शुक्रवार, 19 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७२॥ -----


जगत जुगाड़ जोड़ करेँ लाखों लाख करोड़ । 
अर्थ पिशाची के बीच मची बढे की होड़ ।२७२१ । 
भावार्थ : -- फिर तो  जगत भर के जुगाड़ कर लाखों लाख  करोड़ जोड़ किए  अर्थ पिशाचों के बीच "सबसे बड़ा कौन ? " की प्रतिस्पर्धा होने लगी ॥ 

लाही को सब थोड़ है निरलाही को अधिकाए । 
याके मन में चोर है याके मन पहिराए ।२७२२ । 
भावार्थ : - लोभी हेतु  तीन लोक की संपत्ति भी थोड़ी होती । निर्लोभी को एक पत्ति भी बहुंत होती । वित्त कामी के  मन में चोर होता है अकामी के मन में देश का रक्षक होता ॥ 

देस प्रेम की भावना जाके भीत न होइ । 
तिसपर खोटी नीत किए होत बिद्रोही सोइ ।२७२३ । 
भावार्थ : -- जिसके अंतर में देश प्रेम की भावना न हो उसपर  खोटी बुद्धि का हो तो वह देश द्रोह का अपराधी होना चाहिए था  ॥ 

काल अँधेरी रैन रै जहँ तहँ अर्थ पिसाच । 
बिहारे बहु रूप धरे नाचे अनगढ़ नाच ।२७२४ । 
भावार्थ :-- जब अज्ञानता की अँधेरी रात और अँधेरी होती गई तब अर्थ पिशाच सर्वत्र व्याप्त होते गए । ये बहुंत से रूप धरे होते कोई नेता का कोई अभिनेता का  कोई खिलाड़ी का कोई लम्बी वाली दाढ़ी का रूप धरे भौंडा नृत्य करते दिखाई देते । 

काल कलुषित धन के बल जो चाहे सो पाए । 
जो चाहे सो पद चढ़े जहँ चाहे तहँ जाए ।२७२५ । 
भावार्थ : -- पाप के धन से इनमें  ऐसी अद्भुत क्रय शक्ति आ गई थी की ये अर्थ पिशाच  जो चाहते वह क्रय कर चाहे जो पद को  प्राप्त कर लेते जहाँ चाहते वहां चले जाते बिलकुल इच्छाधारी नाग के जैसे.....

एक  कोर में चोर  लगे दूजे लागी आग । 
लुटेरे पुर पोर लगे तापर भई न जाग ।२७२६ । 
भावार्थ : -- घर के एक कोने में चोर लगे होते दूसरे में महंगाई की आग लगी होती आग भी ऐसी कसूती कि लुगाई भी मिलनी दुस्वार होती । घर की ड्योढ़ी तातारी के उपद्रवी लुटेरों की पुरी से मिली होती उसपर भी घरवाले सोए रहते जागते ही नई.....

जनमानस जी जोगबत जीव जगत मरि जाए । 
जरजा ऐसी होइबे जो जग जीवन दाए ।२७२७ । 
भावार्थ : - मानव जीवन को संजोने के लिए जीव जगत अपने प्राणों की आहुति देता रहा । जबकि मानव का प्रादुर्भाव इस हेतु हुवा की उसकी जीवन चर्या संसार के लिए प्राण दाई हो प्राण हारी न हो ॥ 

भोग रहा भव को अबर  भुकत रहा है कोइ । 
दूषण करता अबरु है दोष अबरु सिर होए ।२७२८। 
भावार्थ : -- इस संसार को भोगी कोई और होता भुक्तभोगी कोई और  । यहाँ दूषण कोई और करता और दोष किसी और के सिर मढ़ दिया जाता  ॥ 

करता  अपनी हो करे होत रहा  किछु आन । 
मानस चिरंजीउ रहे जीव जगत दे प्रान ।२७२९। 
भावार्थ : -- होतव्यता को कुछ और चाहिए होता  किन्तु करता की अपनी हो के कारण होता कुछ और । मानव जीवन चिरायु रहे यह कामना कर जीव जगत अपने प्राण देता रहा ॥ 

  जीवन घाती काग तो मोती चुनि चुनि  खात । 
हंसा घुन के कन चुगत होत मलिनई जात ।२७३० । 
भावार्थ : --जीवन घाती कागा मोती चुन कर खाता  हंस अपनी जाति को मलिन कर घुन लगे कण पाता ॥ 

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