन भयउ मलीन ।२७०९ । 
भवार्थ : -- भीड़ वाली भेड़ की चाल चलते पौराणिक व् आधुनिक के भ्रमित जाल में फंस के बहुतेरे कुलीन मलीन हो गए । ऐसे क्लिष्ट जातक समुदाए में समुद्यत होने लगे  । 

आन धर्माचरनि के, हिंसा रुचित सुभाउ । 
बंसानुगत गुन संचत  जग आतंक जनाए ।२७१० । 
भावार्थ :--इधर भारत से इतर प्रवर्तित अन्य धर्म के अनुयायियों का हिंसक स्वभाव वंशानुगत गुणसूत्रों में संचित होता गया कालांतर में वह वैश्विक आतंकवाद की व्युत्पत्ति का  कारण बना ॥ 

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