रविवार, 28 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७५ ॥ -----

रीत बिसराए  आपनी आन  कही पतियाए । 
सील चरित परिहाए के हीन  चरित अपनाए ।२७५१। 
भावार्थ : -- देश वासी  अपनी  रीतियों को तिरष्कृत कर परायों की कहीं पर विश्वास  करते हुवे शील चरित्र का त्याग कर हीन-चरित्र का वरण करते ॥

माटी महिका अापनी रहे महल में ग़ैर । 
जननी जन्में राखिता रखे आन की ख़ैर ।२७५२ । 
भावार्थ : -- मिटटी महिका  भारत वंशियों की होती,  महलों में कोई और ही रहता । माताएँ  रक्षकों को तो जन्म देती वह रक्षा परायों की करता ॥

धनि को धनहि भला लगे गुनि को गुनही भाए । 
साँचे को सचही  भला झूठे  झूठ सुहाए ।२७५३ । 
भावार्थ : -- धनी को धन, गुणी को गुण, सत्यवादी को सत्य ही भाता झूठ को झूठ ही सुहाता ॥

झूठा सोता जग रखे  साँचा सोए जगाए । 
लगी आग बुझाए जो लगे चोर लग जाए ।२७५४। 
भावार्थ : -- झूठा संसार को निद्रामग्न कर अपनी स्वार्थ सिद्ध करता । सच्चा सुप्त संसार को जागृत करता ॥ यह जागृत संसार लगी हुई आग को बुझाकर लगे चोर को ही लग जाता ॥

देस प्रधान पदासीत होएँ न गौरव वान । 
पापी सब जान जानि के पापीधम तिन मान ।२७५५। 
भावार्थ : -- देश का प्रधान मंत्री बनना कोई इतराने वाली बात तो थी नहीं फिर भी लोग बन बन के इतराते ॥ कारण की जब सभी लोग पाप कर्म में संलिप्त हो तो उनका प्रधान कोई महापापी ही होगा ॥

पंच बरस परतस देस शासक लेइ चुनाए । 
काठ कठिनता कुलिस किए सासन सोई पाए ।२७५६। 
भावार्थ : -- फिर पांच वर्ष व्यतीत हुए देश ने फिर शासक को चुना फिर वही ऊबाउ ( बोरिङ्ग  )  कहानी । शासक बदले किन्तु शासन वही रहा समस्याएं काठ सी होती शासन उन्हें वज्र कर देता ॥

अंतर्मन बिबरन किए भरे भगति के भेस । 
पापी जन के सिरोमनि, भयो देस राजेस ।२७५७। 
भावार्थ : -- अंतर्मन को मलिन  किए भक्ति का वेश धारण किए पापी जनता के सिरोमणि फिर देश के राजेश हुवे ॥

सासन  को बदले नहीं बदले सासन हारि  । 
निसदिन बर बर भेस भर कहते गार गँवारि ।२७५८ । 
भावार्थ : -- तथाकथित जनमत व्यवस्था परिवर्त्तन में असफल होते हुव  केवल शासन  धारियों को ही परिवर्तित करता रहा ये परिवर्त्तित शासक धारी भी नित्य बढ़िया बढ़िया कपडे पहन कर ग्राम्य जीवन के प्रति दुर्वादन करते ॥

चारि दिवस की बहुरिया बैठी कुल को रोए । 
काज करे कर कछु नहीं, बोलहि में सब होए  ।२७५९। 
भावार्थ : -  बहुरिया को आए चार  दिन  हुव नहीं  कि उसे  कुल में दोष दिखने लगे । चमक चांदनी चाम से परिश्रम होता नहीं,  बातों में ही पकवान पकने लगे  ॥

आप करे तो धर्म है आन करे तो पाप । 
सबकी अपनी जापनी सबके अपने जाप ।२७६०। 
भावार्थ : -- स्वयंकरे  तो सब कर्म धर्म  होते कोई और करता  तो पाप होता । जो दल सत्ताधारी होता वह चुने सदस्यों की जप माला बनाकर कोई एक ईष्ट बना लेता  और उसी का  जाप  करता ॥



----- मिनिस्टर राजू १६९ -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी !! वो जो प्रधान मंत्री के सिंहासन पर बैठा है वो प्रधानमंत्री नहीं है..,

" अपन कौन से महात्मा है "

राजू : --  मास्टर जी ! क्या कहते हो तो दो चार धर दें.....? 

