उदधि दाता कर रस जस जन सेबक जस बाहि ।
काल घटा घन गरजाहि,बरखिहि कबहुँक नाहि । २६९१ ।
भावार्थ :-- उदधि स्वरूप कर दाता, जन सेवक स्वरूप घन को कर रूपी जल से परिपूर्र्ण कर देते । ये जन सेवक वो बादल सिद्ध होते जो भयकारी कालिमा ग्रहण किए गर्जते तो बहुंत किन्तु बरसते नहीं ॥
कर रस भरे घनकत घन धनिमन घर बरखाए ।
सूखी खेती आपनी हरिअरि खेत पराए ।२६९२ ।
भावार्थ : -- ये गरजते तरजते हुवे बादल पूंजीपतियों के घर में बरसते । भारत वंशी की अपनी खेती सूखी ही रह जाती और पराए खेत हरियाली से लहलहा उठते ।।
कर्म प्रधान देस लहे किए सत्कृत सब कोए ।
निर्धनहु को सुलभ रहे, सहजै सबहि सँजोए ।२६९३-क ।
अर्थमाली को सहजहि सुलभ सबहि जग जोइ ।
जहाँ अभावान्बित तहँ उदरहु पूर न होइ ।२६९३-ख ।
भावार्थ : -- कर्म -प्रधान भारत में एक समवेत व्यवस्था थी जनमानस की बुद्धि सत्कृत में प्रवृत्त रहती परिणामस्वरूप आवश्यक सामग्रियाँ विपन्न वर्ग को भी सरलता पूर्वक उपलब्ध हो जाती ॥
अर्थ प्रधान भारत में धन की महत्वता अधिक हो गई अधुनातन धनवंत को संसार की सभी वस्तुएँ सहज ही सुलभ होती । निर्धन को उदर की पूर्ति करना भी कठिन हो गया ॥
को चाम को काम बिबस उदर परायन कोइ ।
अर्थ प्रधानक देस में,सबहि अर्थगत होइ ।२६९४ ।
भावार्थ : --कोई चाम के कोई काम (अर्थ-काम ) के कोई उदर के वशीभूत होता । अर्थ प्रधानतस देश इस प्रकार अर्थ पर निर्भर होता चला गया और सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित हो गई ॥
कर्म प्रधानक देस में सबहि कर्म गत होइ ।
धनधान भरपूर रहे वंचित रहे न कोइ ।२६९५-क।
सासन हर भण्डार कर बैठे कुँडलीमार ।
अभरित बचपन के नयन जोगएँ जीवाधार।२६९५-ख ।
भावार्थ : -- कर्म प्रधान देश कर्म पर आश्रित था । इस सम्पन काल में भी धनधान्य के भंडार तभी भरते जब उससे कोई भी वंचित नहीं रहता । अर्थ- प्रधान देश का कुपोषित बचपन आहार की प्रतीक्षा करता मरता रहा । ये अर्थ पिशाचि सत्ताधारी उस आहार का भण्डारण कर उसपर कुंडलीमार कर बैठे रहे ||
सुबारथ परत आपने सत्ता मद मैं चूर ।
धर्मार्थ जनन्हि करहु परमारथ गए भूर ।२६९६।
भावार्थ :-- अपने स्वार्थ के परायण होकर सत्ताधारी सत्ता के मद में उन्मत्त रहे । जो हाथ धर्मार्थ के लिए आरक्षित थे वह भी परमार्थ भूल गए ॥
अर्थ की सबहि चाह किए करम चाहे न कोइ ।
अर्थ लहे धर्म न करे धर्मी कहँ जग सोइ ।२६९७।
भावार्थ : -- अब धन की तो सभी को चाह रहती जहां कर्म है वहां धन की प्राप्ति अवश्यम्भावी है इस सिद्धांत से अन्यथा होकर कर्म की चाह कोई नहीं करता । धन की प्राप्ति पर भी जो धर्म न करता वह धर्मी कहलाता ॥
भयउ बिलासी जीवनी बिकास की परिभास ।
बंचित जहाँ अतिसय रहे कतिपय रहें सुपास ।२६९८।
