जीवन जोग जगाए के,रहि संपत सब काल ।
सुख साधन उपजाए के,भए सब काल अकाल ।२६१ १ ।
कलुषित कल की कला ने जहाँ पसारे पाँव ।
नाउ खतियाए आपने खाए गाँव के गाँव ।२६१२।
सुख साधन उपजाए के,भए सब काल अकाल ।२६१ १ ।
भावार्थ : -- जब यह देश कृषि प्रधान देश था जीवन के आवश्यक हेतु जगाता था तब यह वैभव से परिपूर्ण था । जब से अर्थ प्रधान हुवा तब से यहां सभी समय दरिद्रता छाई रहती है ॥
तब से यहाँ लोग भूखे ही मरते रहते किसी को रोटी की, किसी को बाइफ़ाई की, किसी को चाकरी की तो किसी को सत्ता की भूख थी टुकड़ा मिलते ही बुद्धि भ्रष्ट हो जाती ॥
कलुषित कल की कला ने जहाँ पसारे पाँव ।
नाउ खतियाए आपने खाए गाँव के गाँव ।२६१२।
भावार्थ : -- कलुषित कल्किकाला करने वाले कलयंत्रो ने जहाँ भी पाँव पसारे । वहां के वन क्या खेत क्या खदान क्या उसने गाँव के गाँव ही अपने नाम चढ़ाए और खा गए ।। जैसे जैसे गाँव समाप्त होते गए वैसे वैसे भारत का नाम भी मिटता चला गया और इण्डिया चमकने लगा ॥
काँख छुरी मुखधर राम पुनि अस सासक होए ।
मरे पड़े हैं आपने आन घराँ को रोए ।२६१३ ।
भावार्थ :-- फिर " कंख छुरी मुखधर राम " नाम के शासक हुवे । जो ऐसे थे मरे पड़े हैं अपने और ये दूसरों को रोने जाते ॥
पिछलों ने इण्डिया डिस्कवर किया अगलों ने साइनिंग इण्डिया.....
कलुष कल के करम संग जस जस उद्यम बाढ़ि ।
धनि दारिदता की रेख तस तस गयऊ गाढ़ि । २६१४।
भावार्थ : - प्रदूषणकारी कल यंत्रों का संग प्राप्त कर जैसे जैसे तत्संबंधित अन्य उद्यम बढ़ते गए वैसे वैसे धनाढ्य व् दरिद्रता के बीच की रेखा भी गहरी होते होते खाई में परिवर्तित हो गई ॥
उद्यमों से दरिद्र बढ़ने चाहिए की घटने चाहिए.....?
>> घटने चाहिए यदि बढ़ते हैं तो इसका तात्पर्य है उद्यम दरिद्र की संख्या का संवर्द्धन करते हैं कृषिकर्म अपवर्द्धन करते हैं.....
भ्रंस सासन प्रबंध सन , कलुषि जात के साथ ।
कलुषित बरन गाढ़त गए बाढ़त गयउ प्रमाथ ।२६१५।
भावार्थ :--उसपर भ्रष्ट शासन व्यवस्था और संकीर्ण मानसिकता वाली कलुष योनिज वंशज की बढ़नी के साथ बढ़ती हुई पाप की कालिमा ने बलात्कार, अपहरण,उत्पीड़न, हत्या आदि गंभीर अपराधों को भी बढ़ाया॥
देसाबर रहे न अबर देस रहे नहि देस ।
भारत भारतहि मैं अस होत गयौ अवसेस ।२६१६।
भावार्थ
: -- देसी विदेशी का भेद समाप्त ही कर दिया गया । अब विदेशी विदेशी न होकर
देसी हो गए यह देस देस न होकर जैसे विदेश हो गया यहाँ बाहरी लोग अधिक
दिखाई देते । विश्व की क्या कहें भारत में ही भारत का अस्तित्व समाप्त
होने लगा । अब यहाँ कोई भी विदेशी चाहे वह ब्रिटेन की महारानी ही क्यों न
हो राज कर सकता था पण यह है कि उसे किसी खूसट से विवाह करना होगा ।।
जहँ लग देखिहौ तहँ लग अपराधहि अपराध ।
ऐतक जन संबाध में, अपराधी एक आध ।२६१७।
भावार्थ : -- अब न तो कोई शासन व्यवस्था ही रही न न्याय व्यवस्था, जहाँ तक दृष्टि जाती वहां तक अपराध ही अपराध दिखाई देता इतने लोगों की भीड़ में अपराधी एक आध ही दिखाई देता ॥
करे परायो आपना पड़े पराई पोर ।
बगुले की सी भगति किए ये ततार के चोर ।२६१८।
भावार्थ: -- ये तातारी के डाकू-लूटेरे थे जो पराया-धन को भी अपना मानते हैं ॥ जहाँ रहते हैं वहां बगुले सी भक्ति करते हैं ।। यही वह लोग हैं जिन्होंने भारत के अस्तित्व को अस्त करते हुवे उसे चार भागों में विभाजित कर दिया ॥
स्पष्टीकरण १ : - पंचानबे प्रतिशत से भी अधिक हाइब्रिड भारतीय इन्ही से हैं जाति- संकर इन्ही की झोली में जाकर गिरते हैं । हाइब्रिड में न रसहीन, गुणहीन व् स्वादहीन होते हैं बस ये दिखने भर के अच्छे होते हैं । ये राष्ट्र के लिए स्वास्थवर्धक नहीं होते, ये राष्ट्र-वाद के विरोधी होते हैं वेद पुराणों में तो इनकी कड़े शब्दों में भर्त्सना की गई है ॥
स्पष्टीकरण २ : -- ये अपने ही पेट के परायण होते हैं राष्ट्र पर संकट आन पड़े तो उसे छोड़ कर भागने वालों में ये सबसे आगे होते हैं ॥
स्पष्टीकरण २ : -- ये अपने ही पेट के परायण होते हैं राष्ट्र पर संकट आन पड़े तो उसे छोड़ कर भागने वालों में ये सबसे आगे होते हैं ॥
देस बिरोधि नेम करे जब कोउ संबिधान ।
बिधि हतत होत सो तो आपा ग्रन्थ समान ।२६१९।
भावार्थ : -- किसी राष्ट्र का संविधान यदि राष्ट्र विरोधी नियम उपबंधित करता हो तो वह विधिध्न होते हुवे आपा-ग्रन्थ के समतुल्य होता है ।
यह भू यह धन सम्पदा यह भारत के जोग ।
भारतहि को बंचित किए भोगें पराए लोग ।२६२०।
भावार्थ : -- यह भूमि नदी वन खेत खलिहान यह खदान भारत ही की धन सम्पदा थी हुवे इससे भारत को ही वंचित कर नियम उपबंधित करते इसे परायों के उपभोग हेतु प्रस्तुत किया गया ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें