भुआलु को दास करे, दासा भयो भुआल ।
जुगलग संचित संपदा निकसत भए कंगाल ।२७३१ ।
भावार्थ : -- युगों तक संचित सम्पदा निष्कासित होती गई भारत के भूपति कंगाल होकर दास बन गए दास मालामाल होकर भूपति बन बैठे ॥
शासन रथ सासक रथी भूपति सारथि होए ।
पुनि संचारी पथ रचे संचित सब धन ढोए ।२७३।
भावार्थ : शासन ने इसमं रथ की शासकों ने रथी की व् बने हुवे अतिपतियों ने सारथि की भूमिका निभाई । फिर केवल इन रथों के लिए सडकों का निर्माण होता रहा और देश की संचित सम्पदा उत्खात कर महानगरों में डुहारी जाने लगी ॥
चौखा चकिता चाक भए धन सम्पद के पाँव ।
महा नगरी बसन चले छाँड़ खेत बन गाँव । २७३२ ।
भावार्थ : -- इन बने हुवे अतिपतियों ने संचित सम्पदा के पाँव को विस्मयकारी तीव्रगति धारी चक्र में परिवर्तित कर दिया । अब यह सम्पदा खेतों वनों व् गाँवों को छोड़ कर महानगरो में बसने लगी ॥
उड़न खटोले उड़ चले पहुंचे देस पराए ।
उजरी उजरी सम्पदा काला धन कहलाए ।२७३३ ।
भावार्थ : -- महानगरों में बसने के पश्चात यह उड़न खटोलों में उड़ती हुई मलिन हाथों से पराए देशों में पहुंच जाती । इस प्रकार भारतीयों की उज्जवल सम्पदा काला धन कहलाने लगी ॥
अनभरित बचपन के मन भरे रहे बहु पूछ ।
खात अघात सासक गन उत्तरु सोन रहि छूछ । २७३४ ।
भावार्थ : -- अध भरा उदर लिए देश के बचपन का मन मानस कालाधन क्या है ? किसका है ? कहाँ है ? क्यों हैं ?
जैसे प्रश्नों से भरपूर था । शासक गण का उदर तो कंठ तक भरा रहता किन्तु उनका मनो मस्तिष्क उत्तर से रिक्त होता ।
सिखा सदन बचपन करे सासकगन के जाप ।
सिखे बड़ा है रुपइया भाई बड़ा न बाप ।२७३५ ।
भावार्थ : -- जब यह कुपोषित बालक शिक्षा सदन में जाते, तब शासक गण के अवगुणों का जाप कर यही सीखते कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया ॥
जो बिलसित सदन रहे महमन कहैं पुकार ।
पाठ पाठ प्रचार करे अपने हित को सार ।२७३६ ।
भावार्थ : -- जो उद्योगपतियों के विलासित भवनों में रहते हैं उनको महात्मा कहते हैं स्वार्थी शासक गण निज हितों की सिद्धि के लिए शालाओं के पाठ्यक्रम में ऐसे ढोंगी महात्माओं का प्रचार करते ।
टिप्पणी : -- जो लिखे पढ़े नहीं थे उन्हें अंग्रेजों के व् मुसलामानों का राज व् विभाजन ज्ञात था किन्तु वे ऐसे महात्माओं से अनभिज्ञ थे ॥
गुरुबर ज्ञान परिहरै गहे सिखाकर सीख ।
पति पद कू दासा करे पढ़े बिदेसी लीख ।२७३७ ।
भावार्थ : -- शनै शनै ज्ञान योगी गुरुओं का ज्ञान का त्याग कर वेतन भोगी शिक्षकों की शिक्षा ग्रहण की जाने लगी । यह शिक्षा विदेशी रूडी वादिता पर आधारित होती जो स्वामी के पद को दासता में परिणित करती ॥
सुवारथ परत हुँत धर्म उदर परत हुँत कर्म ।
बालकिन्ह को जनि जनक, सिखावहि एही मर्म ।२७३८।
भावार्थ : -- धर्म अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए व् कर्म केवल उदर पूर्ति के साधन हैं बालकों को माता पिता यही शिक्षा देते मिलते ॥
तेरी सिखाई सीख मैं, सुरु की सीखी खोए ।
दान धरम दुसह भए जब भगति बिसन कहलाइ ।
पाप करम सुख दाइया दया न उर उपजाइ ।२७४० ।
भावार्थ :-- दान पुण्य तब कठिन हो गया जब भक्ति व्यसन कहलाने लगी । पाप कर्म सुख के दाता हो चले तो हृदयों में दया भी व्युत्पन्न नहीं होती ॥
जुगलग संचित संपदा निकसत भए कंगाल ।२७३१ ।
भावार्थ : -- युगों तक संचित सम्पदा निष्कासित होती गई भारत के भूपति कंगाल होकर दास बन गए दास मालामाल होकर भूपति बन बैठे ॥
शासन रथ सासक रथी भूपति सारथि होए ।
पुनि संचारी पथ रचे संचित सब धन ढोए ।२७३।
भावार्थ : शासन ने इसमं रथ की शासकों ने रथी की व् बने हुवे अतिपतियों ने सारथि की भूमिका निभाई । फिर केवल इन रथों के लिए सडकों का निर्माण होता रहा और देश की संचित सम्पदा उत्खात कर महानगरों में डुहारी जाने लगी ॥
चौखा चकिता चाक भए धन सम्पद के पाँव ।
महा नगरी बसन चले छाँड़ खेत बन गाँव । २७३२ ।
भावार्थ : -- इन बने हुवे अतिपतियों ने संचित सम्पदा के पाँव को विस्मयकारी तीव्रगति धारी चक्र में परिवर्तित कर दिया । अब यह सम्पदा खेतों वनों व् गाँवों को छोड़ कर महानगरो में बसने लगी ॥
उड़न खटोले उड़ चले पहुंचे देस पराए ।
उजरी उजरी सम्पदा काला धन कहलाए ।२७३३ ।
भावार्थ : -- महानगरों में बसने के पश्चात यह उड़न खटोलों में उड़ती हुई मलिन हाथों से पराए देशों में पहुंच जाती । इस प्रकार भारतीयों की उज्जवल सम्पदा काला धन कहलाने लगी ॥
अनभरित बचपन के मन भरे रहे बहु पूछ ।
खात अघात सासक गन उत्तरु सोन रहि छूछ । २७३४ ।
भावार्थ : -- अध भरा उदर लिए देश के बचपन का मन मानस कालाधन क्या है ? किसका है ? कहाँ है ? क्यों हैं ?
जैसे प्रश्नों से भरपूर था । शासक गण का उदर तो कंठ तक भरा रहता किन्तु उनका मनो मस्तिष्क उत्तर से रिक्त होता ।
सिखा सदन बचपन करे सासकगन के जाप ।
सिखे बड़ा है रुपइया भाई बड़ा न बाप ।२७३५ ।
भावार्थ : -- जब यह कुपोषित बालक शिक्षा सदन में जाते, तब शासक गण के अवगुणों का जाप कर यही सीखते कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया ॥
जो बिलसित सदन रहे महमन कहैं पुकार ।
पाठ पाठ प्रचार करे अपने हित को सार ।२७३६ ।
भावार्थ : -- जो उद्योगपतियों के विलासित भवनों में रहते हैं उनको महात्मा कहते हैं स्वार्थी शासक गण निज हितों की सिद्धि के लिए शालाओं के पाठ्यक्रम में ऐसे ढोंगी महात्माओं का प्रचार करते ।
टिप्पणी : -- जो लिखे पढ़े नहीं थे उन्हें अंग्रेजों के व् मुसलामानों का राज व् विभाजन ज्ञात था किन्तु वे ऐसे महात्माओं से अनभिज्ञ थे ॥
गुरुबर ज्ञान परिहरै गहे सिखाकर सीख ।
पति पद कू दासा करे पढ़े बिदेसी लीख ।२७३७ ।
भावार्थ : -- शनै शनै ज्ञान योगी गुरुओं का ज्ञान का त्याग कर वेतन भोगी शिक्षकों की शिक्षा ग्रहण की जाने लगी । यह शिक्षा विदेशी रूडी वादिता पर आधारित होती जो स्वामी के पद को दासता में परिणित करती ॥
सुवारथ परत हुँत धर्म उदर परत हुँत कर्म ।
बालकिन्ह को जनि जनक, सिखावहि एही मर्म ।२७३८।
भावार्थ : -- धर्म अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए व् कर्म केवल उदर पूर्ति के साधन हैं बालकों को माता पिता यही शिक्षा देते मिलते ॥
तेरी सिखाई सीख मैं, सुरु की सीखी खोए ।
आगे आगे देखिये होतबता का होए ।२७३९ ।
भावार्थ : -- अपनी सीखी हुई सिख तो सीखा दी गुरु की शिक्षा भुला दी ।अब आगे आगे देखो तेरा और तेरे गुरु का क्या होता है ॥दान धरम दुसह भए जब भगति बिसन कहलाइ ।
पाप करम सुख दाइया दया न उर उपजाइ ।२७४० ।
भावार्थ :-- दान पुण्य तब कठिन हो गया जब भक्ति व्यसन कहलाने लगी । पाप कर्म सुख के दाता हो चले तो हृदयों में दया भी व्युत्पन्न नहीं होती ॥
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