रीत बिसराए आपनी आन कही पतियाए ।
सील चरित परिहाए के हीन चरित अपनाए ।२७५१।
भावार्थ : -- देश वासी अपनी रीतियों को तिरष्कृत कर परायों की कहीं पर विश्वास करते हुवे शील चरित्र का त्याग कर हीन-चरित्र का वरण करते ॥
माटी महिका अापनी रहे महल में ग़ैर ।
जननी जन्में राखिता रखे आन की ख़ैर ।२७५२ ।
भावार्थ : -- मिटटी महिका भारत वंशियों की होती, महलों में कोई और ही रहता । माताएँ रक्षकों को तो जन्म देती वह रक्षा परायों की करता ॥
धनि को धनहि भला लगे गुनि को गुनही भाए ।
साँचे को सचही भला झूठे झूठ सुहाए ।२७५३ ।
भावार्थ : -- धनी को धन, गुणी को गुण, सत्यवादी को सत्य ही भाता झूठ को झूठ ही सुहाता ॥
झूठा सोता जग रखे साँचा सोए जगाए ।
लगी आग बुझाए जो लगे चोर लग जाए ।२७५४।
भावार्थ : -- झूठा संसार को निद्रामग्न कर अपनी स्वार्थ सिद्ध करता । सच्चा सुप्त संसार को जागृत करता ॥ यह जागृत संसार लगी हुई आग को बुझाकर लगे चोर को ही लग जाता ॥
देस प्रधान पदासीत होएँ न गौरव वान ।
पापी सब जान जानि के पापीधम तिन मान ।२७५५।
भावार्थ : -- देश का प्रधान मंत्री बनना कोई इतराने वाली बात तो थी नहीं फिर भी लोग बन बन के इतराते ॥ कारण की जब सभी लोग पाप कर्म में संलिप्त हो तो उनका प्रधान कोई महापापी ही होगा ॥
पंच बरस परतस देस शासक लेइ चुनाए ।
काठ कठिनता कुलिस किए सासन सोई पाए ।२७५६।
भावार्थ : -- फिर पांच वर्ष व्यतीत हुए देश ने फिर शासक को चुना फिर वही ऊबाउ ( बोरिङ्ग ) कहानी । शासक बदले किन्तु शासन वही रहा समस्याएं काठ सी होती शासन उन्हें वज्र कर देता ॥
अंतर्मन बिबरन किए भरे भगति के भेस ।
पापी जन के सिरोमनि, भयो देस राजेस ।२७५७।
भावार्थ : -- अंतर्मन को मलिन किए भक्ति का वेश धारण किए पापी जनता के सिरोमणि फिर देश के राजेश हुवे ॥
सासन को बदले नहीं बदले सासन हारि ।
निसदिन बर बर भेस भर कहते गार गँवारि ।२७५८ ।
भावार्थ : -- तथाकथित जनमत व्यवस्था परिवर्त्तन में असफल होते हुव केवल शासन धारियों को ही परिवर्तित करता रहा ये परिवर्त्तित शासक धारी भी नित्य बढ़िया बढ़िया कपडे पहन कर ग्राम्य जीवन के प्रति दुर्वादन करते ॥
चारि दिवस की बहुरिया बैठी कुल को रोए ।
काज करे कर कछु नहीं, बोलहि में सब होए ।२७५९।
भावार्थ : - बहुरिया को आए चार दिन हुव नहीं कि उसे कुल में दोष दिखने लगे । चमक चांदनी चाम से परिश्रम होता नहीं, बातों में ही पकवान पकने लगे ॥
आप करे तो धर्म है आन करे तो पाप ।
सबकी अपनी जापनी सबके अपने जाप ।२७६०।
भावार्थ : -- स्वयंकरे तो सब कर्म धर्म होते कोई और करता तो पाप होता । जो दल सत्ताधारी होता वह चुने सदस्यों की जप माला बनाकर कोई एक ईष्ट बना लेता और उसी का जाप करता ॥
