बुधवार, 3 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६८ ॥ -----

सस सम्पद साँकर करे  भए काँकर सब खेत । 
जो रत्नन्हि खान बरे सो पर्बत भए रेत ।२६८१। 
भावार्थ : --  धान्य बाहुल्य  क्षेत्र  को संकीर्ण कर कंकर के क्षेत्र विस्तार प्राप्त करते गए । जो पर्वत कभी रत्नों के आकर हुवा करते थे वे सब रेत रूप हो गए ॥

बाताबरण दूषित किए कलुषित केतु ब्याप । 
असंतुलित परिस्थिति सन बढ़े तपन के ताप ।२६८२। 
भावार्थ : -- कल के कलुषित धूम की कणिकाओं के वायुमंडल में  व्याप्त होने से  वातावरण दूषित होने लग । इस दूषित वातावरण के सह पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन से तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी ॥

कतहुँ आपदा कोइ तो कतहुँ आपदा कोइ ।
मानस करनी आपनी अपना  जनम बिगोए ।२६८३। 
भावार्थ : -- कहीं आपदा एक  तो कहीं दूसरी । मानव अपनी ही करनी अपने अस्तित्व को अस्त करने पर तुला रहा ॥

धर्म चरनन हीन  करे जगत अपूरन  होइ । 
अस अधर्माचरन चरत करे पाप सब कोइ ।२६८४।  
भावार्थ : --धर्म के चार आचरण ( सत्य, दया, तप, दान ) से विहीन किए यह जगत अपूर्ण हो गया । ऐसे अधर्म के मार्ग का अनुशरण कर सभी पाप करने लगे ॥ 

उलटी चलनी में चले  अपने बरन बिगोए  । 
धनहू  के बरन बिबरन  पूछ मनाही होइ ।२६८५। 
भावार्थ : -- उलटी रीति को अपनाकर बहूँतों ने अपना वर्ण  विवर्ण कर लिया । अब तो धन का भी वर्ण व् विवरण पूछना मना हो गया ।।

कृपनबुद्धि धनिवंत भए कृपाकरन भए दीन ।
लच्छन हीन सुलच्छ भए  मलीन भयउ कुलीन । २६८६। 
भावार्थ :-- कृपण हृदै धनेश  कृपाकरण  कृपणी हो गए ॥ परिणाम स्वरूप लक्षणहीन सौभाग्यशील हो गए मलीन कुलोद्भव कुलीन कहलाने लगे ॥

कलुषित धन के संकलन, काल कर्म  के कोष । 
जगत अमंगलकर भरैं भयकर रुज दुःख दोष ।२६८७। 
भावार्थ :-- कलुषित  धन का संकलन एवं पाप कर्म के कोष संसार का अहित करते हुवे भयकारी रोगों दुखों व् दोषों को व्याप्त करते ॥

भंडिमन अरु मृषाबदन ब्यसन के बैपारि । 
धनिमन भूषण रूप भए भव भू के भंडारि ।२६८८। 
भावार्थ : -- धूर्त चरित्र मिथ्यावादी व्यसनों  के व्यापारी अब धनाढ्यों के सिरोमणि होकर भव भूति के  भंडारी हो गए ॥ 

सुधन संग पति पद लहे, साधन सों पत पानि । 
दाता को नहि जानिबे ग्यानी को न मानि ।२६८९। 
भावार्थ : -- अब धनवंत ही धनपति के पद पर अधिष्ठित होते, साधन संपन्न ही समाज में प्रतिष्ठित होते  ।  दानियों को कोई नहीं जानता और ज्ञानियों की कोई नहीं मानता ॥

डगर डगर तीरथ मिले तीरथ तीरथ दानि । 
जगलग के धनिमानिहिहु मिले पसारे पानि ।२६९०। 
भावार्थ : --  इस विपन्न काल में भी  डगर डगर पर तीर्थ मिलते,  तीर्थ तीर्थ में दानी भी बहुंत मिलते । जो हाथ पसारे माँगते वह जगत धनी होते ॥



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