शुक्रवार, 26 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७४॥ -----

तैसो उपजन पाइये जैसे बिआ बुआन । 
बिन गुन ग्यान सहुँ होत संतमसी संतान  ।२७४१ । 
भावार्थ : --जैसे बीज बोए जाते उपज भी वैसी ही प्राप्त होगी इस  तथ्य को आधार कर  गुण लक्षण व् ज्ञान हीनता से आसुरी माया के प्रति महामोहि संतान ही उत्पन्न होती ॥

गुनकारी धरम बिहीन, जो बुए बिआ पुरान । 
 संतमस संतान रूप  उपजे यह खलिहान ।२७४२। 
भावार्थ : -- पूर्व में उत्तम गुणों के लिए लाभकारी धर्म से रहित जिन बीजों को बोया गया था । सत्ता व् माया की महामोही संतान  उसी खेत  की उपज थी जो  सत्ता व् पैसा के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती ॥

नीँद न देखे साथरी काल न देखे काल । 
अँधानुगामी न देखे चलनहार की चाल ।२७४३। 
भावार्थ : -- नींद खटिया पलौवन नहीं देखती, आती है तो कहीं भी आ जाती है नहीं आती तो कहीं नहीं आती ॥ मृत्यु समय नहीं देखती  कभी भी आ जाती है । उसी प्रकार अंधे चरणानुग  के नयन चरणहारी की चाल  नहीं देखते ॥

धन सम्पद सों  सबहि को धनपति पद की चाह । 
चाह पूरन  जोग जतन कर चाहेँ को नाह ।२७४४। 
भावार्थ : -- धन सम्पद व्  धनपति पद की सभी को चाह होती । किन्तु उसके लिए आवश्यक योग्यता व युक्ति कोई नहीं चाहता ॥

धर्माचरन  संग चरे सनमारग जो कोइ । 
जगहित परमारथ करे धनपति पद हुँत सोइ ।२७४५ । 
भावार्थ : -- जो धर्म के  चार  चरण  सत्य, शौच,  दान, त्याग के संग सन्मार्ग पर चलता हो । जगहित हेतु परमार्थ करता हो  प्रचार हेतु नहीं वह  धनपति पद के योग्य होना चाहिए ।

होना तो ये चाहिए वो चाहिए होता कुछ और

 मृषा वादन संग करे कल कर्म जो कोइ । 
कूट कुटिल कुचाल  चरे धनपत पद गह सोइ ।२७४६। 
भावार्थ : -- स्वेच्छाचारिता  के शासन में जो मृषा  वादन कर काले  कारनामे करता लुकते  छिपते कुटिल कुचालें चलता वही धनपत के पद को सुशोभित करता ॥

बिगड़े देसाचार नै सब कहुँ भरे बिकार । 
सुधार संग सँभार कू सब जन रहैं जुहार ।२७४७ । 
भावार्थ: -- बिगड़े हुवे आचार- विचार ने सब कही विकार भर दिया इन विकारों को सुधार  व् देश को सहजने के लिए सब लोग प्रतीक्षा में रहते ॥

गोरों जैसी चाम किए काले काले लोग । 
सँकरे मन के मानसा नहीं  केहि के जोग ।२७४८ । 
भावार्थ : -- संकीर्ण मानसिकता से युक्त  गोरों जैसी चमड़ी वाले लोग  काले ही होते  । और  किसी योग्य नहीं होते ॥ 

बड़ी बड़ी बातें करें छोटे करे बिचार । 
केसरी की खाल ज्यूँ  काढ़े सिंग सियार ।२७४९ । 
भावार्थ : -  जैसे शेर की खाल में सिंग निकाले सियार होता ही वैसे ही कुछ छुद्र विचार वाले लोग होते जो बातें बहुंत बड़ी बड़ी करते ।


बड़े न सिर पर धारिये छोटा करे गुहार । 
छोटे के करतब संग सधै बड़े के कार ।२७५० । 
भावार्थ :-- छोटा आह्वान कर कहता है बड़ों को सिर पर नहीं धरना चाहिए ।  छोटों की कलाकारी से ही बड़ों के कार्य सिद्ध होते हैं और छोटी छोटी कलाकारियों से ही कोई बड़ा कलाकार बनता है ॥ 

सोमवार, 22 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७३ ॥ -----

भुआलु को दास करे, दासा भयो भुआल । 
जुगलग संचित संपदा निकसत भए कंगाल ।२७३१ । 
भावार्थ : --  युगों तक संचित सम्पदा निष्कासित होती गई भारत के भूपति कंगाल होकर दास  बन गए दास मालामाल  होकर भूपति  बन बैठे ॥

शासन रथ सासक रथी भूपति सारथि होए ।
पुनि संचारी पथ रचे संचित सब धन ढोए ।२७३।
भावार्थ :  शासन ने इसमं रथ की शासकों ने रथी की व् बने हुवे अतिपतियों ने सारथि की भूमिका निभाई । फिर केवल  इन रथों के लिए सडकों का निर्माण होता रहा और देश की संचित सम्पदा उत्खात कर महानगरों में डुहारी जाने लगी ॥

चौखा चकिता चाक भए   धन सम्पद के पाँव । 
महा नगरी बसन चले छाँड़ खेत बन गाँव । २७३२ । 
भावार्थ : -- इन बने हुवे अतिपतियों  ने संचित सम्पदा के पाँव को विस्मयकारी तीव्रगति धारी चक्र में परिवर्तित कर दिया । अब यह सम्पदा खेतों वनों व् गाँवों को छोड़ कर महानगरो में बसने लगी ॥


उड़न खटोले उड़ चले पहुंचे देस पराए ।
उजरी उजरी सम्पदा  काला धन कहलाए ।२७३३ ।
भावार्थ : -- महानगरों में बसने के पश्चात यह उड़न खटोलों में उड़ती हुई मलिन हाथों से  पराए देशों में पहुंच जाती  । इस प्रकार भारतीयों की उज्जवल सम्पदा काला धन कहलाने लगी ॥

अनभरित बचपन  के मन भरे रहे बहु  पूछ । 
खात  अघात सासक गन उत्तरु सोन रहि छूछ । २७३४ । 
 भावार्थ  : -- अध भरा उदर लिए देश के बचपन का मन मानस कालाधन क्या है ? किसका है ?  कहाँ है ? क्यों हैं ?
जैसे प्रश्नों से भरपूर था । शासक गण का उदर तो कंठ तक भरा रहता किन्तु उनका मनो मस्तिष्क  उत्तर से रिक्त होता ।

सिखा सदन बचपन करे सासकगन के जाप । 
सिखे  बड़ा है रुपइया भाई बड़ा न बाप ।२७३५ । 
भावार्थ : -- जब यह कुपोषित बालक  शिक्षा सदन में जाते, तब शासक गण के अवगुणों का  जाप कर यही सीखते कि बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया ॥   

जो बिलसित सदन रहे महमन कहैं पुकार । 
पाठ पाठ प्रचार करे अपने हित को सार ।२७३६ । 
भावार्थ : -- जो उद्योगपतियों के विलासित भवनों में रहते हैं उनको महात्मा कहते हैं स्वार्थी  शासक गण निज हितों की सिद्धि  के लिए शालाओं के पाठ्यक्रम में ऐसे ढोंगी महात्माओं का प्रचार करते ।

टिप्पणी : -- जो लिखे पढ़े नहीं थे उन्हें अंग्रेजों के व् मुसलामानों का  राज व् विभाजन ज्ञात था किन्तु  वे ऐसे महात्माओं से अनभिज्ञ थे ॥

गुरुबर ज्ञान परिहरै गहे सिखाकर सीख । 
पति पद कू दासा करे पढ़े बिदेसी लीख ।२७३७ । 
भावार्थ : -- शनै शनै ज्ञान योगी गुरुओं का ज्ञान का त्याग कर वेतन भोगी शिक्षकों की शिक्षा  ग्रहण की  जाने लगी । यह शिक्षा विदेशी रूडी वादिता पर आधारित होती जो स्वामी के पद को दासता में परिणित करती ॥ 

सुवारथ परत हुँत धर्म उदर परत हुँत  कर्म । 
बालकिन्ह को जनि जनक, सिखावहि एही मर्म ।२७३८। 
भावार्थ : -- धर्म अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति के लिए व् कर्म केवल उदर पूर्ति के साधन हैं बालकों को माता पिता यही शिक्षा देते मिलते ॥ 

तेरी सिखाई सीख मैं, सुरु की सीखी खोए । 
आगे आगे देखिये  होतबता का  होए ।२७३९ । 
भावार्थ  : --  अपनी सीखी हुई सिख तो सीखा दी  गुरु की शिक्षा भुला दी ।अब  आगे आगे देखो तेरा और तेरे गुरु का क्या होता है ॥

दान धरम दुसह भए जब भगति बिसन कहलाइ । 
पाप करम सुख दाइया दया न उर उपजाइ ।२७४०  । 
भावार्थ :-- दान पुण्य तब कठिन  हो गया जब भक्ति व्यसन कहलाने लगी । पाप कर्म सुख के दाता हो चले तो हृदयों में दया भी व्युत्पन्न नहीं होती ॥ 

शुक्रवार, 19 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७२॥ -----


जगत जुगाड़ जोड़ करेँ लाखों लाख करोड़ । 
अर्थ पिशाची के बीच मची बढे की होड़ ।२७२१ । 
भावार्थ : -- फिर तो  जगत भर के जुगाड़ कर लाखों लाख  करोड़ जोड़ किए  अर्थ पिशाचों के बीच "सबसे बड़ा कौन ? " की प्रतिस्पर्धा होने लगी ॥ 

लाही को सब थोड़ है निरलाही को अधिकाए । 
याके मन में चोर है याके मन पहिराए ।२७२२ । 
भावार्थ : - लोभी हेतु  तीन लोक की संपत्ति भी थोड़ी होती । निर्लोभी को एक पत्ति भी बहुंत होती । वित्त कामी के  मन में चोर होता है अकामी के मन में देश का रक्षक होता ॥ 