सील चरित परिहाए के हीन चरित अपनाए ।२७५१।
भावार्थ : -- देश वासी अपनी रीतियों को तिरष्कृत कर परायों की कहीं पर विश्वास करते हुवे शील चरित्र का त्याग कर हीन-चरित्र का वरण करते ॥
माटी महिका अापनी रहे महल में ग़ैर ।
जननी जन्में राखिता रखे आन की ख़ैर ।२७५२ ।
भावार्थ : -- मिटटी महिका भारत वंशियों की होती, महलों में कोई और ही रहता । माताएँ रक्षकों को तो जन्म देती वह रक्षा परायों की करता ॥
धनि को धनहि भला लगे गुनि को गुनही भाए ।
साँचे को सचही भला झूठे झूठ सुहाए ।२७५३ ।
भावार्थ : -- धनी को धन, गुणी को गुण, सत्यवादी को सत्य ही भाता झूठ को झूठ ही सुहाता ॥
झूठा सोता जग रखे साँचा सोए जगाए ।
लगी आग बुझाए जो लगे चोर लग जाए ।२७५४।
भावार्थ : -- झूठा संसार को निद्रामग्न कर अपनी स्वार्थ सिद्ध करता । सच्चा सुप्त संसार को जागृत करता ॥ यह जागृत संसार लगी हुई आग को बुझाकर लगे चोर को ही लग जाता ॥
देस प्रधान पदासीत होएँ न गौरव वान ।
पापी सब जान जानि के पापीधम तिन मान ।२७५५।
भावार्थ : -- देश का प्रधान मंत्री बनना कोई इतराने वाली बात तो थी नहीं फिर भी लोग बन बन के इतराते ॥ कारण की जब सभी लोग पाप कर्म में संलिप्त हो तो उनका प्रधान कोई महापापी ही होगा ॥
पंच बरस परतस देस शासक लेइ चुनाए ।
काठ कठिनता कुलिस किए सासन सोई पाए ।२७५६।
भावार्थ : -- फिर पांच वर्ष व्यतीत हुए देश ने फिर शासक को चुना फिर वही ऊबाउ ( बोरिङ्ग ) कहानी । शासक बदले किन्तु शासन वही रहा समस्याएं काठ सी होती शासन उन्हें वज्र कर देता ॥
अंतर्मन बिबरन किए भरे भगति के भेस ।
पापी जन के सिरोमनि, भयो देस राजेस ।२७५७।
भावार्थ : -- अंतर्मन को मलिन किए भक्ति का वेश धारण किए पापी जनता के सिरोमणि फिर देश के राजेश हुवे ॥
सासन को बदले नहीं बदले सासन हारि ।
निसदिन बर बर भेस भर कहते गार गँवारि ।२७५८ ।
भावार्थ : -- तथाकथित जनमत व्यवस्था परिवर्त्तन में असफल होते हुव केवल शासन धारियों को ही परिवर्तित करता रहा ये परिवर्त्तित शासक धारी भी नित्य बढ़िया बढ़िया कपडे पहन कर ग्राम्य जीवन के प्रति दुर्वादन करते ॥
चारि दिवस की बहुरिया बैठी कुल को रोए ।
काज करे कर कछु नहीं, बोलहि में सब होए ।२७५९।
भावार्थ : - बहुरिया को आए चार दिन हुव नहीं कि उसे कुल में दोष दिखने लगे । चमक चांदनी चाम से परिश्रम होता नहीं, बातों में ही पकवान पकने लगे ॥
आप करे तो धर्म है आन करे तो पाप ।
सबकी अपनी जापनी सबके अपने जाप ।२७६०।
भावार्थ : -- स्वयंकरे तो सब कर्म धर्म होते कोई और करता तो पाप होता । जो दल सत्ताधारी होता वह चुने सदस्यों की जप माला बनाकर कोई एक ईष्ट बना लेता और उसी का जाप करता ॥