शुक्रवार, 22 मई 2015

----- ॥ दोहा-दशम २६६ ॥ -----

सद्जन कहि बिसार के अपने करे प्रचार । 
तिनके पंथ नुहार के,बिगड़े देसाचार ।२६६१ । 
भावार्थ :-सज्जनों के सुविचारों को विस्मृत  कर इन्होने अपने संकीर्ण विचारोंकोपचारित किया । जो मैं और मेरा  तक ही सिमित था  ऐसे संकीर्ण पंथ के अनुकरण ने  इस देश की संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर दिया ॥

धर्म कर्म भरमाए  पुनि भयउ पाप के राज । 
बिगड़े देसाचार सों बिगड़े जाति समाज ।२६६२। 
भावार्थ :-- धर्म कर्म को विभ्रमित कर फिर देश पर  पाप का ही राज हो गया । छिन्न-भिन्न संस्कृति के सह जाति  व् समाजों में भी विकृतियां पनपने लगी ॥


प्रिया रहे न पिया रहे रहे न कतहुँ प्यार ।
बँधे बंधन छूट रहे टूट रहे परिवार ।२६६३ । 
भावार्थ : - अब गृह तो रहा किन्तु गृहस्थी न रही, गृहवासी गृहस्थ न रहे  । विदेशी संस्कृति के अनुकरण से विवाह सम्बन्ध छूटने लगे परिवार टूटने लगे ॥ 


सुवासस सबहि तन चहेँ बासन चहेँ सुबास । 
बिंहि करम बिनहि परिश्रम जीवन चाहें सुपास ।२६६४। 
भवार्थ : -- देश भीतर के विदेश की चकाचौंध को देखकर लोगों के विचार पतित हो चले । वे कर्म व् परिश्रम के बिना ही आकर्षक वस्त्र धारण किए हुवे विलसित वसतियों में वास  कर सुखमय जीवन कामना करते॥ 

भारत के धन सम्पदा जब चहँ लेइ निकास ।
 देस भीत बिदेस के दिन दिन करे बिकास ।२६६। 
भावार्थ:-- इसी सुखमय जीवन का सपना दिखाकर स्वेच्छाचारी शासक भारत की धन सम्पद का निष्कासन तो कर लेते उसे देते कुछ नहीं ।  कुछ देते भी तो उससे देश के भीतर बसे विदेश को देते परिणाम स्वरूप यह दिनोंदिन विकसित होता गया ॥

मूल नागरी नगन किए किए गन मान अमूल । 
यापद  सूलहि सूल दिए यापद फूलहि फूल ।२६६। 
भावार्थ :--देश  नगरिकों की अवहेलना कर अन्यान्य मूलहीन को गणमान्य किया । मूल  नागरिको को उसके जीवन हेतु से भी वंचित कर मूल हीन को साधन-संपन्न किया ॥ देश के वास्तविक उत्पादन  (कृषि व् तत्संबंधित अन्य उत्पाद ) में इन मूलहीनों की सहभागिता  लगभग शुन्य रही ॥

भोग परायन होए जब,चित पर छाए प्रमाद ।
सासक  भयउ अधिनायक, सासन सत्ता वाद ।२६६७।
भावार्थ :-- भोग विलासिता के वशीभूत शासक सत्ता से प्रमादित होकर स्वेच्छाचारी हो गए वे कर्त्तव्य से निवृत्त  अकर्त्तव्य को कार्य रूपमें परिणित करने लगे शासन पर सत्तावाद का अधिकार हो गया ॥

सत्तावाद =

आन कही पुरान कहे अपनी  कही नवान । 
जो ताहि अनुमान कहे होइब सोए  बिधान ।२६६८। 
भावार्थ : -- अन्यान्य के कथन को ये पुराण पंथी  कहते  अपने आपा  पंथी विचारों को आधुनिक कहते । ज्ञान विज्ञानं से अन्यथा  इनका अनुमान जो कहता वही विधान होता ॥

स्पष्टीकरण : -- जब संसार में कोई भी धर्म प्रवर्तित नहीं हुवा था यह आपा-पंथ तब से है

धर्म धुरीन के कर भए बिपनन संग बिहीन। 
पबित जात कुलहीन भए कलुखित जात  कुलीन।२६६९। 
भावार्थ:--धर्म की धुरी धारण करने वालों के हस्त विपणन कार्य से विहीन हो गए  । परिणामतस् पवित्र कुलों के जातक कुलहीन व् अपवित्र कुल के जातक  कुलीन हो गए । 

धर्मी कर कृपनी करत  पापी करे धनेस । 
जन जन की धन सम्पदा पहुचे बाहिर देस । २६७० । 
भावार्थ: --इस तथाकथित कुलीनता ने राष्ट्र की आर्थिक शक्ति धर्मधी से पापधी  को हस्तांतरित कर दी  ।  जो जन साधारण की निर्मल सम्पदा थी वह कलुषित होकर द्रुतगति से विदेशों में पहुंचने लगी ॥ 













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