शनिवार, 30 मई 2015

--- ॥ दोहा-दशम २६७ ॥ -----

तिनके रीत रीत कहेँ  देवें साधू वाद । 
जो कोउ बिपरीत रहेँ तासो संग विवाद ।२६७१ । 
भावार्थ : -- इनके सुर में जो सुर मिलाता वह साधु वाद को प्राप्त होता ।जो कोई करकस कह देता वह फिर विवादित-वस्तु हो जाता और न्यायालयों में पड़ा मिलता ॥

जन जन के धन सम्पदा बन खन खेत खदान । 
किए मन मानी आपनी जानत उत्तरु दान ।२६७२। 
भावार्थ:--भारत के साधारण नागरिक जनों की धन सम्पति  और उनके वन खंड खेत व् प्राकृतिक सम्पदा को पैतृक सम्पति जान कर ये मन माना व्यवहार करते ।

स्पष्टीकरण :-- संयुक्त परिवार का जब विभाजन होता है तब पारिवारिक सम्पति के सह उसपर अधिरोपित ऋण का भी विभाजन होता है.....

काम बिनु कर नाम चहेँ,रहएँ बिदेसी ठाम । 
चमक चाँदनी चाम किए आठो जाम बिश्राम ।२६७३। 
भावार्थ : -- ये सत्ताधारी विदेशों में रहकर बिना काम के ही नाम करना चाहते । इनकी बनी-ठनी काया चौबीस घंटे विश्राम की ही मांग करती ॥

स्पष्टीकरण : - खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है सो बाद वाले भी इन्ही के रंग में रंग गए ॥

लाख राख रख आपने देवे लाखों लाख । 
जहाँ देस का राखिया, तहँ गड़ावैं आँख । २६७४। 
भावार्थ : -- लाखों लाख पारिश्रमिक दे करये बिचौलिये अपने लाखों रक्षक रखते । जहाँ देश की कोई रक्षा कर रहा होता वहां इनकी कुदृष्टि रहती ॥ 

काल बरन के मानिके गौर परन अवगूँठ । 
बाहिर साँचा पट दियो, भीतर झूठहि झूठ ।२६७५।  
भावार्थ : -- काल वर्ण  के मनकों को गौर पर्ण में गोपन कर इन्होने  ऐसा संविधान रचा  जिसके मुख पृष्ठ पर सत्य लिखा था भीतर झूठ ही झूठ  ॥


आन पास छूटत फसे संविधान के फास । 
जुग जुग के गोसाइयाँ रहे दास के दास ।२६७६।  
भावार्थ :-- पराई अधीनता से मुक्त हुवा तो इस असंवैधानिक संविधान के फंद में  फंस गया  । युगों का  स्वामी होकर भी यह भारतीय जन मानस दास का दास ही रहा ॥

सासक सेवक जान के पड़े भरम मैं लोग ।
जीवति बिहीन होत भए  जीवन जोग बिजोग ।२६७७। 
भावार्थ : -- शासक को सेवक व् स्वयं को स्वामी मानकर लोग भ्रमित रहे और इस दासता को वरण  किए रहे । आजीविका रहित होकर इन दासों का जीवन  आधार भूत  आवश्यकताओं  से भी विहीन रहता ॥

सुजल सुफल सरूप रही जाकी अगद अगानि । 
नाज तोले तोल मिले मोल मिले तहँ पानि ।२६७८। 
भावार्थ :-- देश वासी जिस  देश का पवित्र जल से  फल से शस्य सम्पद् से परिपूर्ण रूप में अगद जय गान करते ॥  वहां अब अन्न  तोले के तोल व् जल मोल मिलने लगा ॥


निर्झर रहे न निरझरी रहे न सरिबर ताल । 
कलजंत्रि मल संग मिले , नदी भई परनाल । २६७९। 
भावार्थ : -- निर्झर रहे न निर्झरणी ही रही सरोवर ताल आदि जल के स्त्रोत समाप्त हो गए । कलयंत्रों के अवशिष्ट का सांगत प्राप्त कर नदियाँ परनालों में परिणित होने लगी ॥ 

काल कलुषि क्लजंत्र की कला पसारे पाँउ । 
देस रहे न देस अजहुँ,  गाँउ रहे नहि गाँउ ।२६८०। 
भावार्थ : -- प्रदुषण कारी  कलुषित कलयंत्रों की कला अपने पाँव  पसार चुकी थीं । भारत अब भारत नहीं रहा उसके गाँव अब गांव नहीं रहे वे काले मरुस्थल में परिवर्तित होने लगे ॥







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