देस प्रेम की भावना जाके भीत न होइ । 
तिसपर खोटी नीत किए होत बिद्रोही सोइ ।२७२३ । 
भावार्थ : -- जिसके अंतर में देश प्रेम की भावना न हो उसपर  खोटी बुद्धि का हो तो वह देश द्रोह का अपराधी होना चाहिए था  ॥ 

काल अँधेरी रैन रै जहँ तहँ अर्थ पिसाच । 
बिहारे बहु रूप धरे नाचे अनगढ़ नाच ।२७२४ । 
भावार्थ :-- जब अज्ञानता की अँधेरी रात और अँधेरी होती गई तब अर्थ पिशाच सर्वत्र व्याप्त होते गए । ये बहुंत से रूप धरे होते कोई नेता का कोई अभिनेता का  कोई खिलाड़ी का कोई लम्बी वाली दाढ़ी का रूप धरे भौंडा नृत्य करते दिखाई देते । 

काल कलुषित धन के बल जो चाहे सो पाए । 
जो चाहे सो पद चढ़े जहँ चाहे तहँ जाए ।२७२५ । 
भावार्थ : -- पाप के धन से इनमें  ऐसी अद्भुत क्रय शक्ति आ गई थी की ये अर्थ पिशाच  जो चाहते वह क्रय कर चाहे जो पद को  प्राप्त कर लेते जहाँ चाहते वहां चले जाते बिलकुल इच्छाधारी नाग के जैसे.....

एक  कोर में चोर  लगे दूजे लागी आग । 
लुटेरे पुर पोर लगे तापर भई न जाग ।२७२६ । 
भावार्थ : -- घर के एक कोने में चोर लगे होते दूसरे में महंगाई की आग लगी होती आग भी ऐसी कसूती कि लुगाई भी मिलनी दुस्वार होती । घर की ड्योढ़ी तातारी के उपद्रवी लुटेरों की पुरी से मिली होती उसपर भी घरवाले सोए रहते जागते ही नई.....

जनमानस जी जोगबत जीव जगत मरि जाए । 
जरजा ऐसी होइबे जो जग जीवन दाए ।२७२७ । 
भावार्थ : - मानव जीवन को संजोने के लिए जीव जगत अपने प्राणों की आहुति देता रहा । जबकि मानव का प्रादुर्भाव इस हेतु हुवा की उसकी जीवन चर्या संसार के लिए प्राण दाई हो प्राण हारी न हो ॥ 

भोग रहा भव को अबर  भुकत रहा है कोइ । 
दूषण करता अबरु है दोष अबरु सिर होए ।२७२८। 
भावार्थ : -- इस संसार को भोगी कोई और होता भुक्तभोगी कोई और  । यहाँ दूषण कोई और करता और दोष किसी और के सिर मढ़ दिया जाता  ॥ 

करता  अपनी हो करे होत रहा  किछु आन । 
मानस चिरंजीउ रहे जीव जगत दे प्रान ।२७२९। 
भावार्थ : -- होतव्यता को कुछ और चाहिए होता  किन्तु करता की अपनी हो के कारण होता कुछ और । मानव जीवन चिरायु रहे यह कामना कर जीव जगत अपने प्राण देता रहा ॥ 

  जीवन घाती काग तो मोती चुनि चुनि  खात । 
हंसा घुन के कन चुगत होत मलिनई जात ।२७३० । 
भावार्थ : --जीवन घाती कागा मोती चुन कर खाता  हंस अपनी जाति को मलिन कर घुन लगे कण पाता ॥ 

शनिवार, 13 जून 2015

--- ॥ दोहा-दशम २७१॥ -----,

पाप बिलसे धर्म ग्रसे सतगुन अल्पहि पाए । 
राजस राज तामस राउ अवगुन अति अधिकाए ।२७११ । 
भावार्थ : -- पापमय सुखोपभोग धर्म का ग्रास करता है धर्म के ग्रास से सत्वगुण  की उपलब्धता अल्प हो जाती है । जब शासन राजसी औरशासक तामसी हो तब समाज अल्प गुणी हो जाता है  ॥ 

मानस तामस गुन  बिबस जगहित कृत परिहार । 
धूत कृत चरित बर करे सब रस पर अधिकार ।२७१२ । 
भावार्थ : -- सात्विक गुणों के वशीभूत होकर जो  मानव फूल फल पशु पक्षी को समर्पित कर पत्र  ग्रहण करता तामसी गुणों के वशीभूत होकर उसने  विश्व के हितकारी कृत्यों को त्याग दिया व्  धूर्त कृत क्रियाकलाप का वरण कर वह सभी सांसारिक रसों पर अपना एकाधिकार स्थापित करता गया  ॥ 

जगती ताके जोगड़ा  जाके रहे अधीन  । 
कुलीन बसिन कुलीन भए मलीन बसिन  मलीन ।२७१३। 
भावार्थ :-- धरती, संसार, वायु, मानवजाति,निवासित स्थल, देश  उसी का हो जाता जिसके वह अधीन होता कुलीन शासक या ऋषि  उसे कुलीन व् मलीन शासक अथवा ऋषि उसे मलीन कर देता ।।  

