सत्तावादि सासन पुनि पूंजी वादि प्रबंध ।
सत्तावाद = जहां सत्ताधारी का मत ही सर्वमान्य हो
पूंजी वादी व्यवस्था = ऐसी प्रणाली जिसमें धनिक वर्ग उत्पादक संसाधनों पर बलपूर्वक अधिकार कर श्रमिकों का शोषण करते है
दोउ देस सम्पद् करे,शासक के कर बंध ।२६०१।
भावार्थ : -- सत्तावादी शासन फिर पूंजी वादी व्यवस्था इन दोनों ने देश की धन
सम्पदा को शासकों की बंधक घोषित कर दिया ॥ सत्तावाद = जहां सत्ताधारी का मत ही सर्वमान्य हो
पूंजी वादी व्यवस्था = ऐसी प्रणाली जिसमें धनिक वर्ग उत्पादक संसाधनों पर बलपूर्वक अधिकार कर श्रमिकों का शोषण करते है
सासन हर भए सास्ता,सासन अंकुस हीन ।
तासों धनपत पिएं भए , दीन दिनोदिन दीन ।२६०२।
भावार्थ
: -- ऐसी द्वैध व्यवस्था में फिर तो शासक अधिनायक ( स्वेच्छाचारी) हो गए ।
शासन निरंकुश होता चला गया अब यह जो चाहता वही होता । निरंकुश शासन
का प्रोत्साहन प्राप्त कर धनिक वर्ग परिपुष्ट होता गया और दीनों निरंतर
दीन होती चली गई
अर्थाधार किए पुनि एक रेखा खींचत आए ।
धनपत उपरोपर करे, दरिद नीच धकियाए ।२६०३ ।
भावार्थ
: -- आर्थिक आधार पर फिर एक रेखा खींचते हुवे परिपुष्ट धनियों को बहुंत
बहुंत बहुंत ऊपर और जो कभी धनवान किसान था उसे दरिद्र दास बना कर नीचे
धकेल दिया गया । इस प्रकार इस देश की शासन व्यवस्था जो कभी कर्म पर
आधारित थी वह अब अर्थ पर आधारित हो गई ।।
अंतर के पट और हैं बाहिर के पट और ।
परन कुटी का जोगना बसे सुबरनी ठौर ।२६०४।
भवार्थ
: -- जिसके अंतर के पट कहीं और खुलते बाहिर के पट कहीं और ऐसा वो
वन कुटिया का महात्मा था जो सोने की लंका में रहता था । और गाँधी- वाद भी कुछ
ऐसा ही है ॥
सब किछु अपना जान के सब किछु आपन मान ।
आपापंथी ने रचे, अपने मन के कान ।२६०५।
भावार्थ: - इस गांधीवादिता का अनुशरण करते हुवे सम्पदा को अपना जान कर अपने को सब कुछ मानते हुवे ये आपापंथी अपने ही मन के विधान रचते गए ।।
सेवक बने अधिनायक, चले कुचालि चाल ।
धर्मादा के कोष में,लगे आपदा काल ।२६०७ ।
भावार्थ : -- इस देश ने वह समय भी देखा जब सेवक से इच्छाचारी शासक बने इन नताओं ऐसी दुष्ट चाल चली कि धमार्थ निकाले हुवे धन पर आपात काल लगाया गया जो किसी महा -भूचाल के जैसा ही था ॥
एक धन कोषज बाहिरे भीतर एक धन कोष ।
कोष कोष को सोष के करे खेत कलि पोष ।२६०८।
भावार्थ
: -- आपात काल के पूर्व यहां निवासित लोगों के विदेशी बैंकों में लेखे थे ऐसा सुनने में नहीं आया था , इस काल में लूटे गए धन को विदेशों
में पहुंचाया गया , और मनचाहे को रेवड़ी के जैसे बँटा । अब यहाँ बृहद उद्यम की स्थापित करने की होड़ होने लगी । तदनन्तर कृषि कार्य योग्य भूमि का शोषण कर वहां कल की कलुषित
कलाओं का पोषण किया । अब इनका देश के बाहिर एक धन कोष है देश के भीतर एक धन
कोष है, न्याय की व्यवस्था इनके शब्द-कोष में नहीं है ॥
आपा पंथीहि फिर तो भए राजाधिकारि ।
धंधारी बेपार भए धुंधारी बैपारि ।२६०९ ।
भावार्थ : -- फिर क्या था भारत की गद्दी इच्छाचारिता का ही अधिकार हो गया । उलटे सीधे धंधे व्यापार व् उलटे सीधे लोग साहूकार हो गए ॥ आपात काल के उपरांत पांच साल में ही बड़ी बड़ी कंपनिया खड़ी हो गईं जो बड़ी थी वो और बड़ी हो गईं ।।
उदाहरण :-- नवासी नब्बे में हमारे पारा में एक धनि आया क्यों आया सटील पलांट लगाने आया । लोगों ने उसकी कुंडली खोली पता चला पंद्रह वर्ष पूर्व वह घुर-बिनिया ( सडकों में पड़ी टूटी फूटी वस्तुएं व् लोहे लक्कड़ इकट्ठे करने वाला ) था ॥
उदाहरण :-- नवासी नब्बे में हमारे पारा में एक धनि आया क्यों आया सटील पलांट लगाने आया । लोगों ने उसकी कुंडली खोली पता चला पंद्रह वर्ष पूर्व वह घुर-बिनिया ( सडकों में पड़ी टूटी फूटी वस्तुएं व् लोहे लक्कड़ इकट्ठे करने वाला ) था ॥
पूँजी करे उधार कूट कपट के छाए ।
तापर भू उपहार की जहँ तहँ कल बिकसाए ।२६१०।
भावार्थ : - छल कपट की छत्र छाया में उधार की पुंजी से दारिद दास पूँजी पति हो गए उसपर बंदर बाँटा में कृषि भूमि उपहार स्वरूप मिल गई और यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ उद्योग विकसित हो गए ॥
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