सोमवार, 22 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७३ ॥ -----

भुआलु को दास करे, दासा भयो भुआल । 
जुगलग संचित संपदा निकसत भए कंगाल ।२७३१ । 
भावार्थ : --  युगों तक संचित सम्पदा निष्कासित होती गई भारत के भूपति कंगाल होकर दास  बन गए दास मालामाल  होकर भूपति  बन बैठे ॥

शासन रथ सासक रथी भूपति सारथि होए ।
पुनि संचारी पथ रचे संचित सब धन ढोए ।२७३।
भावार्थ :  शासन ने इसमं रथ की शासकों ने रथी की व् बने हुवे अतिपतियों ने सारथि की भूमिका निभाई । फिर केवल  इन रथों के लिए सडकों का निर्माण होता रहा और देश की संचित सम्पदा उत्खात कर महानगरों में डुहारी जाने लगी ॥

चौखा चकिता चाक भए   धन सम्पद के पाँव । 
महा नगरी बसन चले छाँड़ खेत बन गाँव । २७३२ । 
भावार्थ : -- इन बने हुवे अतिपतियों  ने संचित सम्पदा के पाँव को विस्मयकारी तीव्रगति धारी चक्र में परिवर्तित कर दिया । अब यह सम्पदा खेतों वनों व् गाँवों को छोड़ कर महानगरो में बसने लगी ॥


उड़न खटोले उड़ चले पहुंचे देस पराए ।
उजरी उजरी सम्पदा  काला धन कहलाए ।२७३३ ।
भावार्थ : -- महानगरों में बसने के पश्चात यह उड़न खटोलों में उड़ती हुई मलिन हाथों से  पराए देशों में पहुंच जाती  । इस प्रकार भारतीयों की उज्जवल सम्पदा काला धन कहलाने लगी ॥

अनभरित बचपन  के मन भरे रहे बहु  पूछ । 
खात  अघात सासक गन उत्तरु सोन रहि छूछ । २७३४ । 
 भावार्थ  : -- अध भरा उदर लिए देश के बचपन का मन मानस कालाधन क्या है ? किसका है ?  कहाँ है ? क्यों हैं ?
जैसे प्रश्नों से भरपूर था । शासक गण का उदर तो कंठ तक भरा रहता किन्तु उनका मनो मस्तिष्क  उत्तर से रिक्त होता ।

सिखा सदन बचपन करे सासकगन के जाप । 
सिखे  बड़ा है रुपइया भाई बड़ा न बाप ।२७३५ । 
भावार्थ : -- जब यह कुपोषित बालक  शिक्षा सदन में जाते, तब शासक गण के अवगुणों का  जाप कर यही सीखते कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया ॥   

जो बिलसित सदन रहे महमन कहैं पुकार । 
पाठ पाठ प्रचार करे अपने हित को सार ।२७३६ । 
भावार्थ : -- जो उद्योगपतियों के विलासित भवनों में रहते हैं उनको महात्मा कहते हैं स्वार्थी  शासक गण निज हितों की सिद्धि  के लिए शालाओं के पाठ्यक्रम में ऐसे ढोंगी महात्माओं का प्रचार करते ।

टिप्पणी : -- जो लिखे पढ़े नहीं थे उन्हें अंग्रेजों के व् मुसलामानों का  राज व् विभाजन ज्ञात था किन्तु  वे ऐसे महात्माओं से अनभिज्ञ थे ॥

गुरुबर ज्ञान परिहरै गहे सिखाकर सीख । 
पति पद कू दासा करे पढ़े बिदेसी लीख ।२७३७ । 
भावार्थ : -- शनै शनै ज्ञान योगी गुरुओं का ज्ञान का त्याग कर वेतन भोगी शिक्षकों की शिक्षा  ग्रहण की  जाने लगी । यह शिक्षा विदेशी रूडी वादिता पर आधारित होती जो स्वामी के पद को दासता में परिणित करती ॥ 

सुवारथ परत हुँत धर्म उदर परत हुँत  कर्म । 
बालकिन्ह को जनि जनक, सिखावहि एही मर्म ।२७३८। 
भावार्थ : -- धर्म अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए व् कर्म केवल उदर पूर्ति के साधन हैं बालकों को माता पिता यही शिक्षा देते मिलते ॥ 

तेरी सिखाई सीख मैं, सुरु की सीखी खोए । 
आगे आगे देखिये  होतबता का  होए ।२७३९ । 
भावार्थ  : --  अपनी सीखी हुई सिख तो सीखा दी  गुरु की शिक्षा भुला दी ।अब  आगे आगे देखो तेरा और तेरे गुरु का क्या होता है ॥

दान धरम दुसह भए जब भगति बिसन कहलाइ । 
पाप करम सुख दाइया दया न उर उपजाइ ।२७४०  । 
भावार्थ :-- दान पुण्य तब कठिन  हो गया जब भक्ति व्यसन कहलाने लगी । पाप कर्म सुख के दाता हो चले तो हृदयों में दया भी व्युत्पन्न नहीं होती ॥ 

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