माटी तन तरु बास नहि  धरती सीस अगास । 
जीवन धन  को साँस नहि जल के कंठ पिपास ।२७१४ । 
भावार्थ : -- मिट्टी के तन  को गहन का वसन नहीं रहा धरती शीश पर आकाश नहीं रहा । अब जीवन धन को ही उचित भोजन उपलब्ध नहीं होता तो वह किसी की क्षुधा कैसे मिटाता, जल का कंठ ही प्यासा होता वह किसी की प्यास क्या बुझाता ॥ 

भव भू के भंडारि कू भावै भोग बिलास । 
भरित पूर भर आपनी, रहे सुवासित बास ।२७१५। 
भावार्थ : -- सांसारिक भूति  के प्रबंधक मानव की रूचि विलासित जीवन चर्या में रहती । वह संसार को अपुष्ट करता स्वयं परिपुष्ट होकर सुखमय निवास में वासित रहता ॥ 

जेतक जोग जोगउने तेतक तिनके नाम । 
धर्म धरे  धर्मात्मा नाम करे सो राम ।२७१६ । 
भावार्थ : -- जो जितना धन संकलन करता वह उतना कीरतवान् होता । करम न कर धर्म  कहने मात्र से धर्मात्मा व्  नाम होने से कोई राम कहलाता  ॥ 

सुघर  सुघर बिचार संग सुघर होत को देस । 
सुघर देसाचार संग सुघर होत परिबेस ।२७१७ । 
भावार्थ : - खाने पहनने और सोने वाले विकास से कोई  देश उत्तम नहीं होता, पैसा पैसा करने वालों से परिवेश उत्तम नहीं होता कारण कि ये विभूतियां क्षणिक होती हैं । उत्तम उत्तम विचारों से ही कोई देश उत्तम होता है । उत्तम रीति व् आचारों  के प्रचलन से  परिवेश उत्तम होता है ॥ 

राज बिगाड़े लोग नै लोग बिगाड़े देस । 
बिगड़े देस प्रसंग किए बिगड़ गयो परिबेस ।२७१८। 
भावार्थ : --  कुमार्गगामी शासन ने देश वासियों को कुमार्गी कर दिया । कुमार्गी  देश वासियों से  उत्तम आचार-विचार वाले देश कुमार्गी हो गया । कुमार्गी देशों  का प्रसंग कर उत्तम परिवेश कुमार्गी होकर निम्न कोटि का हो गया ॥ 

भव भू में लपटा रहा, लपट देह के खेह । 
जिउते जी को छाँड़ के, किया रेह से नेह ।२७१९ । 
भावार्थ : -- सांसारिक वासनाओं में संलिप्त होकर यह मृदा सरिस  रूप  के मोह पाश में बंधा रहा । स्वरूप यहां दुत्कारे जाने लगे प्रतिरूप पूजित होने लगे ॥ 

घर रहे न दुआर रहे पास रहे नहि कौड़ि । 
हीन  चरन ब्यापत भए माया दास करोड़ि ।२७२०। 
भावार्थ : -- जिन अर्थ पिशाची माया दासों के पास न घर था न द्वार था । हीन  आचरण के व्यापते ही वह सभी करोड़पति होते चले गए ॥ 






मंगलवार, 9 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २७० ॥ -----

जोग जगारा मिटि गयो,छायो कालहि काल । 
कतहुँ परे सिर आपदा कतहुँ त करे अकाल ।२७०१ । 
भावार्थ : -- समृद्ध काल व्यतीत हो गया  था स्वतंत्रता वाली जागृति समाप्त हो गई और भारत स्वतंत्र भी नहीं हुवा फिर संविधान की सुसुप्ता ने लोगों को घेर लिया और इण्डिया के रूप में उसका अशुभ काल प्रारम्भ हो गया ॥ 

जागृति समाप्त हो गई लोग स्वतन्त्र भी नहीं हुवे और संविधान गले पड़ गया.....

स्पष्टीकरण : --विभाजन के पूर्व भारत ग्रामीण क्षेत्रों में बसा था जो अंग्रेजों की पहुँच से दूर था यह भारत सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा था जीवन यापन का मुख्य आधार कृषिकर्म था । विभाजन के पश्चात पूरा भारत अस्त-व्यस्त हो गया उस समय मुसलमानों ने ऐसा भयंकर उपद्रव किया कि प्रदेश विशेष के वंशज तितर-बितर हो गए ऐसा विभाजन से प्रभावित भारतवंशियों के पूर्वजों का कहना है ॥ 


अनगैरी अंस भए अब  भारत के  अवतंस । 
मारे मारे  फिरे जो रहे इहाँ के बंस ।२७०२ । 
भावार्थ :-- जो भारत से अपरिचित थे निरवंशी थे वे श्रेष्ठ नागरिक हो गए और भारत के वंशज मारे मारे फिरने लगे ॥ 