भावार्थ : - विलासित जीवन चर्या ही विकास की परिभषा हो गई जिसका अनुकरण कर अतिसय जनता वंचित ही रहती कतिपय लोग ही सुखमय जीवन व्यतीत करते ॥
सोधन केर बिषय रहे जे अचरज की बात ।
कर्मोंमुखी अर्थ मन बदले रातों रात ।२६९९।
भावार्थ : -- अब एक आश्चर्य चकित करने वाली बात शोध का विषय हो गई । जिसे मुसलमानों व् अंग्रेजों का शासन भी परिवर्तित न कर पाया वह कर्म प्रधान व्यवस्था रातों रात अर्थ प्रधान में कैसे परिवर्तित हो गई जबकि यह व्यवस्था युगों युगों से चल रही थी ॥
टिप्पणी :-- जिन्होंने अब तक न अंग्रेजों का अनुशरण किया न मुसलमानों का जो लोग वेद-पुराणों का अनुशरण करते थे वे अब कांग्रेस के बनाए संविधान का अनुशरण करने लगे इस कारण बदल गया जिसने अनुशरण नहीं किया उसका कर्म ही प्रधान रहा ॥
नागर जन अगनीत भए अनगैरी गननीअ ।
बंधु बंधुता तजित के भयो पियारे पीअ ।२७००।
भावार्थ : -- इस अर्थ प्रधान व्यवस्था में भारत वंशी उपेक्षित व् भारत से अपरिचित निरवंशी गणमान्य हो गए । संविधान की आड़ लेकर बंधुओं ने बंधुता त्याग दी, अब उनकी भारत वंशियों पर कुदृष्टि रहती ॥
स्पष्टीकरण : -- भारत से अपरिचित इसलिए कि ये प्रत्येक नई-पुरानी बातों को दक़ियानूसी बोल बोल के भारतवंशियों को फसाते, जबकि इनकी आधुनिक बातें पुराण पंथ से भी पौराणिक थी । ।
काल घटा घन गरजाहि,बरखिहि कबहुँक नाहि । २६९१ ।
भावार्थ :-- उदधि स्वरूप कर दाता, जन सेवक स्वरूप घन को कर रूपी जल से परिपूर्र्ण कर देते । ये जन सेवक वो बादल सिद्ध होते जो भयकारी कालिमा ग्रहण किए गर्जते तो बहुंत किन्तु बरसते नहीं ॥
कर रस भरे घनकत घन धनिमन घर बरखाए ।
सूखी खेती आपनी हरिअरि खेत पराए ।२६९२ ।
भावार्थ : -- ये गरजते तरजते हुवे बादल पूंजीपतियों के घर में बरसते । भारत वंशी की अपनी खेती सूखी ही रह जाती और पराए खेत हरियाली से लहलहा उठते ।।
कर्म प्रधान देस लहे किए सत्कृत सब कोए ।
निर्धनहु को सुलभ रहे, सहजै सबहि सँजोए ।२६९३-क ।
अर्थमाली को सहजहि सुलभ सबहि जग जोइ ।
जहाँ अभावान्बित तहँ उदरहु पूर न होइ ।२६९३-ख ।
भावार्थ : -- कर्म -प्रधान भारत में एक समवेत व्यवस्था थी जनमानस की बुद्धि सत्कृत में प्रवृत्त रहती परिणामस्वरूप आवश्यक सामग्रियाँ विपन्न वर्ग को भी सरलता पूर्वक उपलब्ध हो जाती ॥
अर्थ प्रधान भारत में धन की महत्वता अधिक हो गई अधुनातन धनवंत को संसार की सभी वस्तुएँ सहज ही सुलभ होती । निर्धन को उदर की पूर्ति करना भी कठिन हो गया ॥
को चाम को काम बिबस उदर परायन कोइ ।
अर्थ प्रधानक देस में,सबहि अर्थगत होइ ।२६९४ ।
भावार्थ : --कोई चाम के कोई काम (अर्थ-काम ) के कोई उदर के वशीभूत होता । अर्थ प्रधानतस देश इस प्रकार अर्थ पर निर्भर होता चला गया और सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित हो गई ॥
