सस सम्पद साँकर करे भए काँकर सब खेत ।
जो रत्नन्हि खान बरे सो पर्बत भए रेत ।२६८१।
भावार्थ : -- धान्य बाहुल्य क्षेत्र को संकीर्ण कर कंकर के क्षेत्र विस्तार प्राप्त करते गए । जो पर्वत कभी रत्नों के आकर हुवा करते थे वे सब रेत रूप हो गए ॥
बाताबरण दूषित किए कलुषित केतु ब्याप ।
असंतुलित परिस्थिति सन बढ़े तपन के ताप ।२६८२।
भावार्थ : -- कल के कलुषित धूम की कणिकाओं के वायुमंडल में व्याप्त होने से वातावरण दूषित होने लग । इस दूषित वातावरण के सह पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन से तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी ॥
कतहुँ आपदा कोइ तो कतहुँ आपदा कोइ ।
धर्म चरनन हीन करे जगत अपूरन होइ ।
अस अधर्माचरन चरत करे पाप सब कोइ ।२६८४।
भावार्थ : --धर्म के चार आचरण ( सत्य, दया, तप, दान ) से विहीन किए यह जगत अपूर्ण हो गया । ऐसे अधर्म के मार्ग का अनुशरण कर सभी पाप करने लगे ॥
उलटी चलनी में चले अपने बरन बिगोए ।
धनहू के बरन बिबरन पूछ मनाही होइ ।२६८५।
भावार्थ : -- उलटी रीति को अपनाकर बहूँतों ने अपना वर्ण विवर्ण कर लिया । अब तो धन का भी वर्ण व् विवरण पूछना मना हो गया ।।
कृपनबुद्धि धनिवंत भए कृपाकरन भए दीन ।
लच्छन हीन सुलच्छ भए मलीन भयउ कुलीन । २६८६।
भावार्थ :-- कृपण हृदै धनेश कृपाकरण कृपणी हो गए ॥ परिणाम स्वरूप लक्षणहीन सौभाग्यशील हो गए मलीन कुलोद्भव कुलीन कहलाने लगे ॥
कलुषित धन के संकलन, काल कर्म के कोष ।
जगत अमंगलकर भरैं भयकर रुज दुःख दोष ।२६८७।
भावार्थ :-- कलुषित धन का संकलन एवं पाप कर्म के कोष संसार का अहित करते हुवे भयकारी रोगों दुखों व् दोषों को व्याप्त करते ॥
भंडिमन अरु मृषाबदन ब्यसन के बैपारि ।
धनिमन भूषण रूप भए भव भू के भंडारि ।२६८८।
भावार्थ : -- धूर्त चरित्र मिथ्यावादी व्यसनों के व्यापारी अब धनाढ्यों के सिरोमणि होकर भव भूति के भंडारी हो गए ॥
सुधन संग पति पद लहे, साधन सों पत पानि ।
दाता को नहि जानिबे ग्यानी को न मानि ।२६८९।
भावार्थ : -- अब धनवंत ही धनपति के पद पर अधिष्ठित होते, साधन संपन्न ही समाज में प्रतिष्ठित होते । दानियों को कोई नहीं जानता और ज्ञानियों की कोई नहीं मानता ॥
डगर डगर तीरथ मिले तीरथ तीरथ दानि ।
जगलग के धनिमानिहिहु मिले पसारे पानि ।२६९०।
भावार्थ : -- इस विपन्न काल में भी डगर डगर पर तीर्थ मिलते, तीर्थ तीर्थ में दानी भी बहुंत मिलते । जो हाथ पसारे माँगते वह जगत धनी होते ॥
जो रत्नन्हि खान बरे सो पर्बत भए रेत ।२६८१।
भावार्थ : -- धान्य बाहुल्य क्षेत्र को संकीर्ण कर कंकर के क्षेत्र विस्तार प्राप्त करते गए । जो पर्वत कभी रत्नों के आकर हुवा करते थे वे सब रेत रूप हो गए ॥
बाताबरण दूषित किए कलुषित केतु ब्याप ।
असंतुलित परिस्थिति सन बढ़े तपन के ताप ।२६८२।
भावार्थ : -- कल के कलुषित धूम की कणिकाओं के वायुमंडल में व्याप्त होने से वातावरण दूषित होने लग । इस दूषित वातावरण के सह पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन से तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी ॥
कतहुँ आपदा कोइ तो कतहुँ आपदा कोइ ।
मानस करनी आपनी अपना जनम बिगोए ।२६८३।
भावार्थ : -- कहीं आपदा एक तो कहीं दूसरी । मानव अपनी ही करनी अपने अस्तित्व को अस्त करने पर तुला रहा ॥धर्म चरनन हीन करे जगत अपूरन होइ ।
अस अधर्माचरन चरत करे पाप सब कोइ ।२६८४।
भावार्थ : --धर्म के चार आचरण ( सत्य, दया, तप, दान ) से विहीन किए यह जगत अपूर्ण हो गया । ऐसे अधर्म के मार्ग का अनुशरण कर सभी पाप करने लगे ॥
उलटी चलनी में चले अपने बरन बिगोए ।
धनहू के बरन बिबरन पूछ मनाही होइ ।२६८५।
भावार्थ : -- उलटी रीति को अपनाकर बहूँतों ने अपना वर्ण विवर्ण कर लिया । अब तो धन का भी वर्ण व् विवरण पूछना मना हो गया ।।
कृपनबुद्धि धनिवंत भए कृपाकरन भए दीन ।
लच्छन हीन सुलच्छ भए मलीन भयउ कुलीन । २६८६।
भावार्थ :-- कृपण हृदै धनेश कृपाकरण कृपणी हो गए ॥ परिणाम स्वरूप लक्षणहीन सौभाग्यशील हो गए मलीन कुलोद्भव कुलीन कहलाने लगे ॥
कलुषित धन के संकलन, काल कर्म के कोष ।
जगत अमंगलकर भरैं भयकर रुज दुःख दोष ।२६८७।
भावार्थ :-- कलुषित धन का संकलन एवं पाप कर्म के कोष संसार का अहित करते हुवे भयकारी रोगों दुखों व् दोषों को व्याप्त करते ॥
भंडिमन अरु मृषाबदन ब्यसन के बैपारि ।
धनिमन भूषण रूप भए भव भू के भंडारि ।२६८८।
भावार्थ : -- धूर्त चरित्र मिथ्यावादी व्यसनों के व्यापारी अब धनाढ्यों के सिरोमणि होकर भव भूति के भंडारी हो गए ॥
सुधन संग पति पद लहे, साधन सों पत पानि ।
दाता को नहि जानिबे ग्यानी को न मानि ।२६८९।
भावार्थ : -- अब धनवंत ही धनपति के पद पर अधिष्ठित होते, साधन संपन्न ही समाज में प्रतिष्ठित होते । दानियों को कोई नहीं जानता और ज्ञानियों की कोई नहीं मानता ॥
डगर डगर तीरथ मिले तीरथ तीरथ दानि ।
जगलग के धनिमानिहिहु मिले पसारे पानि ।२६९०।
भावार्थ : -- इस विपन्न काल में भी डगर डगर पर तीर्थ मिलते, तीर्थ तीर्थ में दानी भी बहुंत मिलते । जो हाथ पसारे माँगते वह जगत धनी होते ॥
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