जेहि भुइ जनम जुगे जो भारत बंसी होए । 
कही पराई मान के अपना वंस बिगोए ।२७०३ । 
भारत : -- इस भूमि से जन्में जो भारतवंशी पराई कही को माने  उन्होंने अपना वंश  गँवा दिया ॥ 

हंस बकुल धिआनी भए,कागा हंस बिबेक । 
जो ए बिबेकी कही दिए सोई परम प्रबेक ।२७०५ । 

भावार्थ : --  हंस बगुला भगत हो गए कौंवे विवेकी हंस हो गए और नीर-क्षीर का निर्णय करने लगे। कागा तक तो ठीक कोई कोई तो आधा तितर और आधा बटेर हो गया, माने की आधा इस तरह का आधा उस तरह का बाकी इस-उस तरह का । अब जो ये विवेकी कहते वही परम श्रेष्ठ होता ॥  

बिष भरे हेम कलस जस गनत मिले पै पाँच । 
जोइ  करें सो सब सुकृत जोइ  कहें सो साँच ।२७०६। 
भावार्थ : -- ये विष से भरे स्वर्ण कलश के जैसे लाखों में कोई दो चार ही मिलते । ये कुकृत्य तो कभी करते ही नहीं..... जो करते वह सब सत्कृत होता, ये असत्य तो कभी कहते ही नहीं..... जो कहते सो सत्य ही कहते ॥ 

अर्थहन नीति नेम सन,उपजे अर्थ पिसाच । 
 देश भीत बिदेस बसत नचएँ बिदेसी नाच ।२७०७ । 
भावार्थ :--तदनन्तर अर्थ प्रधान शासन व्यवस्था की अपव्ययी नीति व् नियमों से अर्थ पिशाच उत्पन्न होने लगे  देश के भीतर बसे विदेश में इनका निवास होता ये विदेशी संस्कृति का अनुकरण करते । 

टीका :--भारतीय संस्कृति को ये अपनी सुविधानुसार ही वरन करते जब काम निकल जाता राम नाम असत्य हो जाता ॥ 

चारि बरन दमनाए  के भए बिबबरन के राज । 
राजकुल सम साज बरे,करें ब्याजहि ब्याज ।२७०८। 
भावार्थ:-- संक्षेप में कहें तो मुसलमान  व् गोरों के पश्चात  भारत के वंशज  का दमन करते हुवे उस पर विवर्ण राज करने लगे ।  राजवंशों की सी इनकी साज सज्जा रहती । मैं और मेरा की संकीर्ण मानसिकता इनसे  सोमनाथ  के लुटेरों को भी लज्जित करने वाले कुकरम करने को विवश कर देती ॥ 

चलाचली के चलन में भरमन  जाल अधीन । 
कलुष जात समुदाय किए कुलीन भयउ मलीन ।२७०९ । 
भवार्थ : -- भीड़ वाली भेड़ की चाल चलते पौराणिक व् आधुनिक के भ्रमित जाल में फंस के बहुतेरे कुलीन मलीन हो गए । ऐसे क्लिष्ट जातक समुदाए में समुद्यत होने लगे  । 

आन धर्माचरनि के, हिंसा रुचित सुभाउ । 
बंसानुगत गुन संचत  जग आतंक जनाए ।२७१० । 
भावार्थ :--इधर भारत से इतर प्रवर्तित अन्य धर्म के अनुयायियों का हिंसक स्वभाव वंशानुगत गुणसूत्रों में संचित होता गया कालांतर में वह वैश्विक आतंकवाद की व्युत्पत्ति का  कारण बना ॥ 

शुक्रवार, 5 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६९ ॥ -----

उदधि दाता कर रस जस  जन सेबक जस बाहि ।
 काल घटा घन गरजाहि,बरखिहि कबहुँक  नाहि । २६९१ । 
भावार्थ :-- उदधि स्वरूप कर दाता, जन सेवक स्वरूप घन को कर रूपी जल से परिपूर्र्ण कर देते । ये जन सेवक वो बादल सिद्ध होते जो भयकारी कालिमा ग्रहण किए गर्जते तो बहुंत  किन्तु बरसते नहीं ॥ 

कर रस भरे घनकत  घन धनिमन घर बरखाए । 
सूखी खेती आपनी हरिअरि खेत पराए ।२६९२ । 
भावार्थ : -- ये गरजते तरजते हुवे बादल पूंजीपतियों  के घर में बरसते । भारत वंशी की अपनी खेती सूखी ही रह जाती और पराए खेत हरियाली से लहलहा उठते ।। 

कर्म प्रधान देस लहे  किए सत्कृत सब कोए । 
निर्धनहु को सुलभ रहे, सहजै  सबहि सँजोए ।२६९३-क । 

अर्थमाली को सहजहि सुलभ सबहि जग जोइ । 
जहाँ अभावान्बित तहँ उदरहु पूर न होइ ।२६९३-ख । 