कर्म प्रधानक देस में सबहि कर्म गत होइ ।
धनधान भरपूर रहे वंचित रहे न कोइ ।२६९५-क।
सासन हर भण्डार कर बैठे कुँडलीमार ।
अभरित बचपन के नयन जोगएँ जीवाधार।२६९५-ख ।
भावार्थ : -- कर्म प्रधान देश कर्म पर आश्रित था । इस सम्पन काल में भी धनधान्य के भंडार तभी भरते जब उससे कोई भी वंचित नहीं रहता । अर्थ- प्रधान देश का कुपोषित बचपन आहार की प्रतीक्षा करता मरता रहा । ये अर्थ पिशाचि सत्ताधारी उस आहार का भण्डारण कर उसपर कुंडलीमार कर बैठे रहे ||
सुबारथ परत आपने सत्ता मद मैं चूर ।
धर्मार्थ जनन्हि करहु परमारथ गए भूर ।२६९६।
भावार्थ :-- अपने स्वार्थ के परायण होकर सत्ताधारी सत्ता के मद में उन्मत्त रहे । जो हाथ धर्मार्थ के लिए आरक्षित थे वह भी परमार्थ भूल गए ॥
अर्थ की सबहि चाह किए करम चाहे न कोइ ।
अर्थ लहे धर्म न करे धर्मी कहँ जग सोइ ।२६९७।
भावार्थ : -- अब धन की तो सभी को चाह रहती जहां कर्म है वहां धन की प्राप्ति अवश्यम्भावी है इस सिद्धांत से अन्यथा होकर कर्म की चाह कोई नहीं करता । धन की प्राप्ति पर भी जो धर्म न करता वह धर्मी कहलाता ॥
भयउ बिलासी जीवनी बिकास की परिभास ।
बंचित जहाँ अतिसय रहे कतिपय रहें सुपास ।२६९८।
भावार्थ : - विलासित जीवन चर्या ही विकास की परिभषा हो गई जिसका अनुकरण कर अतिसय जनता वंचित ही रहती कतिपय लोग ही सुखमय जीवन व्यतीत करते ॥
सोधन केर बिषय रहे जे अचरज की बात ।
कर्मोंमुखी अर्थ मन बदले रातों रात ।२६९९।
भावार्थ : -- अब एक आश्चर्य चकित करने वाली बात शोध का विषय हो गई । जिसे मुसलमानों व् अंग्रेजों का शासन भी परिवर्तित न कर पाया वह कर्म प्रधान व्यवस्था रातों रात अर्थ प्रधान में कैसे परिवर्तित हो गई जबकि यह व्यवस्था युगों युगों से चल रही थी ॥
टिप्पणी :-- जिन्होंने अब तक न अंग्रेजों का अनुशरण किया न मुसलमानों का जो लोग वेद-पुराणों का अनुशरण करते थे वे अब कांग्रेस के बनाए संविधान का अनुशरण करने लगे इस कारण बदल गया जिसने अनुशरण नहीं किया उसका कर्म ही प्रधान रहा ॥
नागर जन अगनीत भए अनगैरी गननीअ ।
बंधु बंधुता तजित के भयो पियारे पीअ ।२७००।
भावार्थ : -- इस अर्थ प्रधान व्यवस्था में भारत वंशी उपेक्षित व् भारत से अपरिचित निरवंशी गणमान्य हो गए । संविधान की आड़ लेकर बंधुओं ने बंधुता त्याग दी, अब उनकी भारत वंशियों पर कुदृष्टि रहती ॥
स्पष्टीकरण : -- भारत से अपरिचित इसलिए कि ये प्रत्येक नई-पुरानी बातों को दक़ियानूसी बोल बोल के भारतवंशियों को फसाते, जबकि इनकी आधुनिक बातें पुराण पंथ से भी पौराणिक थी । ।
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