शुक्रवार, 5 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६९ ॥ -----

उदधि दाता कर रस जस  जन सेबक जस बाहि ।
 काल घटा घन गरजाहि,बरखिहि कबहुँक  नाहि । २६९१ । 
भावार्थ :-- उदधि स्वरूप कर दाता, जन सेवक स्वरूप घन को कर रूपी जल से परिपूर्र्ण कर देते । ये जन सेवक वो बादल सिद्ध होते जो भयकारी कालिमा ग्रहण किए गर्जते तो बहुंत  किन्तु बरसते नहीं ॥ 

कर रस भरे घनकत  घन धनिमन घर बरखाए । 
सूखी खेती आपनी हरिअरि खेत पराए ।२६९२ । 
भावार्थ : -- ये गरजते तरजते हुवे बादल पूंजीपतियों  के घर में बरसते । भारत वंशी की अपनी खेती सूखी ही रह जाती और पराए खेत हरियाली से लहलहा उठते ।। 

कर्म प्रधान देस लहे  किए सत्कृत सब कोए । 
निर्धनहु को सुलभ रहे, सहजै  सबहि सँजोए ।२६९३-क । 

अर्थमाली को सहजहि सुलभ सबहि जग जोइ । 
जहाँ अभावान्बित तहँ उदरहु पूर न होइ ।२६९३-ख । 

भावार्थ : --  कर्म -प्रधान भारत में एक समवेत व्यवस्था थी जनमानस की बुद्धि सत्कृत में प्रवृत्त रहती परिणामस्वरूप आवश्यक सामग्रियाँ विपन्न वर्ग को भी सरलता पूर्वक उपलब्ध हो जाती ॥ 
अर्थ प्रधान भारत में धन की महत्वता अधिक हो गई  अधुनातन धनवंत को संसार की सभी वस्तुएँ सहज ही सुलभ होती । निर्धन को उदर की पूर्ति करना भी कठिन हो गया ॥ 

को चाम को काम बिबस उदर परायन  कोइ । 
अर्थ प्रधानक  देस में,सबहि अर्थगत होइ ।२६९४ । 
भावार्थ : --कोई चाम के कोई काम (अर्थ-काम ) के कोई उदर के वशीभूत होता । अर्थ  प्रधानतस देश इस प्रकार अर्थ  पर निर्भर होता चला गया और सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित हो गई ॥ 

कर्म प्रधानक देस में सबहि कर्म गत होइ । 
धनधान भरपूर रहे वंचित  रहे न कोइ ।२६९५-क। 

सासन हर भण्डार कर बैठे कुँडलीमार । 
अभरित बचपन के नयन जोगएँ जीवाधार।२६९५-ख । 

भावार्थ : -- कर्म प्रधान देश कर्म पर आश्रित था । इस सम्पन काल में भी धनधान्य के भंडार तभी भरते जब उससे कोई भी वंचित नहीं रहता । अर्थ- प्रधान देश का कुपोषित बचपन आहार की प्रतीक्षा करता मरता रहा । ये अर्थ पिशाचि सत्ताधारी उस आहार का भण्डारण कर उसपर कुंडलीमार कर बैठे रहे ||

सुबारथ परत आपने सत्ता मद मैं चूर । 
धर्मार्थ जनन्हि करहु  परमारथ गए भूर ।२६९६। 
भावार्थ :-- अपने स्वार्थ के परायण  होकर सत्ताधारी सत्ता के मद में उन्मत्त रहे । जो हाथ धर्मार्थ के लिए आरक्षित थे वह भी परमार्थ भूल गए ॥

अर्थ की सबहि चाह किए  करम चाहे न कोइ । 
अर्थ  लहे  धर्म न करे धर्मी कहँ जग सोइ ।२६९७। 
भावार्थ : -- अब धन की तो सभी को चाह रहती जहां कर्म है वहां धन की प्राप्ति अवश्यम्भावी है  इस सिद्धांत से अन्यथा होकर कर्म की चाह  कोई नहीं करता ।  धन की प्राप्ति पर भी जो  धर्म न करता वह धर्मी कहलाता ॥

भयउ बिलासी जीवनी बिकास की परिभास । 
बंचित जहाँ अतिसय रहे कतिपय रहें सुपास ।२६९८। 
भावार्थ : - विलासित जीवन चर्या ही विकास की परिभषा हो गई जिसका अनुकरण कर अतिसय जनता  वंचित ही रहती कतिपय लोग ही सुखमय जीवन व्यतीत करते ॥



सोधन केर बिषय रहे जे अचरज की बात । 
कर्मोंमुखी अर्थ मन  बदले रातों रात ।२६९९। 
भावार्थ : -- अब एक आश्चर्य चकित करने  वाली बात शोध  का विषय हो गई । जिसे मुसलमानों व् अंग्रेजों का शासन भी परिवर्तित न कर पाया वह  कर्म प्रधान व्यवस्था  रातों रात अर्थ प्रधान में कैसे परिवर्तित हो गई जबकि यह व्यवस्था युगों युगों से चल रही थी ॥

टिप्पणी :-- जिन्होंने अब तक न अंग्रेजों का अनुशरण किया न मुसलमानों का जो लोग वेद-पुराणों का अनुशरण करते थे वे अब कांग्रेस के बनाए संविधान का अनुशरण करने लगे इस कारण बदल गया जिसने अनुशरण नहीं किया उसका कर्म ही प्रधान रहा ॥


नागर जन अगनीत भए अनगैरी गननीअ । 
बंधु बंधुता तजित के भयो पियारे पीअ ।२७००।  
भावार्थ : -- इस अर्थ प्रधान व्यवस्था में भारत वंशी उपेक्षित व् भारत से अपरिचित निरवंशी गणमान्य हो गए । संविधान की आड़ लेकर बंधुओं ने बंधुता त्याग दी, अब उनकी भारत वंशियों पर कुदृष्टि रहती ॥ 

स्पष्टीकरण : -- भारत से अपरिचित इसलिए कि ये प्रत्येक नई-पुरानी बातों को दक़ियानूसी बोल बोल के भारतवंशियों को फसाते, जबकि इनकी आधुनिक बातें  पुराण पंथ से भी पौराणिक थी  । । 



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