सिंहासन के रन ठने पुनि दुहु खल दल बीच ।
हाथ ही के साथ रहे गहे कमल दल कीच ।२६५१ ।
भावार्थ: -- पुनश्च चुनाव हुवे जो इण्डिया की गद्दी के लिए युद्ध ही था । दुष्टों के दल आमने-सामने थे । कीचड़ में धंसा कमल हाथ के साथ ही विराजित प्रतीत होता । लड़ाई वही थी शासन तो अंग्रेजी होगा अंग्रेज हम बनेंगे ।।
सिंहासन के लालची फिरैं दुआरि दुआरि ।
रंकु राउ सुपनाए के अपने होइ भिखारि ।२६५२ ।
भावार्थ : -- गद्दी के लालची दुआर दुआर फिरते । ये जन साधारण को राजा बनने के सपने दिखाते, स्वयं भिखारी का छद्म वेश भरे हुवे होते ॥
बड़े ठिकाने ठौर के भँवरे पौरहि पौर ।
काढे दंत निहोर किए मांगे मत के कौर ।२६५३ ।
भावार्थ : -बड़े ठौर ठिकानों के भी स्वान के जैसे मत रूपी टुकड़े के लिए द्वार द्वार जाते और गिड़गिड़ाते हुवे याचना करते ॥
जनमत जल जन जलधिभए मथे भूत बेताल
प्रगसि सत्ता सुधा कलस पावन करे कुचाल ।२६५४ ।
भावार्थ : -- जन संकुलता सिंधु स्वरूप हो गई तब जनमत जल हो गया । दुष्टों का द्विदल फिर उसका मंथन करने लगा । जब सत्ता का अमृत कलश प्रकट हुवा तब उसे प्राप्त करने हेतु सभी दुष्ट चालें चलने लगे ॥
अहिरनिस जग होइ रहए होइ रहए सब बात ।
दरसन मैं तो हस्ततल करतन मैं जो ठूँठ ।
धावत ऊँचे पद चढ़े, सुधा कलस अवगूँठ ।२६५५ ।
अहिरनिस जग होइ रहए होइ रहए सब बात ।
जब जागै तब दिन भया,जब सोया तब रात ।२६५५।
भावार्थ : -- रात व् प्रभात होते रहे जगत के सारे प्रपंच भी होते ही रहे । जो सोए रहे उनका अन्धेरा ही रहा जगा सबेरा उसी का हुवा ॥
दरसन मैं तो हस्ततल करतन मैं जो ठूँठ ।
धावत ऊँचे पद चढ़े, सुधा कलस अवगूँठ ।२६५५ ।
भावार्थ : -- दर्शन में जोहस्ततल ही काम करने में जो टुंडा हो जाता है जो अपनी समझ के नरेश हैं । वे उस सत्ता के सुधा कलश को छिपाते हुवे ले भागे और ऊँचे सिंहासन पर जा बैठे ॥
भावार्थ : -- सत्ता का सुधा कलश दुष्टों के हाथ लग गया । दुराचार रूपी विष का पान कर जन साधारण महाकाल हो गया उसने अपराधियों, हिंसा व् आतंकवादियों को अपने कंठ में ग्रहण कर लिया ॥
सत्ता के मदिरा भरे धरे बात के पात ।
सत्ता सुधा खल कर दै जन जन भए महकाल ।
दुराचार बिष पान किए गहेउ कंठ ब्याल ।२६५६।भावार्थ : -- सत्ता का सुधा कलश दुष्टों के हाथ लग गया । दुराचार रूपी विष का पान कर जन साधारण महाकाल हो गया उसने अपराधियों, हिंसा व् आतंकवादियों को अपने कंठ में ग्रहण कर लिया ॥
एक लघु दरसी बिअ भीत एक बट बिटप बिसाल ।
जन जनहि जन पाल रूप जनहि रूप महकाल ।२५८६ ।
भावार्थ
:--एक लघुदर्शी बीज के भीतर एक विशाल वटवृक्ष होता है ।जन साधारण ही जग पालक है संचालक है वही महा विनाशक महाकाल का रूप है शासकों को यह संज्ञान न हुवा ॥
भूखे पेट प्रहार को झूठे करे प्यार ।
जीते जी को मार के जोते हारनि हार ।२६५४ ।
भावार्थ : -- भूखे के पेट पर रोटी का प्रहार कर किसी ने झूठा प्यार दिखाया । उन्हें जीते जी मार के हारी हुई सत्ता को पुनश्च जीत ली ॥
राम भरोसा भूर के रहे भरोसे और ।
पंच परोसा दूर के मूरख माँगे कौर ।२६५५।
----- ॥ गोस्वामि तुलसी दास ॥-----
भावार्थ
: -- ईश्वर ने कितना कुछ रचा है जो ईश्वर का भरोसा छोड़ के अन्यान्य के
भरोसे रहता है वह उस मूर्ख के समान है जो पञ्च परोसा छोड़ के टुकड़ा माँगता
फिरता हो ।----- ॥ गोस्वामि तुलसी दास ॥-----
सत्ता के मदिरा भरे धरे बात के पात ।
पुरुख पान कर डोलिहीं, नारी रही उठात ।२६५६।
भावार्थ : -- बातों के कुम्भ में भरी सत्ता की मदिरा का पान कर सत्तापुरुष उन कुम्भों को इधर-उधर फेंकते, डोलते, गिरते, फिरते स्त्रियां उन्हें और उनकी मद्य पात्रों को उठातीं क्या यही है स्वच्छता अभियान.....?
जो केहि जोग नहीं सो बने फिरए जग राए ।
झाँकर घर कर आपने दूजे झाँक बताए ।२६५७ ।
भावार्थ:-- जो किसी योग्य नहीं थे वे जगन्नाथ बने फिरते । अपने घर का दूर से अपूर्ण दर्शन कर दूसरे के घरों की झाँकी निकालते ॥
जन सेबक एहि देस के अपने समझ नरेस ।
उड़न खटोले उड़ फिरै पड़े रहे परदेस ।२६५८।
भावार्थ : -- इस देश के जन सेवक स्वयं को नरेश समझ कर उड़न खटोला उड़ाते फिरते और विदेशों में पड़े रह कर रंगरलियां मनाते दिखते ॥टिप्पणी : -- जैसे कई लोग अपने आपको भगवान समझते हैं किन्तु होते नहीं हैं उसी प्रकार ये नेता अपने आपको भारत-नरेश समझते हैं और पुराने जमाने के जैसे भेष बदल के लोगों के घर झाँकते फिरते हैं ॥
एक नागरिक को चाहे वह किसी भी पद पर क्यों न हो कितने समय तक विदेश में होना चाहिए.....
बहुंत प्रीति पुजाइब मैं पूजिब मैं नहि थोरि ।
नाउ जन (हरि)सेबक धरिहै, करिहैं डाका चोरि।२६५९।
भावार्थ : - संविधान ने इनका नाम जनसेवक रखा । इनकी रूचि सेवा करवाने में रहती, करने में नहीं । करने में करने में तो ये केवल डाके-चोरी ही करते ॥
परजन कंठ लगाए के तिनकी कहि पतियाए ।
होत पराया देस सन रहे जोग को नाए ।२६६० ।
भावार्थ :-- जो विदेशियों को अपना कर उनकी कही में आता है । वह अपने देश से पराया होकर किसी योग्य नहीं रहता ॥
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