शनिवार, 13 जून 2015

--- ॥ दोहा-दशम २७१॥ -----,

पाप बिलसे धर्म ग्रसे सतगुन अल्पहि पाए । 
राजस राज तामस राउ अवगुन अति अधिकाए ।२७११ । 
भावार्थ : -- पापमय सुखोपभोग धर्म का ग्रास करता है धर्म के ग्रास से सत्वगुण  की उपलब्धता अल्प हो जाती है । जब शासन राजसी औरशासक तामसी हो तब समाज अल्प गुणी हो जाता है  ॥ 

मानस तामस गुन  बिबस जगहित कृत परिहार । 
धूत कृत चरित बर करे सब रस पर अधिकार ।२७१२ । 
भावार्थ : -- सात्विक गुणों के वशीभूत होकर जो  मानव फूल फल पशु पक्षी को समर्पित कर पत्र  ग्रहण करता तामसी गुणों के वशीभूत होकर उसने  विश्व के हितकारी कृत्यों को त्याग दिया व्  धूर्त कृत क्रियाकलाप का वरण कर वह सभी सांसारिक रसों पर अपना एकाधिकार स्थापित करता गया  ॥ 

जगती ताके जोगड़ा  जाके रहे अधीन  । 
कुलीन बसिन कुलीन भए मलीन बसिन  मलीन ।२७१३। 
भावार्थ :-- धरती, संसार, वायु, मानवजाति,निवासित स्थल, देश  उसी का हो जाता जिसके वह अधीन होता कुलीन शासक या ऋषि  उसे कुलीन व् मलीन शासक अथवा ऋषि उसे मलीन कर देता ।।  

माटी तन तरु बास नहि  धरती सीस अगास । 
जीवन धन  को साँस नहि जल के कंठ पिपास ।२७१४ । 
भावार्थ : -- मिट्टी के तन  को गहन का वसन नहीं रहा धरती शीश पर आकाश नहीं रहा । अब जीवन धन को ही उचित भोजन उपलब्ध नहीं होता तो वह किसी की क्षुधा कैसे मिटाता, जल का कंठ ही प्यासा होता वह किसी की प्यास क्या बुझाता ॥ 

भव भू के भंडारि कू भावै भोग बिलास । 
भरित पूर भर आपनी, रहे सुवासित बास ।२७१५। 
भावार्थ : -- सांसारिक भूति  के प्रबंधक मानव की रूचि विलासित जीवन चर्या में रहती । वह संसार को अपुष्ट करता स्वयं परिपुष्ट होकर सुखमय निवास में वासित रहता ॥ 

जेतक जोग जोगउने तेतक तिनके नाम । 
धर्म धरे  धर्मात्मा नाम करे सो राम ।२७१६ । 
भावार्थ : -- जो जितना धन संकलन करता वह उतना कीरतवान् होता । करम न कर धर्म  कहने मात्र से धर्मात्मा व्  नाम होने से कोई राम कहलाता  ॥ 

सुघर  सुघर बिचार संग सुघर होत को देस । 
सुघर देसाचार संग सुघर होत परिबेस ।२७१७ । 
भावार्थ : - खाने पहनने और सोने वाले विकास से कोई  देश उत्तम नहीं होता, पैसा पैसा करने वालों से परिवेश उत्तम नहीं होता कारण कि ये विभूतियां क्षणिक होती हैं । उत्तम उत्तम विचारों से ही कोई देश उत्तम होता है । उत्तम रीति व् आचारों  के प्रचलन से  परिवेश उत्तम होता है ॥ 

राज बिगाड़े लोग नै लोग बिगाड़े देस । 
बिगड़े देस प्रसंग किए बिगड़ गयो परिबेस ।२७१८। 
भावार्थ : --  कुमार्गगामी शासन ने देश वासियों को कुमार्गी कर दिया । कुमार्गी  देश वासियों से  उत्तम आचार-विचार वाले देश कुमार्गी हो गया । कुमार्गी देशों  का प्रसंग कर उत्तम परिवेश कुमार्गी होकर निम्न कोटि का हो गया ॥ 

भव भू में लपटा रहा, लपट देह के खेह । 
जिउते जी को छाँड़ के, किया रेह से नेह ।२७१९ । 
भावार्थ : -- सांसारिक वासनाओं में संलिप्त होकर यह मृदा सरिस  रूप  के मोह पाश में बंधा रहा । स्वरूप यहां दुत्कारे जाने लगे प्रतिरूप पूजित होने लगे ॥ 

घर रहे न दुआर रहे पास रहे नहि कौड़ि । 
हीन  चरन ब्यापत भए माया दास करोड़ि ।२७२०। 
भावार्थ : -- जिन अर्थ पिशाची माया दासों के पास न घर था न द्वार था । हीन  आचरण के व्यापते ही वह सभी करोड़पति होते चले गए ॥ 






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