भावार्थ : --  कर्म -प्रधान भारत में एक समवेत व्यवस्था थी जनमानस की बुद्धि सत्कृत में प्रवृत्त रहती परिणामस्वरूप आवश्यक सामग्रियाँ विपन्न वर्ग को भी सरलता पूर्वक उपलब्ध हो जाती ॥ 
अर्थ प्रधान भारत में धन की महत्वता अधिक हो गई  अधुनातन धनवंत को संसार की सभी वस्तुएँ सहज ही सुलभ होती । निर्धन को उदर की पूर्ति करना भी कठिन हो गया ॥ 

को चाम को काम बिबस उदर परायन  कोइ । 
अर्थ प्रधानक  देस में,सबहि अर्थगत होइ ।२६९४ । 
भावार्थ : --कोई चाम के कोई काम (अर्थ-काम ) के कोई उदर के वशीभूत होता । अर्थ  प्रधानतस देश इस प्रकार अर्थ  पर निर्भर होता चला गया और सामाजिक प्रतिष्ठा कर्म पर आधारित न होकर अर्थ पर आधारित हो गई ॥ 

कर्म प्रधानक देस में सबहि कर्म गत होइ । 
धनधान भरपूर रहे वंचित  रहे न कोइ ।२६९५-क। 

सासन हर भण्डार कर बैठे कुँडलीमार । 
अभरित बचपन के नयन जोगएँ जीवाधार।२६९५-ख । 

भावार्थ : -- कर्म प्रधान देश कर्म पर आश्रित था । इस सम्पन काल में भी धनधान्य के भंडार तभी भरते जब उससे कोई भी वंचित नहीं रहता । अर्थ- प्रधान देश का कुपोषित बचपन आहार की प्रतीक्षा करता मरता रहा । ये अर्थ पिशाचि सत्ताधारी उस आहार का भण्डारण कर उसपर कुंडलीमार कर बैठे रहे ||

सुबारथ परत आपने सत्ता मद मैं चूर । 
धर्मार्थ जनन्हि करहु  परमारथ गए भूर ।२६९६। 
भावार्थ :-- अपने स्वार्थ के परायण  होकर सत्ताधारी सत्ता के मद में उन्मत्त रहे । जो हाथ धर्मार्थ के लिए आरक्षित थे वह भी परमार्थ भूल गए ॥

अर्थ की सबहि चाह किए  करम चाहे न कोइ । 
अर्थ  लहे  धर्म न करे धर्मी कहँ जग सोइ ।२६९७। 
भावार्थ : -- अब धन की तो सभी को चाह रहती जहां कर्म है वहां धन की प्राप्ति अवश्यम्भावी है  इस सिद्धांत से अन्यथा होकर कर्म की चाह  कोई नहीं करता ।  धन की प्राप्ति पर भी जो  धर्म न करता वह धर्मी कहलाता ॥

भयउ बिलासी जीवनी बिकास की परिभास । 
बंचित जहाँ अतिसय रहे कतिपय रहें सुपास ।२६९८। 
भावार्थ : - विलासित जीवन चर्या ही विकास की परिभषा हो गई जिसका अनुकरण कर अतिसय जनता  वंचित ही रहती कतिपय लोग ही सुखमय जीवन व्यतीत करते ॥



सोधन केर बिषय रहे जे अचरज की बात । 
कर्मोंमुखी अर्थ मन  बदले रातों रात ।२६९९। 
भावार्थ : -- अब एक आश्चर्य चकित करने  वाली बात शोध  का विषय हो गई । जिसे मुसलमानों व् अंग्रेजों का शासन भी परिवर्तित न कर पाया वह  कर्म प्रधान व्यवस्था  रातों रात अर्थ प्रधान में कैसे परिवर्तित हो गई जबकि यह व्यवस्था युगों युगों से चल रही थी ॥

टिप्पणी :-- जिन्होंने अब तक न अंग्रेजों का अनुशरण किया न मुसलमानों का जो लोग वेद-पुराणों का अनुशरण करते थे वे अब कांग्रेस के बनाए संविधान का अनुशरण करने लगे इस कारण बदल गया जिसने अनुशरण नहीं किया उसका कर्म ही प्रधान रहा ॥


नागर जन अगनीत भए अनगैरी गननीअ । 
बंधु बंधुता तजित के भयो पियारे पीअ ।२७००।  
भावार्थ : -- इस अर्थ प्रधान व्यवस्था में भारत वंशी उपेक्षित व् भारत से अपरिचित निरवंशी गणमान्य हो गए । संविधान की आड़ लेकर बंधुओं ने बंधुता त्याग दी, अब उनकी भारत वंशियों पर कुदृष्टि रहती ॥ 

स्पष्टीकरण : -- भारत से अपरिचित इसलिए कि ये प्रत्येक नई-पुरानी बातों को दक़ियानूसी बोल बोल के भारतवंशियों को फसाते, जबकि इनकी आधुनिक बातें  पुराण पंथ से भी पौराणिक थी  । । 



