सद्जन कहि बिसार के अपने करे प्रचार ।
तिनके पंथ नुहार के,बिगड़े देसाचार ।२६६१ ।
भावार्थ :-सज्जनों के सुविचारों को विस्मृत कर इन्होने अपने संकीर्ण विचारोंकोपचारित किया । जो मैं और मेरा तक ही सिमित था ऐसे संकीर्ण पंथ के अनुकरण ने इस देश की संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर दिया ॥
धर्म कर्म भरमाए पुनि भयउ पाप के राज ।
बिगड़े देसाचार सों बिगड़े जाति समाज ।२६६२।
भावार्थ :-- धर्म कर्म को विभ्रमित कर फिर देश पर पाप का ही राज हो गया । छिन्न-भिन्न संस्कृति के सह जाति व् समाजों में भी विकृतियां पनपने लगी ॥
प्रिया रहे न पिया रहे रहे न कतहुँ प्यार ।
बँधे बंधन छूट रहे टूट रहे परिवार ।२६६३ ।
भावार्थ : - अब गृह तो रहा किन्तु गृहस्थी न रही, गृहवासी गृहस्थ न रहे । विदेशी संस्कृति के अनुकरण से विवाह सम्बन्ध छूटने लगे परिवार टूटने लगे ॥
सुवासस सबहि तन चहेँ बासन चहेँ सुबास ।
बिंहि करम बिनहि परिश्रम जीवन चाहें सुपास ।२६६४।
भवार्थ : -- देश भीतर के विदेश की चकाचौंध को देखकर लोगों के विचार पतित हो चले । वे कर्म व् परिश्रम के बिना ही आकर्षक वस्त्र धारण किए हुवे विलसित वसतियों में वास कर सुखमय जीवन कामना करते॥
भारत के धन सम्पदा जब चहँ लेइ निकास ।
देस भीत बिदेस के दिन दिन करे बिकास ।२६६५।
भावार्थ:-- इसी सुखमय जीवन का सपना दिखाकर स्वेच्छाचारी शासक भारत की धन सम्पद का निष्कासन तो कर लेते उसे देते कुछ नहीं । कुछ देते भी तो उससे देश के भीतर बसे विदेश को देते परिणाम स्वरूप यह दिनोंदिन विकसित होता गया ॥
मूल नागरी नगन किए किए गन मान अमूल ।
यापद सूलहि सूल दिए यापद फूलहि फूल ।२६६६।
भावार्थ :--देश नगरिकों की अवहेलना कर अन्यान्य मूलहीन को गणमान्य किया । मूल नागरिको को उसके जीवन हेतु से भी वंचित कर मूल हीन को साधन-संपन्न किया ॥ देश के वास्तविक उत्पादन (कृषि व् तत्संबंधित अन्य उत्पाद ) में इन मूलहीनों की सहभागिता लगभग शुन्य रही ॥भोग परायन होए जब,चित पर छाए प्रमाद ।
सासक भयउ अधिनायक, सासन सत्ता वाद ।२६६७।
भावार्थ :-- भोग विलासिता के वशीभूत शासक सत्ता से प्रमादित होकर स्वेच्छाचारी हो गए वे कर्त्तव्य से निवृत्त अकर्त्तव्य को कार्य रूपमें परिणित करने लगे शासन पर सत्तावाद का अधिकार हो गया ॥
सत्तावाद =
आन कही पुरान कहे अपनी कही नवान ।
जो ताहि अनुमान कहे होइब सोए बिधान ।२६६८।
भावार्थ : -- अन्यान्य के कथन को ये पुराण पंथी कहते अपने आपा पंथी विचारों को आधुनिक कहते । ज्ञान विज्ञानं से अन्यथा इनका अनुमान जो कहता वही विधान होता ॥
स्पष्टीकरण : -- जब संसार में कोई भी धर्म प्रवर्तित नहीं हुवा था यह आपा-पंथ तब से है
धर्म धुरीन के कर भए बिपनन संग बिहीन।
पबित जात कुलहीन भए कलुखित जात कुलीन।२६६९।
भावार्थ:--धर्म की धुरी धारण करने वालों के हस्त विपणन कार्य से विहीन हो गए । परिणामतस् पवित्र कुलों के जातक कुलहीन व् अपवित्र कुल के जातक कुलीन हो गए ।
धर्मी कर कृपनी करत पापी करे धनेस ।
जन जन की धन सम्पदा पहुचे बाहिर देस । २६७० ।
भावार्थ: --इस तथाकथित कुलीनता ने राष्ट्र की आर्थिक शक्ति धर्मधी से पापधी को हस्तांतरित कर दी । जो जन साधारण की निर्मल सम्पदा थी वह कलुषित होकर द्रुतगति से विदेशों में पहुंचने लगी ॥
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