बुधवार, 3 जून 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६८ ॥ -----

सस सम्पद साँकर करे  भए काँकर सब खेत । 
जो रत्नन्हि खान बरे सो पर्बत भए रेत ।२६८१। 
भावार्थ : --  धान्य बाहुल्य  क्षेत्र  को संकीर्ण कर कंकर के क्षेत्र विस्तार प्राप्त करते गए । जो पर्वत कभी रत्नों के आकर हुवा करते थे वे सब रेत रूप हो गए ॥

बाताबरण दूषित किए कलुषित केतु ब्याप । 
असंतुलित परिस्थिति सन बढ़े तपन के ताप ।२६८२। 
भावार्थ : -- कल के कलुषित धूम की कणिकाओं के वायुमंडल में  व्याप्त होने से  वातावरण दूषित होने लग । इस दूषित वातावरण के सह पारिस्थितिक तंत्र के असंतुलन से तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी ॥

कतहुँ आपदा कोइ तो कतहुँ आपदा कोइ ।
मानस करनी आपनी अपना  जनम बिगोए ।२६८३। 
भावार्थ : -- कहीं आपदा एक  तो कहीं दूसरी । मानव अपनी ही करनी अपने अस्तित्व को अस्त करने पर तुला रहा ॥

धर्म चरनन हीन  करे जगत अपूरन  होइ । 
अस अधर्माचरन चरत करे पाप सब कोइ ।२६८४।  
भावार्थ : --धर्म के चार आचरण ( सत्य, दया, तप, दान ) से विहीन किए यह जगत अपूर्ण हो गया । ऐसे अधर्म के मार्ग का अनुशरण कर सभी पाप करने लगे ॥ 

उलटी चलनी में चले  अपने बरन बिगोए  । 
धनहू  के बरन बिबरन  पूछ मनाही होइ ।२६८५। 
भावार्थ : -- उलटी रीति को अपनाकर बहूँतों ने अपना वर्ण  विवर्ण कर लिया । अब तो धन का भी वर्ण व् विवरण पूछना मना हो गया ।।

कृपनबुद्धि धनिवंत भए कृपाकरन भए दीन ।
लच्छन हीन सुलच्छ भए  मलीन भयउ कुलीन । २६८६। 
भावार्थ :-- कृपण हृदै धनेश  कृपाकरण  कृपणी हो गए ॥ परिणाम स्वरूप लक्षणहीन सौभाग्यशील हो गए मलीन कुलोद्भव कुलीन कहलाने लगे ॥

कलुषित धन के संकलन, काल कर्म  के कोष । 
जगत अमंगलकर भरैं भयकर रुज दुःख दोष ।२६८७। 
भावार्थ :-- कलुषित  धन का संकलन एवं पाप कर्म के कोष संसार का अहित करते हुवे भयकारी रोगों दुखों व् दोषों को व्याप्त करते ॥

भंडिमन अरु मृषाबदन ब्यसन के बैपारि । 
धनिमन भूषण रूप भए भव भू के भंडारि ।२६८८। 
भावार्थ : -- धूर्त चरित्र मिथ्यावादी व्यसनों  के व्यापारी अब धनाढ्यों के सिरोमणि होकर भव भूति के  भंडारी हो गए ॥ 

सुधन संग पति पद लहे, साधन सों पत पानि । 
दाता को नहि जानिबे ग्यानी को न मानि ।२६८९। 
भावार्थ : -- अब धनवंत ही धनपति के पद पर अधिष्ठित होते, साधन संपन्न ही समाज में प्रतिष्ठित होते  ।  दानियों को कोई नहीं जानता और ज्ञानियों की कोई नहीं मानता ॥

डगर डगर तीरथ मिले तीरथ तीरथ दानि । 
जगलग के धनिमानिहिहु मिले पसारे पानि ।२६९०। 
भावार्थ : --  इस विपन्न काल में भी  डगर डगर पर तीर्थ मिलते,  तीर्थ तीर्थ में दानी भी बहुंत मिलते । जो हाथ पसारे माँगते वह जगत धनी होते ॥



मंगलवार, 2 जून 2015

----- मिनिस्टर राजू १६८ -----

राजू : --मास्टर जी ! क्या कर रहे हो.....?

" किस्तियाँ गिण रहा हूँ"

राजू :--मास्टर जी ! किन्तु यहाँ समंदर कहीं नहीं है.....?

" किश्तियाँ नहीं किस्तियाँ गिण रहा हूँ "
राजू : -- ओह ! ये महगाई का तूफ़ान उसपर घर की किस्तियाँ !

" तुम क्या कर रहे हो ? "

राजू : - मास्टर जी ! सफाई सीख रहा हूँ. .,

" ओह !  पहले तुझे सफाई थोड़े ही आती थी उन पांच सालों  में भी नहीं आई 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...